Nishtar-khanqahi-2
by — निश्तर खानकाही

आज़ादी के बाद प्रगतिशील आंदोलन लेखन के लेखक निश्तर साहब ( 1930 – 2006 ) ने कम ही लिखा मगर बढ़िया लिखा पेश हे उनकी बेहतरीन पुस्तक हिंदी साहित्य निकेतन बिजनौर से प्रकाशित ” कैसे कैसे लोग मिले ” से उनके कुछ विचार निश्तर साहब लिखते हे – यहाँ यह बताता चलू की दिल्ली प्रवास से पहले ही मेरा लगाव मार्क्सवाद से हो गया था यह लगाव मार्क्स और लेनिन के साहित्य को पढ़ कर इतना नहीं हुआ जितना उर्दू हिंदी साहित्य को पढ़ कर हुआ था पहले मेने भी देखा देखि धार्मिक मान्यताओ से खुल कर इंकार किया . ‘ शैतान बख्श दिया गया ‘ जैसी विद्रोही कविताय लिखी और बाद में सोच के धरातल पर भी धार्मिक वयवस्था पर मेरी आस्था समाप्त हो गयी . यहाँ समाप्त शब्द पूर्ण रूप से सत्य नहीं हे क्योकि मेरा मानना हे की कोई भी व्यक्ति शतप्रतिशत नास्तिक नहीं हो पाता . हज़ारो वर्ष के संस्कार आस्थाओ से किसी न किसी हद तक उसे जोड़े रखते हे जोश मलीहाबादी ने कहा था ‘ यह दीन पे इसरार किया जाता हे वह दीन से बेजार किया जाता हे इक उम्र से इंकार पे माइल हे दिमाग और दिल हे की इकरार किये जाता हे ‘

बात दरअसल यह हे की पुरानी आस्थाय उस वक्त तक अपनी जड़े नहीं छोड़ती जब तक नई आस्थाओ की नीव नहीं मज़बूत हो जाती और जहा तक हमारा सवाल हे हमने तो नास्तिकता सैद्धांतिक आस्था के माध्यम से नहीं फैशन के माध्यम से ग्रहण की थी बाद में इसे चिंतन और वैज्ञानिक विश्लेषण ने काफी कुछ माँजा भी पर धब्बे पूरी तरह से दूर नहीं हुए हां इतना अवश्य हे की साहित्य ने और वैज्ञानिक सोच ने मुझे और मेरे जैसे कई औरो को भी दीन धर्म जाती पाँति और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठ कर सोचना और वयवहार करना सिखाया . आप चाहे तो मेरे व्यक्तित्व में एक अर्द्ध नास्तिक पहलु जोड़ सकते हे जिसके भीतर कही न कही आस्थावान चोर छिपा हे , लेकिन जो धार्मिक भेदभाव से पूर्णतया अलग हे , जो आदमी को धर्म जाती या किसी अन्य खाने में रख कर नहीं देखता मानव उसके लिए पहले भी मानव हे और अंत में भी मानव जो उसे उसकी समस्त दुर्बलताओं और पर्बलताओ सहित स्वीकार करता हे .

बुद्धि के स्तर पर मेरी किसी भी धर्म में कोई आस्था नहीं हे मुझे लगता हे जैसे भौतिक सत्ता स्थापित करने वालो अपनी शक्ति से काम लेकर जनता को अपने अधीन बना रखा , वैसे ही आध्यात्मिक सत्ता कायम करने वालो ने अपने विवेक और मानसिक शक्ति से काम लेकर एक ऐसी बड़ी वयवस्था स्थापित की जो पहली वयवस्था से कही ज़्यादा शक्तिशाली थी और फिर ये दोनों सट्टे मिलकर आदमी को जड़ एव दास बनाने में लग गई . पर आज भी जबकिसी बहुत ही सुंदर नारी का चेहरा मुझे दिखाई दे जाता हे तो बरबस कह उठता हु की इसे देख कर लगता हे की खुदा हे मेने इसी लेख में कही कहा हे की पूर्ण रूप से नास्तिक हो जाना हर आदमी के बस की बात नहीं हे हज़ारो वर्ष पुराने संस्कार छीप छीप कर उस पर हमला करते रहते हे संसार की सुन्दरतम रचनाओ को देख कर चाहे वह नारी के रूप में हो या किसी और रूप में , मुझे लगता हे की इसका कोई महानतम रचयिता होना चाहिए इससे आगे मर्त्यु के बाद मिलने वाला जीवन सवर्ग नरक हिसाब किताब आदि मान्यताओ पर मेरा विशवास नहीं हे ” साभार हिंदी साहित्य निकेतन बिजनौर से प्रकाशित ” कैसे कैसे लोग मिले ” पुस्तक

( प्रस्तुति- सिकंदर हयात )