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अफ़ज़ल ख़ान

जब तक हम इतिहास का ध्यानपूर्वक समीक्षा न लें हम इस विवाद की पृष्ठभूमि समझने में कभी सफल नहीं हो सकते . फ़िलिस्तीन में यहूदी लोगों आगमन लगभग 1250 साल ईसा पूर्व होती है . यूं फ़िलिस्तीन सदियों तक यहूदियों और फलसटियनों का संयुक्त देश रहा है . सातवीं शताब्दी में उसे अरबों ने जीत लिया . उसकी बाद फिलिस्तीन लगभग पांच सदियों तक राशदीन , उमवी , अब्बासी और फातमी खिलाफत में अरब साम्राज्य का हिस्सा रहा और इसके बाद यह तुर्क के अधीन आ गया . अरब अवधि में अधिकांश फिलीस्तीनी ईसाई से मुसलमान हुए लेकिन यहूदी अपने धर्म पर कायम रहे . हर कोई भी यहूदी को अपने यहा बसता देखना पसंद नहीं करता था . उसकी पहली वजह यह थी कि कैथोलिक ईसाई उन्हें मसीहा का हत्यारा समझते थे और दूसरा कारण यह है कि तेज व्यापार और वैज्ञानिक दिमाग के कारण बहुत जल्दी अपनी आप को आर्थिक रूप से इतना मजबूत कर लेते थे और स्थानीय लोग उनसे ईर्ष्या करना शुरू कर देते थे .

प्रथम विश्व युद्ध में तर्क राज्य तुर्क केंद्रीय शक्तियों या Central Powers का सहयोगी था कि जर्मनी और ऑस्ट्रिया , हंगरी के गठबंधन में शामिल था . युद्ध में अरब विद्रोह के परिणामस्वरूप 1916 यतक पूरी मध्य पूर्व के साथ फिलिस्तीन राज्य भी राज्य तुर्क के हाथ से जाता रहा . अंततः 1918 यमें प्रथम विश्व युद्ध केंद्रीय शक्तियों की हार पर समाप्त हुई . 1916 यमें Sykes – Picot समझौते के तहत फिलिस्तीन , जॉर्डन और इराक कोबर्तानवी जनादेश जबकि लेबनान और सीरिया कोफ़्रानस के जनादेश दिया जाना तय पाया जो एक निश्चित अवधि में मुक्त देशों में वहां के स्थानीय लोगों सौंप दिया जानाथा . 1917 में ब्रिटिश विदेश सचिव आर्थर बीलतुर एक फिलिस्तीन राज्य स्थापना का प्रस्ताव जो अरबों और यहूदियों का संयुक्त देश बन सके . यह घोषणा Balfour Decleration कहलाता है . जिसे विभिन्न मामलों में पहली लीग ऑफ नेशन और बाद में UNO का समर्थन मिला . इस घोषणा में कहा गया है कि दुनिया भर से यहूदी निवासियों फिलिस्तीन हस्तांतरण और फैलाने खानाबदोश अरब समूहों फलस्न में नागरिकता लेने तथा धार्मिक व नागरिक स्वतंत्रता और धार्मिक सहिष्णुता को प्रोत्साहित किया जाएगा .

फिलिस्तीनी राज्य के लिए जो क्षेत्र पता चलता इसमें वर्तमान इसराइल , पश्चिमी पट्टी और गाजा के अलावा नदी जॉर्डन के पूर्व का वह क्षेत्र भी शामिल था जो अब जॉर्डन राज्य कहलाता है . यह क्षेत्र अपनी भौगोलिक दृष्टि से वर्तमान शाम कल क्षेत्र या इराक के आधे क्षेत्र के बराबर था . ब्रिटिश जनादेश फिलिस्तीन को वह अधिकार दिए जो उन्हें राज्य तुर्क ने वंचित रखा था . राज्य तुर्क के सौ साल दमनकारी तर्क गुलामी ने फिलिस्तीनियों को इतना कुचला था कि वह बहुत पिछड़ेपन और अशिक्षा का शिकार जिप्सी जीवन गुजार रहे थे . उन्हें तर्क और अन्य अरब कौमें एक पृथक राष्ट्रीय हतयत न देखती थीं . ब्रिटेन दी गई इस नई नागरिक स्वतंत्रता से फिलिस्तीनियों ने एक्सेल के साथ लाभ उठाया .

फ़िलिस्तीन और अन्य अरब देशों ने लीग ऑफ नेशन ( League of Nations संयुक्त राष्ट्र या UNO पहली देशों के संगठन का नाम था) के यहूदियों फिलिस्तीन हस्तांतरण का फैसला मानने से इनकार कर दिया .1918 में पेरिस में होने वाले विश्व शांति सम्मेलन में अरब प्रतिनिधि ने कहा “या तो हम यहूदियों को समुद्र में धकेल देंगे या वे हमें सेहरा वापस भेजें . ” यरूशलेम के फिलीस्तीनी नेता आरिफ पाशा रजानी ने कहा कि ” यहूदियों साथ रहना अरबों असंभव है . वह जहां कहीं भी बस रहे हैं वे वहाँ अवांछित लोग हैं . क्योंकि वे जहां भी जाते हैं वहां स्थानीय लोगों का आर्थिक रूप से खून चूसती है . अगर लीग ऑफ नेशन ने उनकी प्रवास को न रोका तो फ़िलिस्तीन में उनके खून की नदी बहा दिए जाएंगे . ” लीग ऑफ़ नेशन ने अपनी प्रस्ताव पर अमल जारी रखा . हालांकि अरब प्रतिरोध के कारण यहूदियों फिलिस्तीन की ओर पलायन की प्रक्रिया बहुत धीमी हो गया .

उसकी बाद 1940 के दशक के मध्य तो यहूदियों सिर पर कई कयामतें लेकर आई . उनकी साथ नाजी यूरोप में अत्याचार किया जिनके उल्लेख मानवता कांप उठती है . लेकिन उनका ज़िक्र हमारी यहाँ कभी नहीं होता . . इन घटनाओं इसराइल राज्य के गठन को अनिवार्य बनाने का सबब बने . फ़िलिस्तीन की पहली वितरण: ऐतिहासिक फिलिस्तीन का क्षेत्र नदी जॉर्डन के दोनों पक्षों की भूमि शामिल था . प्रारंभिक बीलतुर घोषणा के समय फिलिस्तीन का क्षेत्र लगभग वर्तमान शाम क्षेत्रफल के बराबर व्यापक था , जबकि यहां की कुल आबादी दस लाख स कुछ अधिक शामिल थी जो लगभग 10 प्रतिशत यहूदी लोग थे . इस लिहाज से यह एक गैर आबाद और पिछड़े क्षेत्र था जहां अगर किसी चीज़ की भरमार थी तो वह जमीन थी . हमारे यहाँ अक्सर लोग इसराइल ब्रिटेन पैदा की एक प्रलोभन साबित करने की कोशिश करते हैं

1921 में मध्य पूर्व के इतिहास में एक ऐसी घटना घटी जो अरब देशों और खुद फिलिस्तीनियों की फ़िलिस्तीन की संप्रभुता आंदोलन से प्रेम का पर्दा चाक करता है . राज्य तुर्क के अधीन पालन फिलिस्तीन का नदी जोर्डन के पूर्वी क्षेत्र Vilayet of Syria का एक हिस्सा था . प्रथम विश्व युद्ध के अंत में ब्रिटेन के युद्ध सहयोगी हजाज़ के हाकिम हुसैन शरीफ ( शरीफ मक्का) की बेटी अमीर फैसल ने सीरिया में हाशमी राज्य घोषित किया और यहां से Greater Syria आंदोलन शुरू भी हुआ . फलस्नीी नेता अमीन लहसीनिय इस आंदोलन का समर्थक था . इस आंदोलन के सिद्धांत के अनुसार सभी फिलिस्तीन सहित नदी जॉर्डन दोनों किनारों क्षेत्रों शाम का एक प्रांत होना चाहिए था . लेकिन युद्ध अंत से पहले ही सहयोगी देशों के धर्मी न होने वाली Sykes – Picot समझौते के अनुसार शाम को फ्रांस के जनादेश दिया जाना तय हो चुका था . इस समझौते का सम्मान करते हुए ब्रिटेन ने 1920 में शाम को फ्रांस जनादेश के हवाले कर दिया और अमीर फैसल के स्थापित किए हुए सिंहासन शाम ( Hashemite Kingdom of Syria ) का समर्थन करना माफी गए . फ्रांस निर्धारित समय में शाम सीरियाई नागरिकों के हाथों सौंपना चाहता था . उसने द्वीप नुमा अरब के अमीर को वहाँ शासक स्वीकार नहीं किया और Maysalun की लड़ाई में अमीर फैसल को हरा कर उसकी बादशाहत को खत्म कर दिया . फ़िलिस्तीन ब्रिटिश जनादेश का हिस्सा था . अरब हाकिमों ने ब्रिटेन पर जोर डाला कि वह अमीर फैसल को Transjordania का शासक बना दें .

जैसा कि हम उल्लेख कर चुके हैं मुख्य बीलतुर घोषणा के अनुसार फिलिस्तीन की प्रस्तावित राज्य में नदी जोर्डन के पूर्वी तट क्षेत्र शामिल होना था जो कि उस समय Transjordania कहलाता था और फिलिस्तीनियों और यहूदियों का संयुक्त देश होना था . अब अरब देशों के दबाव में आकर ब्रिटेन फिलिस्तीन की पहली वितरण और 1921 में Emirate of Transjordan नाम से एक इमारत बनाकर अमीर फैसल को वहाँ शासक बना दिया ( बाद में अमीर फैसल को इराक का और उसके भाई अब्दुल्ला को पार जोर्डन के शासक बनाया गया ) . 1946 में यह इमारत जोर्डन के राज्य में तब्दील हो गई .1951 यतक यह एक British Protectorate रहे और बाद में एक स्वतंत्र राज्य की शक्ल अख्तियार गई . ऐतिहासिक जॉर्डन कभी भी कोई अलग हतयत नहीं रही . वर्तमान जॉर्डन क्षेत्र हमेशा फ़िलिस्तीन का हिस्सा रहा था ( प्रथम विश्व युद्ध के दौरान Transjordania का दक्षिण क्षेत्र हजाज़ की इमारत में शामिल कर लिया गया था ) . फ़िलिस्तीन यह विभाजन जो अरब देशों ाीमापर हुई कई लिहाज से अद्भुत था . इस विभाजन के तहत फ़िलिस्तीन का लगभग दो तिहाई हिस्सा Transjordan को दी गई . न केवल यह कि अरब देशों पूरी तरह से वितरित समर्थक बल्कि उसकी संस्थापक थे , फिलिस्तीनी नेताओं को भी इस विभाजन पर कोई परेशानी नहीं हुई . अमीन ालहसीनिय जैसे फिलीस्तीनी आंदोलन के ठेकेदार ने उफ़ तक न की. बात सिर्फ इतनी थी कि यहां पर फ़िलिस्तीन को हथियाने वाले ख़ुद मुसलमान थे . फलसटियनयत सारा जुनून तो यहूदी खिलाफ ही जोश मारता है . यह घटना फ़िलिस्तीन राष्ट्रवाद के डखकोसले की कलई खोल देता है .

फ़िलिस्तीन की पहली विभाजन पर किसी फिलिस्तीनी कान पर जूं तक न रेंगी . जॉर्डन राज्य सिर्फ फ़िलिस्तीन के बड़े हिस्से यानी पूर्वी तट क्षेत्र में स्थापित होना पर संतोष नहीं किया बल्कि 1948 में उसने फिलीस्तीनियों से अपनी ज्यादा सहानुभूति व्यक्त इस प्रकार पश्चिमी किनारे की पट्टी ( West Bank ) पर कब्जा करके बैठ गया जो 1967 यतक निरंतर .1948 से शुरू होने वाली अरब आक्रामकता और इसराइल के हाथों पराजयों के परिणामस्वरूप लगभग 400,000 बेघर फिलिस्तीनी लोगों ने अपने भाई इस्लामी देश जॉर्डन में शरण ली . जॉर्डन ने अपनी मुस्लिम अरब भाइयों आतिथ्य कुछ यूं कि उन्हें शहरों में आने से रोके रखा और सीमा सहराई क्षेत्रों तक सीमित कर दिया . जॉर्डन सरकार और फिलिस्तीनी प्रवासियों की बीच मतभेद बढ़ते चले गए . 1969-70 में फिलिस्तीनी आतंकवादियों ने कई जॉर्डन विमान अपहरण करके नष्ट कर दिया. सितम्बर 1970 में जॉर्डन सेना Ajlam और Jarash स्थानों पर कई हजार फिलीस्तीनियों का नरसंहार किया ( एक अनुमान के अनुसार मरने वालों की संख्या 25,000 से अधिक थी ) .

अधिकांश फिलीस्तीनी प्रवासियों को लेबनान में धकेल दिया गया . एक पाकिस्तानी बरगीडीर इस नरसंहार में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया . इस बरगीडीर नाम ज़यायालहक था जिसने बाद में पाकिस्तानी सेना प्रमुख के पद तक तरक्की पाई और सत्ता पर कब्जा करके देश का राष्ट्रपति बना . लेकिन जोर्डन और खुद पाकिस्तानी सेना हाथों फिलिस्तीनियों के नरसंहार का कितने पाकिस्तानियों को पता है ? भला मुसलमान ही मुसलमान का हत्यारा कैसे हो सकता है ? मुसलमान का हत्यारा तो नास्तिक है हो सकता है . वास्तव में इस्राएल के राज्य और जॉर्डन दोनों फ़िलिस्तीन का हिस्सा थे . फिलिस्तीनी अपनी पैतृक भूमि पर शरणार्थी बनकर रह गया, यह इस्लामी अरब भाईचारे का फल . जोर्डन फिलिस्तीनी स्वायत्त राज्य का कितना बड़ा समर्थक है, इसका अंदाज़ा जॉर्डन के राजा हसन अब्दुल्ला 1981 यके इस ऐतिहासिक बयान से हो सकता है ” फिलिस्तीन जॉर्डन और जॉर्डन फ़िलिस्तीन, फ़िलिस्तीन की अलग से कोई हैसियत नहीं . ”

नोट- फिलीस्तीन का इतिहास लिखने का मक़सद ये बताना है के अरब मुल्को के शासको की साजिश ने ही फिलीस्तीन को बेघर किया है. जब इसराएल ने देखा के अरब मुल्को की तरफ से कोई मदद नही है तो उस ने भी फिलीस्तीने के जमीनो पे क़ब्ज़ा और फिलीस्तीनियो पे जुल्म शुरु कर दिया जो के जगजाहिर है।