neta-and-poorsमाधव अवाना

फिर वही माहौल,वही शोर शराबा,

वही कुछ नए पुराने चेहरों का बोलबाला ।

फिर से सज गयी तब्दीलियों की मंडियां,

पर असल में कुछ नहीं बदलने वाला ।

फिर चीखते फिर रहे बदहवास चेहरे,

फिर रचे जानें लगें हैं षड्यंत्र गहरे ।

फिर से गूंजने लगें हैं फजाओं में नारे,

पिछलग्गू बन गए हैं कुछ भूख के मारे ।

फिर से ये बतायी जाने लगी बदलाव की बातें,

फिर से कुर्सी कब्जाने को होनें लगीं हैं घातें ।

घुटन दे गया है चुनाव का मौसम पांचसाला,

पर असल में कुछ नहीं बदलनेवाला ।

कुछ आ जायेंगे चेहरे नए पुराने,

बनके रहनुमा लग जायेंगे देश को खाने ।

फिर शुरू होगा आम आदमी की तकदीर से खेल,

फिर भेजा जायेगा कुछ हारे हुओं को जेल ।

फिर से न्याय का ढोंग रचाया जायेगा,

आदमी को रोटी के वादे से बहलाया जायेगा ।

फिर से होगा लूट खसोट का नंगा नाच,

फिर झूठ को बताया जायेगा सांच ।

मुझे जलाएगी, मेरे अन्दर की आंच,

और टूटते सपने चुभेंगे बनके कांच ।

फिर से जिन्दगी बुनने लगेगी मकड़जाला,

मैं जानता हूँ कि कुछ नहीं बदलनेवाला ।