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सुबह सुबह न्यूज देखने के लिए टीवी आन किया तो जो पहला समाचार देखा तो सोचने लगा कि कैसे लोग हैं जो एक बुराई का तो विरोध करते हैं पर वैसी ही दूसरी बुराई का समर्थन करते हैं ।
बगदादी,ओसामा बिन लादेन को अपना आदर्श मानता है और उसके हर तरह के हिंसक और आतंकवादी घटनाओं का विरोध होना ही चाहिए पर ऐसी ही दूसरी घटनाओं का समर्थन उन्हीं लोगों द्वारा करना दोगलापन नहीं है तो क्या है ?

आज ही के दिन देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या करने वाले और देश के पहले आतंकवादी नाथूराम गोडसे को फांसी दी गई थी और टीवी न्यूज चैनलों पर उस हत्यारे नाथूराम गोडसे के बलिदान दिवस के रूप में मनाए जाने की तमाम संगठन घोषणाएँ कर रहे हैं। पेरिस में निःसंदेह गलत किया गया और उसकी आलोचना भी जबरदस्त रूप से सभी के द्वारा की गई पर अगले ही दिन पेरिस के हत्यारों को कोसने और गालियाँ देने वाले गाँधीजी के हत्यारे की पूजा करने लगे बलिदान दिवस मनाने लगें तो क्या कहिएगा इसे ? दोगलापन और कुछ नहीं ।पेरिस में 122 इंसानों की हत्या की गयी पर गाँधीजी की हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी बल्कि एक विचार की हत्या थी एक सिद्धांत की हत्या थी , भारत के उस भविष्य की हत्या थी जिसे गाँधी जी ने सोचा था ।दरअसल परिवार में किसी घर को बेहद परेशानी में डालना हो और वह भी उस घर की जो सदियों की परेशानियों और और गुलामी से छुटकारा पाकर अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिशें कर रहा हो तो उस घर के मुखिया की हत्या कर दो जो नेतृत्व कर रहा है और गाँधी जी की हत्या भी देश के वैसे ही मुखिया की हत्या करने जैसी थी ।देश आज जिस स्थिति में है उस स्थिति में मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि गाँधी जी यदि 10 वर्ष और जीवित रहते तो आज देश की स्थिति कुछ और रहती क्युँकि नेहरू और पटेल को वह ऐसा कुछ करने से रोकते और या वो करने को बाध्य करते जिसके कारण आज भारत में चारों ओर डर और संवेदनहीनता की स्थिति बनी हुई है और निश्चित रूप से गाँधी जी ऐसा करते और आज भारत की तस्वीर कुछ और होती जिसे हत्यारे गोडसे ने गाँधी जी को मारकर उस भारत के भविष्य की हत्या की।

दरअसल मेरे इस विश्वास का कारण बिल्कुल स्पष्ट है और उसका आधार है महात्मा गांधी का मूल मंत्र “सत्य अहिंसा प्रेम” जिसका गोडसे और उससे जुड़े संगठनों का चरित्र बिल्कुल विपरीत है । गाँधी जी ने “सत्य अहिंसा प्रेम” के विरूद्ध नीति अपना कर देश के हित में ही सही अपनी जान दे देने वाले भगतसिंह चन्द्रशेखर और सुभाषचंद्र बोस तक का समर्थन नहीं किया क्योंकि उनके मार्ग गांधी जी के “अहिंसा” के सिद्धांत के विरूद्ध हिंसक थे और यह सिद्धांत इस धरती के श्रीराम बुद्ध महावीर जी के सिद्धांतों के आधार हैं तो संघ जिसके बंटवारे के समय के दंगों मे संलिप्तता के पुख्ता प्रमाण हैं गाँधी जी के जीवित रहते कैसे जीवित रहता समझा जा सकता है , गाँधीजी निश्चित रूप से दबाव बनाकर ही सही नेहरू और पटेल से वह व्यवस्था बनावाते कि संघ जैसे संगठनों का इस देश के भविष्य में पैदा होना ही असंभव हो जाता।यही स्थिति भाँप कर गोवलकर ने 1937 में बिहार में कहा था कि गाँधी के रहते उसके सपने सच नहीं हो सकते। गाँधी जी की हत्या करके हिन्दू महासभा उर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने को जीवन दिया और यह बलिदान दिवस का मनाना उसी हर्ष के कारण है जो इस भाव और सोच के आधार पर है कि गाँधी का मारा जाना उनके उद्देश्यों की प्राप्ति में खड़ी एक बाधा को दूर करना था जिसे नाथूराम गोडसे ने दूर किया तो उसका बलिदान दिवस मनाना उनके लिए हर्ष का ही विषय है ।

ये मुर्ख यह नहीं समझते कि गाँधी जी के “सत्य अहिंसा प्रेम” के सिद्धांत उनके अपने नहीं बल्कि इस देश की मूल आत्मा में हजारों वर्षों से बसे सिद्धांतों का एक सार मात्र है जिसे गाँधीजी ने मात्र तीन शब्दों में पिरो दिया था और देश उसको सिद्ध करता रहा है कर रहा है और करता रहेगा।जो लोग नाथूराम गोडसे की फांसी के दिन को बलिदान दिवस मना रहे हैं उन्हें पेरिस की आतंकी घटना की भर्त्सना और बगदादी ओसामा बिन लादेन को गालियाँ देने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि यह दोनो एक ही विचारधारा का प्रतिनिघित्व करते हैं ।

जय हिन्द”