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by — ताहिर महमूद

इस्लाम एक तर्कसंगत दृष्टिकोण वाला पवित्र, प्रगतिशील और आदर योग्य धर्म है और इसे संकीर्ण नज़रियो वाला धर्म नहीं कह सकते हैं, जैसा कि कानून का कथित उल्लंघन करने वालों ने इसे ऐसा रूप देने की कोशिश की है। इस्लामी कानून के प्रगतिशील और व्यापक दृष्टिकोण को बेईमान वादियों को संकीर्ण दृष्टिकोण में परिवर्तित करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती है। साल 2000 में लिली थामस मामले में ये हिंदुस्तानी सुप्रीम कोर्ट का फैसला था जो पांच साल पुराने सरला मुदगल मामले में दिये अपने फैसले की पुष्टि थी, जिसमें शादी शुदा मर्दों के कई शादियाँ करने के लिए इस्लाम स्वीकार करने को गैर कानूनी होने का फैसला दिया था। मेरे अनुसार हिंदुस्तानी सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दिया गया ये फैसला इस्लामी कानून को दी गयी एक महान श्रद्धांजलि है।

1955 का हिंदू मैरिज ऐक्ट एक शादी को लागू करता है और ये विचार करता है कि एक से ज़्यादा शादी भारतीय दण्ड संहिता के तहत कारवाई की दावत देगा। इसके बाद से इस कानून के तहत आने वाले शादी शुदा लोगों ने दूसरी शादी के लिए इस्लाम कुबूल करने का रस्ता अपनाने लगे। ऐसे दो मामलों ने उन दिनों मीडिया की सुर्खियां बटोरी हैं। इसमें से एक मामले में फौज के एक डाक्टर ने जो अफगानिस्तान में अपनी ड्युटी कर रहा था, उसने एक अफगानी महिला से शादी के लिए इस्लाम कुबूल कर लिया और कुछ बरसों बाद हिंदुस्तान वापिस आकर अपने परिवार के साथ रहने लगा और उस लड़की को वहीं छोड़ दिया।

दूसरे मामल, एक शादी शुदा राजनीतिक लीडर और उसकी महिला वकील दोस्त का था, जो दोनों हिंदू थे, इन्होंने शादी करने के लिए इस्लाम कुबूल कर लिया और जनता में ये दावा भी करते रहे कि उन्होंने ऐसा करके कुछ गलत नहीं किया है। कुछ ही समय में उनकी शादी नाकाम हो गयी और मर्द अपने पुराने विश्वास में वापस चला गया और अपनी पहली बीवी से जा मिला। ये और इसके जैसे कई और मामले ये स्पष्ट करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के द्वारा तस्लीम किये गये कानून का इस्तेमाल उल्लंघन के लिये ज़्यादा किया गया।

बेशक एक से ज़्यादा शादी पर इस्लामी कानून को मुसलमानों और गैरमुसलमानों दोनों के द्वारा गलत ढंग से समझा गया। दोनों का विचार ये है कि इससे शादी शुदा मर्दों को बेरोकटोक शादी करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है, जो कि एक महान कानून का मज़ाक उड़ाने के बराबर है। अरब के समाज में एक से ज़्यादा शादी बिना किसी रोकटोक के आम थी, जिस पर इस्लाम के द्वारा परिभाषित सीमाओं और सख्त अनुशासन के भीतर इसकी इजाज़त दी गयी। एक से ज़्यादा शादी की इजाज़त इस शर्त पर थी कि मर्द अपनी बीवियों के साथ वैवाहिक अधिकारों के सभी मामलों में बिल्कुल एक समान व्यवहार करने के काबिल होना चाहिए।

स्पष्ट रूप से पहली बीवी को घर से बाहर फेंक कर उसकी जगह नयी बीवी लाना, कुरानी विचारधारा के विरुद्ध है। ये भी काबिल गौर है कि बीवियों के साथ पूरी तरह बराबरी का व्यवहार आसान काम नहीं है। कुरान कहता है कि ‘एक निकाह तुम्हें नाइंसाफी करने से दूर रखेगा।’ पैगम्बर मोहम्मद स.अ.व. ने इसमें ये चेतावनी जोड़ी थी कि ‘कयामत के दिन अपनी बीवियों से एकसमान व्यवहार न कर पाने वाला मर्द बुरे अंजाम को पहुँचेगा।’ कई कई शादियाँ करने की सामाजिक बुराई को समाप्त करने के लिए 7वीं सदी की ये कोशिश तारीफ के लायक है।

कुरान के निर्देश और नबी करीम स.अ.व. का एक से ज़्यादा शादी करने वालों के लिए चेतावनी जन्मजात या धर्म परिवर्तन कर होने वाले सभी मुसलमानों पर लागू होती है। लेकिन ये विचार कि जो कोई भी इस्लाम स्वीकार करे उसका स्वागत होना चाहिए, जो चाहे इस्लाम से प्रेम के कारण नहीं बल्कि उस कानून को धोका देने के लिए, जो इन पर नियंत्रण रखता है, ये विचार बिल्कुल बेहूदा है।

इस विषय पर इस्लामी कानून के बारे में कोई जो भी कल्पना रखता हो, इस्लाम कुबूल करने की आड़ में एक से ज़्यादा शादियाँ करने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट के दो निर्देशों ने इसे अनिवार्य कानून का रूप दे दिया है। इसके बावजूद समाज में ये कानून अभी अमल की हद तक नहीं पहुँचा है और शादी शुदा गैरमुसलमान मर्द इसका उल्लंघन एक सनक के रूप में कर रहे हैं। इस हालात का नोटिस लेते हुए हिंदुस्तान के लॉ कमीशन ने इसे भारत सरकार को सिफारिश करने के लिए उचित पाया कि अदालत के द्वारा स्वीकार किये गये कानून को हिंदू मैरिज ऐक्ट और दूसरे कानूनों में शामिल किया जाये।

कमीशन की 227वीं रिपोर्ट जिसमें ये सिफारिश की गयी थी, लेकिन ये इससे आगे नहीं बढ़ी। मुस्लिम समाज के पर्सनल लॉ के प्रति धार्मिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए कमीशन ने इस विषय को छूने की कोशिश नहीं की, जिसमें पैदाइशी मुसलमान इस कानून का उल्लंघन कर रहे हैं, जो नामालूम नहीं है। इस रिपोर्ट के सीमित लाभ से अंजान लोगों के द्वारा मुसलमानों के धार्मिक क्षेत्रों में ला कमीशन की आलोचना की जा रही है। इस क्षेत्र के सदस्यों का विश्वास है कि व्यवहारिक रूप से पर्सनल लॉ को विकृत करने और दुरुपयोग के बावजूद ये सरकार के किसी भी संवैधानिक या सलाहकार संस्थान के अधिकार और कार्यक्षेत्र से बाहर है।

इस्लाम के अभिन्न अंग के रूप में वो चाहते हैं कि इस तरह के संस्थानों को इससे दूर रखना चाहिए। ये लोग संविधान के तहत पर्सनल लॉ के हिंदुस्तान के कानूनी और अदालती व्यवस्था में असल मुकाम की तारीफ अभी नहीं कर रहे हैं। ये उनके अपने हक में होगा कि वो इस सिलसिले में इसके सही कानूनी मुकाम के बारे में परिचित हों। इस दिन तक हिंदुस्तान के संवैधानिक और कानूनी संस्थानों ने इस्लामी कानूनों के बारे में आदर के साथ ही बोला है और साथ ही मुसलमानों की धार्मिक संवेदनशीलता का खयाल रखने की कोशिश की है। लगातार गैरज़िम्मेदाराना ढंग से इस तरह के संस्थानों को अपने से अलग थलग करना दूरअंदेशी नहीं (अदूरदर्शिता) है।

लेखक लॉ कमीशन के सदस्य रहे हैं

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