dars-e-hadith

हदीसो की मदद से हम इस बात का शोध करते हैं की क्या नर्क में औरतों की संख्या मर्दों से अधिक होगी।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कथन, तथ्यों औऱ आपकी राय दोनो पर शामिल है। जहाँ तक राय का सम्बंध है, उन्होने इस बात को ज़ाहिर कर दिया था की आप इंसान ही थे और आप से ग़लतियाँ हो सकती है। इसलिए अब हम तथ्य या राय के तौर पर हदीस की रैंकिंग करते है।

तथ्य या राय?

हम से अबू अलवलिद ने ब्यान किया, उन्होंने कहा हम सब से मुस्लिम बिन ज़रीर ने ब्यान किया, उन्होंने कहा हम से अबू रेज़ा ने ब्यान किया और उन से इमरान बिन हसीन रज़ियल्लाहू अन्हु ने कहा की नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया ‘मैं ने जन्नत में झाँक कर देखा तो जन्नतियों में अधिकतर ग़रीब नज़र आए और मैं ने नर्क में झाँक कर देखा तो वहाँ अधिकतर महिलाएँ नज़र आईं।

(बोखारी, ३२४१, मुस्लिम २७३७)

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जिस बात की गवाही दी उसे तथ्य मानना चाहिए, प्रन्तु प्रश्न यह है की उन्होंने क़यामत से पहले किसी को स्वर्ग या नर्क में किस तरह देखा? हमें यह मानना होगा की नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह देखा दिया गाया था की क़यामत के दिन के बाद क्या होगा।

तथ्य १: नर्क में महिलाओं की अक्सरीयत

अब हम यह देखते है की ऐसा क्यों है। इसकी तौजीह के हवाले से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इसके बारे में दर्याफ़्त किया गया था जिस पर आप ने इस की वजह भी ब्यान फरमाई।

हज़रत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (र आ) ने रिवायत की के अल्लाह के रसूल (स आ व) ने फ़रमाया: ने जन्नत देखी और उसका एक खोशा तोड़ना चाहता था अगर मैं उसे तोड़ सकता तो तुम उसे रहती दुनिया तक खाते और मुझे नर्क भी देखाई गई मैं ने उस से अधिक भयनक दृश्य कभी नहीं देखा। मैं ने देखा उसमें महिलाएँ अधिक है। किसी ने पूछा या रसुलुल्लाह! इसकी क्या वजह है? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया कि अपने कुफ्र की वजह से। पूछा गया, क्या आल्लाह ताला का कुफ्र करती हैं? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया कि पति का और एहसान का कुफ्र करती हैं। ज़िंदगी भर तुम किसी महिला के साथ अच्छा बर्ताओ करो लेकिन कभी अगर कोई उनके दिल के खिलाफ बात आ गई तो तुरंत ही कहेगी के मैं ने तुम से कभी भलाई नहीं देखी”।

(बुखारी १०५२)

कारण १: इसलिए की वह अपने पतियों की शुक्रगुज़ार नहीं हैं. (राय है हक़ीक़त नही)

कारण १ स्पष्ट रूप से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की राय है। अगर यह हक़ीक़त होती तो क़ुरान शरीफ में इस सम्बन्ध में कोई आयत अवश्य होतीं, जबकि हम क़ुरान शरीफ में ऐसी कोई आयत नहीं पाते।

हम से सईद बिन अबी मरियम ने ब्यान किया, उन्होंने कहा हम से मुहम्मद बिन जाफ़र ने ब्यान किया, उन्होंने कहा मुझे ज़ैद ने और यह ज़ैद असलम के बेटे हैं, उन्होंने अय्याज़ बिन अब्दुल्लाह से, इन्होंने अबू सईद खुदरी (र अ) से की आप ने फ़रमाया की नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईद उल अज़हा या ईद उल फित्र मैं ईदगाह तशरीफ़ ले गये, वहाँ आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम महिलाओं के पास से गुज़रे और फरमाया: ऐ औरतों की जमात, सदक़ा करो क्योंकि मैं ने नर्क में अधिकतर तुम्ही को देखा है। उन्होंने कहा या रसूलल्लाह! , ऐसा क्यों? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया की तुम बुरा भला बहुत करती हो और पति की नाशुकरी करती हो। बुद्धि और धर्म में कमज़ोर होने के बावजूद, मैं ने तुम से ज़्यादा किसी को भी एक बुद्धिमान और अनुभवी आदमी को दीवाना बना देने वाला नहीं देखा। महिलाओं ने कहा की हमारे धर्म और हमारी बुद्धि में ग़लत क्या है या रसुलुल्लाह? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया क्या एक महिला की गवाही एक मर्द की गवाही से आधी नहीं है? उन्होंने कहा जी है। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया बस यही इसकी कम होने की पहचान है। फिर आप ने पूछा क्या ऐसा नहीं है की जब महिला मासिक धर्म से हो तो न नमाज़ पढ़ सकती है न रोज़ा रख सकती है, महिलाओं ने कहा, ऐसा ही है। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया यही इसके दीन का नुकसान है। (बुखारी’ ३०४)

कारण २: महिलाएँ मंदबुद्धि होती है, इसलिए दो औरतों की गवाही एक मर्द की गवाही के बराबर है।

कारण २ को एक कमज़ोर राय मान लिया जाना चाहिए, क्योंकि यह क़ुरान के अनुसार नहीं है, क्योंकि क़ुरान केवल दो औरतों की संयुक्त गवाही को एक गवाह की हैसियत देने की इजाज़त देता है उन्हें अलग अलग दो गवाहों की तरह गवाही देने की आवश्यकता नहीं है। यह एक रियायत है कोई क़ानूनी आवश्यकता नहीं। अगर हम इस हदीस को सही मान लें तो इसका मतलब यह होगा की नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सही तरीक़े से क़ुरान की आयात को नहीं समझा है। और यह एक मूर्खतापूर्ण बात है और इस वजह से हमें इस हदीस को सही क़रार देना होगा। इस विषय पर मेरा लेख, “क्या एक औरत की एक गवाही एक मर्द के मुक़ाबले में आधी है?” अवश्य मुलाहीज़ा फरमाएँ।

कारण ३: महिलाएँ धर्म में भी कमज़ोर हैं इसलिए की वह मासिक धर्म के दिनों में न तो नमाज़ अदा कर सकती है, न रोज़ा रख सकती हैं.

अगर कारण ३ त्रुटिपूर्ण है तो यह अल्लाह की तरफ से है (नाऊज़ो बिल्लाह मिन ज़ालिक) न की महिलाओं की तरफ से। कारण ३ को एक एक मनगढ़ंत हदीस और ज़बरदस्त झूठ और अछा होगा की सरासर बकवास मान कर रद् कर दिया जाना चाहिए।

विरोधाभासी हदीस

एक बार कुछ लोग इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि स्वर्ग में ज़्यादा महिलाएँ होंगी या ज़्यादा मर्द होंगे। इस पर अबू हुरैरा (र. अ) ने रवायत की, अबुल क़ासिम (रसुलल्लह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया की जन्नत में दाखिल होने वाले हर व्यक्ति के साथ (दुनियावी) बीवियाँ होंगी, और उन के टाँगों का मगज़ गोश्त के नीचे चमकता होगा, और जन्नत में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जिस के पास एक बीवी न हो। (सहीह मुस्लिम)

हाफ़िज़ बिन हज्र रज़ियल्लाहू अन्हो फरमाते हैं के सय्यदना अबू हुरैरा (र अ) अपने इस दावा को साबित करने के लिए इस हदीस का इस्तेमाल किया करते थे के जन्नत में मर्दों से अधिक औरतों की संख्या होगी। (फ़ताहुल बारी, पृष्ठ ४००-जिल्द ६)

अब इन दो हदीसो के बीच एक विरोधाभास सामने आता है जिन के बीच निम्नलिखित तरीक़ों से सम्बंध पैदा की जाती है।

१- शुरू में महिलाएँ नर्क में अधिक और स्वर्ग में कम होंगी उसके बाद जब वह अपने गुनाहों से पाक होजाएँगी, या उनके ओर से निवेदन स्वीकार कर लिया जाएगा, तो वह जन्नत में दाखिल हो जाएँगी। (फ़तहुल बारी, पृष्ठ ४०१, जिल्द ६)

लेकिन मर्दों को भी क्यों नहीं गुनाहों से पाक कर के जन्नत में दाखिल किया जाएगा? यह एक अनुचित विवरण है।

२- हदीसों मे वह वक़्त मुराद ली जाएगी जब रसुलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जिस्मानी रूप से अवलोकन किया था। इन हदीसों में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं है की वह हमेशा नर्क में इसी तरह रहेंगी। (फ़ाज़ुल बारी, पृष्ठ २४४- जिल्द ४)

फिर भी ऐसा कैसे हो सकता है कि कम संख्या में मौजूद जन्नत में औरतों की संख्या अब दोगुनी हो जाएगी?

यह संभव है कि यह एक तथ्य हो कि पुरुषों की तुलना में नरक में महिलाओं की संख्या अधिक हो। इसके लिए महिलाओं को नाफ़रमान, नाशुक्र और मज़हब और बुद्धि में कमज़ोर बता कर उनका अपमान किए बिना एक सादा व्याख्या हो। यह हदीस और यह व्याख्या अल्लाह, क़ुरान और रसुलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की तौहीन है।

आंकड़ों के हिसाब से इसकी व्याख्या

पूरी दुनिया को देखते हुए हर १०० महिलाओं पर १०७ मर्द पैदा होते हैं। लेकिन मर्द बच्चों के ज़्यादा मृत्यु दर के कारण १५ साल तक यह अनुपात 105 पुरुष बनाम 100 महिला तक पहुँच जाता है। चूंकि बच्चे स्वर्ग में जाते हैं और पुरुष बच्चों की मृत्यु दर महिलाओं की मृत्यु दर की तुलना में 47 प्रतिशत अधिक है, (मजमुई तौर पर मृत्यु दर = 5.7 है), जिस के अनुसार जन्नत में हर १०० बच्चियों के तुलना में १४७ बच्चे होंगे।

जहां तक वयस्क पुरुषों की बात है तो युद्ध में ज्यादातर पुरुष ही मारे जाते हैं। एक युद्ध में दो पक्ष होते हैं। एक पक्ष न्याय की ओर होता है और दूसरा पक्ष अत्याचार की ओर होता है। इसलिए युद्ध में मारे गए लगभग 50 प्रतिशत लोग स्वर्ग में प्रवेश कर जाते हैं और 50 प्रतिशत नर्क में। अगर युद्ध का मामला नहीं होता तो प्राकृतिक मौत मरने वाले उन्ही पुरुषों में से 10 प्रतिशत से अधिक लोग स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर पाते। इसलिए, युद्ध ने ज़ाहरी तौर पर जन्नती पुरुषों के अनुपात में एक असमानता पैदा कर दिया है।

इस दुनिया में पैदा होने वाला हर व्यक्ति या तो जन्नत में जाएगा या नरक में जाएगा। चूंकि महिलाओं की तुलना में पुरुषों की जन्म दर अधिक है, तमाम चीज़ों के बराबर होने के कारण हमें इस बात की उम्मीद करनी चाहिए कि स्वर्ग और नरक दोनों में पुरुषों की संख्या अधिक होगी। हालांकि उपरोक्त आमालों से उनकी संख्या में असमानता पैदा होता है, जिसमें नरक में जाने वाले पुरुषों की संख्या में या तो युद्ध या पुरुष बच्चों की मौत में वृद्धि के कारण काफी कमी साबित होती है।

क्या खुदा पुरुषों की तरफदारी करके न्याय पर है?

आंकड़ों पर आधारित व्याख्या को भी खारिज कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि फिर यह सवाल उठता है कि क्या “खुदा एक विशिष्ट जींस का समर्थन करके अन्याय पर है”।

अल्लाह ने महिलाओं को ममता के धन से सम्मानित है जिसके संबंध में कुरान का फरमान है। “……….. जिसे उसकी मां तकलीफ पर तकलीफ़ की हालत में (अपने पेट में) सहती रही और जिसका दूध छूटा भी दो साल में है। (३१:१४)

नज़दीकियों में भी तक़वा अपनाओ (४:१)

अपने बच्चों की परवरिश में एक माँ का ख़ास योगदान होता है और अगर बच्चे नेक हों तो इसका इनाम भी महान है।

इस विषय पर हदीसों, तथ्यों और राय की हालत बेहद कमजोर दिखाई देते हैं, इसलिए, उन्हें अविश्वसनीय अफवाह करार देकर खारिज कर दिया जाना चाहिए।

यह स्पष्ट है कि पुरुष दुनिया और आखिरत दोनों में अच्छी ज़िंदगी चाहते हैं और उसी के अनुसार उन्होंने हदीसें गढ़ ली हैं। पहले उन्हें ऐसी महिलाओं की जरूरत थी जो उनके हुकमों का पालन करती हैं और उनकी आभारी रहें। और उन्होंने यह कह कर उसे प्राप्त किया कि नरक में बहुमत महिलाओं की होगी इसलिए कि वे अपने पतियों की अवज्ञा करती हैं। और उन्होंने यह कह कर अपना स्थान और अपना महत्व बनाए भी रखा कि महिलाएं बुद्धि और धर्म दोनों में कमज़ोर हैं। उनके जीवन में महिलाओं को अपना अधीन बनाना उनके लिए पर्याप्त नहीं हुआ। इसीलिए उन्होंने स्वर्ग में हर मर्द के साथ दो बीवियों की बात कह दी, जबकि हर आदमी के लिए आधी औरत भी नहीं है! अपनी पत्नियों को अधीन बनाकर और अपने हितों को पूरा कर लोगों ने इस्लाम को विकृत कर दिया है। हदीस पवित्र होने के अलावा सब कुछ हैं। अधिकांश हदीस पुरुषों द्वारा वर्णित किए गए काल्पनिक झूठ का एक संग्रह हैं, जिन्हें इस संग्रह के आयोजन से दो सदी पहले ब्यान किया गया और उनकी रवायत की गई। यह पूरा संग्रह अविश्वसनीय है इसीलिए इसे अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए।

हदीसों का नुकसान बहुआयामी है। चूंकि हदीस विरोधाभासों से भरे और कभी कभी बिल्कुल बकवास बातों पर निर्भर होते हैं, इसलिए एक मुसलमान को सबसे पहले यह सिखाया जाता है कि उन्हें अपने धर्म से उसके तार्किक होने या किसी प्रकार की प्रासंगिकता रखने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। यह माहौल शैखुल हदीस ने अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए पैदा किया है! ज्ञान और बुद्धि पर आधारित धर्म अनुचित मिथकों का एक समूह बनकर रह गया है। हदीसों का उपयोग फु़र्कान या कुरान की आयतों को रद्द करने के लिए एक मानक के रूप में किया जाता है, जो कि इस्लाम का सबसे बड़ा अपमान है।

www.newageislam.com