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प्रस्तुति– सिकंदर हयात

दंगाई मार लो मार लो का शोर करते हुए कोठी के अंदर घुस आये मुझे लगा जैसे मौत बहुत निकट आकर मेरे कानो पर दस्तक दे रही हो अब कुछ ही षण शेष हे जब में और मेरे परिवार के लोग काट डाले जाएंगे ————जितनी तेजी से शोर गूंजा मार लो मार लो उससे कही ज़्यादा तेजी से वह 75 साल का बूढ़ा शेर बिज़ली की तरह कोंध कर भवन के दरमियानी दुआर तक पंहुचा ——- बूढ़ा शेर दहाड़ा ” लोट जाओ लोट जाओ तुम्हे उस तक पहुचने के लिए मेरी लाश से गुजरना होगा भाग जाओ हथियार डाल दो ” मेने देखा की इस निर्भीक दहाड़ ने दंगाईयो के हौसले पस्त कर दिए हे उनकी लाठिया झुक गयी और वे वापस पलट गए बूढ़े शेर की यह शक्ति शारीरिक नहीं थी मानवीय थी और मानवीय शक्ति ने शैतानी ताकतों को मैदान छोड़ कर भाग जाने पर मज़बूर कर दिया था ———- यह घटना 2 नवम्बर 1990 की हे मेरी रक्षा करने वाला यह बूढ़ा शेर कोई और नहीं बिजनौर के ऐतिहासिक चौधरी परिवार का सदस्य राजा नरेंद्र पाल सिंह था जिसने अपने परिवार की परंपरा पर चलते हुए खुद अपने जीवन को खतरे में डाल कर मुझे संरक्षण दिया था हिन्दू मुस्लिम एकता और धार्मिक सदभाव का अलम्बरदार यह चौधरी परिवार अपने मानवीय धरातल पर तब भी इतनी मज़बूती से खड़ा रहा था जब 1857 में अँगरेज़ हिन्दू और मुसलमानो को आपस में बाँट कर विद्रोह को दबाने की कोशिश कर रहे थे 1857 के विद्रोह में————- सर सय्यद अहमद खा बिजनौर में सदर अमीन के पद पर कार्यरत थे तब उन्होंने 1857 की घटनाओ को लेकर — एक पुस्तक लिखी थी उसमे सर सैय्यद ने इस चौधरी परिवार का कम से कम 18 स्थानो पर वर्णन किया हे एक जगह लिखते हे —– मगर चौधरी नयन सिंह खुद घटना स्थल पर गए और फसाद को दूर किया. यह चौधरी नयन सिंह उसी बूढ़े शेर के दादा थे – भाईचारे और धार्मिक सदभाव की यह परम्परा चौधरी नयन सिंह पर ही समाप्त नहीं हुई यह अगली पीढ़ी में उनके बेटे चौधरी निहाल सिंह तक पहुंची और उनके बाद राजा नरेंद्रपाल सिंह तक !

बताया जाता हे की चौधरी निहाल सिंह ने तो अपनी कोठी का एक भाग ही मुस्लिम अतिथियों के लिए आरक्षित कर रखा था , जहा उन्हें नमाज़ अदा करने का कपडा ( जाएनमाज़ ) पानी का लोटा , तसबीह और कुरान सब उपलब्ध कराइ जाती थी राजा नरेंद्रपाल सिंह तक आते आते ये सब चीज़ें तो नहीं रही थी , लेकिन वाणी और वयवहार दोनों ही दर्ष्टिकोण से वह अब भी वैसे ही मिलनसार धार्मिक भेदभाव से बहुत ऊँचे और भारत की गंगा जमुनी संस्कर्ति के सच्चे प्रतिनिधि थे जैसे उनके पारिवारिक बुजुर्ग रहे थे दरअसल उन दिनों बल्कि राजा नरेंद्र पालसिंह के जीवन तक धर्मनिरपेक्षता रानीतिक नारे या दिखावे के फैशन में नहीं बदली थी इसे न तो राज़नीतिक नारे या दिखावे के लिए अपनाया जाता था और न राजनीती करने के लिए इसका प्रचार किया जाता था तब तो धर्मनिरपेक्षता प्रबुद्ध लोगो की जीवनपद्धति थी जीने का अंदाज़ था वह भाषण में नहीं आचरण में शामिल थी अपने धर्म पर अडिग रहकर लोग धर्मनिरपेक्ष होते थे मेने निहाल सिंह की कोठी में इस्तिथ शिव मंदिर भी देखा और मुस्लिम अतिथियों के लिए उनका मेहमानखाना भी . ऐसे ईमानदार लोग अब क्यों नहीं पैदा होते ( आगे निश्तर खानकाही जी बताते हे कैसे जब उन्हें बिजनौर में मकान की बेहद सख्त जरुरत थी और क़ानूनी कार्यवाहियो के कारण उनके परिवार पर बेघर होने का खतरा मंडरा रहा होता हे तब सन 86 87 के आस पास राजा नरेंद्र पाल सिंह उन्हें अपनी कोठी का निचला भाग ख़ुशी ख़ुशी और वाज़िब किराय पर दे देते हे जबकि राजा साहब से उनकी पिछले मुलाकात सन 66 67 में साहित्यिक अभिरुचियों के सिलसिले में ही हुई थी ) ———————— 90 का अक्टूबर आया तो शहर की इस्थिति तनावपूर्ण होने लगी ——— राजा साहब को विश्वास था की बिजनौर में दंगा नहीं होगा वह यहाँ की स्वस्थ परम्पराओ को छाती से लगाय जी रहे थे —————- आखिर वह घडी आ ही गयी जिससे हम बचना चाहते थे शहर में दंगा फुट पड़ा यह 1990 30 अक्टूबर का अशुभ दिन था मेने कलम कागज़ उठाकर अपने दैनिक का सम्पादकीय लिखना ही शुरू किया था —– आग और धुए से लिप्त शोर मेरे कानो से टकराया तो समझते देर न लगी की शहर में साम्प्रदायिक मारकाट शुरू हो गयी हे ——- मेने राजा से पूछा अब हम लोगो का क्या होगा राजा साहब यह जानते थे की मेरा इशारा इस तरफ था की कोठी में मेरे अलावा कोई मुसलमान परिवार नहीं था ———- राजा साहब ने पुरे आत्मविश्वास से मेरी तरफ देखा बोले ‘ जब तक में जिन्दा हु तुम पर कोई आंच नहीं आएगी तुम बेफिक्र रहो ———-राजा साहब दंगा शुरू होते ही यह बात भाप गए थे की में अंदर से बुरी तरह से भयभीत हु . बाहर से अपना सहस बने रखने का असफल प्रयास कर रहा हु इसलिए वह निरंतर साये की तरह मेरे साथ रहने लगे एक षण को भीमुझे अकेला नहीं छोड़ा उन्होंने.

—ढाई बजे के आस पास मेरे पड़ोस का किरायदार , जो कृषि विभाग में निरीक्षक था वह अपने विभाग की जीप दुआरा वापस आया तो हम दोनों तेज़ी से उसकी और लपके हमें शहर के हालत जाने की व्याकुलता थी लेकिन कृषि निरीक्षक ने जो बताया वह मेरे होश उड़ा देने के लिए काफी था उसने बताया ‘ —– कारसेवको के जुलुस पर पथराव हुआ जिससे दंगा भड़का मुसलमानो ने जुलुस में शामिल दो महिलाओ को उठा लिया और उनके साथ बलात्कार करके उन्हें बेकरी की भट्टी में झोक दिया ——. में स्वीकार करता हु की कृषि निरीक्षक के साथ मेने भी ऐसे गंदे मुसदलमानो की बढ़ चढ़ कर भर्त्सना की उससे भी ज़्यादा उन्हें कोसा लताड़ा में यह भी स्वीकार करता हु की यह सब करते हुए मेरा उद्द्शेय ईमानदाराना इतना नहीं था , जितना की अपने को आम मुसलमानो से अलग करके दिखाना और हमदर्दी बटोर कर पड़ोसियों से अपनी रक्षा की गुहार करना था लेकिन यहाँ भी राजा नरेंद्र पाल सिंह ने अपने ठोस और दबाव में न लचकने वाले चरित्र का सबूत दिया बोले ‘इन्स्पेक्टर कैसी बेवकुफो वाली बात कर रहे हो , दो ढाई हज़ार लोगो के जुलुस में से मुस्लमान गुंडों दुआरा दो औरतो को उठा कर ले जाना सम्भव नहीं हे फिर सुरक्षा के लिए पुलिस भी साथ होगी , जुलुस के दो ढाई हज़ार लोग और पुलिस क्यों चुपचाप खड़ी तमाशा देखती रही ? उन्होंने गुंडों का सामना क्यों नहीं किया उन्होंने क्यों उठाने दिया औरतो को ? ‘ राजा साहब का तर्क मज़बूत था मेने देखा की निरीक्षक उनकी बात का जवाब नहीं दे पा रहा हे राजा साहब कुछ देर चुप रहकर बोले ———-राजा ने फिर एक तर्क दिया और कड़क कर बोले ‘ इन्स्पेक्टर कोठी के अहाते में अफवाह फैलाने का प्रयास न करो ‘

लेकिन अफवाह तो फेल चुकी थी महिलाओ को उठा ले जाने और ————– हर आहट पर ऐसा लगता था की दंगाई मुझ पर चढ़ आये हे अगले दिन मेरा बेटा भगा हुआ मेरे पास आया और बोला की अमुक अमुक आपी को उठा कर ले जाने की बात कर रहे हे कहरहे हे की औरत का बदला औरत से लेंगे मेने सुना तो आँखों क सामने अँधेरा छा गया कैसे अपने परिवार की जान और मान सम्मान बचा पाउँगा में ? कमजोर बीमार आदमी और पागलो की भीड़ में सिर्फएक ही व्यक्ति मेरा हितेषी और पक्षधर और वह भी सत्तर साल का बूढ़ा बेटी को भनक लगी तो उसने बेइज़्ज़ती का वह षण आने से पहले कोठी की छत से कूदकर जान देने का निश्चय कर लिया में घबराया राजा साहब के पास गया वह कुछ समय पहले ही मुझे छोड़ कर ऊपर की मंजिल खाना खाने गए थे मेने राजा साहब को इस षड्यंत्र से अवगत कराया तो वह तनिक भी विचलित नहीं हुए —- बोले ‘ चिंता मत करो सब लोग ऊपर के हिस्से में मेरे पास आ जाओ दंगाई ऊपर आने की हिम्मत नहीं करेंगे और अगर की भी तो पहले में जान दूंगा बाद में तुम ‘

यह कहकर राजा साहब नीचे आये और मेरे सारे परिवार को अपने साथ ऊपर ले गए मेरी पत्नी और बच्चे अम्मा जी के साथ रहे और में राजा साहब के पास . पांच दिन हम वहाँ रहे और इन पांच दिनों में इस दम्पति ने हमें वह प्यार दिया जो माता पिता ही दे सकते हे ——- राजा साहब के चरित्र की महानता मुझ पर पहले नवम्बर की रात में उस वक्त और ज़्यादा रोशन हो गयी जब उन्होंने पड़ोस के कुछ गरीब मुसलमानो को भी अपने घर में पनाह दी अब तक में समझता था की राजा साहब की मेहरबानी सम्बन्धो के आधार पर केवल मुझ तक और मेरे परिवार तक हे लेकिन उस रात उनकी मानवता सारी सीमाय तोड़ कर असीम हो गयी ———- हम लोगो के राजा नरेंद्र पाल सिंह के संरक्षण में जाने के उपरान्त असामाजिक तत्वों के दुआरा रची गयी लड़कियों के अपहरण की साज़िश तो असफल हो गयी थी लेकिन वे हमें परेशान करने पर अब भी तुले हुए थे 3 नवम्बर आया तो मेने सुबह सुबह ही कोठी के निचले भाग में कुछ विचित्र पर्कार की गतिविधिया देखि —————— षड्यंत्रकारियो ने मेरे और ऊपर पनाह लिए लोगो के साथ राजा साहब के परिवार को भी शामिल कर लिया था — पि ए सी के जवान – राइफल लिए अंदर घुस आये उनमे से एक कॉन्स्टेबल दहाड़ा – ‘ क्यों बे तूने गुंडे छुपा रखे हे ऊपर गोली मर दूंगा राजा नरेंद्र पाल इस धमकी से घबराय नहीं उसने तनी हुई संगीन के सामने छाती खोल दी दहाड़ा वे गुंडे हे तो हम भी गुंडे हे मारो गोली —-, —————– षड्यंत्रकारियो की यह दूसरी साज़िश भी नाकाम हो गयी थी पांचवे दिन शहर के हालत सामान्य हुए तो राजा साहब ने हमें प्रेमपूर्वक अपने यहाँ से विदाई दी और हम निचली मंजिल अपने किराय के आवास में आ गए दरअसल राजा नरेंद्र पाल सिंह उस भारतीय संस्कर्ति के सशक्त नुमाइंदे थे , जिसे भारत की गंगा जमुनी संस्कर्ति कहा जाता हे ———– दिन का कर्फ्यू उठा तो में शहर में घूम कर ज़ायज़ा लेने लगा —– लौटने लगा तो रस्ते में पत्रकार अशोक मधुप से भेट हुई — हम मिले एक दूसरे का कुशल क्षेम पूछा मधुप में मुझे बताया की वह कारसेवको के जुलुस के साथ उस समय से था ———————–बताया की जुलुस में दो महिलाओ को उठकर भट्टी में झोक देने वाली बात तो बिलकुल ही मनघड़ंत थी और असामाजिक तत्वों ने जान बुझ कर उड़ाई थी —– यह सब सुनते हुए मेरे कानो में राजा नरेंद्र पाल सिंह की आवाज़ गूँजने लगी ‘ इन्स्पेक्टर किसी बेवकुफो वाली बात कर रहे हो , दो ढाई हज़ार लोगो के जुलुस में से मुस्लमान गुंडों दुआरा दो औरतो को उठा कर ले जाना सम्भव नहीं हे फिर सुरक्षा के लिए पुलिस भी साथ होगी , जुलुस के दो ढाई हज़ार लोग और पुलिस क्यों चुपचाप कड़ी तमाशा देखती रही ? उन्होंने गुंडों का सामना क्यों नहीं किया उन्होंने क्यों उठाने दिया औरतो को ? ‘ राजा साहब का तर्क मज़बूत था मेने देखा की निरीक्षक उनकी बात का जवाब नहीं दे पा रहा हे राजा साहब कुछ देर चुप रहकर बोले ———-राजा ने फिर एक तर्क दिया और कड़क कर बोले ‘ इन्स्पेक्टर कोठी के अहाते में अफवाह फैलाने का प्रयास न करो ‘ ————-यह वयक्ति एक दिन मौत से हार गया और 1991 में चल बसा ओह क्या खूब कहा था मीर ने” मत सहल हम जानो फिरता फलक बरसो तब खाक के परदे से इंसान निकलते हे ”

हिंदी साहित्य निकेतन बिजनौर से प्रकाशित पुस्तक लेखक निश्तर खानकाही ” कैसे कैसे लोग मिले ” से साभार