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जाने /अनजाने कुछ आम समझ के लोगों द्वारा सार्वजनिक स्पेस में यह कौतूहल दिखाया जाता रहा है कि ‘बलात्कार की पीड़िता सिर्फ ‘पीड़िता’ होती है |नकारा मीडिया बेवजह ‘दलित महिला से बलात्कार ‘ जैसी हेड लाइन बनाता है ‘|आम तौर पर यह सतही समझ साफ़ जान पड़ती है और प्राथमिक तौर पर यह तर्क दुरस्त लग सकता है लेकिन बेहतर समझाव विश्लेषण की मांग करता है |

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बलात्कार किसी औरत के प्रति किया गया सबसे घातक अपराध है |क्योकि यह औरत की आत्मा की हत्या करता है |पीड़िता को जीते जी मार देता है | माना जाता है कि यौन जुगुप्साएँ बलात्कार कि असली वजह होती है | यह सच भी है लेकिन भारत की सामजिक संरचना में कुछ ऎसे बुनियादी दोष है जिसका खामियाजा अंततः औरतों को भुगतना पड़ता है |औरतों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों का कारण सिर्फ यौन जुगुप्साएँ ही नही होती बल्कि कई बार औरतें भीड़ की जातीय और धार्मिक कुत्सा शांत करने का जरिया बनती हैं | जैसे दो जति समूहों के बीच का झगङा या दो धर्मिक समुदायों के बीच की झड़प अक्सर व्यक्तिगत मसला होता है लेकिन देखा गया है कि साम्प्रदायिक दंगों के दौरान भीड़ का पहला निशाना महिलाएं बनती रही है |हर दंगाई जुगुप्सा का रोगी ही नही होती बल्कि उसके भीतर दूसरे कौम के लिए जो नफरत है ,बलात्कार उस नफरत की खुराक बन जाता है |

Bhaganaदो महीने पहले बिहार के कसी गाँव से एक ही परिवार की औरतों से सामूहिक बलात्कार की खबर आई थी |राष्ट्रीय सहारा के पुराने अंकों में ढूंढने पर यह खबर मिल जाएगी | यह परिवार दलित था जिसका गाँव के ही सवर्ण सरपंच से कोई जातीय झगङा था | अदालत ने सरपंच को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई | सरपंच तो जेल गया लेकिन उसके गुर्गों ने न सिर्फ उस दलित का घर जलाया बल्कि घर की सभी महिलाओं के साथ बलात्कार भी किया | ऐसी घटनाये आये दिन समाचार दैनिकों में छपती रहती है |

बिहार का प्रसिद्द शंकर बिगहा काण्ड हो या रणवीर सेना का दौर ;निशाना हमेशा से महिलाये ही बनती आई हैं |ख़ास तौर से इस देश में दलित , आदिवासी और अल्पसंख्यक महिलाओं ने इसका सर्वाधिक दंश झेला है |आंकड़े बताते है कि हर हफ्ते 21 दलित महिलाएं बलात्कार का शिकार बनती है |यौन अपराधों कि पीड़िताओं के कुल प्रतिशत का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ दलित ,आदिवासी और अल्पसंख्यक तबके का है |ऐसा मै नही कह रहा बल्कि गूगल से जाकर आंकङे देखे जा सकते हैं |इसका बड़ा कारण यह भी कि अभी भी तमाम कारणों से देश में दलित ,आदिवासी तबका मुख्यधारा का हिस्सा नही है | आज भी तमाम गाँवों में किसी दूल्हे को मात्र इसलिए घोङी पर नही चढ़ने दिया जाता कि उसकी जातिगत पहचान दलित है |राजस्थान कि एक शादी में दूल्हे को हेलमेट लगाकर जाना पड़ा क्योकि उसे डर था कि कोई पत्थर से उसके सर पर हमला कर सकता है |13 दलित हर हफ्ते मार दिए जाते हैं |हर सप्ताह 5 दलितों के घर जला दिए जाते हैं |गुजरात में 2001 से 2014 तक आते आते दलित महिलाओं से बलात्कार में 500 फीसदी कि वृद्धि हुई है |(RTI के जरिये ) हर 17 मिनट में किसी न किसी दलित के साथ कोई न कोई अपराध हो जाता है | ओवर कमिंग वायलेंस नाम की वेबसाइट पर मौजूद इन आंकणों पर गौर किया जाये तो आसानी से जाना जा सकता है कि दलितों के साथ अपराध उनकी पहचान कि वजह से भी हो रहे हैं |सामजिक तौर पर असुरक्षित और हाशिये पर खड़े लोगों के साथ कोई भी अपराध वैसे भी आसानी से किया जा सकता है |

कहा जा सकता है कि हर दलित महिला से बलात्कार की पृष्ठभूमि में जातीय कुत्सा ही काम करे यह जरूरी नही है | यह सच भी है लेकिन ऐतिहासिक बुराइयां रचनात्मक सशक्तीकरण से भी खत्म की जा सकती है |इन हेड लाइनों को ऎसे माहोल के सृजन के रूप में भी देखा जा सकता है जहां कोई व्यक्ति हाशिये पर पड़े गरीब तबकों की महिलाओं का बलात्कार करने कि हिम्मत भी न कर सके |