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राजधानी के दक्षिणी कोने में खेला गया राजनीति का राष्ट्रवादी कार्ड उत्तर प्रदेश की चुनावी थीम बनता नजर आ रहा है |खबर आई है कि राष्ट्रवादी खुमारी में एक ही पृष्ठभूमि के तमाम लोग अपने -अपने इलाकों में जुलूस निकाल और निकलवा रहे हैं |सड़क पर यह गुस्सा जे एन यू की उस घटना को लेकर बताया जा रहा है जिसमे 9 फरवरी के एक कार्यक्रम के दौरान कथित तौर पर कुछ छात्रों ने राष्ट्रविरोधी नारे लगाये थे |सवाल समूचे विश्विद्यालय की राष्ट्रनिष्ठा पर उठाया गया है इसीलिए विचार बेहद जरूरी है |भला कोई विश्वविद्यालय कैसे राष्ट्रवादी हो सकता है |

हमारी नस्लों को ‘हम भारत के लोग’ जैसी फीलिंग इतिहास की उन्ही किताबों को पढ़कर आई है जिनको इन जुलूसियों की नजर में’ देशद्रोही’ जे एन यू के प्रोफेसरों ने ही लिखा है |दरअसर हमे राष्ट्रवाद को सेना तक सीमित कर देने की अकादमिक बीमारी होती जा रही है |राष्ट्रवाद से जुडी हर बहस में एक चिल्लाहट है जो कि हर वक्त चेताती है कि राष्ट्रवाद का ‘ओरिजनल मालिकाना’ सेना के पास है | सेना पर सवाल करने का सीधा मतलब सब की नजर में खुद को “कम राष्ट्रवादी” करना है क्योकि आपने “ज्यादा राष्ट्रवादी” सेना पर शक किया है | शायद इसी वजह से कन्हैया के एक सेना संबंधी बयान पर बखेड़ा खड़ा हो गया |मुझे नही पता कि ‘ज्यादा राष्ट्रवादी’ होने का आशय क्या है ?? देश के भीतर किसी भीतरी इलाके में ईमानदारी से लोगों के रोग दूर करता कोई चिकित्सक उतना ही राष्ट्रवादी क्यों नही माना जाना चाहिए जितना कि सीमा पर देश की सुरक्षा करता एक सैनिक | कोई भी राष्ट्र तमाम संस्थाओं से चलता है | सेना भी उनमे से एक जरूरी संस्था है | राज्य अपनी संप्रभुता बनाये रखने के लिए इस संस्था को अनिवार्य मानता है वही कभी कभी यह संस्था राज्य के निर्देश पर ही बाढ़ में राहत कार्य या पुल बनाने जैसे घरेलू कामों में भी मदद करती है |सवाल इस संस्था पर भी बेहद जरूरी हैं क्योकि खुद को लोकतांत्रिक कहने वाली किसी भी तरह कि व्यवस्था की सारी संस्थओं की जवाबदेही अंततः जनता के प्रति ही होती है |

‘सेना’ के साथ- साथ जे एन यू की एक महिला प्रोफ़ेसर के कश्मीर संबंधी बयान पर कई लोगों का उबाल उबल कर बाहर आ रहा है | देश की आजादी के इतने सालों बाद भी सुदूर कोनों से उठती आजादी की तमाम आवाजों को देखते हुए हमे यह मान लेना चाहिए कि भारत एक बनता हुआ देश है | दक्षिण एशिया के इस इस इलाके का सांस्कृतिक इतिहास किस्म किस्म की विविधताओं से भरा है |तमाम तरह की अस्मिताओं के मिलावट में वक्त लगता है |चूँकि माना जाता है कि भारत एक थोपा हुआ राष्ट्र नही है बल्कि यह उन लोगों से मिलकर बना है जो इसके बनने कि प्रक्रिया के सक्रिय स्टेक होल्डर हैं | कोई राष्ट्र मैप से नही बनता बल्कि उसके बाशिंदों की सहमति से बनता है | जबरन बनाने की कोशिश में यह एक थोपा हुआ राष्ट्र बनकर रह जाता है जो हर छड़ टूटने की आशंका के बीच जीवित रहता है | इसीलिए हमे बतौर भारतीय अलगाव/आजादी की जानदार/बेजान आवाजों को दबाना नही है बल्कि हमारी जवाबदेही उन समस्याओं को लेकर भी है जिसके चलते आजादी अलगाव के आंदोलनों की बेसिक मांग बनती जा रही है |सेना को यदि किसी ने बलात्कारी कहा है तो क्या उसे बस राष्ट्रद्रोही कहकर ख़ारिज किया जा सकता है |क्या यह सच नही है की अपने ही देश में असम राइफल्स के सैनिकों ने महिलाओं के साथ बलात्कार किये ?क्या एमनेस्टी इंटरनेशनल और देशी मानवाधिकार की रिपोर्टों को क्या सिर्फ एक शब्द एंटी नेशनल /गद्दार कहकर चलता किया जा सकता है!

सवाल कश्मीर ,मणिपुर या नागालैंड का नही है |सवाल उस राजनीतिक प्रक्रिया का है जो सियासी मसलों को सैन्य बलों के द्वारा सुलझाने के लिए उतावली रहती है |पूरी दुनिया में सियासी मसलों को बंदूक की शह पर सुलझाने की कोशिश नासूर बन कर रह गई है |अपने ही देश का एक राज्य मिजोरम किन्ही दिनों भारत के सबसे अशांत इलाकों में से एक था | भारत की अपनी सरकार ने इस सूबे पर हवाई हमले किये थे |परिणामतः हालात सुधरने की बजाय बिगड़ने लगे | सरकार को बात बात धीमे समझ आने लगी | अंततः आसमान और जमीन के बीच का फर्क खत्म हुआ और मामला कॉफ़ी टेबलों पर आ गया |हम सभी जानते है आज मिजोरम पूर्वोत्तर के सबसे शांत इलाकों में से एक है | हालांकि हमने कुछ महान भूले की हैं (और अभी भी कर रहे है ) लेकिन इतिहास को देखते हुए सियासी मसलों के निपटाव की सियासी पहल उचित जान पड़ती है |अलगाव की ओर मुहं उठा चुकी आवाजों की समस्याओं को सुलझाकर मुख्यधारा में लाना हमारी चुनौती है | इस चुनौती को नरमदिल होकर स्वीकार करना होगा वरना भारत एक थोपा हुआ राष्ट्र बनकर रह जायेगा |