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by — शैलेश वर्मा

काँग्रेस ‘संघ-परिवार’ का अभिन्न हिस्सा है। कश्मीरी ब्राह्मण नेहरु ने गुप्त पत्राक जारी किया था जिसके परिणाम से गत 50 सालों में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व एकदम नीचे लाया गया। सेना के रक्षा विंग द्वारा प्रेस के लिये जारी जम्मु से 1 अप्रैल को जारी एक पत्राक के अनुसार मुसलमानों तथा व्यापारियों के लिये सेना में पद नही है। जार्ज फर्नांडिज(ब्राह्मण) ने रहस्योदघाटन किया कि 1971 में बंगलादेश युध्द के पहले इंदिरा गांधी ने में यह आदेश दिये थे कि मुसलमानों को महत्व के पदों पर आसिन नही किया जाये।(नवभारत, 30 सितंबर 2003) सोनिया गांधी ने अपनी बेटी प्रियंका गांधी की शादी वढेरा परिवार में की है जो आरएस.एस. का शक्तिशाली सक्रिय सदस्य है। काँग्रेस धर्मनिरपेक्षता का ढोंग करती है इसलिये आपको इस पाखंडवादी काँग्रेस के भयंकर दाँत ही नही दिखाई देते और आप इसे अपना मानकर अपने-अपने समाज के संगठन समाप्त करके इसे अपना लेते है, परिणाम स्वरुप आपके अपने समाज की ताकत और आवाज समाप्त हो जाती है। फिर यह ब्राह्मणवादी संगठन एक एक करके आपके हकों को आप की आँखों के सामने निगलना षुरु करता है और ओबीसी, दलित, मुस्लिम, आदिवासी नेता न सिर्फ समाज के हक निगले जाते हुये देखते रहने पर मजबुर होते रहे है बल्की जनता का ध्यान इस ओर न जाये इसकी भरकस कोशिश भी खुद ही करते रहे है। इसके विपरित फासिस्ट दंगा-पार्टियों के हिंसक कारनामे आपको दिखाई देते है। उन्हे देखकर आपको संगठित होकर प्रतिकार करने की प्रेरणा मिलती है इसलिये ह संगठन आपकी ताकत को निगलते नही बल्की बढाते है।

इनकी हर फुफकार से आप और ज्यादा सतर्क हो उठते है। संघ परिवार के फासिस्ट संगठनों को दंगा कराकर जितना चुनावी फायदा हुआ है उससे कई ज्यादा फायदा दंगो पर झुठे घडियाली आँसु बहाकर होते रहा है। धार्मिक उन्माद फैलाने वाले होंगे तभी धर्म निरपेक्षता के झाँसे में मूलनिवासियों को फँसाया जा सकेगा इसलिये एकदुसरे पर हमारा अस्तित्व निर्भर करता है। एकदुसरे के बिना हमारा खेल चलना संभव ही नही है। आर्थिक सामाजिक नीतियों के मामले मे काँग्रेस भी उतनी ही बुरी पार्टी है जितनी की भाजपा। 1984 के सिख विरोधी दंगे तथा मेरठ-मुरादाबाद इ॰ के दंगे इसका सबूत है। यह क्रम पिछले दो दषकों से चलता आ रहा है कि भाजपा जहाँ कमजोर पडती है उसकी जगह लेने के लिए काँग्रेस वहाँ आगे आ जाती है और काँग्रेस जहाँ कमजोर पडती है उसकी जगह लेने के लिए भाजपा आगे आ जाती है। इन पार्टीयों में तब तक होड रहती है जब तक वर्णव्यवस्था को कोई खतरा उपस्थित नही होता। किंतु जब परंपरागत समाज रचना के टूटने और समाज में बुनियादी परिवर्तनों की स्थितियाँ बनती है तो दोनो पार्टीयाँ अपने मतभेद भुलाकर एकजुट हो जाती है। काँग्रेस के षासन में सन् 1949 में 22 दिसंबर की रात को बाबरी मस्जिद में राम की मूर्ति चोरी-छिपे प्रस्थापित की गई तथा अगले ही दिन मस्जिद पर ताला डाल दिया गया और मुस्लिमों को बाबरी मस्जिद में नमाज पढने से प्रतिबंधित किया गया। इसके बाद काँग्रेस के शासन में ही कांग्रेस सरकार के मंत्री अरुण नेहरु (ब्राह्मण) ने सन् 1986 को पांडे नामक (ब्राह्मण) जज के आदेश से बाबरी मस्जिद को हिन्दुओं की पूजा के लिए खोल दिया। जबकि मुस्लिमों को नमाज के लिये प्रतिबंधित किया गया। इसके पष्चात काँग्रेसी प्रधान मंत्री राजीव गांधी (ब्राह्मण) ने सन् 1989 में बाबरी मस्जिद परिसर में शिलान्यास कर रामराज्य की घोषणा की। इसके पश्चात काँग्रेस के प्रधान मंत्री नरसिंह राव (ब्राह्मण) तथा आर.एस.एस. परिवार की मिलिभगत से बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। बाबरी मस्जिद को ‘‘विवादित ढांचा’’ कहकर एक प्रकार से बाबरी मस्जिद के अस्तित्व को ही सिरे से नकारा जा रहा है।

मंडल आयोग लागू किये जाते ही दोनों ने मिलकर आरक्षण विरोधी दंगे कराए थे। बाद में नरसिंहराव की अल्पमत सरकार को पांच साल तक जीलाये रखने के लिए भाजपा ने कई बार संकटमोचक की भूमिका निभाई। एक बार तो भाजपा ने अविष्वास का नोटीस देकर अपने सांसदों को अनुपस्थित रहने को कह दिया था। इधर बाजपेयी सरकार को कई मौकों पर काँग्रेस ने सहयोग दिया है और जब वाजपेयी सरकार के पहले कार्यकाल के अंत में तीसरे मोर्चे की सरकार बनने की स्थितियाँ बनी थी तो काँग्रेस ने उसमें अडियल रुख अपनाकर लोकसभा भंग कर दी थी। (लोकमत समाचार, 28 अप्रेल 2002) उत्तर प्रदेष में विधान परिषद की एक सिट के लिए हुए उपचुनाव में भाग न लेकर कांग्रेस ने भाजपा-बसपा के उम्मीदवार को जिताया। (नवभारत, 20 नवंबर 2002) काँग्रेस व्दारा बीजेपी के खिलाफ अगस्त 2003 में संसद में पेश अविष्वास प्रस्ताव के खिलाफ यह आरोप लगाया गया कि काँग्रेस अब तक बीजेपी सरकार का साथ देते रही है और उनके विधेयकों को पास कराते रही है। अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा शरू होने के पहले के एक घंटे में कांग्रेस के सहयोग से पांच विधेयक पारित कराए गये है। पिछले चार सालों में गुजरात नरसंहार तथा ऐसी अनेक घटनाएं हुई है जिसमें अविष्वास प्रस्ताव लाया जा सकता था लेकिन काँग्रेस ने तब कभी अविस्वाव प्रस्ताव नही लाया। (नवभारत, 19 अगस्त 2003) जाहिर है कि यह अविष्वास प्रस्ताव की नौटंकी भी आपसी मिलिभगत से आगामी विधानसभा और संभावित लोकसभा के चुनावी उद्देष्य से अंजाम दी गई। अयोध्या के मामले में दोनो पार्टियों की समय समय पर एकजूटता इसलिए जरुरी है क्योंकि अयोध्या का मामला आरक्षणों के कारण वर्णव्यवस्था पर आए संकट का एकमात्रा बचाव है। इतिहास में वर्णव्यवस्था पर जब जब भी संकट आया उसे मंदिर मठ प्रणाली को मजबूत करके ही टाला गया। गुजरात के नरसंहार में भी परदेश के काँग्रेसी नेता तमाशबीन बने रहे और निचले स्तर के कार्यकर्ता दंगों और लूटपाट मे भी षामिल हुये। यह मूलतः सामाजिक समस्या है जो कभी दलित-पिछडे विरोधी दंगों मे प्रकट होती है और कभी मुस्लिम विरोधी दंगों में।

अस्सी के दषक मे आरक्षणों को लेकर गुजरात मे हुये दलित-पिछडे विरोधी दंगों और आजकल वहाँ हो रहे मुस्लिम विरोधी दंगों (जिन्हे नरसंहार कहना अधिक उचित होगा) ब्राम्हण, बनिया, पटेल एकजुटता से यही निष्कर्ष निकलता है कि परंपरागत जाति व्यवस्था को बचाने के लिये धर्म का सहारा लिया गया और धर्म को दष्ढता प्रदान करने के लिये सांप्रदायिक हिंसा,घिर्णा और पाषविकता का सहारा लिया जा रहा है। दलितों पिछडों के खिलाफ मुसलमानों को और मुसलमानों के खिलाफ दलित पिछडों का इस्तेमाल ब्राह्मणवादी व्यवस्था की पुरानी रणनीति है। (लोकमत समाचार, 28 अप्रेल 2002) मुस्लिम समाज जब भी अपने परिश्रम से उद्योग इ॰ श्रेत्रों मे आगे बढने लगता है तब तब काँग्रेस के इशारों पर बीजेपी, आर.एस.एस. इ॰ ने सांप्रदायिक दंगे भडकाकर मुसलमानों को तबाह किया है। गुजरात के दंगों के पीछे भाजपा के साथ साथ काँग्रेस भी पुरी तरह से जिम्मेदार है। इन सभी की मिलीजुली साजिश के तहत ही मूलनिवासी मुस्लिम मौत के घाट उतारे गये है। काँग्रेस के दिवंगत सांसद एहसान जाफरी की बहन का आरोप है कि जब उनके भाई पर गुजरात में दंगाईयों का हमला हो रहा था तो उन्होने काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी सहित पार्टी के कई लोगों से मदद की गुहार की थी लेकिन किसी काँग्रेसी नेता ने इसपर ध्यान नही दिया।(नवभारत, 15 दिसंबर 2002) गुजरात की बेस्ट बेकरी नरसंहार के गवाहों को चुप करने का दबाव बनाने के आरोप काँग्रेस के कुछ नेताओं पर लगे है। वडोदरा से काँग्रेस के पार्षद चंद्रकांत श्रीवास्तव ने इस हत्याकांड की मुख्य गवाह जाहिरा शेख को जुबान बंद रखने की धमकी दी थी। चंद्रकांत श्रीवास्तव वडोदरा के भाजपा विधायक मधु श्रीवास्तव के भाई है जिसके दबाव में आकर ही उसने अदालत में अपना बयान बदला था।(भाष्कर, 13 जुलाई 2003) जाहिरा शेख का कहना है कि उसके सामने दो ही रास्ते थे: मर चुके रिश्तेदारों के लिए इन्साफ हासिल करु या जिंदा बचे अपने लोगों को बचाउं। अगर उसके समुदाय का एक भी आदमी उस घडी उसके साथ खडा होता तो उसने लड़ाई छोडी नही होती।

(शैलेश वर्मा,इंडिया टुडे, 23 जुलाई 2003)

Sources– https://www.facebook.com/abdulhk1/posts/10201864528692930