Felex-Padelby निराला

डॉ. फेलिक्स पैडल चार्ल्स डार्विन के परपोते हैं, लेकिन यही उनकी इकलौती पहचान नहीं है. वे मूल रूप से मानवशास्त्री हैं. कई भाषाओं के जानकार, साहित्य और दर्शन के गहन अध्येता. इतना ही नहीं वे संगीत की भी गहरी जानकारी रखते हैं. पैडल की सबसे बड़ी पहचान ये है कि वह तकरीबन 35 साल पहले भारत आए थे और अब तक ओडिशा में आदिवासियों के बीच रहकर, उनके साथ संघर्ष और उनके लिए काम कर रहे हैं. नियमगिरी पहाड़ी के पास रहने वाले ‘डोंगरिया कोंध’ और ‘पाउरी भुइया’ जैसी जनजातियों पर उनका उल्लेखनीय काम है. वेदांता-पॉस्को के खिलाफ लड़ाई में उनकी भूमिका अहम रही है. वह ‘आउट ऑफ दिस अर्थ : ईस्ट इंडिया आदिवासीज एंड द एल्युमिनियम कार्टेल’ जैसी चर्चित किताब लिख चुके हैं. निराला की उनसे बातचीत

तकरीबन चार दशक से आप भारत को नजदीक से देख रहे हैं. आप जब यहां आए तब और अब के भारत में आपको क्या फर्क नजर आता है?

इसका जवाब देना मुश्किल है. कितने बदलावों की बात करूं. जब भारत आया था तो यहां की नदियां, नदी की तरह ही थीं, लेकिन अब जगह-जगह नदियों के बहने में रुकावट हैं, तमाम नाले में बदल गई हैं. पहले यहां पहाड़ों और जंगलों का महत्व था. प्रकृति और सृष्टि से मानव का मार्मिक रिश्ता था. धर्म जीवन की एक प्रक्रिया थी, उसमें जीवन मूल्य समाहित थे. अब सब कुछ तेजी से बदल चुका है, अब तो निवेश यहां का मूल मंत्र है. ये विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के जाल में फंसा हुआ एक मुल्क बन चुका है. विश्व बैंक के लिए दुनिया के तमाम देश सिर्फ तीन खांचों में फिट होते हैं, पहला- विकसित (डेवलप्ड), दूसरा- विकासशील (डेवलपिंग) और तीसरा- अल्प विकसित (अंडरडेवलप्ड). विकसित बनने की होड़ में शामिल होकर भारत अपना सब कुछ बदल चुका है. सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और आर्थिक विकास इसके मूलमंत्र बन चुके हैं.

जीडीपी और आर्थिक विकास मूलमंत्र बन चुके हैं, मतलब?

हां, निश्चित रूप से यही दो ऐसे शब्द हैं, जो दुनिया के सबसे शक्तिशाली झूठे शब्द हैं. ये दोनों पूरी सृष्टि को रसातल में ले जा रहे हैं. इनके लक्ष्यों को पाने के लिए सबसे पहले मानवीय और सांस्कृतिक मूल्यों को ध्वस्त करना पड़ता है, सुंदर और पहचान से जुड़ी परंपराओं का नाश करना पड़ता है. जब तरक्की की दौड़ नहीं थी, तब क्या विकास नहीं था? था, तब भी था, लेकिन उस विकास में मानव समुदाय के बीच आपसी रिश्ते की भी कद्र थी. अब तो तेजी से दूरियां बढ़ती जा रही हैं. आर्थिक विकास और जीडीपी ने सत्ता, राजनीति, कॉरपोरेट और माओवादियों के बीच गठजोड़ बनाया है. इन चारों का गठजोड़ क्या कर रहा है, कैसे आपसी सहमति से सामंजस्य बैठाकर भारत जैसे देश को बर्बाद किया जा रहा है, इसे लोगों को बताने की जरूरत नहीं.

जिस गठजोड़ की बात आप कर रहे हैं तो इसका मतलब क्या माओवादी सीधे-सीधे सामंजस्य बैठाकर, आपसी सहमति से काम कर रहे हैं?

हां, बिलकुल. इन सबकी फंडिंग कौन करता है, यह देखना होगा. सबको कॉरपोरेट विशेषकर माइनिंग कंपनियां फंड करती हैं. इन माइनिंग कंपनियों को फंड कहां से मिलता है. विश्व बैंक व आईएमएफ से. इसके लिए सरकार देश के विकास का हवाला देते हुए अधिक से अधिक माइनिंग की जरूरत पर बल देती है. इसके लिए चारों आपस में गठजोड़ कर एक-दूसरे की मदद करते हैं. जहां भी माइनिंग कंपनियां आती हैं, सबसे पहले वहां की संस्कृति का बलात्कार करती हैं, फिर औरतों का, फिर धर्म का नाश करती हैं, लोगों को झांसा देती हैं. सब आपस में मिलकर काम करते-हैं. मैं तो कहता हूं कि माओवादियों को अपने नाम से ‘माओ’ शब्द हटा देना चाहिए.

आप ओडिशा में रहकर वर्षों से काम कर रहे हैं. नियमगिरी वाला मामला बहुत चर्चित रहा है और वेदांता का विरोध वहीं हुआ. आपका इस पर क्या कहना है?

नियमगिरी का मामला अलग है. जब भी वहां काेई माइनिंग कंपनी गई तो सबसे पहले उन्होंने लोगों को यह बताने की कोशिश की कि वह वहां नियमगिरी राजा का विशाल मंदिर बनवा देगी. तब वहां के आदिवासियों ने जवाब दिया कि हमारा भगवान, नियमगिरी राजा मंदिरों में नहीं रहता, वो रह ही नहीं सकता. वह कंक्रीट के जंगल में नहीं, असली जंगल में रहता है, पहाड़ पर खुले आसमान के नीचे. लोग जब कंपनी के झांसे में नहीं फंसे. तब दूसरे रास्ते अपनाए गए. वहां के लोग साफ कहते हैं कि पहाड़ को हमारी जरूरत है और हमें पहाड़ की. ऐसा नहीं है कि आदिवासी नहीं जानते कि इस पहाड़ में सैकड़ों तरह के अयस्क हैं, लेकिन उनके लिए धरती, जंगल, पहाड़ कभी लालच पूरा करने के स्रोत की तरह नहीं रहे. आदिवासी जैव पारिस्थितिकी आधारित अर्थव्यस्था पर चलते हैं, इसलिए कंपनियां उन्हें आसानी से दूसरे समुदाय की तरह झांसा नहीं दे पाती.

दूसरे समुदाय, मसलन?

दूसरे समुदाय को एक उदाहरण से समझिए. मैं जब भारत आया था तो हिंदू धर्म मुझे आकर्षित करता था, अब भी करता है. मैंने हिंदू धर्म का नदियों से, उसके पानी से, सृष्टि से, पहाड़ से लगाव देखा था. अब भी मैं हिंदू धर्म के अनुसार पूजा करता हूं, मंदिर जाता हूं लेकिन जब भी किसी बड़े मंदिर जाता हूं, जहां सिर्फ संगमरमर ही संगमरमर लगे होते हैं, तो सोचता हूं कि इस विशाल मंदिर में क्या भगवान रहता होगा? और रहता होगा तो कैसे? क्या भगवान को नहीं मालूम कि उसका वास बनाने में इस्तेमाल संगमरमर निकालने में बड़े लोगों ने मजदूरों पर कितने तरह के जुल्म किए थे? निश्चित रूप से भगवान यह जानता होगा. जिस तरह का झांसा देकर बड़े लोगों ने मंदिर बनवाए ठीक वैसे ही माइनिंग कंपनियों ने अपने बचाव के लिए बड़े-बड़े मंदिरों का निर्माण शुरू करवा दिया है ताकि लोग उसमें उलझे रहें और उनका कोई विरोध न हो.

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