Allama-Iqbal

16 मार्च 1965 शौक : कर्प्या इकबाल की शायरी के सम्बन्ध में अपने विचार तर्कपूर्ण ढंग से सविस्तार व्यक्त करने का कष्ट करे फ़िराक़ : ————- इक़बाल की शायरी शुरू से ही एक ऐसी शानदार बौद्धिकता और व्यक्तित्व का सबुत दे रही थी जिसे हम अंग्रेजी में split personailty ( विभक्त व्यक्तित्व ) कहते अर्थात एक ऐसा व्यक्तित्व जो दो भागो में बँट गया हो वे दो भाग एकदूसरे के उल्ट थे उनमे परस्पर विरोध और टकराव था इस व्यक्तिव का एक भाग हिंदुस्तान प्रेमी था और दूसरा भाग इस्लाम का समर्थक या साम्प्रदायिक . इक़बाल अपने व्यक्तिव के अंतर्द्वंद से काफी परेशान दिखाई देते हे इस व्यक्तिव का भारत प्रेमी भाग तो उनसे ऐसे बयानात दिलवाता हे सारे जहा से अच्छा हिंदुस्तान हमारा और दूसरा साम्प्रदायिक निष्ठा वाला भाग यह कहलाता हे मुस्लिम हे हम वतन हे सारा जहाँ हमारा

मानो गैर मुस्लिम सारे विश्व को अपना देश ही नहीं समझ ही नहीं सकते . वे अपने देशानुरागी भाग की रागनी तो कभी कभी अलाप जाते हे , लेकिन इस देशप्रेम से वे कोई गहरे या दूरगामी अथवा मानवीय निष्कर्ष प्राप्त नहीं कर पाते हे . बहुत से महत्वपूर्ण यथार्थ जो कदापि मात्र इस्लामी यथार्थ नहीं हे उन्हें वे केवल इस्लामी यथार्थ माने और मनवाने का निष्फल प्रयास उम्र भर करते रहे . अब इक़बाल की शायरी वर्तमान शताब्दी के तीसरे और चौथे दशक में कदम रखती हे भारत के नवजागरण का दोपहर का सूर्य इस जमने में अपनी पूरी ऊंचाई पर हे . और इस नई जाग्रति से इक़बाल प्रभावित भी हे और साथ ही भयभीत भी वे इस ज़माने को अपनाना भी चाहते हे और यह भी अनुभव भी करते जाते हे की यह जमाना हिंदुस्तान से बाहर कही भी इस्लामी जमाना नहीं हे और न ही इस्लामी विचारधारा की बुलंदी का जमाना हे यह बात सोच कर इक़बाल एक स्थायी झल्लाहट और कचकचाहट का शिकार हो जाते हे . यही से उनकी शायरी एक दांत पिसती हुई शायरी दिखाई पड़ती हे इस ज़माने के तसव्वुर से बेहद परेशान होकर इक़बाल अपने आपको या अपनी साम्प्रदायिक निष्ठा को भांति भांति के बहलावे देते नज़र आते हे देशप्रेमी इक़बाल का इस ज़माने में देहांत हो चूका हे और इक़बाल इसे अपने हाथो दफना चुके हे . इस दौरान इक़बाल ने अपने साम्प्रदायिक प्रेम के औचित्य में खुदी और बेखुदी के दर्शन का एक अविष्कृत प्रकार का आडम्बर रचा . इस ज़माने में उन्होंने उर्दू शायरी को स्थगित कर दिया था और फ़ारसी जबान की शायरी शुरू कर दी थी खुदी और बेखुदी के तथाकथित दार्शनिक सिद्धांतो को व्यापकता देने में वे अपने सभी हथकंडे अपनाते थे . इस शरी में बहुत से ऐसे टुकड़े मिलते हे जिनसे व्यक्ति किसी धर्म और सम्प्रदाय के भेदभाव के बिना प्रभावित और प्रेरित हो सकता हे वे इन टुकड़ो से खुदी के दर्शन के मूल रूप से गलत तस्स्वुर को सजाते हे अर्थात तर्क तो बहुधा खूबसूरत हे लेकिन नतीज़ों की तान इस्लामी साम्प्रदायिक वरीयता पर टूट्ती हे .

—————-इक़बाल ने यह बताने में एड़ी चोटी का जोर लगा दिया की गैर इस्लामी तमाम सम्प्रदायों और पाश्चात्य दर्शन में मानवता की भलाई के लिए कुछ भी नहीं हे इस सम्बन्ध में में कुछ सवाल आप से आप उठ जाते हे जिनका कोई उत्तर उन्होंने नहीं दिया ———————— इक़बाल अपनी शायरी को कर्म और गतिशीलता का सन्देश बताते हे क्या उन्हें इस सचाई से इंकार होगा की हिंदुस्तान का गैर मुस्लिम भाग कर्म और गतिशीलता की जाग्रति में मुसलमानो से किसी प्रकार से भी कम या पीछे हे ? क्या उनकी शायरी ने मुसलमानो में कोई ऐसी योग्यता विवेक या जाग्रति पैदा कर दी , जिससे हिन्दू समाज वंचित हे ? क्या समस्त इस्लामी जगत की जाग्रति इकबाल की रचनाओ की ऋणी हे ? इक़बाल यह समझ ही नहीं सकते थे की देश की जाग्रति उस ज़माने में शायरी के दुआरा पैदा की ही नहीं जा सकती थी और न ही देश की जाग्रति के पुरोधा , शायरी से प्रभावित होकर कर्मभूमि में उतरते थे .शायरी और अदब का उद्द्शेय वही बन चूका हे जिसका पता हमें इक़बाल के अलावा दुनिया के बड़े बड़े साहित्यकारों की रचनाओ में पता चलता हे . में यह नहीं कहता की राष्ट्र या देश की जाग्रति में अदब और शायरी का कोई योगदान ही नहीं . लेकिन जाग्रति और कर्म के आकर्षक नारो या दो शब्दों वाल;इ नारो से कोई बड़ा साहित्यकार देश या राष्ट्र में जाग्रति नहीं पैदा किया करता आज दुनिया के बड़े अदब ने जिस जाग्रति को पैदा किया हे वह इक़बाल के प्रकार का साहित्य नहीं हे और न ही खुदी के दर्शन वाला साहित्य हे —————————————————————–लेकिन ग़ालिब के शब्दों में दिल को बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा हे

पांचवा सवाल : इकबाल दूसरे गुमराह भारतीय मुसलमानो की तरह इस्लामी विजयो और गैर इस्लामी देशो में इस्लाम के प्रचार और प्रसार के पुराने अफसानों से ख़ुशी से झूम उठते हे और फिर उसी दुनिया को वापस लाने या उसी रूप में इस्लाम को जीवित रखने का स्वपन देख देख कर आत्मविभोर हो जाते हे . अब इनसे कौन पूछे ——————————————————-इसलिए इकबाल का यह दावा बहर- ए जुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हमने एक अत्यंत हास्यापद दावा हे उस समय यह दावा और भी हास्यपद हो जाता हे जब इसे खुदाय – दो आलम के दरबार में इस उद्द्शेय और इरादे से पेश किया जाता हे की हमें फिर इस काबिल कर दे की तौहीद के नाम पर हम फिर गैर मुसलमानो को ख़त्म कर दे इस दावे की सचाई को प्रकट करता हे ; काट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर हमने

इकबाल के कलाम का सिर्फ एक असर पैदा हो सकता हे की बड़े ऊँचे स्वर में और बड़ी शालीनता के साथ प्रस्तुत अनेक तर्कों में इकबाल ने सिर्फ इस बात की कोशिश की हे की उनकी शायरी से जो मुस्लमान प्रभावित हो वे दुनिया की गैर मुस्लिम आबादी से सदा सदा के लिए अपने आप को अलग समझे और उन्हें अपना स्थायी शत्रु बना ले . क्या यह मुसलमानो को गुमराह करना नहीं हे ? इक़बाल पर जितनी किताबे अब तक लिखी गयी हे उनमे से किसी एक किताब में भी यह बात नहीं बताई गयी और न ही इन किताबो के लिखने वालो को यह बात बताने का सहस हुआ की इक़बाल विश्व वयवस्था के मामलो में और विश्व राज़नीति के मामले में क्या दर्ष्टिकोण था ? कोई यह बात बताता भी कैसे ? जब इक़बाल खुद फरमा चुके हे – शमशीर औ सीनां अव्वल ताऊस औ रबाब आखिर ( तलवार और भाले की नोक पहले संगीत और नृत्य बाद में . इकबाल का कोई भी प्रशंसक यह नहीं बताता की क्या सारी दुनिया मुस्लमान हुए बिना अपनी भलाई और सुरक्षा की क्षमता रखती हे और जिंदगी में उच्च लक्ष्यों को प्राप्त कर सकती हे . ? ये कुछ ऐसे सवाल हे जिनसे छुटकारा पाना असम्भव हे . साहित्य की अदालत इकबाल और उसके अनुयायियों को उस वक्त तक बरी नहीं कर सकती जब तक वे इन सवालो का साफ़ साफ़ जवाब न दे . समझ नहीं आता की इक़बाल किसी चुस्ती चाहते हे ? किसी क्रिया किसी गतिशीलता किसी दुनिया कैसी ‘ खुदी ‘ और किसकी ‘ खुदी ‘ ? ———– रही बात साहित्यिक और कलात्मक सौंदर्य की . यहाँ भी मीर ग़ालिब और अनीस में साहित्यिक सौंदर्य इकबाल से कही अधिक हे क्या इकबाल की भाषा और अभिवियिक्ति शैली में जो विशेषताए मिलती हे वे शेक्सपियर मिल्टन वर्डस्वर्त किट्स शेले होमर वर्जिल दाँते गोयटे टॉलस्टाय बार्क बेकन और कालिदास के काव्य में मिलने वाली विशेषताओ से कुल मिलाकर कम नहीं हे ? हां पिछली एक शताब्दी से उर्दू अदब की अल्प समर्द्धि को देखते हुए अपेक्षाकरत विचारणीय अवश्य हे लेकिन विश्व साहित्य से परिचित कोई भी विधार्थी इकबाल के कलात्मक सौंदर्य से भी प्रभावित नहीं हो सकता .

( वाणी प्रकाशन से प्रकाशित सुमत प्रकाश ‘ शौक ‘ की पुस्तक ‘ गुफ्तगू फ़िराक से ‘ ( फ़िराक गोरखपुरी से बातचीत 1959 -1976 से साभार )