fake-encounter-delhi

मोदी सरकार ने खुद के दो साल पूरे कर लिए हैं | हिंदी की खबरिया दुनिया ‘बदलाव के इन सालों’ का उत्सव मना रही है | ख़बरों से लेकर सम्पादकीय तक उम्मीद का दामन थामे धनात्मक हो रहे हैं | इस वक्त मैं समय की सटीकता से बेखबर सरकार की नाकामियों को चालाकी से चुनोतियाँ बताती हुयी एक निर्मम आलोचना लिखने की बजाय बटला हॉउस के कथित इनकाउंटर पर यह ब्लॉग लिख रहा हूँ | बेसमय यह ब्लॉग लिखने की दो वजहें हैं | पहली वजह कांग्रेस कार्यकाल में गृह मंत्री रहे शिवराज पाटिल का वो बयान है जो सामने आते ही तमाम वेब पोर्टलों की हेडलाइन बन गया है |पाटिल अपनी ही पार्टी लाइन पर चलते हुए बताते हैं की बटला हॉउस एनकाउंटर फर्जी नहीं था |बेशक कांग्रेस के कई नेता बटला हॉउस एनकाउंटर के सच होने पर अपना शक सार्वजनिक रूप से साझा कर चुके हैं | दूसरी वजह राणा अयूब की मार्केट में कदम रखती उस किताब को लेकर रवीश कुमार की लिखावट है जिसमे इशरत जहां से लेकर सोहराबुदीन एनकाउंटर का बारीक पोस्टमार्टम किया गया है |

हमारे देश में ऐसे मुठभेड़ों की एक लम्बी फेहरिस्त है जो खुद के समूचेपन के अभाव में अफवाहों में बदलकर राजनीतिक दलों की दुकाने चला रहे हैं |बटला हॉउस का एनकाउंटर भी उसी फेहरिस्त का एक हिस्सा है | 8 साल पहले हुई इस एनकाउंटर को लेकर मीडिया मंडी में इतनी बाते हैं , इतने बयान है ,इतने एंगल है की कोई भी आसानी से कन्फ्यूज हो सकता है | तमाम राजनीतिक दलों के द्वारा फैलाई गई सामग्री के बीच भी सब साफ़ नहीं है | इस मामले में फॉलोअप करने वाला भी न्याय तक पहुँचने से पहले ही बोर हो जाता है | इस मामले में न्याय पर भी तमाम सवाल हैं | सवाल यह भी है की न्याय हुआ है या नहीं | इसके फैसले का ठेका अब जांच एजेंसियों या न्यायिक जांचो की बजाय नेताओं ने ले लिया है |

इस केस की कहानी 13 सितम्बर 2008 से शुरू होती है जब दिल्ली में हुए पांच सिलसिलेवार धमाकों में 26 से ज्यादा लोग मार दिए जाते हैं | ठीक पांच दिन बाद 18सितंबर को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के इंस्पेक्टर मोहनचन्द्र शर्मा को ‘कथित आतंकियों’ के ठिकाने का पक्का सुराग मिल जाता है |मोहन चन्द्र शर्मा और उनकी विशेष टीम जामिया नगर के बटला हाउस के एल-18 मकान में छिपे इंडियन मुजाहिद्दीन के कथित आतंकवादियों को मारने के लिए धावा बोलती है ।इस मुठभेड़ में पुलिस यह दावा करती है की” परिणामतः’ दो चरम पन्थिो को मार गिराया गया है |दो को गिरफ्तार किया गया है और एक भागने में सफल रहा है ‘| पुलिस यह भी दावा करती है की यही शख्स दिल्ली में हुए ब्लास्टों के जिम्मेदार थे |मुठभेड़ के दौरान इस एनकाउंटर के नियोजक इंस्पेकटर मोहन चन्द्र शर्मा घायल हो जाते हैं जिन्हे नजदीकी होली फैमिली अस्प्ताल में भर्ती कराया जाता है जहां ‘अधिक खून बहने के कारण’ उनकी मौत हो जाती है |पुलिस इस मौत के लिए शहजाद अहमद को जिम्मेदार ठहराती है | 21 तारीख को पुलिस उस मकान की देख-रख करने वाले के साथ- साथ दिल्ली में हुए विस्फोट के आरोप में कुल 14 लोगों को गिरफ्तार कर लेती है |दिल्ली और उत्तरप्रदेश में हुई इन गिरफ्तारियों और इस मुठभेड़ पर तब तक तमाम तरह के सवाल पढ़ने – लिखने वाले लोगों का एक तबका उठाने लगता है |मानवाधिकार संगठन इस एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले की न्यायिक जांच कराने के लिए याचिका दायर करते है | 21 मई 2009 को दिल्ली हाइकोर्ट राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से पुलिस के दांवों की जांच करने के लिए कहता है |एक महीने के बाद आयोग अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए पुलिस को क्लीन चिट दे देता है| इस रिपोर्ट के आधार पर ही हाईकोर्ट न्यायिक जांच से इंकार कर देता है |हाई कोर्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की जाती है लेकिन सुप्रीम कोर्ट यह कहते हुए जांच से इंकार कर देता है इस ‘ इस मामले की जांच से पुलिस का मनोबल प्रभावित होगा ‘|6 फरवरी 2010 को शहजाद को मोहन चन्द्र की मौत के सिलसिले में गिरफ्तार करती है और 25 जुलाई 2013 को उसे दोषी करार दे दिया जाता है |इसी सब के बीच यह मामला कांग्रेस और बीजेपी के मध्य फुटबाल बन जाता है |समाजवादी पार्टी भी एनकाउंटर में पुलिस की भूमिका पर शक जताते हुए न्यायिक जांच की मांग करती है |कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी एनकाउंटर को फर्जी बताते हैं लेकिन उनकी ही पार्टी से तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम एनकाउंटर को वास्तविक बताते हुए मामले को फिर खोलने से इनकार कर देते हैं ।बिना न्यायिक जांच के यह मामला सत्ता पाने के लिए की जा रही बहसों का हिस्सा बन जाता है |

बटला हॉउस मामले में अभी तक न्यायिक जांच नहीं हुई है |सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस का मनोबल प्रभावित होने का तर्क दिया है |सुप्रीम कोर्ट से यह भी पूछा जाना चाहिए की यदि यह एनकाउंटर न्यायिक जांच में फर्जी हुआ तो उस तबके के मनोबल का क्या होगा जिसने इस केस में खुद को अब तक पीड़ित और परेशान ही महसूस किया है और जो अब तक खुद को निर्दोष बताते हुए न्याय की आश लगाए बैठा है | राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उस रिपोर्ट पर भी सवाल उठे हैं जिसमे पुलिस को क्लीन चिट दी गई है | कुछ सवाल ऐसे हैं जिनका उत्तर उस रिपोर्ट में नहीं है |जैसे की यदि यह एक तयशुदा एनकाउंटर था तो17 साल के साजिद के सर पर वह चार गोलिया के छेद कैसे थे जो केवल बैठाकर निशाना लगाने से ही हो सकते थे |तस्वीरों में आतिफ की पीठ बुरी तरह छिली हुई थी जो यह दिखाती है की उसे मारने से पहले टारचर किया गया |शरीर में लगी उन चोटों और दागों का क्या जिनका पुलिस की रिपोर्ट में जिक्र नहीं है | यदि पुलिस के पास यह सबूत था की वह लड़के ही दिल्ली ब्लास्ट के गुनहगार है तो मोहनचन्द्र शर्मा ने बुलेट प्रूफ क्यों नहीं पहन रखी थी |दो लड़के बचकर किस तरह भाग गए जब की फ्लैट में निकलने का एक ही रास्ता था और पुलिस ने चारो तरफ से फ्लैट को घेर रखा था |ये वो सवाल हैं अब तक जिनका जवाब नहीं मिला है |बटला हॉउस मामले पर होने वाली बयानबाजियों ने सचमुच इन सवालों का एनकाउंटर किया है |

पच्चीस साल पहले उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में पुलिस ने तीन अलग-अलग मुठभेड़ों में दस सिख युवकों को आतंकी बताकर मौत के घाट उतार दिया था. मामले की सीबीआई जांच हुई तो सामने आया कि मृतक आतंकी नहीं बल्कि तीर्थयात्री थे जो सिख तीर्थस्थलों की यात्रा करके वापस घर लौट रहे थे. पिछले दिनों सीबीआई की विशेष अदालत ने इस मामले पर फैसला सुनाते हुए उस मुठभेड़ को फर्जी ठहराया है | 47 पुलिसकर्मियों को हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई गई है| अदालत के अनुसार पुलिस ने प्रमोशन के लालच में इस वारदात को अंजाम दिया था |राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों के अनुसार भारत में आए दिन होने वाला हर दूसरा पुलिस एनकाउंटर फ़र्ज़ी होता है.|ऐसे तमाम मामले हैं जो न्याय की प्रतीक्षा में है |न्याय राजनीति शास्त्र का सबसे जरूरी सिद्धांत है |यह एक ऐसी जादुई शक्ति है जो एक सीमा के भीतर रहने वालों को एक राष्ट्र का मान लेने की औचित्यपूर्णता प्रदान करता है |यदि देश के भीतर न्याय नहीं रहेगा तो देश हर वक्त एक खतरे की स्थिति में रहेगा |न्याय सरकारों के आने जाने जैसा नहीं है बल्कि यह अपरिहार्य होकर राष्ट्र के वजूद का आधार तैयार करता है |