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शीत – युद्ध की समाप्ति और दो धु्रवीय विश्व की प्रतीक – ‘‘बर्लिन की दीवार’’ के नवम्बर 1989 मे ंढह जाने के साथ एक नई विश्व व्यवस्था का अधिकृत रूप से आगाज हुआ । भू-मण्डलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियां अपनाकर भारत भी इस नई व्यवस्था में सहयात्री बना । 25 वर्ष तक संसद में गठबंधन सरकार के चलते इस दिशा में खास उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई । लोकसभा में पूर्ण बहुमत वाली सरकार के गठन के बाद अब विश्व के धन कुबेरों को उम्मीद है कि उनके सपनों का ‘‘न्यू वर्ल्ड आर्डर’’ कायम करने में भारत महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगा । यह बात आप सब गांठ बांध लें कि आम गरीबों , दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ वो होने वाला है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते !!बरसों बाद मिली मलाई कैसे छोड़ें!

कोर्पोरेट भ्रष्टाचार ही मूल जड़ है इनकी बरबादी का । कोर्पोरेट देश के संसाधनों पर कब्जे, दोहन के लिए सरकारी तंत्र को अपने काबू में कर लेते हैं। देश के संसाधनों का दोहन ही नहीं सरकारे , नीतियाँ भी इन कोर्पोरेट की मर्जी से बनाती हैं। पूँजीवादी व्यवस्था में अमेरिका से लेकर भारतीय व्यापारिक घराने भाजपा को लाने में एक हो गये हैं । क्यों ? क्योंकि उन्हें पूरे भारत के बाजार, संसाधनों यहाँ तक की जमीन तक पर कब्जा चाहिए। भूमि अधिग्रहण बिल, हर क्षेत्र में एफ़डीआई ,निजीकरण यहाँ तक की कर्मचारियों की भविष्य निधि तक के पैसे को ये कोर्पोरेट संचालित कर मुनाफे की अंधी दौड़ में शामिल हो जाते हैं। ये भारत तक ही सिमित नहीं हैं। आप सोचिये भारत के तत्कालीन सबसे महंगे लोकसभा चुनाव से भी चार गुना महंगा है अमेरिकी चुनाव, अमेरिका की प्रमुख कम्पनियों को छींक भी आ जाए तो ओबामा रुमाल ले कर दौड़ेंगे। ऑस्ट्रेलिया की सत्ता रूढ़ पार्टी को सबसे बड़े दान दाता भारतीय उद्योग पति अडानी है । आश्चर्य मत कीजिये पूंजीवादी गठजोड़ विश्व व्यापी है।

यह विश्व व्यवस्था एक ‘‘विश्व सरकार’’ की कल्पना है, जिसे साकार करने के लिए इल्युमिनाटी, बिल्डरबर्ग ग्रुप,कौंसिल फॉर फारेन रिलेशन्स, त्रिपक्षीय आयोग (ट्रायलेट्रल कमीशन), फ्रीमेसन्स जैसे शक्तिशाली अन्तर्राष्ट्रीय और गुप्त संगठन वर्षों से प्रयासरत है। अमेरिका, ब्रिटेन सहित अनेक शक्तिशाली देशों के शासनाध्यक्ष इनके प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं। इन संगठनों के मुख्यिा रॉथशील्ड, रॉकफेलर, मोरगन परिवार जैसे धनकुबेरों के साथ-साथ बिल्डरबर्ग ग्रुप से जुड़े लगभग 150 खरबपति हैं, जो दुनियां के अधिकांश बैंकों और विशालकाय कम्पनियों के मालिक हैं।

अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, इजरायल, बेज्लियम, फ्रांस आदि देशों के ये धन्नासेठ ऐसा विश्व बनाना चाहते हैं, जिसमे 50 करोड़ नागरिकों के लिए रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार की गारंटी होगी। लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित ये विश्व नागरिक स्वयं केन्द्रित होंगे। नई विश्व व्यवस्था में सभी राष्ट्र राज्यों का अंत हो जाएगा । निजी सम्पत्ति नहीं होगी, उत्तराधिकार का अधिकार नहीं होगा, देश भक्ति के लिए कोई स्थान नहीं होगा । परिवार नहीं होगा और धर्म भी नहीं होगा। कार्लमार्क्स ने जिस ‘कम्यून’ की कल्पना की थी, उससे मिलती – जुलती इस व्यवस्था मे उत्पादन के सभी साधन समाज के हाथ में नहीं, बल्कि बिल्डरबर्ग ग्रुप से जुड़े धनकुबेरों के स्थायी नियंत्रण मे होंगे तथा उनका हित संवर्धन करना ही विश्व नागरिकों का परम् कर्त्तव्य होगा। समाज दो भागों में बटा होगा – शासक और सेवक। मध्य वर्ग के सभी कार्य तकनालॉजी के माध्यम से सम्पन्न होंगे। सभी नागरिकों पर माइक्रोचिप के जरिये नियंत्रण रखा जावेगा।

वर्तमान में दुनिया की आबादी लगभग 700 करोड़ से अधिक है । इस आबादी को घटाकर 50 करोड तक लाने के लिए विभिन्न उपायों की खोज में शीर्षस्थ वैज्ञानिकों को लगाया गया है। वेक्सीनेशन और जेनेटिक इंजीनियरिंग से निर्मित खाद्यान्न के जरिये नई पीढी की प्रजनन क्षमता को खत्म करने का विश्व व्यापी अभियान गोपनीय रूप से चलाया जा रहा है । बिल और मिलिंडा गेट्स फाउन्डेशन इसमें पूरा सहयोग कर रहा है। मीडिया सम्राट वारेन बफेट ने भी इस अभियान में लगभग 30 बिलियन डालर का योगदान किया है ताकि धरती को मानव के अत्यधिक बोझ से छुटकारा मिले। यह अलग बात है कि भारत मे संघी बड़बोले अधिक बच्चे पैदा करने का राजनीतिक ब्यान परोस रहे हैं ।
मनुष्य के श्वास विसर्जन से वातावरण में कार्बनडाय आक्साइड की मात्रा बहुत बढ़ रही है और क्लाइमेट चेंज हो रहा है। इस जलवायु परिवर्तन के कारण विश्व का तापमान बढ़ रहा है, जिससे मानव का अस्तित्व ही खतरे में आ गया है, – यह अवधारणा कायम कर दी गई है। तापमान को बढ़ने से रोकने के लिए वातावरण में कार्बन डाय-आक्साइड कम करना होगा। आबादी को घटाकर ही यही संभव है।इस नई पूजीवादी विश्व व्यवस्था के लिए एशिया, अफ्रीका, मध्यपूर्व के देशों की निर्धन आबादी को खत्म करना आवश्यक माना गया है। ‘‘आबादी घटाना’’ और ‘‘नस्ल विशेष के हाथ मे राजसत्ता’’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन करने वाले विख्यात फेबियन सोसलिस्ट और दार्शनिक ‘‘बट्रेड Russell Tarr रसेल’’ है , जिन्हें नई विश्व व्यवस्था का मसीहा माना जाता है।

विश्व की 80 से 90 फीसदी आबादी को खत्म करने के अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ‘नई विश्व व्यवस्था’ के हिमायती चंद धन कुबेरों द्वारा तीसरे विश्व युद्ध की संभावना, जलधारा (नदी, जलाशय) को विशाक्त बनाने,जैविक या रासायनिक हथियारों का उपयोग करने, प्राकृतिक आपदा पैदा करने जैसे अनेक उपायों पर शोध कराया जा रहा है। भारत सहित दुनिया के कृषि प्रधान देशों में किसानों से खेती की जमीन मुक्त कराने के लिए खेती को घाटे का सौदा बनाकर किसानों को आत्महत्या के लिए विवश करना ‘नई विश्व व्यवस्था’ को साकार करने की दिशा में एक सफल प्रयोग है। भारत सरकार इसमें पूरा सहयोग कर रही है।

इस महत्वपूर्ण परिघटना के संबंध में जागरूक समुदाय द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से सूचनाओं का प्रचार-प्रसार कर रहा है। असंख्य रिपोर्ट और फिल्मे यू-ट्यूब में उपलब्ध हैं। मुख्यधारा के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चूंकि ‘न्यू वर्ल्ड आर्डर’ के हिमायती कार्पोरेट के नियंत्रण में हैं इसलिए उनमें इससे संबधित गतिविधियों का प्रसारण नहीं होता। कार्पोरेट मीडिया द्वारा सामाजिक सरोकारों की इस उपेक्षा के चलते दुनिया की अधिकांश आबादी अपने सिर पर मंडराते खतरे के प्रति बेखबर है। कुकुरमुत्तों की तरह पैरा बैंकिंग आखिर कर क्या रहे हैं ? आम आदमी का खून किसकी बोतल मे चूसा जा रहा है ?

यूँ तो पैराबैंकिंग क्षेत्र में पूरे देश में पिछले 40 वर्षों से बड़े-बड़े घोटाले (ताजा मामला सारदा ग्रुप का है) होते रहे हैं, भारत मे सुब्रत राय एक उदाहरण सामने है । पर सुब्रत राय अपने आप में एक प्रतिनिधि घटना ही नहीं बल्कि परिघटना हैं। सुब्रत राय भारत जैसे तीसरी दुनिया के किसी देश में ही हो सकते हैं, जहाँ अनुत्पादक परजीवी पूँजी का खेल राजनेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों, तरह-तरह के काले धन की संचयी जमातों और काले धन के सिरमौरों की मदद से खुलकर खेला जाता है। लेकिन पूँजी के खेल के नियमों का अतिक्रमण जब सीमा से काफी आगे चला जाता है तो व्यवस्था और बाज़ार के नियामक इसे नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठाते हैं और तब सबसे “ऊधमी बच्चे” को या तो कोड़े से सीधा कर दिया जाता है या खेल के मैदान से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। सुब्रत राय के साथ यही हुआ है।

मगर नवउदारवाद के दौर में एक सुब्रत राय अस्ताचलगामी होंगे तो कई और छोटे-बड़े सुब्रत राय पैदा होते रहेंगे। पूँजीवादी खेल के नियमों को गलाकाटू प्रतिस्पर्धा में लगे अंबानी, अदानी, जेपी ग्रुप, , मित्तल, वेदान्ता आदि सभी तोड़ते रहते हैं, पर ज़्यादा से ज़्यादा उन्हें हल्की चेतावनी ही मिलती है। कारण है उनकी उस पूँजी की ताकत जो मुख्यतया मैन्युफैक्चरिंग और बैंकिंग तथा मुख्य धारा के वित्त बाज़ार में लगी है। सहारा ग्रुप ने पैरा बैंकिंग से पैसा निकालकर रीयल एस्टेट, हाउसिंग, विमानन, मीडिया, मनोरंजन, होटल आदि अनुत्पादक क्षेत्रों में भारी पूँजी लगाई। लगभग इन सभी क्षेत्रों में उसे घाटा ही हुआ, फिर भी पैराबैंकिंग के ज़रिए छोटे निवेशकों को मूँड़कर वह पूंजी का अम्बार जुटाता रहा और इसी अन्धी हवस ने सेबी को विवश किया कि वह संड़सी से कान पकड़कर सुब्रत राय को अदालती कटघरे में खड़ा कर दे। फासिस्टी ‘सहारा प्रणाम’, दुर्गारूपणी भारत माता की आराधना वाली देशभक्ति, खेल और मनोरंजन की दुनिया की शीर्ष हस्तियों के साथ उत्सव-मस्ती तथा ‘सहारा शहर’, ‘सहारागंज’, ‘सहारा टावर’, जैसे नामकरण आदि के ज़रिए सुब्रत राय “महान साम्राज्य निर्माता” होने के जिस भोड़े ‘कल्ट’ का प्रहसन खेल रहे थे, उस मंच के पाये-पटरे ही चरमराकर टूट गये। सुब्रत राय दरअसल एक धूमकेतु थे। उनके पास पारम्परिक उद्योगपतियों-व्यापारियों के घरानों की परम्परा की निरन्तरता से प्राप्त शक्ति, संस्कृति और सूझ-बूझ नहीं थी। इस कमी को वह टीम-टाम, शोशेबाज़ी, ‘कल्ट’ की चकाचौंध और राजनेताओं तथा अन्य महाधनिक हस्तियों से निकटता बढ़ाकर पूरा करना चाहते थे, जो सम्भव ही नहीं था।सहारा ग्रुप की पूरी संरचना और कार्यप्रणाली पर पिछले दिनों तमाल बन्द्योपाध्याय की चार सौ पृष्ठों की पुस्तक ‘डेंजर ऑफ शैडो बैंकिंग’ प्रकाशित हुई, जिसे पढ़ना एक दिलचस्प अनुभव है। इस पुस्तक की मुख्य धारा की मीडिया में चर्चा नहीं हुई । इस कथित मुख्य धारा की मीडिया पर जिन इज़ारेदार पूँजीपतियों का कब्ज़ा है, वे इतना तो भाईचारा निभायेंगे ही। सौतेला है, थोड़ा बेऔकात हो गया था, पर है तो अपना भाई ही।विश्व पटल पर क्या हो रहा है भारत की राजनीतिक पार्टियों के सोच के दायरे से यह बहुत दूर की बात है । क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं पर नजर रखकर रणनीति बनाने की प्रवृत्ति उन्होने विकसित ही नहीं।अब कोई ये विवेकहीन विचार लाये की पूरी कोर्पोरेट की पूँजी से बनी सरकार आमजन के लिए काम करेगी तो हास्यपद ही है। कोर्पोरेट ही ये तय करता है की कौनसा मंत्रालय किसे मिले, यहाँ तक की हर विभाग में मुख्य नियुक्तियां तक अपनी मर्जी की तय करता है, पिछले 2 साल के भाजपा कार्यकाल में सभी कोर्पोरेट परस्त नीतियों से स्पष्ट है। हर क्षेत्र में अयोग्य लोगों की नियुक्ति में भी भाजपा सारे रिकोर्ड तौड़ रही है। अब बरसों बाद मिली मलाई कैसे छोड़ें राजनेता जो शुद्द व्यवसाय की तरह राजनीति करते हैं ।

फिल्म और टेलीविजन के माध्यम से युवा पीढ़ी की मानसिकता ‘कारपोरेट विश्व व्यवस्था’ के अनुकूल बनाने के लिए बहुत तेजी से काम चल रहा है। शिक्षा, बैंकिंग, राजनीति, सैन्य शक्ति और इलेक्ट्रॉनिक्स के जरिये इस अभियान को द्रुत गति से आगे बढ़ाया जा रहा है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन नई विश्व व्यवस्था के एकमात्र विरोधी राजनेता हैं। महाश्ािक्तयों से खतरे के चलते वे पूरी सैनिक शक्ति के साथ चलते हैं। पिछले दिनों आस्ट्रेलिया मे सम्पन्न जी20 सम्मेलन के दौरान उनके इर्द-गिर्द रूसी सेना का कड़ा पहरा था। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नई विश्व व्यवस्था के संबंध में कोई बयान नहीं दिया है। देखना है कि संघ परिवार के प्रतिनिधि के रूप मे ं ‘‘कारपोरेट विश्व व्यवस्था’’ के प्रति उनकी सरकार क्या और किस तरह का नीति अपनाती है जबकि काम बहुत ही गोपनीय तरीके से चल रहा है ?आर्थिक उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों को नंगे तौर पर लागू करने और देशी-विदेशी पूँजी की खुली लूट को कानूनी रूप देने की दिशा में और आगे बढ़ते हुए नरेन्द्र मोदी की सरकार उच्चतर शिक्षा को डब्ल्यू.टी.ओ.-गैट्स के अन्तर्गत शामिल किये जाने को सुनिश्चित करने की पूरी तैयारी में है। पूँजीपतियों के संगठनों फिक्की, नैसकॉम, एसोचैम और भारतीय अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक सम्बन्ध शोध परिषद (आईसीआरईआर) से लेकर भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रलय के साथ-साथ सरकार के भोंपू विद्वानों और अर्थशास्त्रियों ने इसे आज के समय की सबसे बड़ी ज़रूरत बताया है। इसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि भारत में उच्च शिक्षा की माँग बढ़ रही है और यहाँ से एक बड़ा तबका विदेशों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए जा रहा है तो उस युवा आबादी को यहीं रोका जाये और उनके लिए विश्वस्तरीय शिक्षा की व्यवस्था यहीं की जाये। कहने की ज़रूरत नहीं कि देश की 85 फीसदी मेहनतकश अवाम के युवाओं की शिक्षा और रोज़गार का प्रश्न इन रिपोर्टों से सिरे से ग़ायब है। जो आबादी विदेशों में पढ़ने के लिए जाती है वह उच्च, उच्च मध्यम वर्ग और 1990 के बाद अस्तित्व में आये नवधनाढ्य वर्ग के युवाओं की आबादी है। इसके अलावा एक बड़ी आबादी ऐसे घरों के युवाओं की भी है जो शैक्षणिक वीज़ा लेकर विदेशों में काम के “बेहतर” अवसरों की तलाश में जाती है और वहाँ अपनी श्रमशक्ति अपेक्षाकृत सस्ती दरों पर विदेशी बाज़ारों में उपलब्ध कराती है। विदेश जाने वाले युवाओं की संख्या हालिया रिपोर्टों के अनुसार 2011 में 2,28,774 थी और 2012 में 1,90,055 रह गयी। संयुक्त राष्ट्र संघ की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15-24 आयु वर्ग के युवाओं की कुल जनसंख्या 35,60,00000 है। दरअसल, भारत में उच्चतर शिक्षा में वृद्धि का यह जो हौवा खड़ा किया जा रहा है उसके पीछे सच्चाई यह है कि सरकार उच्चतर शिक्षा को ‘मेक इन इण्डिया’ के तहत विदेशी निवेशकों के लिए खोल देना चाहती है ताकि यहाँ बड़ी संख्या में आई.टी.आई. और पोलिटेक्निक जैसे तकनीकी शिक्षण संस्थान खोले जायें और प्रशिक्षित कमेरों की एक बड़ी फौज तैयार हो – जो आज विश्व पूँजीवाद की ज़रूरत है। फिक्की की 2014 की रिपोर्ट में कहा गया है कि सेवा क्षेत्रों में व्यापार बढ़ने के कारण और वैश्विक अर्थव्यवस्था में तकनीकी ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए कुशल एवं प्रशिक्षित मज़दूरों, अन्वेषकों तथा ‘नॉलेज वकर्स’ की ज़रूरत है। साफ है कि भारतीय पूँजीपति वर्ग पूँजी की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे नहीं रहना चाहता।