लायंस हन्नान अंसारी

पर्दा : इस्लाम ने नारी का सिर ऊँचा किया ॥

parda

सामूहिक जीवन में औरत और मर्द का संबंध किस तरह होना चाहिए, यह इंसानी सभ्यता की सब से अधिक पेचीदा और सब से अहम समस्या रही है, जिसके समाधान में बहुत पुराने ज़माने से आज तक दुनिया के सोचने-समझने वाले और विद्वान लोग परेशान हैं,। जबकि इसके सही और कामयाब हल पर इंसान की भलाई और तरक्क़ी टिकी हुई है। पुरुष प्रधान समाज ने अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए स्वयम के नियम गढ़ लिए ना की धर्म मेँ उकेरी गयी वास्तविक बातों को ग्रहण किया ? इतिहास का पन्ना पलटने से पता चलता है कि प्राचीन काल की सभ्याताओं से लेकर आज के आधुनिक पश्चिमी सभ्यता तक किसी ने भी नारी के साथ सम्मान और और न्याय का बर्ताव नहीं किया है! वह सदैव दो अतियों के पाटन के बीच पिसती रही है। इस घोर अंधेरे में उसको रौशनी एक मात्र इस्लाम ने प्रदान किया है, जो सर्व संसार के रचयिता का एक प्राकृतिक धर्म है, जिस ने आकर नारी का सिर ऊँचा किया, उसे जीवन के सभी अधिकार प्रदान किये, समाज में उसका एक स्थान निर्धारित किया और उसके सतीत्व की सुरक्षा की…… .

तसलीमा नसरीन के कथित लेख पर कर्नाटक में मचे बवाल के बाद बुर्का, हिजाब और पर्देदारी एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इसमे कोई दो राय नहीं कि बुर्का आम मुसलमान औरत की पहचान बन गया है। इसी को बहाना बना कर कुछ जाहिल गंवार इसे इस्लाम से जोड़ अनर्गल बहस बाजी मे लगे हैं । यही नहीं इसी बहाने इस्लाम में औरतों के दोयम दर्जे की बात भी उठाई जा रही है । सवाल ये है कि क्या इस्लाम में बुर्का सचमुच अनिवार्य है, या फिर इसे जानबूझ कर मुसलमानो के जरिये औरतों पर लादा जा रहा है?

दरअसल यह भी एक नजरिया है। इस नजरिए में सच की झलक सिर्फ और सिर्फ मुसलमानो की उपज है ना की इस्लाम की। अगर ये सच है तो क्या यही बात बुर्के और हिजाब पर नहीं लागू होती। लेकिन एक अखबार में बुर्के के बारे छपा एक लेख दंगों की वजह बन जाता है। कर्नाटक के हासन और शिमोगा ने इसकी तपिश झेली है। आखिर बुर्के के पीछे का नजरिया क्या है। ये नजरिया क्या औरत की आजादी में बाधा नहीं है। लेकिन सच्चा इस्लाम तो औरत की आजादी का हामी है।

बुर्क़ा मुस्लिम संस्कृति का एक हिस्सा है ,लेकिन इस्लाम का एक हिस्सा नहीं है । असल मेँ यह भेद, ध्यान में रखना बहुत ज़रूरी है। आजकल बुर्क़ा या पर्दा खबरों में छाया हुआ है। सामान्यत: हर मुसलमान इसे इस्लाम का अनिवार्य अंग समझा जाता है । लेकिन ऐसा है नहीं । वास्तव में, बुर्क़ा मुस्लिम संस्कृति का एक हिस्सा है। इस्लामी शिक्षा का हिस्सा नहीं । मुसलमानों का वर्तमान किरदार और इस्लाम के बीच एक बड़ा अंतर है। अग़र यह दावा किया जाता है कि बुर्का या पर्दा मुस्लिम संस्कृति का एक हिस्सा है तो हां यह बात सच्च है । ,लेकिन अग़र यह दावा किया जाता है कि इसे पहनना क़ुरानी शिक्षा का एक हिस्सा है तो तमाम जानकारी लेने के बाद यह कहा जा सकता है की ” नहीं ” ।आप अच्छी तरह जान लें की इस्लाम का स्रोत मुस्लिम संस्कृति नहीं,” क़ुरान” है। मुस्लिम संस्कृति एक सामाजिक तथ्य है भौगोलिक आधार है । जबकि क़ुरान एक ईश्वरीय पुस्तक है जो इस्लाम के पैग़म्बर के समक्ष प्रकट की गयी थी। भाषिक इतिहास के अनुसार बुर्क़ा शब्द का अर्थ कपड़े का एक टुकड़ा था जिसे, विशेषकर सर्दियों में, हिफ़ाजत के लिये इस्तेमाल किया जाता था। प्रसिद्ध अरबी शब्दकोश लिसान अल-अरब हमें इस्लाम पूर्व काल में इसके इस्तेमाल के दो उदाहरण देता है:…. पहला,सर्दी के मौसम में जानवरों को ओढ़ाने की और दूसरा गांव की औरतों के लिया शाल की तरह ओढ़ने की चादर का । यद्यपि अरबी शब्दावली में ‘बुर्क़ा’ शब्द मौजूद था,जबकि क़ुरान में बुर्क़ा शब्द का इस्तेमाल औरतों के पर्दे के लिये नहीं किया गया है। इतिहास बताता है कि पर्दा या ‘बुर्क़े’ के इस्तेमाल की शुरुआत फारस (ईरान) से हुई। फारस में जब इस्लाम का प्रवेश हुआ तब वहां एक संस्कृति पहले से ही मौजूद थी। इस्लामी संस्कृति में अनेक चीज़े फारसी संस्कृति से ही आईं हैं। उदाहरण के लिये अल्लाह की जगह ”ख़ुदा”,… सलात की जगह ”नमाज़” जैसे शब्द । इसी तरह ईरानी संस्कृति के प्रभाव में मुसलमानों ने बुर्क़ा अपना लिया। क्रमश: शने – शने इसका इस्लामीकरण खुद ही इनहि मुसलमानो के जरिये हो गया और यह इस्लामी संस्कृति हिस्सा बन गया । जबकि ऐसा नहीं है । आजकल मुसलमान ‘हिजाब’ शब्द का इस्तेमाल बुर्क़े की तरह करते हैं, लेकिन ‘हिजाब’ शब्द का इस्तेमाल क़ुरानी अर्थोँ में नहीं किया जाता है। हिजाब का शाब्दिक अर्थ है ”पर्दा”। क़ुरान मे हिजाब शब्द का इस्तेमाल सात बार किया गया है, लेकिन उस अर्थ में नहीं जो आज मुसलमानों के बीच में प्रचलित है। औरतों के पर्दे के बारे में क़ुरान में दो शब्दों का इस्तेमाल किया गया है ”जिलबाब”(33:59 ) और ”ख़िमर”। लेकिन इन शब्दों का इस्तेमाल भी इनके वर्तमान अर्थों मे नहीं किया गया है। यह एक तथ्य है कि दोनों शब्दों का अर्थ समान है,यानी एक औरत के चेहरे नहीं बदन को ढ़ाँकने वाली एक चादर या दुपट्टा । इससे यह स्पष्ट है कि वर्तमान ”बुर्क़ा” या ‘हिजाब’ कुरानी शब्द नही हैं। दोनों मुस्लिम संस्कृति का हिस्सा हैं क़ुरान के आदेशों का हिस्सा तो एकदम नहीं । फिक्ह के(इस्लामी धर्म शास्त्र) हनफी और मालिकि संप्रदाय के अनुसार औरत के बदन के तीन हिस्से ”सतर”(बदन को ढ़ाकने वाला वस्त्र) के बाहर हैं – ”वजाह”(चेहरा),”कफाईन”(हाथ) और ”क़दमाईन”(पैर)। शरिया के अनुसार औरतों को अपने बदन को ऐसे कपड़ों से ढ़ंकना चाहिये जो चुस्त और दूसरों को आकर्षित करने वाले ना हों।(अध्याय 24,सूरा 31,तसफीर उसमानी)। यह ग़ौर करने की बात है कि मशहूर अरबी विद्वान शेख़ मुहम्मद नासिरुद्दीन अल-अलबानी ने अपनी किताब हिजाब अल-माराह अल-मुसलमिह -फिल किताब(एक मुसलमान औरत का पर्दा) में ऊपर चर्चा किये गये शरिया के द्दष्टिकोण का अनुमोदन किया है। उन्होने यह भी लिखा है कि क़ुरान,हदीस और (पैग़म्बर मोहम्मद के) साथियो तथा ताबियून( पैग़म्बर के साथियों के साथी) के व्यवहार से यह साफ है कि जब भी एक औरत घर के बाहर पैर रखती है तब उसका फर्ज है कि वह अपने बदन को इस तरह ढाँके कि चेहरे और हाथों के अलावा और कुछ न दिखाई दे। इसमें कोई दोराए नहीं की इस्लाम धर्म स्वरूप के बजाय आत्मा पर केंद्रित है। यह धर्मनिष्ठ सोच और मूल्यों पर आधारित चरित्र पर बल देता है। मुसलमानों और तमाम इन्सानो को नैतिक रूप से अपने को शुद्ध करना चाहिये। मुसलमान औरतों को अपने को अध्यात्मिक रुप से विकसित करना चाहिये, आदमियों का अनुकरण करने के बजाय उन्हे अपने नारी-सुलभ व्यक्तित्व को विकसित करना चाहिये और मनोरंजन की वस्तु बनने के बजाय समाज में एक सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिये। पैग़म्बर के समय मुसलमान औरतें खेती,बाग़बानी और सामाजिक कार्य जैसे क्षेत्रों में सक्रिय थीं ।

क्या इसे मुसलमान झुठला सकते हैं ? लेकिन इसके साथ ही वे अपने नारी-सुलभ चरित्र को बरक़रार रखतीं थीं। इस्लाम के आरंभिक इतिहास में अनेक ऐसी घटनायें हैं जो दिखातीं है कि एक औरत को एक आदमी के समान आज़ादी प्राप्त थी । इस मामले में दोनों के बीच कोई भेद नहीं है और ना था । इस्लाम में एक औरत को वही आज़ादी मिली है जो एक आदमी को। इस्लामी साहित्य कुछ धर्मनिष्ठ औरतों का ज़िक्र करता है जिन्होने अपने समाजों में एक अत्यंत सकारात्मक भूमिका अदा की थी,जैसे पैग़म्बर इब्राहीम की पत्नी हाजिरा,ईसा मसीह की मां मरियम,इस्लाम के पैग़म्बर की पत्नी खदीजा, इस्लाम के पैग़म्बर की पत्नी आयशा। इन औरतों को मुस्लिम समाज में आदर्श की तरह देखा जाता है और वे आज की औरतों के लिये अच्छी उदाहरण हैं। निष्कर्ष के रूप में दो को जोड़कर देखिये …. : एक क़ुरान से और दूसरा हदीस(पैग़म्बर की उक्तियां) से है। क़ुरान में आदमियों और औरतों का उल्लेख इन शब्दों में किया गया है, ”तुम दोनों एक दूसरे का अंग हो” (3:195)। इसका मतलब है कि आदमी और औरत लैंगिक रूप से भिन्न तरह से रचे जाने के बावजूद एक दूसरे के पूरक हैं। अब दूसरा संदर्भ लेते हैं। इस्लाम के पैग़म्बर ने कहा,” आदमी और औरत एक इकाई के दो बराबर के हिस्से हैं”।(मसनाद अहमद)लैंगिक समता की यह सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है। वर्तमान समय में मुस्लिम समाज में हिजाब के प्रचलन को समझने के लिये यह बात ध्यान में रखनी ज़रूरी है कि इस्लाम और मुसलमानों के बीच एक भेद है। इस्लाम एक विचारधारा का नाम है जबकि मुसलमान एक समुदाय हैं जिसकी अपनी संस्कृति है जो अनेक परिस्थितियों के कारण बदलती रहती है।ऐसी स्थिति में मुस्लिम परंपरा को इस्लाम की मूल शिक्षाओं के आधार पर आंका जायेगा ना कि मुसलमानों की संस्कृति के आधार पर ।याद रखिये कई बार लोग इस्लाम के बारे में सिर्फ कुरआन पड़कर जानते हैं या फिर गैर मुस्लिम हम मुसलमानो को देखकर इस्लाम के बारे में तसव्वुर बांधते हैं इसलिए हम सबको दूसरो के लिए एक अच्छी मिसाल होना चाहिए और हमेशा अपने मामलात में सच्चे और खरे भी उतरना चाहिए मुसलमानो के मामलात ही गैर मुस्लिमो के सामने इस्लाम की कोई अवधारणा बनाने में अहम किरदार अदा करते हैं ।….

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23 thoughts on “पर्दा : इस्लाम ने नारी का सिर ऊँचा किया ॥

  1. सिकंदर हयात

    आपकी बाते अपनी जगह हे लेकिन हमारा फ़र्ज़ होना चाहिए की एक भी मुस्लिम औरत इस दुनिया में ऐसी न हो जो अपनी मर्ज़ी से नहीं बल्कि किसी भी मर्द के दबाव में बुरका पर्दा हिज़ाब आदि करे में तो बुरका बिकनी दोनों के खिलाफ हु मगर आख़िरकार फैसला औरतो का ही होना चाहिए हम क्या हे हमें क्या हक़ हे ? वैसे बुर्के के पेरोकार चाहे जो कहे मगर अधिकतर औरते ये मर्दो के दबाव में ही करती हे मेरी मदर हे पांच बहने हे 7 भांजी भतीजी हे कोई भी न करती हे न करेगी क्योकि हम कुछ नहीं कहते हे ना कहेंगे चाहे इसका नतीजा जो हो असल में बहुत से लोग घबराते हे की अगर औरतो को बुर्के से दूसरी बातो से आज़ादी दी तो वो मनमर्ज़ी करेगी प्रेम करेगी प्रेम विवाह करेगी प्रेम में जात तो देखि जाती नहीं हे तो जात बाहर शादी होगी तो इससे ही अधिकतर लोगो के पसीने आते हे उन लोगो के भी जो रात दिन राग अलापते हे की इस्लाम में सब बराबर हे

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  2. zakir hussain

    कुछ हिस्सो से सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन लेख अच्छा है.

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  3. सिकंदर हयात

    एक नया चलन में देख रहा हु की चलो औरतो लड़कियों का हिज़ाब पर्दा अलग बात हे उसे छोड़े मगर ये एक नया चलन देखने को मिल रहा हे की दो चार साल की बच्चियों को हिज़ाब करवाया जा रहा हे ये क्या हे भाई ? मुझे नहीं पता की ऐसे क्यों हे लेकिन मेरी समझ में इसकी वजह समाज में बढ़ते जा रहे ” जाकिर नायकों ” की फौज ही हे एक तो मेरी अपनी कज़िन सिस्टर ही हे उनकी भी ” दूकान ” अच्छी चल रही हे अच्छा कमाल ये हे पैसे वाले लोग हे तो ज़ाहिर हे की बच्चे कांवेंट में ही पढ़ रहे हे और में उनके घर गया तो अपनी भांजी को देख कर मुझे नहीं लगा की वो कल को पर्दा हिज़ाब आदि करने वाली हे उधर मेरी सिस्टर के उपदेश जारी हे हालांकि मेरा अंदाज़ा हे की अब ये ” फौज ” कुछ कमजोर पड़ने वाली हे क्योकि तेल के दाम बेहद कम से खाड़ी देश खुद ही संकट में उपमहाद्वीप में आने वाला भारी चंदा काफी कम हुआ ही होगा मगर हम तो इससे भी खुश नहीं हो सकते हे क्योकि की जैसा की बताया की एक सेकुलर भारतीय मुस्लिम सबसे कठिन काम में फंसा हे खुश हो कैसे क्योकि जानते ही हे की अगर गल्फ देशो की इकोनॉमी डूबी तो लाखो भारतीय परिवार बर्बाद हो जाएंगे और इधर मोदी सरकार तेल के दाम कम होने पर भी कोई फायदा जनता को नहीं होने देगी इधर कुआ उधर खाई यही हे एक सेकुलर मुस्लिम की नियति

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  4. wahid raza

    बहुत हि सतिक लेख् पर्दा मुसल्मानो का इमान है. औरअतओ के साथ साथ मर्दो के लिये भि लाजिम है

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  5. wahid raza

    घूंघट हो या नक़ाब परदे मैं स्त्री ही एडवांटेज में रहती है, मर्द उसको नहीं देख सकते लेकिन वोह सबको देख भी सकती है और समझ भी सकती है.
    दरअसल परदे का विरोध आम भारतीय महिला कर भी नहीं रही, यह महिलाओं की आज़ादी के नाम पर अपनी दूकान चलाने वाले कुछ पुरुष या तस्लीमा नसरीन टाइप की चंद महिलायें ही कर रही हैं, जबकि उनसे कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं कर रहा. पर्दा करना है तो करो नहीं करना तो मत करो लेकिन अपना फैसला दूसरों पर थोपने वाले यह होते कौन हैं.??

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    1. सिकंदर हयात

      बिलकुल सही कहा वहीद साहब चार साल की लड़की ने ”अपनी मर्जी और ख़ुशी ” से हिज़ाब धारण कर रखा हे सही कहा

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  6. afzal khan

    FROM THE FACEBOOK COMMENT -AIJAZ AHMAD

    नंगे पुंगे चलने वाले
    हाल क्या जाने परदे की

    गर आधुनिकता कम कपडे या बिना कपडे के रहना होता तब तो आदिकाल के मानव सब से आधुनिक होते …. दर असल लोगों को इस्लाम में हिजाब का मतलब बिलकुल पता नहीं …. और लिबास का मतलब भी उन्हों ने नहीं समझा …. लिबास इंसानो का कांसेप्ट इंसान के मस्तिष्क में इंसानी Revolution के साथ ही पनपा और बढ़ा जब उन्हों ने लाखों साल के सतत चलने वाली CIVILISATION के दौर से गुज़रते हुए शरीर के उन अंगों को ढकना और छुपाना अनिवार्य समझा जिस से उन्हें सुगठित समाज में एक भटकाव और बुराई से बचने और दूसरों के मन में बुरे ख्यालात से बचने के लिए वस्त्र का कांसेप्ट जागृत हुआ जो वस्त्र उन्हें वातावरण की उंच नीच और बुराई के साथ साथ मन में उठने वाले उंच नीच और बुराई जो विपरीत लिंग के BIOLOGICAL और PHYSICAL सूरतों को देख मन में पैदा होती है से किसी हद तक बचाता है , और इसी CONCEPT को और भी MODIFIED रूप हिजाब है …. परदे के नाम पर मुसलमानो को ताना देने वाले उन्हें आदिकाल के कहने वाले कुछ खप्त दिमाग के गैर मुस्लिमों को ये पता ही नहीं के इस्लाम में मर्दों के लिए भी हिजाब है और इस में मरदो को नाभ से लेकर घुटने के थोड़े नीचे तक का ढकना अनिवार्य है । जो गैर मुस्लिम मित्र यहां पर मुस्लिम विरोधी बातें कर रहे हैं उन्हें हिजाब की अज़मत के बारे में क्या पता और औरत या मर्द के लिए मॉडेस्टी किस तरह कायम रहे और बुराई से बचे रहे उन्हें इन सब चीज़ों से क्या मतलब बल्कि ये वही लोग होते हैं जो अपने बहन बेटियों को शरीर के शेप से ऐसे चिपके हुए कपडे पहना कर सड़क पर भेजते हैं जो उनके बदन के पूरे शेप को बिलकुल नंगे रहने के बराबर नज़र आते हैं और फिर आवारा और ऐय्याश मिज़ाज लोग उन्हें देख कर अपनी सेक्स कुंठा आँखों से शांत करते हैं और मज़े लेते हैं …. और याद रहे मुसलमानो के घरों की औरतें जबरन पर्दा नहीं करतीं बल्कि वो उनके ट्रेडिशन में होता है और शौक से पहनती हैं और आप खुद ही तय कर लो के तुम्हारी बहन बेटियां किस लिबास में सुन्दर, बेहतर और मॉडेस्ट दिखेंगीं .

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  7. zakir hussain

    जब भी बुर्क़े या घूँघट की आलोचना मे कुछ लिखो, दूसरा पक्ष नंगेपने की बात करने लग जाता है.

    बाकी जाकिर नायक साहब जैसे लोग, समाज मे इस्लाम को लेके ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं, और ये ध्रुवीकरण, मुस्लिम-गैर मुस्लिम ही नही, मुस्लिम समुदाय के भीतर भी पनप रहा है.
    इस्लाम की नकारात्मक छवि, के लिए आज के दौर मे ऐसे लोग ही ज़िम्मेदार है.

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  8. सिकंदर हयात

    सही कहा जाकिर भाई कुछ लोगो को बुरका पर्दा हिज़ाब और फिर सीधे बिकनी बिकनी या शार्टस के आलावा लड़कियों की कोई और ड्रेस दिखाई ही नहीं देती हे असल में अवचेतन मन में ये बात होती हे की लड़कियों को दबाकर रखना हे जिससे न वो किसी को देखे न कोई उन्हें देखे न आँखे चार हो ना प्यार हो न जात बाहर शादी हो इस जात बाहर से शादी से जितने गेर मुस्लिम ठेकेदार घबराते हे उतने ही” इस्लाम में सब बराबर ” की बात करने वाले भी घबराते हे और बहुत घबराते हे ये सोचते हे की लड़कियों को दबाकर कर रखो उन्हें बीस पचीस से पहले पहले अपनी जात में शादी और दो बच्चे की माँ बनवा ( कम से कम ) वही इन्हे बेस्ट लगता हे बहुत से लोग घबराते हे की लड़कियों को भी लड़को की तरह बराबरी दी तो कुछ ऊंच नीच हो जायेगी में तो साफ़ कहता हु की हां हो जायेगी कुछ ऊंच नीच हो जायेगी क्योंकि लड़कियों को फुल बराबरी और आज़ादी एक आदर्श हे आदर्श पर चलना मतलब सरदर्दी मोल लेना में बता ही चूका हु की मेरे दसवीं फेल बाप और पांचवी फेल अम्मी ने अपने बच्चों में कोई भेद भाव कसम खाने को भी नहीं किया और मेरे फादर अस्सी के दशक में ही जब लड़को को भी अच्छी घड़िया शादी पर ही नसीब होती तब ही दोनों सबसे बड़ी बहनो को अच्छी घड़िया दिलवाई तो ये था और इसी आदर्श का ये नतीजा निकला की आज हमारी अर्थवयवस्था कई गुणा बेहतर होने से रह गयी में फिर से वो किस्सा बयान कर देता हु की आदर्श मतलब सरदर्दी और संकीर्णता मतलब आराम फिर भी चलना हो तो चलिए —– जारी

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    1. सिकंदर हयात

      अब दो परिवार थे एक हमारा और एक दूसरा , अब दो परिवारों के बीच जितने बढ़िया रिश्तों की आप कल्पना कर सकते हे उतने थे हमारे और उनके पेरेंट्स की बहुत ही गाढ़ी दोस्ती बहुत ही गाढ़ी जब उनकी इकोनॉमी बेहद कमजोर थे तो हमारे माँ बाप ने उनका किया फिर नाबे के दशक में ददिहाली झगड़ो से और बड़े परिवार से हमारी इकोनॉमी डाउन हो गयी उसी समय गल्फ की नौकरी से उनकी इकोनॉमी बेहद मज़बूत हो गयी इसी दौरान पापा के डेथ हो गयी डेथ से कुछ समय पहले वो परिवार चाहता था की उनके लड़के की शादी हमारी बड़ी सिस्टर से हो कोई हर्ज़ नहीं बहुत ही बढ़िया रिश्ता मगर हमारी सिस्टर उस समय 18 बीस साल की थी पढाई में अच्छी थी फुल ऑफ़ लाइफ थी तो ज़ाहिर हे की कोई जरुरी नहीं हे की हर लड़की की तमन्ना एकमात्र ही हो की बीस में शादी कर ले पचीस तक दो बच्चे हो जाए कोई जरुरी नहीं की हर लड़की यही चाहे तो उन्होंने इंकार कर दिया और लड़कियों को दबाने का उन पर अपनी मर्ज़ी थोपने का स्वभाव तो गाव के ठेठ और ट्रक मालिक और चालक पापा का तक नहीं था तो भला कोई और क्या दबाव डालता तो एक तो रिश्ते से इंकार फिर मेरे बड़े भाई बहनो दुअरा सिस्टर पर कोई रिश्ते के लिए दबाव भी न डालने से वो परिवार बेहद नाराज़ हुआ और उसने हमारे बुरे दिनों में हमारी कोई मदद नहीं की अब समझिए के मेरे घर में मुझे छोड़ कर सारे भाई बहन काबिल थे और बिना किसी के भी कैसे भी सपोर्ट के बिना ही अपने दम पर काफी आगे बढ़ गए तो सोचिये की इतने काबिल लोगो को सही समय पर कुछ सपोर्ट मिला होता तो आज हमारी इकोनॉमी कई गुणा बेहतर हो सकती थी यानि करोड़ का नुक्सान हुआ इसलिए की हमारे यहाँ लड़का लड़की बराबर हे हमारे यहाँ लड़कियों को दबाया नहीं जाता आदर्शो से हुआ ये नुक्सान हमें कबूल हे क्योकि हमें पता हे की आदर्श मतलब घाटा ही घाटा और संकीर्णता मतलब आराम तो आप सोच लीजिए की आपको आर्दर्श पर चलना हे या संकीर्णता पर

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      1. zakir hussain

        आपकी हिम्मत के लिए सलाम.

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        1. सिकंदर हयात

          जाकिर भाई और पाठको लड़कियों को दबाया इसलिए जाता हे क्योकि उपमहाद्वीप में विभिन्न धर्मो समाजो और जातियों के ठेकेदार यही चाहते हे की लड़कियों पर कड़ा दबाव रखो हमेशा रेड अलर्ट रखो कोशिश ये करो की इनकी बीस में शादी और पचीस तक वो दो बच्चों की माँ तो बन ही जाए फिर हम खुद को सुरक्षित और इज़्ज़तदार समझते हे ऐसा न हो तो हमें बताया जाता हे की हमारी इज़्ज़त का भाजी पाला हो जाएगा शादी ना हो या जात बाहर शादी हो जाए तो ये ठेकदार इससे आम आदमी को बेहद डराते हे ये ठेकेदार जानते हे की इससे ही उनकी वो जाती समाज आदि की किलबन्दिया सुरक्षित और मज़बूत रहेगी जिनसे ये अपना सरकार राज़ चलाते हे इस सरकार राज़ से और तो नुक्सान हे ही साथ ये भी हुआ की उपमहाद्वीप की आबादी दो अरब के आस पास जाने वाली हे सांस लेने की भी जगह नहीं बच रही हे ये सब भी इसी लड़कियों को दबा कर रखने की खफ्त के कारण हुआ वर्ना देखे की दुनिया में कही भी भारत उपमहाद्वीप के जैसी आबादी नहीं हे मुस्लिम देशो में भी नहीं अधिकांश मुस्लिम देशो में भी आबादी बेहद कम हे

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  9. zakir hussain

    वाहिद रजा साहब, लेकिन हिजाब का वर्तमान बुर्क़ा-स्वरूप ही इस्लाम से जुड़ा है, ये विवाद का विषय है, और हन्नान साहब ने उसपे ही सवाल किया है, इस लेख मे.

    कपड़े कितने खुले, तंग या बदन ढँकने वाले होने चाहिए, ये व्यक्ति अपनी समझ, सामाजिक परिवेश, और अपनी सुविधा से निर्धारित कर ले. लेकिन चेहरो को ढँकने वाले हिजाब को मज़हबी और अनिवार्य बताना बेहद चिंताजंक है.
    चेहरा, इंसान की शक्सियत का सबसे अहम हिस्सा है. हमारी पहचान के तमाम दस्तावेज़ो मे हमारे शरीर के हिस्से की अनिवार्यता होती है. हम सैकड़ो हज़ारो की भीड़ मे शरीर के सिर्फ़ इस हिस्से से ही लोगो की पहचान कर लेते हैं. हमारे मन के भावों को भी चेहरा बयान करता है, ऐसी सूरत मे अगर कोई भी मुसलमान, चेहरे को छिपाने वाले हिजाब को मज़हबी लिबास बताता है, इस्लाम की नकारात्मक छवि दुनिया के सामने रख रहा है.

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  10. zakir hussain

    हिजाब मे आप चेहरे को छोड़, सारे अंग ढन्के, उसे इतना ढीला बना दें कि शरीर की आकृति का कोई अनुमान नही हो पाए, कोई दिक्कत नही. लेकिन ये सब करके, लड़कियों को गुणवत्ता वाली तालीम ज़रूर दें, उसे सशक्त बनाए. क़ौम की आधी आबादी को, घरो मे क़ैद करके, हम स्वस्थ समाज का निर्माण नही कर सकते.

    शालीनता और दकियानूसी विचारो मे फ़र्क होता है.

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  11. Sachin Pardeshi

    वैसे तो आपके लेख के जवाब में मेरा ‘छत के निचे छाता क्यों ? ‘नाम का लेख यहाँ पहले से मौजूद है ! फिर भी आपके लेख में जो नयी बात आई है उसपर कुछ सवाल
    1.औरतो के सतीत्व से आपका क्या मतलब है ?सतीत्व की आपकी क्या परिभाषा है जनाब फिर उस हिसाब से पुरुषों के सतीत्व का क्या ?? और कुरआन में इस सतीत्व की रक्षा के लिए उसके तरीके केलिए क्या कुछ नहीं लिखा गया ? अगर है तो क्या वह पर्दा ,बुरका आदि उपायों के विपरीत है ? अगर नहीं तो फिर पर्दा बुर्का इस्लाम हो या आपकी नए खोज के अनुसार संस्कृति इसके श्रेय और आलोचना से इस्लाम को कैसे अलग रखा जा सकता है ?
    2. और ये बढ़िया रास्ता निकाला आपने की इस्लामी संस्कृति और इस्लाम अलग अलग है कहकर ! वाह साहब जो धर्म और उसका ईश्वर कुरआन के एक शब्द से भी टस से मस होने की इजाजत नहीं देता और ऐसा करने वाले को तुरंत काफ़िर करार देता हो वह कुरआन से विपरीत पूरी की पूरी संस्कृति को न सिर्फ अपनाने बल्कि उसको फूलने फलने की इजाजत देता है यह दावा करना किस बौद्धिक दिवालियेपन की निशानी है साहब ?
    3.कल क्या इसी संस्कृतिकी आड़ लेकर आप इस्लामी आतंकवाद को भी सही करार देना शुरू नहीं करेंगे ? की भाई ये तो कुरआन में नहीं है लेकिन संस्कृति में जुड़ गया !!!
    सिर्फ कुरआन में कुछ होने न होने से कुरआन नहीं बक्शा जाएगा जनाब ! बल्कि जो भी इस्लाम में कहिये या मुसलमान में कहिये या फिर आपकी नयी संघी खोज संस्कृति कहिये उसके पक्ष या विपक्ष में न सिर्फ कुरआन स्पष्ट रूप से क्या कहता है और मुसलमान उसपर कितना अमल करता है इस आधार पर अपने कुरआन ,इस्लाम ,और संस्कृति को बख्शने की कोशिश कीजिये ! अगर कुरआन इसमें नाकाम है तो जिम्मेदारी लेने की भी हिम्मत रखिये ! यूँ बच्चों की तरह इसको उसको ऊँगली दिखाकर कुरआन ,इस्लाम और मुसलमान के बिगड़ने का रोना रोने से आप स्वयं इस्लाम ,कुरआन के ईश्वरीय और न जाने क्या क्या होने के दावे को खारिज करवाते हो यह मत भूलिए ! क्यों ईश्वरीय वो नहीं होता जो इंसानो से इतना बिगड़ जाए की उसकी पैरवी करने की जरुरत पड़ जाए !

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  12. Sachin Pardeshi

    क्यों की ईश्वरीय वो नहीं होता जो इंसानो से इतना बिगड़ जाए की उसकी पैरवी करने की जरुरत पड़ जाए !

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  13. Ravinder

    Again same stupid logic every one knows this dam idiot thing burqa doesn’t suit Indian climate so drop it it’s a sin where our ladies wear this stupid symbol of Arab

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  14. सिकंदर हयात

    Sanjay Tiwari1 hr · तीन मेल स्टार हैं इस दौर में। शाहरुख। आमिर और सैफ। तीनों को अपने धर्म मजहब में एक अदद पत्नी नहीं मिली। जब प्यार मोहब्बत शादी करना हुआ तो उन्हें अपने मजहब के दायरे से बाहर जाना पड़ा। एक चौथा भी जाना चाहता था लेकिन ऐश्वर्या ने साथ नहीं दिया इसलिए अकेला रह गया।इन चारों को अगर आप मुस्लिम समाज के नजरिए से देखें तो पायेंगे कि बीस करोड़ लोगों की दुनिया औरतों को लेकर इतनी दमित और पिछड़ी है कि कोई सफल आदमी अपने लिए जीवनसाथी नहीं खोज सकता। जीवनसाथी का मतलब बुर्क में लिपटी एक काली आकृति नहीं होती। मनुष्य मन की इच्छाएं समान होती हैं वो धर्म बदल देने से बदल नहीं जातीं। इसलिए जैसे ही आप अपने नियम खुद निर्धारित करने लगते हैं तो आपको भी सहज लोग पसंद आते हैं।लेकिन इस्लाम औरतों के दमन का सबसे कारगर हथियार है। जब औरत की गुलामी की बात आती है तो बाकी धर्म भी इसके तरीकों के आगे बौने साबित होते हैं। एक से एक तरीके गढ़े गये हैं। ये शायद मनुष्य मन की कमजोरियां होती हैं जो औरत को ज्यादा से ज्यादा नियंत्रित करता है क्योंकि वह अपनी वासनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है। स्त्री अंगों के प्रति पुरुष में बहुत जबर्दस्त आकर्षण होता है। पूरब की सभ्यता में जो धर्म पनपे उन्होंने इस आकर्षण से पार पाने के लिए स्त्री के दमन का रास्ता नहीं पकड़ा। उन्होेंने आत्म दमन और संयम को अपना मार्ग बनाया। इसलिए हिन्दू हो या बौद्ध या फिर जैन आप इनकी जीवनशैली देखेंगे तो पायेंगे कि पुरुष सामान्यत: यौन कुंठा का शिकार है। यह उसका संयम के नाम पर किया जानेवाला दमन है जो उसे कुंठित कर देता है।अरब की कबीलाई सभ्यता में इस्लाम से पहले बिल्कुल यही पद्धति थी। औरतों पर नियंत्रण के कोई सख्त नियम कानून नहीं थे। बल्कि इस्माइल के प्रभाव में जो स्थानीय धर्म परंपराएं पनपीं उनमें औरत का सम्मान था। खुद मोहम्मद साहब का कुरैश कबीला किसी देवता का नहीं बल्कि देवी का उपासक था। जो काला पत्थर काबा में लगाया गया है, जिसे हज के दौरान मुसलमान चूमते हैं वह उसी कुरैश कबीले की देवी का पत्थर है जिससे मोहम्मद साहब ताल्लुक रखते थे। उनकी पहली पत्नी खुद एक सफल व्यवसायी थीं। जाहिर सी बात है, किसी बंद समाज में कोई महिला सफल कारोबारी नहीं हो सकती थी।लेकिन बाद में बहुत सारी गड़बड़ की गयी और उस पर इस्लाम का आवरण चढ़ा दिया गया। युद्ध में जीती जानेवाली औरतों के बंटवारे वाले नियम को चार शादी का नियम बना दिया गया। जिस हिजाब का मतलब हया होता है उसे स्कार्फ बना दिया गया जो कि अनिवार्य रूप से औरत के सिर पर रहना ही चाहिए। औरतों के सामान्य रूप से खांसने पादने तक पर फतवे जारी कर दिये गये। ये सब नियम कानून असल में पुरुष की अपनी कामोत्तेजना को न भड़कने देने के साधन थे जिन्हें औरतों पर लाद दिया गया। स्त्री देह के प्रति पुरुष के मन में जो स्वाभाविक आकर्षण है उसको नियंत्रित करने के लिए इस्लाम में दुनियाभर के नियम कानून गढ़े गये और स्त्री को विकृत किया गया।

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  15. सिकंदर हयात

    Sanjay Tiwari1 ht visfot news networkrआज इस्लाम में औरतों की क्या दुर्दशा है इसे जानने के लिए देश की शिक्षा व्यवस्था में मुस्लिम लड़कियोम की हिस्सेदारी देखकर लगा लीजिए। कभी जिस फिल्म इंडस्ट्री में एक से एक प्रतिभावान मुस्लिम लड़कियां अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाती थीं आज वहां एक कायदे की अभिनेत्री नहीं मिलेगी। यह ऊपरी तौर पर चाहे जो लगे लेकिन गहरे में यह बीमारी का लक्षण बताता है कि कैसे एक समाज धर्म के नाम पर भीतर ही भीतर बीमार हो गया है। शाहरुख की गौरी और सैफ अली की करीना उसी बीमारी का लक्षण हैं। लेकिन मुसलमानों का दुर्भाग्य यह है कि उन्हें जिस बीमारी पर रोना पीटना चाहिए वो उस पर ताली बजाते हैं। वे उसी को जन्नत बता रहे हैं जो जीवित इंसान के दोजख हैं।Sanjay Tiwari1 t visfot news network

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  16. सिकंदर हयात

    Sheetal P सिंह India DialogueLike Page
    1 hr · Tazikistan ने हिजाब पर बैन लगाया
    98% मुस्लिम आबादी वाले देश की संसद ने कहा कि यह हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं
    साहसिक फैसला
    https://sputniknews.com/asia/201709051057085756-tajikistan-muslim-veils-ban/ Sheetal P Singh added 2 new photos.Follow
    3 September at 22:09 ·
    ये IPS हैं और महाराष्ट्र में पुलिस के बड़े बड़े ओहदों पर रहे हैं । जिनके साथ अपनी पत्नी को लेकर खड़े हैं उनको बलातकार के दो मामलों में सजा हो चुकी है और कत्ल के मामले पेंडिंग हैं |

    इनकेमुंबई केफ्लैट को इनके किरायेदार कालगर्ल रैकेट में स्तेमाल करते दो बरस पहले पकड़े गये थे |

    आप समझ सकते हैंकि ये पुलिस के कितने काबिल अफसर रहे होंगे कि जरायमपेशा लोगों की सोहबत में हैं जाने अनजाने ।

    अब देश इनके हाथ है !

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  17. सिकंदर हयात

    Dhananjay Singh
    22 August at 19:54 ·
    एनडीटीवी पर आरिफ मोहम्मद खान साहब बता रहे हैं की शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला संसद से पलटने के पीछे राजीव जी के ऊपर मुस्लिम कट्टरपंथियों का दबाव कत्तई नहीं था.कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं अर्जुन सिंह,नरसिम्हा राव और एनडी तिवारी का दबाव था की — ”हम मुसलमानों के समाज सुधारक नहीं हैं,वो गड्ढे में पड़े रहना चाहते हैं तो हम अपने वोट बैंक को क्यों बर्बाद करें”.
    देश की एक बड़ी आबादी के अहम मसले पर यह बहुत ही बड़ी बात है जिसे वो अपने अनेक इंटरव्यूज में कह चुके हैं.जिनकी स्मृति कमजोर है उन्हें याद रहना चाहिए की तत्कालीन गृह राज्यमंत्री आरिफ साहब ने सरकार की तरफ से शाहबानो फैसले पर (179 रु.20 पैसे महीने गुजारा भत्ता दिए जाने के फैसले और तलाक के मुद्दे पर) संसद में जोरदार भाषण दिया था. दबाव बढ़ने पर जब राजीव जी ने यू टर्न मारकर संसद से मामला पलटवा दिया तो आरिफ साहब ने कांग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया था.
    खरीखरी-खुरखुरी ——– # अभी भी अदालती फैसले पर उन लोगों को मुस्लिम बहनों का बड़ा ध्यान आ रहा है जो मुस्लिम भाइयों का झोला चेक करके कहीं और का रास्ता दिखाना चाहते Dhananjay Singh

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