देश का चालीस प्रतिशत भूभाग, दस राज्य और ढाई सौ से ज़्यादा ज़िले अगर सूखे की भयंकर चपेट में हैं और देश में इस पर कहीं कोई चिन्ता नहीं, चर्चा भी नहीं तो हैरानी क्या? शहर को सूखे का मतलब तो तब समझ में आयेगा, जब आटा, दाल, चावल, सब्ज़ियाँ अचानक से और महँगी हो जायें, नलों में पानी कम आने लगे, और आनेवाली गर्मियों में आठ-दस घंटे बिजली कटौती होने लगे, तब उसे इस सवाल का जवाब झटपट समझ में आ जायेगा कि सूखा बड़ा या आइपीएल?

Drought-in-India

अक़्ल बड़ी कि भैंस? सूखा बड़ा कि आइपीएल? पहले सवाल पर तो देश में आम सहमति है. आज से नहीं, सदियों पहले से. दूसरा सवाल अभी कुछ दिन पहले ही उठा है. और देश इसका जवाब खोजने में जुटा है कि सूखा बड़ा है कि आइपीएल? लोगों को पीने के लिए, खाना बनाने के लिए, मवेशियों को खिलाने-पिलाने के लिए, नहाने-धोने के लिए, खेतों को सींचने के लिए, अस्पतालों में ऑपरेशन और प्रसव कराने के लिए और बिजलीघरों को चलाने के लिए पानी दिया जाना ज़्यादा ज़रूरी है या आइपीएल के मैचों के लिए स्टेडियमों को तैयार करने के लिए पानी देना ज़्यादा ज़रूरी है?

Worst Drought in India and ticking Water Bomb
इंडिया में IPL, भारत में सूखा!
वैसे भी कौन मानेगा कि अक़्ल उसके पास नहीं है! इसलिए अक़्ल को भैंस से बड़ा मान लेने में भला किसे आपत्ति होगी? तो इस पर सर्वसम्मति तो चुटकियों में बन ही गयी होगी. लेकिन सूखा बड़ा कि आइपीएल, इस पर सहमति कैसे बने?

Drought in India affecting 10 States and 40% area of the country
आइपीएल इंडिया में होता है. सूखा भारत में पड़ा है. इंडिया बड़े-बड़े स्मार्ट शहरों का महादेश बनने जा रहा है. भारत तो छोटे-छोटे गाँवों और ढाणियों का देश है. एक विकास के इस छोर पर है, दूसरा दूर, बहुत दूर उस छोर पर. इसलिए देश का चालीस प्रतिशत भूभाग, दस राज्य और ढाई सौ से ज़्यादा ज़िले अगर सूखे की भयंकर चपेट में हैं और देश में इस पर कहीं कोई चिन्ता नहीं, चर्चा भी नहीं तो हैरानी क्या? शहर को सूखे का मतलब तो तब समझ में आयेगा, जब आटा, दाल, चावल, सब्ज़ियाँ अचानक से और महँगी हो जायें, नलों में पानी कम आने लगे, और आनेवाली गर्मियों में आठ-दस घंटे बिजली कटौती होने लगे, तब उसे इस सवाल का जवाब झटपट समझ में आ जायेगा कि सूखा बड़ा या आइपीएल? अभी फ़िलहाल ऐसा कुछ नहीं है, इसलिए ‘गतिमान एक्सप्रेस’ पर सर्र-सर्र सर्राटा मारते शहर खिड़िकियों के बाहर क्या झाँके. वह तो बस नारों, हुँकारों, ललकारों, झनकारों पर तालियाँ और ताल ठोंकते-हुर्राते-ग़ुर्राते व्यस्त है.

Water Crisis & Drought in India – Nature’s Fury or man made disaster?
खाने की थाली या IPL की ताली?
वैसे, ऐसा नहीं है कि ‘भारत वाले’ आइपीएल नहीं देखते हैं, या नहीं देखना चाहते हैं. ख़ूब जम कर देखते हैं, लेकिन जब मटके भर पानी के लिए आठ-दस घंटे लाइन लगानी पड़े, या मीलों चल कर जाना पड़े, दो-दो, तीन-तीन दिन या कहीं-कहीं उससे भी ज़्यादा हफ़्ते-दस दिन तक टैंकर के आने इन्तज़ार करना पड़े या पुलिस के डंडे खाने पड़ें, तब हाथ किस चीज़ के लिए कलपेंगे, खाने की थाली के लिए या आइपीएल की ताली के लिए?

जल भंडारों में बस 25 फ़ीसदी पानी
देश इस दशक के सबसे भयंकर जल संकट से जूझ रहा है. देश के 91 जल भंडारों में अब केवल 25 फ़ीसदी पानी बचा है. मानसून इस बार अच्छा होने की सम्भावना है, लेकिन मानसून आने के पहले इन जल भंडारों में पानी कहाँ से आयेगा? गरमी का हाल इस साल कहीं ज़्यादा बुरा होने का अनुमान है. आन्ध्र और तेलंगाना में तो अभी शुरुआती गरमी में ही सौ से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं. देश के कई और हिस्सों में तापमान सामान्य से कहीं ज़्यादा हो चुका है. अगले तीन महीनों में जून तक जैसे-जैसे गरमी बढ़ेगी, पानी का संकट और गहरायेगा. अभी ही हालत यह है कि मराठवाड़ा से ऐसी ख़बरें आयी हैं कि पानी की कमी के कारण अस्पतालों में डॉक्टरों ने ऑपरेशन टाल दिये हैं. प्रसव को टाला नहीं जा सकता, इसलिए अस्पताल किसी तरह उसका इन्तज़ाम कर रहे हैं.

न खेती, न काम, न रोटी, न पानी
गाँवों में हालात बेहद ख़राब हैं. लोग बूँद-बूँद पानी को तरस रहे हैं. खेती का काम धन्धा ठप पड़ा है. लोग या तो मनरेगा में काम पाने की जुगाड़ में हैं या फिर शहरों को पलायन कर रहे हैं. लेकिन मनरेगा में भी काम सौ के बजाय पचास से भी कम दिन मिल पा रहा है. अभी सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर केन्द्र सरकार को लताड़ भी लगायी है. गुजरात, हरियाणा और महाराष्ट्र की सरकारों के लचर रवैये पर अदालतों ने सवाल उठाये हैं. महाराष्ट्र में चारे और पानी की कमी के कारण मवेशियों को पालना दूभर हो चुका है. कई परिवार तो मवेशी चारा शिविरों में अपने मवेशियों के साथ ख़ुद भी दिन काट रहे हैं. औसतन हर दिन नौ किसान आत्महत्या कर रहे हैं. कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की हालत भी अच्छी नहीं है.

बिजली संकट का भी ख़तरा
लेकिन अब आँच शहरों तक भी पहुँचनेवाली है.पनबिजलीघरों को पानी पहुँचानेवाले जलभंडारों में इस बार पिछले साल के मुक़ाबले 31 फ़ीसदी कम पानी बचा है. कोयले से चलनेवाले कुछ बिजलीघर भी जल संकट से प्रभावित हो सकते हैं. बल्कि ख़बरें तो अभी ही हैं कि कर्नाटक, मध्य प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ बिजलीघर और एनटीपीसी की फ़रक्का इकाई पहले ही ठप हो चुकी है. गरमी बढ़ने के साथ बिजली की माँग बेतहाशा बढ़ती है. जल संकट से बिजली संकट भी बढ़ सकता है.

Controversy on IPL and Drought in India
आइपीएल को लेकर विवाद क्यों है? इसलिए कि महाराष्ट्र में होनेवाले बीस मैचों के लिए स्टेडियमों को तैयार रखने के लिए छह करोड़ लीटर पानी की ज़रूरत पड़ेगी. सवाल उठाया जा रहा है कि जब इतना गम्भीर जल संकट है, तो खेल तमाशे पर इतना पानी बरबाद करने की क्या ज़रूरत है? फ़िलहाल मुद्दा अदालत में है. तर्क दिया जा रहा है कि स्टेडियम में छिड़का जानेवाला पानी पीने लायक़ नहीं होता! ठीक बात है. लेकिन वह पानी तमाम दूसरे काम तो आ सकता है न! एक और तर्क है कि क्या यह पानी बचा लेने से संकट ख़त्म हो जायेगा? संकट ख़त्म हो या न हो, लेकिन कम से कम इससे संकट को लेकर संवेदनशीलता तो दिखेगी. यह सन्देश तो जायेगा कि सबको पानी बचाना चाहिए. इस मामले में कैलिफ़ोर्निया से सीखें कि उसने अपने नागरिकों के बीच कैसे पानी बचाने की मुहिम चलायी.

पैंसठ साल में सत्तर फ़ीसदी कम हो गया पानी!
दरअसल, पानी के सवाल पर हमें गम्भीरता से सोचने की ज़रूरत है. यह कोई मानसून की कमी भर की समस्या नहीं है, बल्कि हमारी पूरी जल नीति की विफलता है और अगर हमने भूल सुधार नहीं किया तो अगले कुछ वर्षों बाद स्थिति विकट हो जायेगी. क्या आपको पता है कि आज से पैंसठ साल पहले 1951 में देश में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता पाँच हज़ार घनमीटर से ज़्यादा थी, जो 2001 में घट कर 1816 और 2011 में उससे और घट कर 1545 घनमीटर ही रह गयी. यानी 1951 के मुक़ाबले सत्तर फ़ीसदी कम! जबकि दुनिया में यह औसत प्रति व्यक्ति छह हज़ार घन मीटर है! अन्दाज़ लगा लीजिए कि आप कहाँ खड़े हैं और आगे क्या होगा?

इस सच्चाई पर नज़र डालिए
देश का भौगोलिक क्षेत्रफल तो बदल नहीं सकता. न ऐसा हो सकता है कि बढ़ती आबादी के साथ हर साल बरसात भी बढ़ती रहे. बरसात का औसत तो वही रहेगा, जो पचास-साठ या सौ साल पहले था. तो अब देखिए. देश को वर्षा और बर्फ़बारी से हर साल औसतन चार हज़ार BCM (बिलियन क्यूबिक मीटर) पानी मिलता है, लेकिन वाष्पीकरण के साथ-साथ कुछ प्राकृतिक, भौगोलिक व अन्य कारणों से केवल इसमें से 1123 BCM पानी ही हमें मिल पाता है. यानी केवल एक चौथाई के आसपास. 1951 में आबादी 36 करोड़ थी, आज उसकी तिगुनी से भी अधिक यानी क़रीब सवा अरब है. पानी तो उतना ही रहा. आबादी बढ़ गयी, जल संसाधन बढ़ाने के लिए हमने वह किया ही नहीं, जो करना चाहिए था.

पाँच हज़ार बाँध, फिर भी संकट?
हमने क्या किया. बड़े-बड़े बाँध बनाये. करोड़ों लोगों को उनके घरों से विस्थापित किया और नदियों को तबाह कर दिया. पाँच हज़ार से ज़्यादा छोटे-बड़े बाँध बना कर हम दुनिया में बाँधों के मामले में हम तीसरे नम्बर पर हैं. बाँधों से बिजली उत्पादन में तो मदद मिली, लेकिन खेती में बाँधों के पानी का योगदान मामूली है. साठ फ़ीसदी सिंचाई भूगर्भ जल पर ही आधारित है. बाक़ी बड़ा हिस्सा मानसून पर. पेयजल के लिए शहरों में 30 और गाँवों में 70 फ़ीसदी पानी ज़मीन के नीचे से निकाला जाता है. भूगर्भ दोहन के मामले में हम दुनिया भर में सबसे आगे हैं, लेकिन पानी की बरबादी रोकने और जल संरक्षण के मामले में हमारा रिकार्ड बेहद ख़राब है. खेती, उद्योगों और घरेलू इस्तेमाल तक में पानी की बरबादी को लेकर हमारे यहाँ कोई चेतना नहीं है. उपलब्ध पानी का लगभग आधा हम बेकार में बरबाद कर देते हैं. मानसून के पानी के संरक्षण के लिए ‘रेन वाटर हार्वेस्टिंग’ पर हमारे यहाँ कुछ भी नहीं किया गया. हमने सिर्फ़ इन दो छोटी-छोटी बातों पर ही ध्यान दे दिया होता तो हमारी ऐसी बुरी गत न बनी होती. अगर हम अब भी न चेते तो अगले तीस साल बाद की बढ़ी आबादी के बाद क्या हालत होगी, इसका अन्दाज़ आप ऊपर दिये गये आँकड़ों को देख कर लगा सकते हैं. और गाँवों से ज़्यादा मुसीबत शहरों पर टूटेगी. अभी देश की शहरी आबादी 32 करोड़ है, जो 2050 तक बढ़ कर 84 करोड़ हो जायेगी. अभी सत्तर फ़ीसदी शहरी आबादी के पास पानी के कनेक्शन नहीं हैं, टैंकरों या दूसरे स्रोतों से उनका काम चलता है. तीस बरस बाद क्या होगा?

तो असली मुद्दों पर सोचिए महोदय!
तो पानी पर सोचिए महोदय. नक़ली नहीं, असली मुद्दों पर सोचिए. और गम्भीरता से सोचिए. उद्धव ठाकरे ने सही चेताया है. पानी नहीं रहेगा, तो ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाने के लिए कौन रहेगा?

http://raagdesh.com by Qamar Waheed Naqvi