fatwa

हाल ही में हिंदुस्तानी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एक कांफ्रेंस में पूरे महाराष्ट्र (पश्चिम भारत के एक राज्य) से लगभग 2,00,000 मुसलमानों की बड़ी तादाद ने भाग लिया और बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना राबे हसनी नदवी ने इस मौके पर बहुत जज़्बाती भाषण दिया और कहा कि शरीयत ख़ुदादाद है और इसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है और यहां तक ​​कि पूरी इस्लामी दुनिया शरीयत में अगर तब्दीली करती है तब भी हिंदुस्तानी मुसलमान इसमें कोई बदलाव करने की इजाज़त नहीं देंगे और रवायती शरीयत को अपने दिल के करीब रखेंगे।

ये रुख ​​कैसे उचित है? आज कई औरतें तीन तलाक और अनियमत बहुविवाह वगैरह, जो उनके लिए मुसीबत पैदा कर रहा है, वो इसमें कुछ आवश्यक तब्दीली के लिए आंदोलन कर रही हैं। कुछ फिक्रमंद हज़रात समेत मैंने खुद मुस्लिम पर्सनल लॉ को तर्तीब देने की पहल है ताकि इसके दुरुपयोग को कम से कम किया जा सके और मुस्लिम औरतों को राहत पहुंचाई जा सके। शरीयत कानून का दुरुपयोग किस हद तक किया जा सकता है, इसका फैसला इस तथ्य से किया जा सकता है की हैदराबाद (डेक्कन) की एक मशहूर इस्लामी युनिवर्सिटी ने इस घारणा पर कि इस्लाम बहुविवाह की इजाज़त देता है, एक शख्स को दो नौजवान लड़कियों के साथ एक ही वक्त में शादी करने की इजाजत दे दी।

ये सब सैकड़ों साल पहले लिखी गई किताबों और जारी किए गए फ़तवे पर आधारित है और हमारे उलेमा लोग इन तहरीरों से इंहेराफ (विचलित) करना नहीं चाहते हैं। जब भी इनसे कोई सवाल पूछा जाता है तो ये इन तहरीरों से रुजू करते हैं और एक फतवा जारी करते और फिर अदालत के फैसले की तरह यह फतवा बाद के फतवों के लिए एक नज़ीर बन जाता है और ये फतवा पूरी दुनिया में लागू होने वाला माना जाने लगता है। आम मुसलमानों को पता नहीं है कि ये फतवा सिर्फ मुफ्ती हज़रात की ज़ाहिर की गई महज़ राय है और इनकी पाबंदी करना ज़रूरी नहीं है।

क्या नामवर उलमा की जानिब से जारी किये फतवों को नाकबिले तब्दील माना जाना चाहिए? या फिर उन्हें वक्त और जगह में तब्दीली के साथ बदला जा सकता है? आमतौर पर शरीयत को खुदादाद और नाकाबिले तब्दील माना जाता है और कोई भी व्यक्ति इसमें कोई भी तब्दीली नहीं कर सकता है। हकीकत में शरीयत के कानूनों को हज़रत इमाम अबू हनीफा जैसे प्रसिद्ध इमामों ने अपने ज़माने और हालात की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए तैयार किया था। इस तरह शरीयत को खुदा के इरादे में मुख्लिस इंसानी दृष्टिकोण के रूप में बताया जा सकता है। ये मशहूर है कि हज़रत इमाम शाफ़ेई जब मिस्र स्थानांतरित हुए तो आपने कई फ़िक़्ही मुद्दों पर अपनी राय बदल दी थी।

हाल ही में मैंने अरब दुनिया में सबसे काबिले एहतेराम प्रसिद्ध विद्वान अल्लामा यूसुफ करज़ावी की एक किताब को देखा। ये फतवा और फ़तवे में तब्दीली की आवश्यकता के विषय पर है। ये एक काबिले एहतेराम इदारे इस्लामी फ़िक़्ह अकादमी द्वारा प्रकाशित की गई है। अल्लामा यूसुफ करज़ावी ने फतवा में तब्दीली के लिए औचित्य के रूप में इस्लाम में इज्तेहाद के सिद्धांत को ताजा किया है। अल्लामा का तो यहां तक ​​कहना है कि शरीयत, उम्मत के लिए तब तक उपयोगी नहीं हो सकती है जब तक इज्तेहाद (वो इज्तेहाद की कई शक्लों की तरफ इशारा करते हैं) का अमल वक्त से इस्तेमाल न किया जाये।

ये काबिले ग़ौर है कि शरियत को गतिमान और जहां ये लागू होती है, उसके वक्त और जगह के लिहाज़ से होना चाहिए। जिन बुनियादी सिद्धांतों और मूल्यों पर शरीयत की बुनियाद है उन्हें बदला नहीं जा सकता है लेकिन इन सिद्धांतों और मूल्यों पर आधारित कानूनों को कार-आमद और वक्त के लिहाज़ के मुताबिक रखने के लिए वक्त के साथ इनमें परिवर्तन होना चाहिए। इसी वजह से अधिकांश इस्लामी देशों में पारंपरिक शरीयत कानूनों को बदल दिया गया या इनको तर्तीब (संहिताबद्ध) दिया गया है ताकि ये मुफीद हों जैसा कि ये कभी थे।

अल्लामा करज़ावी ने 10 बुनियादें दी हैं, जिस पर फतवा बदला जा सकता है और ये सभी कारण बहुत प्रासंगिक हैं। सबसे पहले उन्होंने चार बुनियादें जिस पर फतवा तब्दील होना चाहिए यानी वक्त में तब्दीली, जगह में तब्दीली, हालात में तब्दीली और सामाजिक तरीके या रवायत में तब्दीली। कुरान भी इसी अर्थ में मारूफ की इस्तेलाह (पदावली) का इस्तेमाल करता है। फिर बदलाव की पसंद के बारे में छह और बुनियादें पेश करते हैं, जो निम्नलिखित है: (1) इल्म में तब्दीली , (2) लोगों की ज़रूरतों में तब्दीली, (3) लोगों की सलाहियतों में तब्दीली, (4) किसी कहर के फैलने पर (जब कुछ गंभीर समस्या आम हो जाती है), (5) सामूहिक राजनीतिक या आर्थिक स्थिति में बदलाव और (6) राय या फिक्र में तब्दीली।

ये दस बुनियादें वास्तव में किसी समाज के सभी संभावित बदलावों को शामिल करती हैं। इससे ये बहुत हद तक स्पष्ट है कि इस्लामी फ़िक़्ह, जैसा कि आम लोग सोचते हैं, कि ये स्थिर और किसी भी तरह से काबिले तब्दील नहीं है बल्कि इसमें बदलाव के लिए काफी गुंजाइश है। ये पूरी तरह दूसरी बात है अगर हमारे उलेमा कठोर या नाकाबिल हैं और खुद को शरीयत के खुदादाद होने के पीछे छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। वास्तव में कोई भी कानून अगर स्थिर रहता है तो वो समाज की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकता है।

मध्यकाल के जमाने में बने पर्सनल लॉ में आज कई बदलाव की जरूरत है। इसे लोग जानते हैं कि उस ज़माने की शरीयत में अरब के कई संस्कार और रिवाज भी इसमें शामिल किये गये थे, जैसे की मारूफ औऱ तीन तलाक़, उन्हीं में से एक है। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इसकी मज़म्मत की है क्योंकि कुरान से औरतों के सशक्तिकरण और उनको बराबर का दर्जा देना मतलूब है और इस पर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के वक्त में किसी ने अमल नहीं किया लेकिन बाद में कुछ कारणों से इसे फिर से लागू कराया गया।

आज औरतें अपने अधिकारों के बारे में बहुत जागरूक हैं और इस तरह का अमल समानता के सिद्धांत के खिलाफ है जो किसी भी अरब परंपरा की तुलना में बहुत ही बुनियादी है। अब भी इन पर हिंदुस्तान जैसे देशों में अमल होता है और यहां तक ​​की इसके खुदादाद होने के बारे में तसव्वुर किया जाता है। इसी तरह बहुविवाह का भी बहुत दुरुपयोग किया जाता है और इसे मर्दों का विशेषाधिकार माना जाता है। इसे बाज़ाब्ता करना होगा और किसी के खब्त के तौर पर इसके इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। कोई औरत आज इसे कुबूल नहीं करेगी जैसा कि माज़ी (अतीत) में किया करती थीं। मध्यकाल के पर्सनल लॉ की फार्मूलासाज़ी पुरुष प्रधान मूल्यों से प्रभावित थी और आज पुरुष प्रधान मूल्यों को खासतौर से औरतों के द्वारा चुनौती पेश की जा रही है।

बहुविवाह तेजी से उर्फ ​​यानी सामाजिक प्रासंगिकता और लोकप्रियता का उपयोग कर रहा है। इसकी सिर्फ उन सूरतों में इजाज़त दी जानी चाहिए जहां ये जरूरी है। इसी तरह दूसरे पर्सनल लॉ को भी अगर ज़रूरत हो तो इनका जायेज़ा लिया जा सकता है। अगर हमारे उलेमा शरई कानूनों के मामलों में अपनी राय देते वक्त अपने मन में इन 10 बुनियादों को रखते हैं, तो इससे बहुत फायदा होगा

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