Uthaigeer

प्रस्तुति सिकन्दर हयात

(साहित्य अकादमी दुवारा पुरुस्कृत मराठी आत्मकथा लेखक लक्ष्मण गायकवाड़ अनुवादक सूर्यनारायण रणसुभे)

लेखक की और से – जिस समाज में में जन्मा उसे यहाँ की वर्णवयवस्था और समाज व्यवस्था ने नकारा हे सेकड़ो नहीं हज़ारो वर्षो से मनुष्य के रूप में इस वयवस्था दुवारा नकारा गया मेरा यह पशुवत जीवन जीने के लिए मज़बूर किया गया मेरा यह समाज . अँगरेज़ सरकार ने तो ” गुनाहगार ” का ठप्पा ही हमारे समाज पर लगा दिया और सबने हमारी गुनहगार के रूप में ही देखा और आज भी उसी रूप में देख रहे हे रोजी रोटी के सभी साधन और सभी मार्ग हमारे लिए बंद कर दिए गए इसी कारण चोरी करके जीना यही एकमात्र पर्याय हमारे सम्मुख शेष रह गया हम पर थोपे गए चोरी के इस वयवसाय का उपयोग उपर वालो ने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए किया सभवतः विश्व भर में एक हमारी एकमात्र जाती होगी जिसे जन्म से ही गुनाहगार घोषित किया गया हे जिनके माथे पर जन्म से ही अपराधी की मुहर लगाई गयी आखिर ऐसा क्यों हुआ इसका समाजशास्त्रीय अध्ययन कभी तो होगा ही ——————————————————–लक्ष्मण गायकवाड़ 1 अगस्त 1987 तिलकनगर लातूर .

जिस समूह के पास न कोई अपना गांव हे न खेत हे न कोई जाती हे और न जन्मदिन के हिसाब किताब की कोई पद्धति – ऐसी ही एक जाती में जन्मा लातूर तहसील के धनेगाव नमक गाव में एक उठाईगीर जाती में जन्मा .जब में छोटा था तब मेरे घर पर घास फुस का छप्पर था . यह छप्पर मुझे गोरैया के घोसले की तरह लगता जमीं पर बैठ कर रेंगते हुए ही हम सबको इस घर के भीतर जाना पड़ता था —————— बहुत पहले से हमारा पूरा घर दादा ही चलाता था दूरदराज़ फैले गावो में वह जेब काटने उठाईगिरी करने जाता था इस पुरे इलाके के उठाईगीरों में वह बहुत मशहूर था निजाम सरकार में उसका नाम एक प्रमुख उठाईगीर के रूप में लिया जाता था ——————— यु हमारे घर में खाने वाले ज़्यादा थे पर कमाई बहुत नहीं थी नाना शिकार के लिए जाता था मछली खरगोश हिरन गीदड़ जंगली बिलाव चूहे केकड़े कछुआ नेवला आदि का शिकार करता था इस कारण घर में कुछ न कुछ खाने को मिलता ताता ( नाना ) की चोरी दादा या अन्य सभी से भिन्न थी उसे कोई चोर नहीं कह सकता था उसकी चोरी कमाल की होती थी में और ताता चूहे पकड़ते थे घर में चूहे तो भरपूर थे ही इन चूहों का उपयोग ताता चोरी करने के लिए करता था जिस किसान के खेतों में गेहू काफी पक गया हो , उसके खेत में इन चूहों को वह छोड़ देता . गेहू के भुट्टो को कुतर कुतर के कर ये चूहे उन्हें ज़मीन के भीतर बिलों में छिपाते . गेहू की कटाई के बाद ताता उस खेत के मालिक के पास पहुंचता कहता की इन चूहों के बिलों को खोद कर उन्हें साफ कर दूंगा मालिक तैयार हो जाता में और ताता चूहे के बिलों को खोजते खोदते खेतों के उन सुराखों में से गेहू की बालिया ही बालिया निकलती उन बालियों में तेज़ी से कपडे में बाँधने लगता गेहू की बालिया तो में उठाता ही , बिल में से जो चूहे निकलते उनका शिकार करके उन्हें भी साथ ले आता बाद में हम दोनों चूहों को भुनते उन्हें खाते इस प्रकार से प्राप्त गेहू से ताता ने चार बोर भर रखे थे इस गेहू से ताता ने मेरे दो भाइयो की शादी करवाई ताता के साथ शिकार के लिए में जाता इसलिए किसी भी जानवर का मांस में खाने लगा . चूहे खरगोश मछली नेवला हिरन गोह लखापक्षी बदक बगुला कछुआ पांगली बिल्ली सूअर गीदड़ कबूतर केंकड़ा भेद बकरी मेना सरस मोर किते नाम गिनाऊ इन सबके मांस मेने खाये हे ———————————————

हमारा घर बहुत ही छोटा था उसमे सभी लोग चीलर की तरह भरे रहते एक ही छप्पर के नीचे बकरिया भी बाँधी जाती और आदमी औरत भी सोते . में और हरचंदा बकरियों के पास सोते जाड़े के दिनों में बहुत परेशानी होती दोनों में एक ही चादर . हमारी इस चादर में कुत्ता भी घुस जाता . बकरिया पास में बंधी रहती रात में वे पेशाब करती उनकी पेशाब ठीक मेरे नीचे फैलती बकरियों की वह गरम पेशाब जाड़े की उस ठण्ड में सुखद लगती . जाड़े से परेशान में , सोचता की बकरिया लगातार मूतती रहे ताकि ठंड तो न लगे . सवेरे हम जगते . पर ओढ़ी हुई चादरों को धोते नहीं थे . छप्पर पर यु ही सुखाने को डालते बकरियों की पेशाब की दुर्गन्ध उससे निकलती . पर रात में हम फिर उसी को ओढ़ते . हमारा मन हमारी सवेंदनाय मर चुकी थी . कुछ महसूस ही नहीं होता था उस ओढ़ने की चादर में चीलर हो जाते हम दोनों उन्हें मारते एक दो तीन कभी सौ तक कड़ी धुप जब होती तो वह चादर हम सूखने डालते उससे हज़ारो चीलर धुप की गर्मी से आस पास फैलते . हम उन्हें मरने बैठते फिर भी चादर धोते नहीं थे साल में केवल एक बार उसे धोते दहशरे के अवसर पर बस . बाद में साल भर उसे ओढ़ते में महीने में से किसी एक दिन ही नहाता कोई कहता भी नहीं था की नहा ले जब नहाने की यह इस्तिती , तब चादर धोने की तो बात बहुत दूर की रही ——————- स्कूल में पहली बार जा रहा था मुझे वहां सब कुछ अजीब सा लगता था सियारो के झुण्ड में मानो कोई अकेली बकरी आ गयी हो कक्षा के सभी लड़के मुझे कंकड़ों से मारते , कहते उठाईगीरों का लक्ष्या स्कुल में कैसे ? कुछ लड़के चिल्लाते अरे यह तो केंकड़े खाने वाला हे ——————- ————-

एक एक माह तक में नहाता नहीं था बहुत गन्दा रहता इस कारण सर में भूसा ही भूसा हो जाता वहां रुसी हो जाती सतत खुजलाता रहता सतत खुजलाने से फोड़ो में से पानी पिव और कभी कभी खून निकलता में सर पर हाथ फेरता और उसकी गंध को सूंघता पीव और पानी निकलने से बाल एकदूसरे से चिपके रहते एक बार माँ को अपनी तकलीफ बताई फोड़े बताय ———– माँ ने डांटा जरूर पर उसी समय वह मेरे बाल काटने बैठी फोड़े पर जमी पपड़ी भी निकाल दी फोड़ो में से कीड़े बिलबिला रहे थे माँ बहुत घबराई यह तो देवी का प्रकोप हे हां याद आया मेने पिछले मंगल को उपवास भी नहीं किया था उसका यह परिणाम हे चूल्हे में से रख निकल कर वह ले आई मेरे सर पर राख मलते हुए कहने लगी ” हे देवी माँ मेरे बेटे कह यह संकट दूर कर दे जब तक में तुझे बकरे की बलि नहीं दूंगी शुकवार और मंगलवार का उपवास करती रहूंगी फिर वह गांव से गणपति गडरिये को ले आई गणपति ने अपनी जेब से कीड़े निकालने हेतु उपयोग में लाइ जाने वाली चिमटी निकाली दादा और माँ ने मुझे कस कर पकड़ लिया मेरे हाथ पैर रस्सी से बांधे गए गणपति ने फिनेल को मेरे सर पर उड़ेल दिया सिर पर भयंकर आग लग गयी में जोर जोर से चिल्लाने लगा माँ ने डांटा चुप बैठ मुर्दे देख कीड़े कैसे बिलबिला रहे हे . फिनेल डालने के कारण कीड़े बिलबिलाने लगे और गणपति अपने चिमटे से कीड़े निकाल निकाल कर फेंकने लगा में लगातार रोटा रहा काफी देर तक यह चला बाद में माँ ने गरम पानी से मुझे नहलाया —————