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इस्लाम में हालांकि धार्मिक रस्मों को अदा करवाने वाले पुरोहित की कोई कल्पना नहीं है, लेकिन एक समूह सामने आया है जिसे उलमा कहते हैं और अंग्रेज़ी में जिसे क्लेरिक कहते हैं। इस्लाम में कोई व्यक्ति जिसे अच्छा ज्ञान हो वो शादी, मौत या मुसलमानों की दूसरी धार्मिक ज़िम्मेदारियों से जुड़े कार्यों और रस्मों को अदा करा सकता /सकती है, ऐसे व्यक्ति को आलिम कहते हैं। आलिम (बहुवचन- उलमा) का अर्थ है, जो जानता हो। इस तरह समुदाय, जाति, नस्ल या राष्ट्रीयता से अलग पूरा ज़ोर कुरान और हदीस के ज्ञान पर है। चूंकि ज्ञान इस समूह के लोगों के व्यक्तित्व में सबसे अहम है, इसलिए इन्हें उलमा कहा गया।

अब यहाँ सवाल ये पैदा होता है कि इन लोगों को कौन सा इल्म सिखाया जाये जिन से मुस्लिम समुदाय के मार्गदर्शन की आशा की जाती है। उलमा अक्सर एक हदीस का हवाला देते हैं कि नबी करीम (स.अ.व.) आखिरी पैगम्बर हैं और उनके बाद उलमा तारों की तरह हैं और मुसलमानों को इनसे मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए, क्योंकि अंधेरी रात में तारा रहनुमाई करता है और रौशनी का ज़रिया बन जाता है, और अज्ञानता अंधेरे के जैसी है। जिन दिनों में उलमा का कबीला अस्तित्व में आ रहा था, उन दिनों में कुरान और हदीस का ज्ञान सबसे अहम था, जिसमें समुदाय के मार्गदर्शन की तमाम शिक्षाएं शामिल थीं। और अरब द्वीप पर जहाँ इस्लाम से पहले साहित्यिक परम्परा नहीं थी, कुरान और हदीस ने यहाँ के लोगों को ज्ञान की क्रांतिकारी परम्परा सिखायी। जिस किसी को भी इसका इल्म होता था उसकी गिनती महान आलिमों में होती थी। इसके अलावा शरई कानूनों का आधार कुरान और हदीस था, इसलिए इसका इल्म सभी इल्मों का अहम ज़रिया था।

इस प्रकार जैसे ही इस्लाम दूसरे देशों में फैला, उन उलमा जिनके ज्ञान का माध्यम केवल कुरान और हदीस तक सीमित था उनकी तुलना में सभ्यता, संस्कृति और कानून के दूसरे माध्यमों का ज्ञान रखने वाले दूसरे किस्म के उलमा का अस्तित्व सामने आया, यानि ऐसे उलमा जिन्होंने दूसरे माध्यमों जैसे दर्शन, गणित, प्रकाश विज्ञान, रसायन शास्त्र, भौतिकी और खगोल विज्ञान इत्यादि से ज्ञान प्राप्त किया था, कुरान और हदीस के परम्परागत माध्यम की तुलना में इन उलमाओं ने तर्क संगत विज्ञान पर ज़ोर दिया।

समय के सात ये तर्क विज्ञान इस कदर अहम हो गये कि ये उलमा की तरबियत के पाठ्यक्रम का हिस्सा बन गये और जिसे उलूमुल अक्ल (तर्क व बुद्धि का ज्ञान) के रूप में जाना गया, जो यूनानी दर्शन और अन्य विज्ञानों के अनुवाद पर आधारित था। इन दिनों यूनानी विज्ञान सबसे उन्नत था और इस तर्क विज्ञान ने उलमा की दृष्टि को व्यापक करने में मदद की होगी। ये इस कदर अहम माने जाते थे कि सुकरात को पैगम्बरों में से एक माना जाता था। सुकरात का एक शिष्य प्लेटो (अफलातून) था।

मुसलमानों ने कई महान दार्शनिकों को पैदा किया, जिन्होने विज्ञान के क्षेत्र में काफी अहम योगदान किया है और जिनकी यूनानी दर्शन पर टिप्पणियों को मध्यकाल के दौरान यूरोपी विश्वविद्यालयों और ईसाईयों के धार्मिक संस्थानों में पढ़ाया जाता था। इस तरह ईसाई पादरियों ने अपने धार्मिक संस्थानों में अलफराबी, इब्ने सिना, इब्ने रशद को पढ़ा। इस तरह सभी प्रकार के तर्क विज्ञान को इस्लामी दुनिया में मध्यकाल के दौर में बढ़ावा मिला और मुस्लिम उलमा ने इन विज्ञानों को हासिल किया।

अब यूनानी विज्ञान केवल ऐतिहासिक महत्व का ही रह गया है और इंसानों ने सामाजिक और भौतिकी विज्ञान में ज़बरदस्त प्रगति की है। कोई भी वर्तमान समय की प्रगति के इन विज्ञानों के बारे में जाने बिना खुद के आलिम होने का दावा नहीं कर सकता है। बदकिस्मती से उपनिवेशिक काल और यूरोप में इन विज्ञानों की प्रगति दोनों एक ही समय में हुई, क्योंकि अधिकांश मुस्लिम देश ही यूरोपी देशों के उपनिवेश बने, जिसके कारण आम तौर से मुसलमान और विशेष रूप से उलमा सभी पश्चिमी या यूरोपी विज्ञानों के बारे में पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो गये। बुनियादी रूप से इसका स्रोत उपनिवेशीकरण था।

इसके अलावा इस्लामी मदरसे उपनिवेशी आकाओं से अपने गुस्से के इज़हार में उपनिवेशी शासकों और वैज्ञानिकों के बीच भेद को भूल गये, जबकि इनमें से कई वैज्ञानिकों को अपनिवेशी शासकों ने सज़ा दी थी। विज्ञान को तरक्की शासकों ने नहीं दी थी बल्कि वैज्ञानिकों ने दी थी और ये उलमा यूनानी दर्शन औऱ विज्ञान को अब भी अपने धर्म का आवश्यक अंग मानते थे, जो कि गलत था। इन उलमा ने यूनानी विज्ञान का विरोध किया और कई दार्शनिकों पर मुकदमा चलाया, लेकिन बाद में इसे स्वीकार कर लिया और इस विज्ञान को अपने पाठ्यक्रम का हिस्सा बना लिया और बाद में अपने धर्म का भी।

इस तरह इन लोगों ने आधुनिक सामाजिक और भौतिकी विज्ञान को गैर मज़हबी और पश्चिम से आयातित कह कर विरोध किया और इन विज्ञानों को खारिज कर दिया। इस तरह बाद में इन विज्ञानो को स्वीकार करना शुरु किया लेकिन इस्लामी मदरसों में पढ़ाना शुरु नहीं किया। अब भी ये परम्परागत यूनानी दर्शन को इस्लामी ज्ञान के भाग के रूप में पढ़ाते हैं। इस्लामी मदरसे पाठ्यक्रम के मामले में एक हो जायें जैसा कि पहले यूनानी विज्ञान के समय था।

आज इन मदरसों में परम्परागत ज्ञान और धार्मिक मामलों के अध्ययन पर पूरा ज़ोर दिया जाता है, जो बिना शक ज़रूरी है, लेकिन सिर्फ तरबियत के हिस्से के रूप में। धर्मशास्त्र के मामलों के साथ ही छात्रों को आधुनिक सामाजिक और भौतिकी विज्ञान की भी शिक्षा दी जानी चाहिए जो इनके दृष्टिकोण को व्यापक करने में मददगार होगी। इन लोगों को कुरान की नयी व्याख्या करने का भी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि ये आधुनिक विज्ञानों को अपने में शामिल कर सकें। पहले की तफ्सीर और व्याख्या उस वक्त उपलब्ध ज्ञान के आधार पर की गयी थी, केवल इस आधार पर छात्रों को तफ्सीर का पढ़ाया जाना जारी नहीं रखा जा सकता है, कि कुरान ही नहीं बल्कि तफ्सीर भी ईश्वरीय है। जबकि कुरान खुदादाद है और तफ्सीर उसे समझने के लिए मानव ज्ञान के दायरे के अंदर एक इंसानी रचना है।

मौजूदा हदीसों में कुछ प्रमाणिक और कुछ संदिग्ध आधार वाली हदीस दोनों शामिल हैं। छात्रों को मौजूदा हदीसों में आधुनिक आलोचनात्मक पद्धति भी सिखाई जानी चाहिए और इन लोगों को उन हदीसों का चुनाव करना चाहिए जो प्रमाणिक हैं और तर्कसंगत भी हैं। रावी की वफादारी ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे अक्ल और समझ की कसौटी को पूरा करना चाहिए। तर्क और बुद्धि दिव्य उपहार हैं और कुरान तर्क की भूमिका को स्वीकार करता है।

इसके अलावा इन मदरसों में सांप्रदायिकता में भी इज़ाफा हो रहा है इसलिए भविष्य के उलमा को सहिष्णुता और संयम के मूल्य सिखाना बहुत ज़रूरी है। कुरान के बुनियादी मूल्य सत्यता (हक़), न्याय (अद्ल), परोपकार (ऐहसान), करुणा को भी पढ़ाया जाना चाहिए और इस पर ज़ोर भी दिया जाना चाहिए। आधुनिक बहुलवादी दुनिया में धर्म का तुलनात्मक अध्ययन भी ज़रूरी होना चाहिए।

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