आज आपको रिबेरो, सुशील कुमार, शाहरुख़, आमिर और ‘सिकुलरों’ को लताड़ना हो, लताड़ लीजिए. लेकिन जिस एजेंडे पर देश को ले जाने की कोशिश हो रही है, उसे समझिए. धर्म पर आधारित कोई राज्य आधुनिक, उदार और लोकताँत्रिक नहीं होता, हो ही नहीं सकता. इतिहास में, अतीत में, दुनिया में चाहे जहाँ खँगाल कर देख लीजिए, धर्म आधारित राज्यों का चरित्र हमेशा, हर जगह एक ही जैसा रहा है. खाप पंचायतों के विराट और कहीं-कहीं कुछ परिष्कृत संस्करणों जैसा!

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सिर्फ़ बीस दिन हुए थे. शायद ही ऐसा पहले कभी हुआ हो. देश में कोई नयी सरकार बनी हो और महज़ बीस दिनों में ही यह या इस जैसा कोई सवाल उठ जाये! तारीख़ थी 14 जून 2014, जब ‘राग देश’ के इसी स्तम्भ में यह सवाल उठा था—2014 का सबसे बड़ा सवाल, मुसलमान!

और यह सवाल सरकार बनने के फ़ौरन बाद ही नहीं उठा था. ‘राग देश’ के नियमित पाठक अपनी याद्दाश्त पर ज़ोर डालें तो उन्हें याद आ जायेगा. लोकसभा चुनावों के प्रचार के दौरान ही यह सवाल उठना शुरू हुआ था, जब इसी स्तम्भ में मैंने लिखा था कि इस चुनाव में पहली बार कैसे देश दो तम्बुओं में बँटा हुआ दिख रहा है और कैसे यह चुनाव आशाओं और आशंकाओं के बीच एक युद्ध बन गया है!

Is it Intolerance or agenda of Hindu Rashtra?

सिर्फ़ डेढ़ साल और एक सवाल !

क्यों? यह सवाल देश में सिर्फ़ डेढ़ साल पहले अचानक उठना क्यों शुरू हो गया? आज़ादी के बाद से अब तक कभी ऐसा सवाल नहीं उठा? लेकिन यह इन्हीं डेढ़ सालों में क्यों उठ रहा है? ऐसा तो नहीं है कि इससे पहले देश में साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए! बहुत बड़े-बड़े और भयानक दंगे हुए. लेकिन यह सवाल ऐसे किसी दंगों के बाद भी कभी नहीं उठा! न 1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद उठा, न 1992 के मुम्बई दंगों के बाद उठा और न 2002 के गुजरात दंगों के बाद! ऐसा तो नहीं है कि इससे पहले कभी ईसाइयों को निशाना नहीं बनाया गया. बहुत बार उन पर हिंसक हमले हुए. लेकिन गुजरात के डांग और उड़ीसा में ग्राहम स्टेन्स को ज़िन्दा जला दिये जाने की बर्बर वारदातों के बावजूद देश में ऐसा सवाल पहले कभी क्यों नहीं उठा?

सवाल यही है कि यह सवाल अभी ही क्यों उठ रहा है? पिछले डेढ़ सालों में ही क्यों उठने लगा है? इन डेढ़ सालों में देश में ऐसा क्या बदला है कि जो सवाल बड़े-बड़े दंगों के बाद कभी नहीं उठा, वह अभी क्यों उठ रहा है. एक दादरी की घटना को छोड़ दें तो इन डेढ़ सालों में देश में साम्प्रदायिक हिंसा की कोई बड़ी वारदात नहीं हुई, यहाँ-वहाँ छिटपुट घटनाएँ हुईं, जो हमेशा होती ही रहती हैं. हर साल ऐसी सैंकड़ों घटनाएँ होती हैं, तो इस साल भी हुईं और आँकड़ों को देखें तो शायद पहले से कम भी हुईं. फिर यह असहिष्णुता (Intolerance) का सवाल क्यों उठ रहा है?

It is not a matter of Intolerance at all, but a well thought plan to change our Social Landscape!

मामला असहिष्णुता का है नहीं!

सवाल इतना कठिन नहीं है कि इसका जवाब ढूँढने के लिए बड़ी रिसर्च करनी पड़े, मोटी-मोटी पोथियाँ पलटनी पड़ें. जवाब बड़ा आसान है और साफ़ है. मामला असहिष्णुता (Intolerance) का है ही नहीं! जो हो रहा है, उसे असहिष्णुता (Intolerance) कह कर या तो आप ‘कन्फ़्यूज़’ हैं, या लोगों को ‘कन्फ्यूज़’ करना चाहते हैं, या मामले की गम्भीरता समझ नहीं रहे हैं, या समझ कर भी उसे कहने का साहस नहीं कर पा रहे हैं. बहरहाल, बात जो भी हो, पिछले डेढ़ सालों में देश में जो भी हुआ, जो भी हो रहा है, वह असहिष्णुता (Intolerance) का मामला नहीं है. हालाँकि इन मुद्दों पर आयी बहुत-सी प्रतिक्रियाओं में ज़रूर बड़ी असहिष्णुता (Intolerance) दिखी, लेकिन हम जानते हैं कि आवेश में कभी-कभी ऐसा हो जाता है!

बात को आगे बढ़ाने के पहले यह बात भी साफ़ हो जाये कि यह मामला न असहिष्णुता (Intolerance) का है और न यह हिन्दुओं, मुसलमानों और ईसाइयों के बीच किसी झगड़े का है. बल्कि मामला एक घोषित एजेंडे का है, जिसे देश का एक बड़ा संगठन बाक़ायदा चला रहा है. एक ऐसे एजेंडा, जिसकी एक निश्चित योजना है, एक ख़ाका है, एक नक़्शा है, एक ‘रोडमैप’ है. एजेंडा भी साफ़ है, और सार्वजनिक है, हिन्दुत्व की स्थापना, हिन्दू राष्ट्र की स्थापना. और इस एजेंडे को वे लोग चला रहे हैं, जिनका कहना है कि आठ सौ साल बाद देश में हिन्दुओं की सरकार आयी है! याद कीजिए साल भर पहले, नवम्बर 2014 में विश्व हिन्दू काँग्रेस में अशोक सिंहल का बयान, जिसका आज तक किसी ने खंडन नहीं किया, सरकार में बैठे किसी व्यक्ति ने या सरकार चलानेवाली देश की बड़ी राष्ट्रीय पार्टी के किसी नेता ने न इस बयान का खंडन किया और न आलोचना की! मतलब क्या है इसका? आप कह सकते हैं कि सरकार क्यों इस तरह के ‘दावों’ का खंडन करे? ठीक बात है! लेकिन जब प्रधानमंत्री ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ हो (नरेन्द्र मोदी ने यह बात ख़ुद ही कही थी), जब विश्व हिन्दू परिषद के वही अशोक सिंहल जी प्रधानमंत्री के शपथ-ग्रहण समारोह में पहली पंक्ति में नज़र आयें और जब संघ, विहिप और परिवार के बाक़ी संगठनों के सामने केन्द्र सरकार के मंत्री अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करें, उनसे निर्देश लें तो इसके बाद इसमें कोई शक रह जाता है कि सरकार किस रिमोट कंट्रोल से चल रही है!

सरकार, परिवार और रिमोट कंट्रोल

और इसी रिमोट कंट्रोल ने मोदी सरकार बनते ही ईसाइयों और मुसलमानों के ख़िलाफ़ अभियान अचानक शुरू कर दिया. अन्धविश्वास और धार्मिक उग्रवाद के ख़िलाफ़ लिखनेवाले लेखकों को निशाना बनाया जाने लगा. ज़ोर-शोर से ‘लव जिहाद’ का हंगामा खड़ा किया था. दिलचस्प बात है कि देश के कई राज्यों में बरसों से बीजेपी की सरकारें चल रही हैं, लेकिन इनमें से कोई भी सरकार आज तक ‘लव जिहाद’ का एक भी मामला पकड़ नहीं पायी! फिर यह मुद्दा क्यों उछाला गया? फिर ‘घर-वापसी’, चार शादियाँ और चालीस बच्चे, हरामज़ादे और मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने की धमकियाँ चलीं. गोमांस के नाम पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर उगला गया. स्कूलों के पाठ्यक्रमों का हिन्दूकरण करने की शुरुआत हुई. इतिहास में जो कुछ भी मुसलमानों के नाम पर अच्छा हो, उसको बदलने का अभियान जारी है. हिन्दू त्योहारों से मुसलमानों को अलग रखने के बाक़ायदा संगठित अभियान चलाये गये. और तो और, उप-राष्ट्रपति हामिद अन्सारी की निष्ठा और देशभक्ति पर सवाल उठाये गये, एक बार नहीं, तीन-तीन बार.

और सवाल किसने उठाये. संघ के एक बहुत बड़े और ज़िम्मेदार नेता ने! उप-राष्ट्रपति की साख पर बार-बार उँगली उठाने का मक़सद क्या था? क्या यह महज़ चूक थी? तो क्या एक ही चूक तीन बार हो सकती है? और जो पार्टी सरकार चला रही है, जब उसका अध्यक्ष कहता है कि बिहार में एनडीए की हार पर पटाख़े पाकिस्तान में दग़ेंगे, तो वह किस समुदाय को निशाना बना रहा है और क्यों? और जब ख़ुद प्रधानमंत्री कहते हैं कि नीतीश-लालू-सोनिया आपका आरक्षण छीन कर किसी और धर्म के लोगों को देना चाहते हैं, तो वह पूरे हिन्दू समाज को किस समुदाय के ख़िलाफ़ खड़ा करने की कोशिश करते हैं? इसका क्या सन्देश है?

पहले कब किसी ने सेकुलरिज़्म का पाठ पढ़ाया?

बताइए, आज़ाद भारत के इतिहास में कब ऐसा हुआ कि अमेरिका के किसी राष्ट्रपति को या दुनिया के किसी और राष्ट्रनेता को भारत को सेकुलरिज़्म का पाठ पढ़ाने की ज़रूरत पड़ी हो. और क्यों उस जूलियो रिबेरो को पहली बार अपने ईसाई होने का एहसास अजीब लगा, जिसने पंजाब से आतंकवाद के ख़ात्मे के लिए जी-जान लगा दी थी. क्यों पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल सुशील कुमार को भी लगभग ऐसा ही लगा? हंगामा तो तब भी मचा था. देशभक्ति पर सवाल तब भी उठे थे. और हंगामा तब भी मचा, जब अभी हाल में शाहरुख़ ख़ान ने कहा कि कुछ ‘अनसेकुलर’ (यानी जो सेकुलर नहीं हैं) तत्वों की ओर से असहिष्णुता (Intolerance) बढ़ी है. अगर ऊपर दी गयी घटनाएँ ग़लत नहीं हैं, तो शाहरुख़ के बयान में क्या ग़लत है? क्यों हंगामा हुआ उस पर? और फिर आमिर की बात पर हंगामा हुआ. सवाल उठ सकता है कि आमिर ने यह क्यों कहा कि उनकी पत्नी इतनी चिन्तित हुईँ कि पूछने लगीं कि किसी और देश में रहने जायें क्या? आपत्ति क्या इसी बात पर थी? अगर आमिर केवल यह वाली बात न कहते, तो हंगामा नहीं होता क्या? शाहरुख़ ने तो ऐसा कुछ नहीं कहा था, फिर हंगामा क्यों हुआ? उनकी देशभक्ति पर क्यों सवाल उठे?

इसमें कोई शक नहीं कि यह देश बड़ा सहिष्णु है और आम हिन्दू समाज बहुत सहिष्णु है. इसमें भी कोई शक नहीं कि मुसलमानों के लिए भारत से ज़्यादा अच्छी जगह और कहाँ होगी? चिन्ता यही है कि कुछ लोग एक सुविचारित और घोषित एजेंडे के तहत इसे बदलने-बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं. आश्चर्य है कि जो लोग देश बिगाड़ने के इन षड्यंत्रों का विरोध कर रहे हैं, आप उनकी ही देशभक्ति पर सवाल उठा रहे हैं! लेकिन एक बात समझ लीजिए. आज आपको रिबेरो, सुशील कुमार, शाहरुख़, आमिर और ‘सिकुलरों’ को लताड़ना हो, लताड़ लीजिए. लेकिन जिस एजेंडे पर देश को ले जाने की कोशिश हो रही है, उसे समझिए. धर्म पर आधारित कोई राज्य आधुनिक, उदार और लोकताँत्रिक नहीं होता, हो ही नहीं सकता. इतिहास में, अतीत में, दुनिया में चाहे जहाँ खँगाल कर देख लीजिए, धर्म आधारित राज्यों का चरित्र हमेशा, हर जगह एक ही जैसा रहा है. खाप पंचायतों के विराट और कहीं-कहीं कुछ परिष्कृत संस्करणों जैसा! संस्कृति, परम्पराओं और पोंगापंथी नैतिकताओं के पिंजड़ों में दाना-पानी चुगते हुए जीवन गुज़ार देने की आज़ादी से बड़ा कोई भी सपना देखना वहाँ सबसे बड़ा अधर्म होता है. क्या चाहिए आपको, लोकतंत्र या धर्म-राज्य? चुनाव आपका है.

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