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हिंदी नेट पर मेने जितने लेखकों पत्रकारों को पढ़ा हे उनमे रविश कुमार और संजय तिवारी संपादक विस्फोट को में सबसे अधिक विद्वान मानता हु संजय तिवारी हमेशा बेहद गुणीऔर निष्पक्ष व्यक्ति और लेखक लगे उनको हम 2010 के आस पास से लगातार पढ़ते आये हे याद आता हे की किस तरह से उन्होंने मकबूल फ़िदा हुसैन की मौत होने पर जश्न मना रहे हिन्दू कटट्रपन्तियो को जम कर लताड़ा था उनके सामने टिकने की उनके तर्कों को काटने की किसी बजरंगी की हिम्मत नहीं थी मगर पिछले कुछ समय से उनकी साइट और उनके पेज पर पाया की वो कुछ ”कन्वर्ट ” ( बदल ) से हो गए हे हालांकि अभी भी बहुत बेहतर हे मगर एक इतने अच्छे और निष्पक्ष लेखक का यु ज़्यादा या थोड़ा सा भी दक्षिणपंथ में कन्वर्ट सा हो जाना गम्भीर चिंता का विषय तो हे ही ( आज भी संजय तिवारी मुजफरनगर दंगो के आरोपी नेताओं के प्रचार का प्रचार करते दिखे एक प्रोपेगंडे बाज़ वहां लिखता हे की लेकिन कोई यह नहीं बताता कि जिस शहनवाज की हत्‍या पर ये दंगे भड़के थे उसकी छेड़छाड़ से तंग होकर दर्जनों लड़कियों ने कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी थी । इस पर तिवारी जी ने यह पूछने की ज़हमत नहीं उठाई की ऐसा था तो कोई पुलिस रिपोर्ट क्यों नहीं दर्ज़ कराइ गई ? इस क्लेश से आख़िरकार किसको फायदा होना था और हुआ भी ) जबकि पहले ही मिडिया का एक बड़ा हिस्सा इस सरकार का खुला चरण चुम्बन कर रहा हे ऐसा चरण चुम्बन जो इससे पहले किसी सरकार का नहीं देखा गया वो भी तब जबकि इस सरकार की कोई खास जमीनी उपलब्धि भी नहीं हे ऊपर से इस सरकार के आने के बाद से महगाई और साम्प्रदायिकता में समान इजाफा ही हो रहा हे सोशल मिडिया पर तो सबसे अधिक हिन्दू कटट्रपन्तियो फिर मुस्लिम कटट्रपन्तियो का भारी प्रचार हे ही . इंटरनेट से अधिकाधिक लोग उसमे भी कम उम्र लोग जुड़ ही रहे हे जो किसी भी तरह के प्रचार में बड़ी जल्दी बह भी जाते हे ऐसे में संजय तिवारी जैसे शुद्ध बेहतरीन ज्ञानी और निष्पक्ष लेखक पत्रकार का भी हल्का सा भी कन्वर्ट होना चिंता में तो डालता ही हे ऐसी बात नहीं हे की अब संजय तिवारी और सुरेश चिपलूनकर में कोई फर्क नहीं रहा नहीं ,मगर क्या एक निष्पक्ष लेखक से ये आशा की जा सकती हे की वो मोदी सरकार की सबसे बड़ी दुष्टता हरियाणा हिंसा पर कोई बड़ा और गम्भीर लेख तो छोड़ो दो शब्द भी ना कहे जबकि यही लोग अक्सर सोशल मिडिया पर दो लफ्ज़ो की टिप्पणियाँ तो लगातार करते ही रहते हे ज़ाहिर हे की थोड़े ही सही मगर अब दक्षिणपंथी झुकाव के कारण अब उनके दिल में इस शुद्ध संघी सरकार के लिए खासी जगह बन गयी हेलेकिन ऐसा क्यों हुआ वजह ?

मेने पाया की पिछले दिनों वो पाकिस्तानी मिडिया के वीडियो मुल्ला मौलवियों के वीडियो काफी देख रहे थे बड़े ही दुःख की बात हे की एक तो पाकिस्तानी मिडिया में कई बार हिन्दुओ के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया जाता हे इन्हे कोई रोक नहीं हे वही ये कुछ मुर्ख मुल्ला मुसलमानो को गज़वा ए हिन्द के ख्वाब दिखाते रहते हे यानि इनकी सोच की मुस्लिम फिर से दिल्ली पर कब्ज़ा करके हिन्दुओ को फिर से गौरी गजनबी औरंगजेब की तरह गुलाम बना लेंगे इनकी बाते इतनी भड़काऊ और बेहूदा होती हे की इनका अध्ययन करने के दौरान उनका शायद तिवारी जी पर गहरा असर हुआ होगा ऐसा असर जो उन्हें इस्लाम और मुसलमानो से खतरे और फिर हिन्दू कटटरपंथ के प्रति हल्की सी सहानभूति की तरफ ही ले जाएगा नतीजा उन्होंने दो साल से भी अधिक बीत जाने पर भी पहली शुद्ध संघी मोदी सरकार की असफलताओं पर भी कोई बड़ा या गम्भीर लेख तो खेर लिखा ही नहीं उल्टा मोदी सरकार की सबसे बड़ी दुष्टता हरियाणा हिंसा पर भी कोई छोटी मोटी टिपण्णी भी नहीं की सिर्फ एक बार जाटो को प्यार से समझाते दिखे हद तो ये हो गयी की हरियाणा हिंसा और मुरथल जैसे दिल दहला देने वाले काण्ड के बाद भी फिर से हरियणा में आंदोलन शुरू हो गए हे इस भरोसे की दिल्ली की चाबी लखनऊ में चुनाव को देखते हुए ये सत्ता की भूखी सरकार कोई सख्ती तो करने वाली हे नहीं उल्टा दंगइयो को छुड़वाने और मुआवज़े की मांग जोर शोर से की जा रही हे निष्पक्षता छोड़ कर दक्षिणपंथ में हल्का सा कन्वर्ट होने के कारण तिवारी जी ने अभी तक इस घिनौनी राजनीति के खिलाफ भी अपनी कमाल की कलम को खामोश ही रखा हे

इसके अलावा ये भी सच हे की मेनस्ट्रीम और सोशल मिडिया पर भी अधिकांश मुस्लिम लिखने वालो का रवैय्या निष्पक्ष नहीं हे वो भारत और दुनिया भर में मुस्लिम कटटरपंथ से जुडी हर छोटी हो या बड़ी हर घटना को संघ भाजपा कांग्रेस दुनिया अमेरिका रूस और यहूदियों की तो कन्फर्म ही बताते हे और मुस्लिम कटटरपंथ विषय पर चुप्पी ही साधे रखते हे बताते हे की हाल ही सोशल मिडिया पर हुए बुर्के परदे हिजाब पर बहस में अधिकांश मुस्लिम नामो ने किन्तु परन्तु करके हिजाब आदि का बचाव ही किया जबकि ये वहाबियो के बढ़ते प्रभाव का सबूत ही हे की छोटी छोटी लड़कियों तक से हिजाब करवाया जा रहा हे मगर अधिकांश मुस्लिम लिखने वाले इन विषयों पर मौन साध कर केवल अपने साथ होने वाले अन्याय जुल्म की ही चर्चा करते रहते हे मुस्लिम कटटरपंथ का ये लगभग वजूद ही मानने से इंकार करते हे हर बात इन्हे ”सारी दुनिया में तेज़ी से फैल रहे इस्लाम के खिलाफ एक साज़िश ही लगती हे ” एक जगह संजय तिवारी लिखते हे की Sanjay Tiwari24 April कितना लड़ेगें आप जहालत से? जहालत जेहन के आखिरी तह पर जमी हुई है, आप चुक जाएंगेलेकिन जहालत जिन्दा रहेगी।यह कोई इमरान खान नाम का आदमी है। अव्वल तो यह बहुत शातिर और झूठा है। इसकी प्रोफाइल की पड़ताल करके आपके जेहन में खुद बहुत से सवाल उठेंगे। बताता है कि मुंबई में रहता है लेकिन फोटो डाल रखी है पश्चिमी उत्तर प्रदेश की। इफको खाद का पोस्टर इसकी तस्दीक कर रहा है। फिर कह रहा है कि इसने किसी प्रीति गुप्ता नामक लड़की लव जिहाद में फंसाकर शादी की है और वह लड़की शादी के महीने भर बाद ही बुर्का पहन रही है।तो भैये ये लड़की हिन्दू तो कहीं से नहीं लग रही है। हमारे उत्तर भारत में बुर्काधारी महिलाएं एक खास किस्म से श्रृंगार करती हैं जो हिन्दू लड़कियां या महिलाएं कभी नहीं करतीं। इस लड़की की जांच की जाए तो इसके दावे की पोल खुल जाएगी।अगर मान भी लें कि इसने सचमुच यह जिहाद किया है तो फिर सवाल ये है कि इस बात का यह इतना बड़ा प्रोपेगेण्डा क्यों कर रहा है? और इसके प्रोपेगेण्डा पर हजारों मुसलमान चौबीस घण्टे से माशा अल्लाह की रट क्यों लगाये हुए हैं? क्योंकि यही तो उन्हें चाहिए। सबसे बड़ी कामयाबी तो यह है कि उसने जिहाद किया। फिर सोने पर सुहागा यह कि उसे बुर्का पहनाकर इस्लाम भी नाफिज कर दिया। माशाअल्लाह कौम को इससे ज्यादा और क्या चाहिए?अगर हिन्दू घर से आई लड़की बुर्के की अहमियत समझकर महीनेभर में ही बुर्काधारी हो गयी तो मुस्लिम लड़कियों तुम्हें इससे इतनी परेशानी क्यों होती है। यह एक कट्टरपंथी मनोवैज्ञानिक युद्ध है जो वे बहुत करीने से लड़ रहे हैं। आप स्टूडियो में बैठकर उच्च आदर्शों का ज्ञान बांटते रहिए। वे आपकी उदारता को भी अपनी कट्टरता तराशने के लिए एक शील्ड की तरह इस्तेमाल करते हैं और अपना काम करते हैं।

जो लोग कूद कूदकर लव जिहाद को हिन्दूवादी प्रोपेगेण्डा बताते हैं और हरकारा लगाते हैं उनको उस जेहन में भी घुसने की कोशिश करनी चाहिए जिसकी अजान लाउडस्पीकर लगाकर नहीं बल्कि कानोकान दी जाती है। ” तो लगता यही हे की हो सकता हे की लगातार मुस्लिम कटटरपंथ के अध्ययन और उस पर अफ़ज़ल भाई ताबिश सिद्द्की आदि जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश मुस्लिमो लिखने वालो की चुप्पी , ख़ामोशी ने एक बेहतरीन पत्रकार और निष्पक्ष लेखक को कही न कही दक्षिणपंथी खेमे में धकेल दिया इसके अलावा भी देखे तो आज हालात निष्पक्ष पत्रकारों के लिए बदतर हो ही रहे हे दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी अपने चाटुकार पत्रकारों को खूब नवाज़ा वही भाजपा भी भी इन चाटुकारो को राजयसभा में भेज ही रही हे और एक निष्पक्ष पत्रकार कब तक पेट पर पत्थर बाँध कर अपना काम करता रहे जबकि महानगरों में लगातार बढ़ती महंगाई में जीना मुहाल हे पिछले दिनों तिवारी पर हुए एक हमले और उसके बाद उनकी ख़राब माली हालात की भी खबर मिडिया साइट पर आई थी कौन जाने इससे भी वो दक्षिणपंथ की तरफ कुछ आकर्षित हुए हे कुछ भी हो सकता हे जो भी हो विशुद्ध सेकुलर विशुद्ध निष्पक्ष पत्रकारों लेखकों की संख्या का लगातार कम हो जाना ये आम आदमी के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं हे