mohd-rafiiसैयद एस. तौहीद

बचपन के दिनों में संगीत जुनून पर चर्चा करते हुए रफ़ी साहेब ने फ़कीर औरएकतारा की बात कही थी. उन दिनों वह एकतारा लेकर चलने वाले फ़कीर के फ़न सेबहुत प्रभावित रहे, फ़कीर अक्सर एकतारा पर कुछ गाते हुए दूर-दूर तक चलेजाते हैं. जिस किसी ने फ़कीर को गाते सुना होगा,वह जानते हैं किरफ़ी साहेब की दीवानगी यूं ही नही थी . बचपन में फ़कीर के जुनून को सलाम करते हुएबालक रफ़ी उससे सीख लेकर गायकी करते थे. यह प्रयास आने वालेस्वर्णिम भविष्य संकेत के रूप मे देखा जा सकता है . जब लाहौर पहुंचे तो वहां उस्तादअब्दुल वहीद खान, जीवन लाल मट्टु एवं गुलाम अली खान की दुआ मिली.

इल्म से मुक्त होकर सबसे पहले रेडियो लाहौर मे संगीत सेवाएं दी, दरअसल संगीतकारफ़िरोज़ निज़ामी इस नगीना फनकार को परखकर यहां लाए थे. इस तरह कैरियर का आगाज़ हुआ, पहला फ़िल्मी गाना श्याम सुंदर के धुनों से सजी पंजाबी फ़िल्म मे रिकार्ड हुआ. सन चालीस के शुरुआती सालों मे लाहौर से बम्बई चले आए , रिश्तेदारों व दोस्तों की मदद से भिंडी बाज़ार में रहने का ठिकानामिल गया . थोडा वक्त गुज़रने के बाद उनकी भेंट अब्दुल रशीद करदार, महबूब खान, नौशाद अली, फ़िरोज़ निज़ामी जैसे लोगों से हुई .

शुरुआत में श्याम सुंदर, जी एम दुर्रानी, नौशाद ने बहुत अच्छा
साथ निभाया. आप को पहला फिल्मी ब्रेक श्याम सुंदर ने एक पंजाबी फ़िल्ममे दिया, फ़िर जी एम दुर्रानी की फ़िल्म में पहले हिन्दी गीत के लिए नौशाद ने पहल की. उस जमाने में हुश्नलाल भगतराम व गीतकार राजेन्द्र कृशनके साथ कुछ स्पेशल गाने भी गाए . प्रधानमंत्री नेहरू ने बापू की हत्या के शोक में रफ़ी को गीत सुनाने को कहा, रफ़ी ने ‘बापू की अमर कथा’ को गाया.

उन्हें उस जमाने के नामी संगीतकारों के साथ काम करने का मौका
मिला . नौशाद व सचिन देव बर्मन का साथ विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा. नौशाद साहेब रफ़ी की काबलियत से इस कदर प्रभावित हुए कि हिन्दी फ़िल्मों में ब्रेक नवाज दिया, अनमोल घडी एवं शाहजहां में गीत दिए . फ़िर तो जैसे नौशाद रफ़ी के आवाज़ के मुरीद रहे . रफ़ी साहेब ने नौशाद के लिए ‘दीदार’ , ‘आन’ , ‘उडन खटोला’ , ‘कोहीनूर’ ,‘मुगल-ए-आज़म’ , ‘गंगा जमुना’ , ‘मेरे महबूब’ में गीत गाए. वहीं सचिन देव बर्मन की ‘प्यासा’ , ‘नौ दो ग्यारह’ , ‘काला पानी’ , ‘काला बाज़ार’ एवं ‘गाईड’ में भी गायकी का यादगार मिसाल पेश की.

पचास-साठ दशक की पीढी का नसीब वह रफ़ी साहेब के ज़माने मे पैदा हुए. वह लोग जिन्होंने रफी को लाइव भी सुना फ़िर जो नयी फ़सल आई उसमे किशोर कुमार की दीवानगी रही. सत्तर के दशक में संगीत की महफ़िल मे किशोर दा की जबरदस्त मौजूदगी के बावजूद मो रफ़ी ने बेहतर गीत दिए : दिन ढल जाए (गाईड), क्या हुआ तेरा वादा (हम किसी से कम नही), बडी दूर से आए है (समझौता), राही मनवा दुख की चिंता ( दोस्ती) , हुई शाम उनका ख्याल आ गया ( लाल पत्थर), गर तुम भुला न दोगे (यकीन), नफ़रत की दुनिया को छोड के’ (हांथी मेरे साथी) जैसे गाने इस सिलसिले में काबिले जिक्र हैं.

शक्ति सामंत की ‘आराधना’ से सत्तर के दशक में किशोर कुमार की मकबूलियत काफी आगे हो चुकी . यह किशोर दा का वक्त रहा जो नासिर हुसैन की ‘हम किसी से कम नहीं’ के पहले तक कायम रहा. यह सुपरस्टार राजेश खन्ना का भी जमाना था . किशोर कुमार को राजेश खन्ना के सुपरहिट गीतों के अंदाज़ ने उन्हें बीस-तीस बरस जवां कर दिया. किशोर कुमार व मो रफ़ी की गायकी का अंदाज़ अलग था . रफ़ी एवं किशोर कुमार में से किसी एक को अधिक महान बताना उचित न होगा क्योंकि दोनों का अंदाज़-ए-फ़न अलग था .

सत्तर दशक में रफ़ी साहेब ने नासिर हुसेन की फ़िल्मों
से जबरदस्त वापसी करते हुए गायन के लिए फिल्मफेयर अवार्ड जीता. उसीसाल मनमोहन देसाई की ‘अमर अकबर अंथोनी’ के गीतों से रफ़ी एकबार फ़िर मकबूलियत के शिखर पर जा पहुंचे . उनका यह सफ़र जब अस्सी दशक के एकत्तीस जुलाई को हृदयघात से यकायक समाप्त हुआ, तो ऐसा लगा कि संगीत की महफ़िल विरान हो गई!

सभी जानते हैं कि रफ़ी एक महान गायक थे, पर उनके द्वारा किए काम केमहत्त्व पर कम ही चर्चा हुई. संगीत को ज्यादातर टाईम-पासका जरिया मानने की सीमित अवधारणा ने गीतों के मर्म का नुकसान किया . सभी संगीत ऐसा नही होता. संगीत का मर्म समझने के लिए उसे ज़िंदगी की हक़ीकत व फलसफे से जोड कर देखना होगा. ज़िंदगीके अनेक पहलू संगीत के जरिए से समझे जा सकते हैं. रफ़ी साहेब के गीतों या किसी भीबेहतरीन गीत-संगीत को मन से सुनने पर उसमे एक खूबसुरत विचार सामने आता है . रफ़ी कीगायकी के ऊपर चर्चा ‘ नफ़रत की दुनिया कोछोड के’ (हांथी मेरे साथी) , ‘आया रे खिलौने वाला’( बचपन), ‘मिले न फ़ूलतो कांटों से दोस्ती’(अनोखी रात), ‘कभी खुद पे कभी हालात पे रोना (हमदोनो), ‘राही मनवा दुख की चिंता’ (दोस्ती), ‘हर फ़िक्र को धुंऐ में उडाता’(हम दोनों), ‘सुख के सब साथी’(गोपी), ‘मन रे तु काहे न धीर धरे’(चित्रलेखा),वक्त से दिन और रात (वक्त) इत्यादि के साथ जा की सकती है . फ़िल्म ‘हांथी मेरे साथी’ का गीत आदमी कीनिष्ठुरता व बर्बरता पर कडी टिप्पणी करता है . पशुओं को लेकर अमानवीयता चिंता का विषय है . फ़िर ‘सुख के सब साथी’ गीत में मानव स्वार्थ को बताया गया.

मो रफ़ी के लिए यह कहना होगा कि वह भारतीय
सिने संगीत के अमर फ़नकारों में एक हैं . उनकी गायकी में
आला दर्जे की वेरायटी व डेप्थ थी. रफ़ी साहेब के गाने हर अभिनेता
के स्टाईल के हिसाब से हुआ करते थे गानों की बानगी कुछ इस तरह रही कि उस जमाने के सभी अभिनेताओं केस्टाइईल में सहजता से फ़िट बैठ गए . रफ़ी आज भी काफी पसंद किए जाते हैं . भारतीय सिने संगीत कायह ध्रुव -तारा उन गीतों में आज भी जिंदा है.