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पेरिस हमले का क्या मक़सद था उससे किसको और क्या फ़ायदा पहुचेगा ये धीरे धीरे पर्दे से बाहर आएगा । मगर इनबातों पर गौर करना भी जरूरी है …. सिरिया और इराक़ के शरणार्थी सबसे अधिक मुस्लिम देशो मे है और जो पलायन कर यूरोप जा रहे है उनकी तादाद बहुत मामूली है और उपर से यूरोपी के कई देशो ने केवल ईसाइयो को अपने मुल्क मे पनाह देने की घोषणा कर रखी है यानी की आप मुस्लिम है तो आप यूरोप के उन देशो मे पलायन नही कर सकते है लेकिन इसके बावजूद मीडिया के द्वारा प्रपगेंडा फैलाया गया की यूरोपियन देश सिरिया व इराक़ के शरणार्थियो को गले से लगा रहे है और हज़ारो लोग यूरोपियन देशो मे जा कर बस रहे है । अमेरिका और यूरोप के संबंध लगातार खराब हो रहे है अमेरिका की युद्ध पॉलिसी की वजह से क्यूंकी इसमे यूरोपियन देश भी शामिल होते है जिसके कारण एक तो उनकी आर्थिक स्थिति को धक्का पहुँचता है और दूसरे की अब अक्सर यूरोप की जनता लगातार युद्ध मे शामिल होने से उब चुकी है। यूरोपियन देश अब इस्राइल की अंधाधुन मदद के बजाय अब अपनी पुरानी पॉलिसी पे दुबारा गौर कर रहे है और फ़लस्तीन के प्रति उनका झुकाव सॉफ नज़र आ रहा है इसके पहले चार्ली हेब्डो अटैक के समय कई देश जिनमे फ्रांस भी शामिल था फ़लस्तीन को एक आज़ाद मुल्क की हैसियत से तसलीम करने का क़ानून अपनी पार्लियामेंट मे पेश कर रहे थे लेकिन मूसाद द्वारा प्लान किया गया अटैक सफल रहा जिसके बाद किसी भी देश ने पार्लियामेंट मे बिल नही पेश किया इसके अलावा हाल ही के दिनो मे यूरोपियन देश कई बार इस्राइल के द्वारा की जा रही हिंसा की आलोचना की थी और इस हमले के ठीक कुछ दिन पहले यूरोप यूनियन ने एक क़ानून पास किया था की इस्राइल ने 1976 के बाद फ़लस्तीन के जिन इलाक़ो पे क़ब्ज़ा किया है वो वहाँ के प्रोडक्ट नही ख़रीदेंगे । अमेरिका से पूर्व सोवियत यूनियन दुनिया का नेतृत्व करता था लेकिन सोवियत यूनियन के अफ़ग़ानिस्तान मे शिकस्त के बाद टूटने के कारण दुनिया का नेतृत्व अमेरिका के हाथो चला गया जिसे अब तक किसी ने भी चैलेंज नही किया था लेकिन अब हालात बदल रहे है रूस अब दुबारा अमेरिका को न सिर्फ़ टक्कर दे रहा है बल्कि अमेरिका का एक विकल्प भी पेश किया है जो सीरिया युद्ध मे बखूबी देखने मे नज़र आ रहा था लेकिन इस हमले के तुरंत बाद अमेरिका की स्थिति दुबारा से मज़बूत हो गयी है जो ढीली पड़ती नज़र आ रही थी। इसी के तहत एक झींका टूटा कि आज अमेरिका फिर से तनन गया है ॥
तुर्की ने रूस का एक विमान मार गिराया जिसके बाद रूस-तुर्की मे ठन गयी है । अब तभी से तमाम जानने वाले फोन कर के यह बता रहे हैं कि भाई रूस के पक्ष मे लिखिए ? अब इनको क्या समझाऊँ कि..रूसी विमान को मार गिराने पे तुर्की का पक्ष है की रूस का विमान तुर्की की सीमा मे घुस आया था इसलिये मार गिराया जिसपे रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने रूस का पक्ष रखते हुये कहा था की तुर्की ने योजनाबद्ध रूप से उसका विमान मार गिराया था लेकिन अब रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने तुर्की व तुर्की द्वारा विमान गिराय जाने पे प्रतिक्रिया देते हुये रूस और तुर्की के बिगड़ते संबंध की असल वजह ब्यान कर दी है पुतिन का ब्यान है की ”तुर्की द्वारा रूसी विमान गिराना समस्या नही है बल्कि समस्या बहुत गहरी है और वो है की तुर्की की नीतिया इस्लामीकरण है”। अब पुतिन के इस ब्यान को जब उनसे कहता हूँ कि क्या आप सहमत हैं कि तुर्की की इस्लामीकरण की या रूस के द्वारा सिरिया मे बम बरसाय जाने के .?साँप सूंघ जा रहा है अब घंटी बजनी बंद हो गयी !! लेकिन असल बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता ? अरब भूमि के सृष्टि पर राजनीतिक सोच को जेहन मे रखते हुवे समीक्षा करनी होगी ….

जी अब इज़रायली-फिलिस्तीनी संघर्ष जो राजनीतिक विसतारवाद और एकाधिकार का अनसुलझआ मसला, नासूर हो चुका है ।इसके घाव का रिसाव अभी तक जारी है। PLO के नेता यासिर अराफ़ात के बाद कोई ठोस नेतृत्व नहीं मिला और हम्मास को इसे बिल्ली के भाग से झींका टूट गया । अमेरिका मानव वाद कितना भी पाठ पढ़ाये मगर उसकी करनी और कथनी का अंतर समझ मे आने लगा है । पश्चिमी देश यहूदियों से पीछा छुड़ाने के लिए मानव नरसनहार का मौन समर्थन करते रहे हैं । इज़राइल और फिलिस्तिनियों के बीच का एक संघर्ष जो अरब-इजराइल संघर्ष की एक लम्बी कड़ी है। वास्तव में, यह दो समूहों के बिच एक ही क्षेत्र पर किये गए दावे का संघर्ष है। द्वि-राज्य सिद्धांत के लिए यहाँ कई प्रयास किये गए जो भारत मे भी एक वक़्त जिन्ना ने उठाया था ,उसी तरह इजराइल से अलग एक स्वतंत्र फिलिस्तीन राज्य बनाने के लिए कहा गया था। वर्तमान में, इसरायली और फिलिस्तीनियों की बहुमत चाहती है की, द्वि-राज्य सिद्धांत पर इस संघर्ष को ख़त्म कर दिया जाय। कई फिलिस्तीनी हैं जो पश्चिम किनारे और गाज़ा पट्टी को भविष्य का अपना राज्य के रूप में देखते हैं, जिस नजरिये को कई इसरायलीयों ने स्वीकारा भी है। कुछ शिक्षाविद एक-राज्य सिद्धांत की वकालत करते हैं और पुरे इजराइल, गाज़ा पट्टी और पश्चिम किनारे को एक साथ रखकर, दो राष्ट्रीयता को एक साथ रखकर एक राज्य बने जिसमें सब के लिए समान अधिकार हो। यद्यपि, कुछ ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं जिनके कारण किसी भी अंतिम निर्णय पर पहुँचने में दोनों पक्ष में असंतोष दिखाई देता है और दोनों पक्षों में एक दुसरे के ऊपर विश्वास का स्तर भी कमजोर है, और यही असली विवाद की जड़ है ॥

असल मसले को समझने के लिए सर्वप्रथम इज़राइल की पृस्ट्भुमी और इसका इतिहास समझना आवश्यक है ।
वस्तुतः इज़राइल संसार के यहूदी धर्मावलंबियों के प्राचीन राष्ट्र का नया रूप है। इज़रायल का नया राष्ट्र 14 मई, सन् 1948 को अस्तित्व में आया। इज़रायल राष्ट्र, प्राचीन फ़िलिस्तीन अथवा पैलेस्टाइन का ही बृहत् भाग है।तब और अब क्यों कैसे ॥ इसके लिए आदिकाल का अवलोकन अति आवश्यक होगा । यहूदियों के धर्मग्रंथ “पुराना अहदनामा” के अनुसार यहूदी जाति , पैगंबर हज़रत अबराहम (इस्लाम में इब्राहिम, ईसाइयत में Abraham) से प्रारम्भ होता है। अबराहम का समय ईसा से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व है। अबराहम के एक बेटे का नाम इसहाक और पोते का नाम याकूब (ईसाईयत में Jacob) था। याकूब का ही दूसरा नाम **इज़रायल** था। याकूब ने यहूदियों की 12 जातियों को मिलाकर एक किया। ये सब जातियाँ अलग अलग क़बीलों मे बनती थी । इन सब जातियों का यह सम्मिलित राष्ट्र इज़रायल के नाम के कारण “इज़रायल” कहलाने लगा। आगे चलकर इबरानी भाषा में इज़रायल का अर्थ हो गया-“ऐसा राष्ट्र जो ईश्वर का प्यारा हो”।
याकूब के एक बेटे का नाम यहूदा अथवा जूदा था। यहूदा के नाम पर ही उसके वंशज यहूदी (जूदा-ज्यूज़) कहलाए और उनका धर्म यहूदी धर्म (जुदाइज्म) कहलाया।
प्रारंभ की शताब्दियों में याकूब के दूसरे बेटों की संतानें इज़रायल या “बनी इज़रायल” के नाम से प्रसिद्ध रही। फ़िलिस्तीन और अरब के उत्तर में याकूब की इन वंशजों की “इज़रयल” और “जूदा” नाम की एक दूसरी से मिली हुई किंतु अलग-अलग दो छोटी-छोटी सल्तनतें थीं। दोनों में शताब्दियों तक गहरी शत्रुता रही। अंत में दोनों मिलकर एक हो गईं। इस सम्मिलन के परिणामस्वरूप देश का नाम **इज़रायल** पड़ा और जाति इनकी थी यहूदी।

एक मत यह भी कि यहूदियों के प्रारंभिक इतिहास का पता अधिकतर उनके धर्मग्रंथें से मिलता है जिनमें मुख्य बाइबिल का वह पूर्वार्ध है जिसे “पुराना अहदनामा” (ओल्ड टेस्टामेंट) कहते हैं। पुराने अहदनामे में तीन ग्रंथ शामिल हैं। सबसे प्रारंभ में “तौरेत” है। तौरेत का शब्दिक अर्थ वही है जो “धर्म” शब्द का है, अर्थात् धारण करने या बाँधनेवाला। दूसरा ग्रंथ “यहूदी पैगंबरों का जीवन चरित” और तीसरा “पवित्र लेख” है। इन तीनों ग्रंथों का संग्रह “पुराना अहदनामा” है। पुराने अहदनामें में 39 खंड या पुस्तकें हैं। इसका रचनाकाल ई.पू. 444 से लेकर ई.पू. 100 के बीच का माना जाता है। पुराने अहदनामे में सृष्टि की रचना, मनुष्य का जन्म, यहूदी जाति का इतिहास, सदाचार के उच्च नियम, धार्मिक कर्मकांड, पौराणिक कथाएँ और यह्वे के प्रति प्रार्थनाएँ शामिल हैं।
यहूदी धर्म , ईसाई धर्म, तथा इस्लाम धर्म को संयुक्त रूप से इब्राहिमी धर्म भी कहते हैं क्योंकि इब्राहम तीनों धर्म के मूल में हैं ।
यहूदी जाति के आदि संस्थापक अबराहम को अपने स्वतंत्र विचारों और ईश्वरीय संदेशों के कारण दर-दर की खाक छाननी पड़ी। अपने जन्मस्थान ऊर (सुमेर का प्राचीन नगर) से सैकड़ों मील दूर निर्वासन में ही उनकी मृत्यु हुर्ह। अबराहम के बाद यहूदी इतिहास में सबसे बड़ा नाम मूसा का आता है। मूसा ही यहूदी जाति के मुख्य व्यवस्थाकार या स्मृतिकार माने जाते हैं। मूसा के उपदेशों में दो बातें मुख्य हैं : एक–अन्य देवी देवताओं की पूजा को छोड़कर एक निराकार ईश्वर की उपासना और दूसरा — सदाचार के दस नियमों का पालन करना । मूसा ने अनेकों कष्ट सहकर ईश्वर के आज्ञानुसार जगह-जगह बँटी हुई अत्याचार पीड़ित यहूदी जाति को मिलकार एक किया और उन्हें फ़िलिस्तीन में लाकर बसाया । यह समय ईसा से प्राय: 1,500 वर्ष पूर्व का था। मूसा के समय से ही यहूदी जाति के विखरे हुए समूह स्थायी तौर पर फ़िलिस्तीन में आकर बसे और उसे अपना देश समझने लगे। बाद में अपने इस नए देश के नाम को उन्होंने “इज़रायल” की संज्ञा दी।
उस काल के दौर मे राजनीतिक फैलाव के कारण ही अबराहम ने यहूदियों का उत्तरी अरब और ऊर से फ़िलिस्तीन की ओर संक्रमण कराया। यह उनका पहला संक्रमण था । दूसरी बार जब उन्हें मिस्र छोड़ फ़िलिस्तीन भागना पड़ा तब उनके नेता हज़रत मूसा थे (प्राय: 16वीं सदी ई.पू.)। यह यहूदियों का दूसरा संक्रमण था जो महान् बहिरागमन (ग्रेट एग्ज़ोडस) के नाम से प्रसिद्ध है।यह एक अलग वाकया है ।

अबराहम और मूसा के बाद इज़रायल में जो दो नाम सबसे अधिक आदरणीय माने जाते हैं वे दाऊद (ईसाइयत में David) और उसके बेटे सुलेमान (ईसाइयत में Solomons) के हैं । सुलेमान के समय दूसरे देशों के साथ इज़रायल के व्यापार में खूब उन्नति हुई। सुलेमान ने समुद्रगामी जहाजों का एक बहुत बड़ा बेड़ा तैयार कराया और दूर-दूर के देशों के साथ तिजारत शुरु की। अरब, एशिया कोचक, अफ्रीका, यूरोप के कुछ देशों तथा आज के आधुनिक भारत सिंध के साथ इज़रायल की तिजारत होती थी। सोना, चाँदी, हाथीदाँत और मोर भारत से ही इज़रायल आते थे। सुलेमान उदार विचारों का धनी था । सुलेमान के ही समय इबरानी यहूदियों की राष्ट्रभाषा बनी । 37 वर्ष के योग्य शासन के बाद सन् 937 ई.पू. में सुलेमान की मृत्यु हुई।सुलेमान की मृत्यु से यहूदी एकता को बहुत बड़ा धक्का लगा। सुलेमान के मरते ही इज़रायली और जूदा (यहूदा) दोनों फिर अलग–अलग स्वाधीन रियासतें बन गईं । सुलेमान की मृत्यु के बाद 50 वर्ष तक इज़रायल और जूदा के आपसी झगड़े चलते रहे । इसके बाद लगभग 884 ई.पू. में उमरी नामक एक राजा इज़रायल की गद्दी पर बैठा । उसने फिर दोनों जतियों , , ,शाखों में प्रेमसंबंधस्थापित किया। किंतु उमरी की मृत्यु के बाद यहूदियों की ये दोनों शाखें सर्वनाशी युद्ध में उलझ गईं और जिसके परिणाम स्वरूप खाई बढ़ गई ।यहूदियों की इस स्थिति को देखकर असुरिया के राजा शुलमानु अशरिद पंचम ने सन् 722 ई.पू. में इज़रायल की राजधानी समरिया पर चढ़ाई की और उसपर अपना अधिकार कर लिया। अशरिद ने 27,290 प्रमुख इज़रायली सरदारों को कैद करके और उन्हें गुलाम बनाकर असुरिया भेज दिया और इज़रायल का शासन प्रबंध असूरी अफसरों को सपुर्द कर दिया। सन् 610 ई.पू. में असुरिया पर जब खल्दियों ने आधिपत्य कर लिया तब इज़रायल भी खल्दी सत्ता के अधीन हो गया।इसके बाद हख़ामनी राजवंश सन् 550 ई.पू. में ईरान सुप्रसिद्ध हख़ामनी राजवंश का समय आया। इस कुल के सम्राट् कुरुश ने जब बाबुल की खल्दी सत्ता पर विजय प्राप्त की तब इज़रायल और यहूदी राज्य भी ईरानी सत्ता के अंतर्गत आ गए।

आसपास के देशों में उस समय ईरानी सबसे अधिक प्रबुद्ध, विचारवान् और उदार थे। अपने अधीन देशों के साथ ईरानी सम्राटों का व्यवहार न्याय और उदारता का प्रतीक होता था। प्रजा के उद्योग धंधों को वे संरक्षा देते थे। समृद्धि उनके पीछे-पीछे चलती थी। उनके धार्मिक विचार उदार थे। **ईरानियों का शासनकाल यहूदी इतिहास का कदाचित् सबसे अधिक विकास और उत्कर्ष का काल था**। जो हजारों यहूदी बाबुल में निर्वासित और दासता में पड़े थे उन्हें ईरानी सम्राट् कुरु ने मुक्त कर अपने देश लौट जाने की अनुमति दी। कुरु ने जेरूसलम के मंदिर के पुराने पुरोहित के एक पौत्र योशुना और यहूदी बादशाह दाऊद के एक निर्वासित वंशज जेरुब्बाबल को जरूसलम की वह संपत्ति देकर, जो लूटकर बाबुल लाई गई थी, वापस जेरूसलम भेजा और अपने खर्च पर जेरूसलम के मंदिर का फिर से निर्माण कराने की आज्ञा दी। इज़रायल और यहूदा के हजारों घरों में खुशियाँ मनाई गईं। शताब्दियों के पश्चात् इज़रायलियों को साँस लेने का अवसर मिला।
अब यही वह समय था जब यहूदियों के धर्म ने अपना परिपक्व रूप धारण किया। इससे पूर्व उनके धर्मशास्त्र एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जबानी प्राप्त होते रहते थे। अब कुछ स्मृति के सहारे, कुछ उल्लेखों के आधार पर धर्म ग्रंथों का संग्रह प्रारंभ हुआ। इनमें से थोरा या तौरेत का संकलन 444 ई.पू. में समाप्त हुआ।** खास बात यह की दोनों समय का हवन , जिसमें लोहबान जैसी सुगंधित चीजें, खाद्य पदार्थ, तेल इत्यादि के अतिरिक्त किसी मेमने, बकरे, पक्षी या अन्य पशु की आहुति दी जाती थी, यहूदी ईश्वरोपासना का अवश्यक अंग था। ध्यान देने वाली बात यह की ऋग्वेद के “आहिताग्नि” पुरोहितों के समान यहूदी पुरोहित इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि वेदी पर की आग चौबीस घंटे किसी तरह बुझने न पाए ।**

जैसा की इसराइलियों का मानना है कि इज़रायली धर्मग्रंथों में सबसे सुंदर पुस्तक “दाऊद के भजन” हैं।
सन् 330 ई.पू. में सिकंदर ने ईरान को जीतकर वहाँ के हख़ामनी साम्राज्य का अंत कर दिया । सन् 320 ई.पू. में सिकंदर के सेनापति तोलेमी प्रथम ने इज़रायल और यहूदा पर आक्रमण कर उसपर अपना अधिकर कर लिया। बाद में सन् 198 ई.पू. में एक दूसरे यूनानी परिवार सेल्यूकस राजवंश का अंतिओकस चतुर्थ यहूदियों के देश का अधिराज बना। जेरूसलम के बलवे से रुष्ट होकर अंतिओकस ने उसके यहूदी मंदिर को लूट लिया और हजारों यहूदियों का वध करवा दिया, शहर की चहारदीवारी को गिराकर जमीन से मिला दिया और शहर यूनानी सेना के सपुर्द कर दिया।
अंतिओकस ने यहूदी धर्म का पालन करना इज़रायल और यहूदा दोनों जगह कानूनी अपराध घोषित कर दिया । यहूदी मंदिरों में यूनानी मूर्तियाँ स्थापित कर दी गईं और तौरेत की जो भी प्रतियाँ मिलीं आग के सपुर्द कर दी गईं । लगभग यह स्थिति सन् 142 ई.पू. तक चलती रही। सन् 142 ई.पू. में एक यहूदी सेनापति साइमन ने यूनानियों को हराकर राज्य से बाहर निकाल दिया और यहूदा तथा इज़रायल की राजनीतिक स्वाधीनता की घोषण कर दी। यहूदियों की यह स्वाधीनता 141 ई.पू. से 63 ई.पू. तक बराबर बनी रही। यह वह समय था **जब भारत में बौद्ध भिक्षु और भारतीय महात्मा अपने धर्म का प्रचार करते हुए पश्चिमी एशिया के देशों में फैल गए**। इन भारतीय प्रचारकों ने यहूदी धर्म को भी प्रभवित किया। इसी प्रभाव के परिणामस्वरूप यहूदियों के अंदर एक नए “एस्सेनी” नामक संप्रदाय की स्थापना हुई । हर एस्सेनी ब्राह्म मुहूर्त में उठता था और सूर्योदय से पहले प्रात: क्रिया, स्नान, ध्यान, उपासना आदि से निवृत हो जाता था । सुबह के स्नान के अतिरिक्त दोनों समय भोजन से पहले स्नान करना हर एस्सेनी के लिए आवश्यक था। उनका सबसे मुख्य सिद्धांत था-अहिंसा । हर एस्सेनी हर तरह की पशुबलि, मांसभक्षण या मदिरापान के विरुद्ध थे। हर एस्सेनी को दीक्षा के समय प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी ::: “”मैं यह्वे अर्थात् परमात्मा का भक्त रहूँगा। मैं मनुष्य मात्र के साथ सदा न्याय का व्यवहार करूँगा। मैं कभी किसी की हिंसा न करूँगा और न किसी को हानि पहुँचाऊँगा। मनुष्य मात्र के साथ मैं अपने वचनों का पालन करूँगा। मैं सदा सत्य से प्रेम करूँगा।”” आदि।
उसी समय के निकट हिंदू दर्शन के प्रभाव से इज़रायल में एक और विचारशैली ने जन्म लिया जिसे क़ब्बालह कहते हैं। क़ब्बालह के थोड़े से सिद्धांत ये हैं- “”ईश्वर अनादि, अनंत, अपरिमित, अचिंत्य, अव्यक्त और अनिर्वचनीय है। वह अस्तित्व और चेतना से भी परे है। उस अव्यक्त से किसी प्रकार व्यक्त की उत्पत्ति हुई और अचिंत्य से चिंत्य की। मनुष्य परमेश्वर के केवल इस दूसरे रूप का ही मनन कर सकता है। इसी से सृष्टि संभव हुई।””।

यहूदियों की राजनीतिक स्वाधीनता का अंत…………
यहूदियों की राजनीतिक स्वाधीनता का अंत उस समय हुआ जब सन् 66 ई.पू. में रोम के जनरल पांपे ने तीन महीने के घेरे के पश्चात् जेरूसलम के साथ-साथ सारे देश पर अधिकार कर लिया। इतिहासलेखकों के अनुसार हजारों यहूदी लड़ाई में मारे गए और 12,000 यहूदी कत्ल कर दिए गए । इंसानी कत्लेआम कि शर्मनाक घटना उस दौर के लिए आप बात थी।
इसके बाद सन् 135 ई. में रोम के सम्राट् हाद्रियन ने जेरूसलम के यहूदियों से रुष्ट होकर एक-एक यहूदी निवासियों का कत्ल करवा दिया । वहाँ की एक-एक ईंट गिरवा दी और शहर की समस्त जमीन पर हल चलवाकर उसे बराबर करवा दिया। इसके पश्चात् अपने नाम एलियास हाद्रियानल पर ऐंलिया कावितोलिना नामक नया रोमी नगर उसी जगह निर्माण कराया और आज्ञा दे दी कि कोई यहूदी इस नए नगर में कदम न रखे। नगर के मुख्य द्वार पर रोम के प्रधान चिह्न **सुअर** की एक मूर्ति कायम कर दी गई। इस घटना के लगभग 200 वर्ष बाद रोम के पहले ईसाई सम्राट् कोंस्तांतीन ने नगर का जेरूसलम नाम फिर से प्रचलित किया।

अरबों का अधिकार छठी ई. तक इज़रायल पर रोम और उसके पश्चात् पूर्वी रोमी साम्राज्य बीज़ोंतीन का प्रभुत्व कायम रहा । खलीफ़ा अबूबक्र और खलीफ़ा उमर के समय अरब और रोमी(Bizantine) सेनाओं में टक्कर हुई। सन् 636 ई. में खलीफ़ा उमर की सेनाओं ने रोम की सेनाओं को पूरी तरह पराजित करके फ़िलिस्तीन पर, जिसमें इज़रायल और यहूदा शामिल थे, अपना कब्जा कर लिया । खलीफ़ा उमर जब यहूदी पैगंबर दाऊद के प्रार्थनास्थल पर बने यहूदियों के प्राचीन मंदिर में गए तब उस स्थान को उन्होंने कूड़ा कर्कट और गंदगी से भरा हुआ पाया । उमर और उनके साथियों ने स्वयं अपने हाथों से उस स्थान को साफ किया और उसे यहूदियों के सपुर्द कर दिया।जेरुसलम पर इसाइयों का अधिकार. ***********इज़रायल और उसकी राजधानी जेरूसलम पर अरबों की सत्ता सन् 1099 ई. तक रही। सन् 1099 ई. में जेरूसलम पर ईसाई धर्म के जाँनिसारों ने अपना कब्जा कर लिया और बोलोन के गाडफ्रे को जेरूसलम का राजा बना दिया। ईसाइयों के इस धर्मयुद्ध में 5,60,000 सैनिक काम आए, किंतु 88 वर्षों के शासन के बाद यह सत्ता समाप्त हो गई ।ईसाई अब सत्ता नहीं धर्म युद्ध कि तरफ बढ़े और सन् 1147 ई. से लेकर सन् 1204 तक उन्होने ने धर्मयुद्धों (क्रूसेडों) द्वारा इज़रायल पर कब्जा करना चाहा किंतु उन्हें सफलता नीं मिली। सन् 1212 ई. में ईसाई पादरियों ने 50 हजार किशोरवयस्क बालक और बालिकाओं की एक सेना तैयार करके पाँचवें धर्मयुद्ध की घोषणा की। इनमें से अधिकांश बच्चे भूमध्यसागर में डूबकर समाप्त हो गए। इसके बाद इस पवित्र भूमि पर आधिपत्य करके लिए ईसाइयों ने चार असफल धर्मयुद्ध और किए।

13वीं और 14वीं शताब्दी में हलाकू खान और उसके बाद तैमूर लंग ने जेरूसलम पर आक्रमण करके उसे नेस्तनाबूद कर दिया । इसके पश्चात् 19वीं शताब्दी तक** इज़रायल पर कभी मिस्री आधिपत्य रहा और कभी तुर्क **। सन् 1914 में जिस समय पहला विश्वयुद्ध हुआ, इज़रायल तुर्की के कब्जे में था । तब तक यहूदी बिखर चुके थे और पूरी दुनिया मे पलायन कर अपना कारोबार भलीभाँति फलीभूत कर चुके थे । तभी यहूदियों के साथ एक त्रासदी शने शने जन्म ले रही थी । अडोल्फ हिटलर का जन्म आस्ट्रिया में 20 अप्रैल, 1889 को हुआ। उसकी प्रारंभिक शिक्षा लिंज नामक स्थान पर हुई। पिता की मृत्यु के पश्चात् 17 वर्ष की अवस्था में वे वियना गया । कला विद्यालय में प्रविष्ट होने में असफल होकर वो पोस्टकार्डों पर चित्र बनाकर अपना निर्वाह करने लगा । इसी समय से वो साम्यवादियों और यहूदियों से घृणा करने लगा ।1918 ई. में उसने नाजी दल की स्थापना की। इसका उद्देश्य साम्यवादियों और यहूदियों से सब अधिकार छीनना था। इसके सदस्यों में देशप्रेम कूट-कूटकर भरा था। इस दल ने यहूदियों को प्रथम विश्वयुद्ध की हार के लिए दोषी ठहराया। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण जब नाजी दल के नेता हिटलर ने अपने ओजस्वी भाषणों में उसे ठीक करने का आश्वासन दिया तो अनेक जर्मन इस दल के सदस्य हो गए। हिटलर ने भूमिसुधार करने, वर्साई संधि को समाप्त करने, और एक विशाल जर्मन साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य जनता के सामने रखा जिससे जर्मन लोग सुख से रह सकें। इस प्रकार 1922 ई. में हिटलर एक प्रभावशाली व्यक्ति के रूप मे स्थापित हो गया । उसने **स्वस्तिक** को अपने दल का चिह्र बनाया जो कि हिन्दुओ का शुभ चिह्र है। समाचारपत्रों के द्वारा हिटलर ने अपने दल के सिद्धांतों का प्रचार जनता में किया। भूरे रंग की पोशाक पहने सैनिकों की टुकड़ी तैयार की गई। 1923 ई. में हिटलर ने जर्मन सरकार को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न किया। इसमें वह असफल रहा । और जेलखाने में डाल दिया गया । वहीं उसने मीन कैम्फ (“मेरा संघर्ष”) नामक अपनी आत्मकथा लिखी। इसमें नाजी दल के सिद्धांतों का विवेचन किया। उसने लिखा कि आर्य जाति सभी जातियों से श्रेष्ठ है और जर्मन आर्य हैं। उन्हें विश्व का नेतृत्व करना चाहिए। यहूदी सदा से संस्कृति में रोड़ा अटकाते आए हैं। जर्मन लोगों को साम्राज्यविस्तार का पूर्ण अधिकार है। फ्रांस और रूस से लड़कर उन्हें जीवित रहने के लिए भूमि प्राप्ति करनी चाहिए।

1930-32 में जर्मनी में बेरोज़गारी बहुत बढ़ गई। संसद् में नाजी दल के सदस्यों की संख्या 230 हो गई। 1932 के चुनाव में हिटलर को राष्ट्रपति के चुनाव में सफलता नहीं मिली। जर्मनी की आर्थिक दशा बिगड़ती गई और विजयी देशों ने उसे सैनिक शक्ति बढ़ाने की अनुमति की। 1933 में चांसलर बनते ही हिटलर ने जर्मन संसद् को भंग कर दिया, साम्यवादी दल को गैरकानूनी घोषित कर दिया और राष्ट्र को स्वावलंबी बनने के लिए ललकारा। हिटलर ने ”डॉ. जोज़ेफ गोयबल्स” को अपना प्रचारमंत्री नियुक्त किया। नाज़ी दल के विरोधी व्यक्तियों को जेलखानों में डाल दिया गया। कार्यकारिणी और कानून बनाने की सारी शक्तियाँ हिटलर ने अपने हाथों में ले ली। 1934 में उसने अपने को सर्वोच्च न्यायाधीश घोषित कर दिया। उसी वर्ष हिंडनबर्ग की मृत्यु के पश्चात् वे राष्ट्रपति भी बन बैथा । नाजी दल का आतंक जनजीवन के प्रत्येक क्षेत्र में छा गया। 1933 से 1938 तक लाखों यहूदियों की हत्या कर दी गई। नवयुवकों में राष्ट्रपति के आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करने की भावना भर दी गई और जर्मन जाति का भाग्य सुधारने के लिए सारी शक्ति हिटलर ने अपने हाथ में ले ली।हिटलर ने 1933 में राष्ट्रसंघ को छोड़ दिया । यूरोप की धरती पर कत्लेआम मचा कर हिटलर को सबसे ज्यादा क्रूर आदमी के रूप में जाना गया। हिटलर नाम दुष्टता का पर्याय बन गया। प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सैनिकों ने एक घायल जर्मन सैनिक की जान बख्श दी थी। वह खुशनसीब सैनिक एडोल्फ हिटलर ही था, जिसने चुन-चुन के यहूदियों को कत्लेआम किया। वहीं, सिर्फ चार साल की उम्र में एक पादरी ने हिटलर को डूबने से बचाया था। द्वितीय विश्व युद्ध के यातना गृह के बारे में सभी जानते हैं। यहां यहूदी लोगों को इकट्ठा कर गैस चैंबर में ठूस दिया जाता था। यह आश्चर्य की बात है कि हिटलर ने इन यातनागृहों का कभी भी दौरा नहीं किया। भले ही द्वितीय विश्व युद्ध में यूरोप की धरती को यहूदियों के खून से लाल कर दिया गया हो, लेकिन हिटलर का पहला प्यार एक यहूदी लड़की ही थी। तब वह इतना साहस भी नहीं बटोर पाया कि उससे अपनी दिल की बात कह सके। इतना कत्लेआम मचाने के बाद भी हिटलर शुद्ध रूप से शाकाहारी था। इतना ही नहीं, उसने पशु क्रूरता के खिलाफ एक कानून भी बना दिया। वहीं, हिटलर अमेरिकी कार निर्माता हेनरी फोर्ड से बहुत ज्यादा प्रभावित था। इसलिए वह अपनी डेस्क के पीछे उनकी तस्वीर लगा कर रखता था। हिटलर पेट फूलने की समस्या से ग्रस्त था। इसके लिए वह 28 तरीके की दवाइयां लेता था। इतना ही नहीं, वह 80 तरह की नशीली दवाओं (ड्रग्स) का लती भी था। इनमें एम्फैटेमिन का कॉकटेल, बैल का वीर्य, चूहे मारने वाली दवाई और मॉर्फिन हिटलर को अत्यधिक पसंद थी। इसमें कोई शक नहीं कि 80 तरीके की नशीली दवाओं का उपयोग हिटलर अपनी सेक्स ताकत बढ़ाने के लिए करता था। लेकिन कि हिटलर के पास सिर्फ एक ही अंडकोष था। एंटी स्मोकिंग कैम्पेन (धूम्रपान विरोधी अभियान) के आधुनिक इतिहास में पहली बार हिटलर ने सार्वनिक रूप से धूम्रपान के खिलाफ कैम्पेन का आगाज किया।॥

ब्रिटेन के अधीनता एवं नये राष्ट्र का उदय…… …
सन् 1917 में ब्रिटिश सेनाओं ने इस पर अधिकार कर लिया ।यह भी घटना इंग्लैंड कि सोची समझी राजनीति कि एक कड़ी थी 2 नवंबर, सन् 1917 को ब्रिटिश विदेश मंत्री बालफ़ोर ने यह घोषणा की कि ”इज़रायल” को ब्रिटिश सरकार यहूदियों का धर्मदेश बनाना चाहती है। जिसमें सारे संसार के यहूदी यहाँ आकर बस सकें ।ब्रिटेन के मित्रराष्ट्रों ने इस घोषण की पुष्टि की अर्थार्त समर्थन किया । इस घोषणा के बाद से इज़रायल में यहूदियों की जनसंख्या निरंतर बढ़ती गई और बढ़ती गई । लगभग 21 वर्ष बाद (दूसरे विश्वयुद्ध) के पश्चात् मित्रराष्ट्रों ने सन् 1948 में एक इज़रायल नामक यहूदी राष्ट्र की विधिवत् स्थापना कि घोषणा की । सन्‌ 1948 ई. से पहले फिलिस्तीन (इज़रायल जिसका आजकल एक भाग है) ब्रिटेन के औपनिवेशिक प्रशासन के अंतर्गत एक अधिष्ठित (मैनडेटेड) क्षेत्र था। यहूदी लोग एक लंबे अरसे से फिलिस्तीन क्षेत्र में अपने एक निजी राष्ट्र की स्थापना के लिए प्रयत्नशील थे । इसी उद्देश्य को लेकर संसार के विभिन्न भागों से आकर यहूदी फिलिस्तीनी इलाके में बसने लगे। अरब राष्ट्र भी इस स्थिति के प्रति सतर्क थे। फलत: 1947 ई. में अरबों और यहूदियों के बीच युद्ध प्रारंभ हो गया। 14 मई, 1948 ई. को अधिवेश (मैनडेट) समाप्त कर दिया गया और इज़रायल नामक एक नए देश अथवा राष्ट्र का उदय हुआ । युद्ध जनवरी, 1949 ई. तक जारी रहा। न तो किसी प्रकार की शांतिसंधि हुई, न ही किसी अरब राष्ट्र ने इज़रायल से राजनयिक संबंध स्थापित किए। अलबत्ता संयुक्त राष्ट्रसंघीय युद्धविराम–पर्यवेक्षक–संगठन इस क्षेत्र में शांति स्थापना का कार्य करता है । एक दूरगामी निष्कर्ष के लिए ।

सन्‌ 1957 में इज़रायल ने पुन: ब्रिटेन तथा फ्रांस से मिलकर स्वेज की लड़ाई में गाजा क्षेत्र में अधिकार कर लिया ( गज़ापट्टी का इतिहास तो 1948 में इस्राइल के निर्माण के साथ शुरु होता है पर इस क्षेत्र के सम्पूर्ण इतिहास के लिए इसरायल का इतिहास देखा जा सकता है । 1948 में इसरायल के निर्माण के बाद यहाँ बसे अरबों के लिए अर्मिस्टाइस रेखा बनाई गई जो ब्रिटानिया सरकार की दें थी के तहत गजा पट्टी में अरब, जो सुन्नी मुस्लिम हैं, रहेंगे तथा यहूदी इसरायल मे रहेंगे । 1948 से लेकर 1967 तक इसपर मिस्र का अधिकार था पर 1967 के छःदिनी लड़ाई में, जिसमें इसरायल ने अरब देशों को निर्णायक रूप से हरा दिया, इसरायल ने मिस्र से यह पट्टी भी छीन ली जिसके बाद से इसपर इसरायल का नियंत्रण बना हुआ है 2005 में इसरायल ने फ़िलीस्तीनी स्वतंत्रता संस्था के साथ हुए समझौते के तहत ग़ज़ा और पश्चिमी तट से बाहर हट जाने का फेसला किया । साथ ही इसरायल ने ग़ज़ा तथा पश्चिमी तट परस्हदीबस्तियों को भी हटाने का काम शुरु किया । २००७ में हुए चुनाव में *हमास* ने इसकी सत्ता हथिया ली जो इसरायल और संयुक्त राष्ट्र सहित कई देशों के अनुसार एक आतंकवादी संगठन है । हमास ने पश्चिमी तट पर स्थित अरबों से भी सम्पर्क तोड़ लिया जो 1948 में इसरायल के निर्माण का ही परिणाम हैं और इस कारण गजावासियों से अब तक जुड़े हुए थे । यह भी एक दिलचस्प वाक्य है जिसे अगले लेख मेन स्पस्ट करूंगा ,)। परंतु राजनीतिक कारण के चलते, संयुक्त राष्ट्रसंघ के आज्ञानुसार उसे इस भाग को अंतत: छोड़ना पड़ा। प्रथम युद्ध एक प्रकार से समाप्त हो गया, लेकिन अप्रत्यक्ष तनातनी बनी रही ।

1967 ई. में स्थिति बहुत खराब हो गई और इज़रायल-सीरिया-सीमाक्षेत्र में हुई झड़पों के बाद मिस्र ने इज़रायल की सीमा पर अपनी सेना बड़ी संख्या में तैनात कर दी। राष्ट्रसंघीय पर्यवेक्षक दल को निष्कासित कर दिया गया और रक्तसागर में इज़रायल की जहाजरानी पर मिस्र द्वारा रोक लगा दी गई। 5-6 जून की रात्रि को इज़रायल ने मिस्र पर जमीनी और हवाई आक्रमण शुरू कर दिए। जार्डन भी इज़रायल के विरुद्ध युद्ध में सम्मिलित हो गया और सीरिया की सीमाओं पर भी लड़ाई जारी हो गई। 11 जून को राष्ट्रसंघ द्वारा की गई युद्धविराम की अपील लगभग सभी युद्धरत राष्ट्रों ने स्वीकार कर ली। लेकिन इस समय तक इज़रायल गाज़ा पट्टी, स्वेज़ नहर के तट तक सिनाई प्रायद्वीप के भूभाग, जार्डन घाटी तक जार्डन के भूभाग, जेरूसलम तथा गैलिली सागर के पूर्व में स्थित सीरिया के गालन नामक पर्वतीय भाग (जिसमें क्यूनेत्रा नामक नहर भी है) पर अधिकार कर चुका था ।एक राजनीतिक निर्णय के अनुसार जेरूसलम को तत्काल इज़रायल का अभिन्न अंग घोषित कर दिया गया, लेकिन शेष विलित इलाके को ‘अधिकृत क्षेत्र’ के रूप में ही रखा गया।आज फ़्रांसिसी साम्राज्यवादी भेड़ियों की बमबारी में आइसिस के बजाए चुन चुनकर रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया जा रहा है l भारी संख्या में छोटे छोटे बच्चों के मारे जाने की खबरें आ रहीं हैं । अब इसके बावजूद भी आप पूर्वाग्रह से पीड़ित हैं की मुसलमान आतंकवादी हैं तो रहिए ग्रसित भस्म होना आपकी नियतती है ।