kashmiri-pandits

इरफान नबी गनी सिर्फ 18 साल का था। बच्चा ही था। गायों को चराता था अचानक उसके पिता को उसकी लाश मिली जिसके सर पर भारतीय सेना ने बीचोंबीच गोली मारी और सर फटकर उसका भेजा बाहर आ गया यह घटना जून 2013 की है । कैसा होता होगा अपने बेटे के दिमाग को लोथड़े के रूप में जमीन पर गिरा देखना ? इरफान का कसूर ? वह भारत के एक ऐसे राज्य में रहता था, जहां सेना जब चाहे, जो चाहे कर सकती है।

28 जून 2013 को कश्मीर के बांदीपुरा में रविवार को दो युवक सेना की गोलीबारी में मारे गए थे तो 30 जुलाई को कश्मीर पूरा बंद था , शेष भारत जैसा नहीं कि दुकान का शटर आधा गिराकर दुकानदार चुपचाप अंदर बैठे रहते हैं और सामान बेचते रहते हैं बल्कि बियाबान सन्नाटा था पूरे काश्मीर में ।सेना ने बांदीपुरा की घटना के लिए माफी मांगी ली , इससे पहले भी कई बार मांगी है लेकिन वह ऐसा आगे भी करती रही है माफी मांगती रही है और जब हत्या करके माफी मांगने भर से काम चलने लगे तो समझ लेना चाहिए कि तानाशाही अपनी हदें पार कर रही है। क्या सेना के इस रवैये को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज करते रहें कि कश्मीर में आतंकवाद है ? आतंकवाद है तो क्या मासूमों के कत्ल की सजा सिर्फ एक “माफी” है?

साल 2008 तक कश्मीर में 2000 से ज्यादा कब्रें बरामद हुई थीं। इस तरह की कब्रें दूसरे विश्व युद्ध के बाद मिला करती थीं जब हिटलर ने लाखों लोगों को कत्ल किया था।

कश्मीर को भारत अभिन्न अंग मानने वालों का खून ऐसी घटनाओं पर खौलता क्यों नहीं ? इरफान नबी गनी भारत का ही नागरिक था ना ? इस तरह एक मासूम भारतीय की मौत पर हमें गुस्सा क्यों नहीं आता ? हम मोमबत्तियां लेकर भारतीय सेना के खिलाफ सड़कों पर विद्रोह करते नजर क्यों नहीं आते ? दरअसल संघ ने जिस तरह औरंगज़ेब को हिन्दुओं के झूठे कत्लेआम का एक सबसे बड़ा हत्यारा बना दिया वैसे ही झूठ का सहारा लेकर काश्मीर के पंडितों की हत्याओं को आज़ाद भारत का सबसे बड़ा नरसंहार बना दिया और अपने समर्थकों के हृदय में यह भर दिया कि काश्मीर में मुसलमानों ने पचासों लाख काश्मीरी पंडितों को वहाँ से भगा दिया जो इधर उधर भटक रहे हैं और लाखों काश्मीरी पंडितों की हत्याएं कर दी ।जो विषय काश्मीर में एक समग्र आतंकवाद का था उसे हिन्दू और मुसलमानों में बांट कर काश्मीरी मुसलमानों को भारत से दूर कर दिया और वही काश्मीरी अब वह पाकिस्तान और आईएसआईएस का झंडा लहरा रहे हैं ।

इस लेख को लिखने का आशय उस सच को सामने लाना था जो संघ के लोग हर समय काश्मीरी पंडितों पर हुए अन्याय और कत्लेआम को शेष भारत के मुसलमानों के सामने रखकर उन्हें गालियाँ देना शुरु कर देते हैं ।इस लेख को लिखने के लिए जब मैने तथ्यों की पड़ताल करने के लिए गुगल किया तो हैरान रह गया देख कर कि काश्मीरी पंडितो की हत्या से संबंधित लगभग सैकड़ों भगवा वेबसाइट्स गलत आंकड़ों और तथ्यों के साथ किस तरह समाज में गलत तस्वीरें पैदा कर रही हैं और अधिकांश वेबसाइट एक ही लेखों और आंकड़ों के साथ झूठा प्रपंच फैला रही हैं , वेबसाइटों के नाम अलग अलग और उसपर उपलब्ध सामग्री सब एक जिसमें एक मात्रा का भी अंतर नहीं। उनके नामों से ही लगता है कि वह किस गिरोह की वेबसाइट्स हैं और किस उद्देश्य से हैं।

1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार भाजपा और वाम मोर्चा के सहयोग से बनती है और आज जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद तब भारत के गृहमंत्री बन जाते हैं , उनकी बेटी डाक्टर रूबिया सईद का आतंकवादी अपहरण कर लेते हैं तब देश को काश्मीर के आतंकवाद का पता चलता है , गृहमंत्री की बेटी देश से महत्वपूर्ण साबित हुई और विश्वनाथ प्रताप सिंह की नपुंसक सरकार काश्मीर के तब तक के सबसे बड़े पाँच आतंकवादियों को छोड़कर गृहमंत्री की लाडली की रिहाई कराती है , फिर हजरत बल दरगाह पर कब्ज़ा करके पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने देश को काश्मीर के आतंकवाद की ओर ध्यान दिलाया ।नरेन्द्र मोदी के पहले भारत में जगमोहन को मुसलमानों का सबसे बड़ा दुश्मन समझा जाता रहा है और वह इसलिए कि संघी जगमोहन संजय गांधी के गुंडा ब्रिगेड में टाप पर थे और दिल्ली के तुर्कमान गेट के झुग्गीवासियों पर जनरल डायर की तरह गोली चलवाकर जगमोहन ने 150 लोगों से अधिक को मृत्यु के काल में पहुंचा दिया था और 70000 से अधिक लोगों को बेघर कर दिया था ।संघ और भाजपा के दबाव में संघ के चहेते उसी जगमोहन को काश्मीर में राज्यपाल बनाकर भेजा गया और आतंकवाद प्रभावित काश्मीर को उन्होंने समग्र रूप से देखने की बजाए हिन्दू मुस्लिम के आधार पर विभाजित कर दिया ।पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की चपेट में सब आए सब मारे गये , कहीं काश्मीरी पंडित तो कहीं काश्मीरी मुस्लिम , हिन्दू भी मरे तो मुस्लिम भी मरे पर जगमोहन ने दोगलापन दिखाते हुए काश्मीर की घाटी से काश्मीरी पंडितों को सुरक्षित बाहर निकालने का काम शुरू कर दिया और संघ ने काश्मीरी पंडितों की लाशों को गिनना शुरु कर दिया जिससे पूरे भारत में बरगला कर ज़हर फैलाया जा सके , मुस्लिम काश्मीरी वहीं आतंकवाद से मरने के लिए छोड़ दिये गये ।दरअसल काश्मीर के आज की स्थिति के लिए जिम्मेदार जगमोहन ही है जिसने मुसलमानों से नफरत के कारण घाटी को निर्दोष लोगों के खून से लाल कर दिया और यह आजतक होता आ रहा है 2009 तक विकीपीडिया के अनुसार 47000 काश्मीरी मारे जा चुके हैं ( लिंक देखिए ) और इस 47000 में काश्मीरी पंडितों की संख्या कुल 209 मात्र है जिसमें 7 काश्मीरी पंडित संग्रामपुरा 21-22 मार्च 1997 , 25 जनवरी 1998 को वंधमा में 23 काश्मीरी पंडित , और नदीमार्ग में 25 जनवरी 1998 को 24 काश्मीरी पंडित मारे गये , बाकी जो हैं वह अलग अलग घटनाओ में मारे गये और यह आंकड़े “दी हिन्दू” और “इकनॉमिक्स टाईम्स” के दिए आंकड़ों के अनुसार हैं कोई मनगढंत आंकड़े नहीं हैं हालाकि 46600 अन्य मुसलमानों के मारे जाने की कोई चर्चा कहीं नहीं होती ।काश्मीरी विस्थापितों के संगठन “काश्मीर पंडित संघर्ष समिति” के अध्यक्ष संजय टिकू के अनुसार इन 20-25 वर्षों में काश्मीरी पंडितों की 399 तो प्रमाणित हत्याएं हुईं और यदि अप्रामाणित को भी जोड़ दें तो अधिकतम 600 काश्मीरी पंडितों की आतंकवादियों ने हत्याएं की जबकि इतने वर्षों में कुल लगभग 47000 ( 2009 तक ) हत्याएं काश्मीर में हुईं तो 46400 लोग कौन थे जिनको मारा आतंकवादियों ने ? निश्चित रूप से मुस्लिम थे।टिक्कू काश्मीरी पंडितो के 3000 या 4000 की हत्या होने की अफवाहों को सिरे से खारिज करते हैं ।( लिंक देखिए ) ।

दरअसल संघ की अफवाहबाज टीम ने ऐसा प्रचारित कर दिया कि काश्मीर में केवल काश्मीरी पंडित ही मारे गये और यह मुसलमानों ने किया कि घाटी खाली हो जाए तो जो 46400 लोग मारे गये वह किस लिए ? क्या खाली करने के लिए ?

kashmiri-pandits-1जम्मू कश्मीर की सरकार के अनुसार मृतक काश्मीरी पंडितों के 399 परिवारों को लगभग 40 करोड़ का मुआवजा दिया जा चुका है ( लिंक देखिए ) । जगमोहन ने मुसलमानों को आतंकवाद से मरने के लिए छोड़ कर एक लाख चालिस हजार जो काश्मीरी पंडितों को घाटी से निकाला ( लिंक देखिए ) वह सरकारी मदद मुआवजे और पुनर्वास का सरकारी लाभ लेकर अपने अपने जगह पूरे भारत में या विदेशों में “सेट” हो गये हैं और सरकार की तमाम मदद और काश्मीर में फ्लैट देने के बावजूद भी वहां जाना नहीं चाहते क्योंकि वह यहीं रह कर सुखी हैं और काश्मीरी विस्थापितों के नाम पर मिल रहे सरकारी मदद को खाना चाह रहे हैं जैसे 84 के दंगों के प्रभावितों को सदैव कुछ ना कुछ मिलता रहता है ।ध्यान रहे कि केन्द्र सरकार ने सैकड़ों करोड़ का धन केंद्रीय बजट में इनके लिए दिया है ।कभी सुना है गुजरात मेरठ मलियाना हाशिमपुरा मुजफ्फरपुर कानपुर मुम्बई सूरत के दंगों में मारे गये परिजनों के लिए बजट मे एलोकेशन ? या रणवीर सेना के द्वारा बाथे लक्षमणपुर में 60 दलितों की हत्या हुई उनके परिजनों के लिए कोई एलोकेशन ? तब तो एक तरफ दंगा चलता रहा दूसरी तरफ सैफई में माधुरी दीक्षित ठुमके लगाकर सबका मनोरंजन करती रहीं । यही है दोगलापन । ध्यान दीजिये कि यदि देश सिर्फ काश्मीरी पंडितों के लिए रोता रहेगा और काश्मीर के अन्य लोगों को इग्नोर करता रहेगा तो हम कश्मीरियों को ना कभी अपना बना सकते हैं ना काश्मीर को बचा सकते हैं । जब मैं काश्मीर गया था तो एक काश्मीरी मुस्लिम ने मुझसे कहा था कि आप हिन्दू हो या मुस्लिम हम कश्मीरियों को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमारे घर से जब लाशें उठती हैं तो जो हमारे साथ हिन्दुस्तान का हिन्दू जो बर्ताव करता है वही आप जैसे मुसलमान , आप भी वही हो मेरे लिए जो हिन्दू है मेरे लिए ।

मेहरबानी करके मेरे सवालों के जवाब अब आगे कश्मीरी पंडितों का नाम लेकर मत दीजिएगा। कश्मीर में अब तक पिछले 30 साल में 70 हजार लोग मारे गए हैं। उनमें से कितने कश्मीरी पंडित हैं ? 399 या अधिकतम 600 ।अगर काश्मीरी पंडित काश्मीर को अपनी जमीन कहते हैं तो वहां जाएं, रहें और सामना करें जैसे वहाँ का मुसलमान कर रहा है । सच यह है कि उनके लिए भारत बाहें फैलाए खड़ा है और काश्मीरी मुस्लिम सेना और आतंकवादियों की दोहरी मार मार कर भी काश्मीर से कहीं अन्य नहीं जा पा रहा है । जबतक इस दोगलेपन को दूर नहीं किया जाएगा काश्मीर को पाने का बस सपना देखते रहिए ।

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http://www.bbc.com/…/04/150416_kashmiri_pandit_resettlement…

http://archive.indianexpress.com/…/209-kashmiri-pan…/305457/

http://articles.economictimes.indiatimes.com/…/29676901_1_k…

http://www.thehindu.com/…/219-kashmiri-pa…/article734089.ece

https://hi.m.wikipedia.org/…/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0…