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by — मनोहर नायक

( उपमहादीप के दो महान कवियों फेज़ अहमद फेज़ 1911 – 1984 और रघुपति सहाय उर्फ़ फ़िराक गोरखपुरी 1896 – 1982 आज़ादी से पहले के साथी रहे मर्त्यु से पूर्व दोनों दोस्तों की आखिर मुलाकात 1981 में जब फ़ैज़ भारत आये तब उनके इलाहाबाद प्रवास में हुई थी उसी पर ये विवरण लेखक मनोहर नायक पुस्तक क्रांति और रोमांस का शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ संपादक भारत सिंह , आलोक सिंह साभार )

फ़िराक के साथ ही ज़ेहन में जिस दूसरे शायर का ख्याल आता हे वो निसंदेह फैज़ ही हे इस सदी के दो महान कवि .———- बात 1971 की हे भारत पाकिस्तान की जंग चल रही थी फ़िराक़ घर पर अपने एक दोस्त प्रशंसक के साथ बैठे रेडियो से समाचार सुन रहे थे . भारतीय सेनाय आगे बढ़ रही थी . एकाएक देश प्रेम की एक जोरदार लहर फ़िराक़ के दिल में उठी और वे बोल पड़े , ” बस यही मौका हे भारत को पाकिस्तानी शहरो पर बमबारी कर देनी चाहिए . यह सुन कर कुछ हतप्रभ उस दोस्त ने कहा ” जरूर कर देनी चाहिए फ़िराक़ साहब , तब हो सकता हे की बम फैज़ पर भी गिरे क्योकि बम किसी को बख़्शता नहीं हे ……. ” ओफ़ यह मेने क्या कह दिया ? फ़िराक बोले मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था जंग तबाह करती हे संस्कर्ति को गर्क करती हे फ़िराक बेहद परेशान हो गए थे

1981 की गर्मियों में फैज़ भारत आये थे इलाहबाद भी आये . यूनिवर्सिटी में फैज़ का अभिनंदन किया गया . फ़िराक और महादेवी इस समारोह में उपस्तितिथ थे फैज़ की शायरी का जिक्र करते हुए फ़िराक ने कहा ” फैज़ की शायरी की जान उसकी तहज़ीब और नरमी हे हिंदुस्तान की तहज़ीब जंग तोप और लाठियो से नहीं बनी यहाँ की तहज़ीब उन आत्माओ ने बनाई जो पीपल के पत्ते की तरह नरम और चमकदार थी हमारी तारीख और हमें कई लाख लोगो ने सिर्फ सांस लेकर बनाया हे हमें बनाने में हमें बनाने वालो में आसमान जमीन खेत हिमालय और मासूम बच्चे भी हे ” अपने इलाहबाद प्रवास में फेज़ कई जलसों में शामिल हुए पर उनमे सबसे अलग और सबसे महत्वपूर्ण कार्यकर्म था फ़िराक से उनकी मुलाकात का एक लम्बे अरसे के बाद फ़ैज़ फ़िराक से मिल रहे थे फ़िराक काफी पहले से बेसब्र थे अपने सेवक पन्ना को हिदायते देते हुए वहा मौजूद चार पांच लोगो से बतियाते भी जाते उन्होंने साफ़ कुरता पायजामा पहना और इंतज़ार करने लगे थोड़ी ही देर में फेज़ नमूदार हुए तपाक से फ़िराक का हाथ अपने हाथ मे लेते हुए फेज़ ने याद दिलाया की वो यहाँ पहले भी आ चुके हे तब तक वह छोटा बरामदा पूरा भर चुका था फ़िराक सामने बैठे एक नेता जी से बोले ”भाई बड़ा मैदान मार लिया लखनऊ में उर्दू को सरकारी जुबान बनवा दिया ” नेता जी जवाब में बोले हुज़ूर आप तो काफी बढ़िया तकरीर कर आये थे बड़ी चर्चा थी फ़िराक हँसे बोले आरेटरी के बारे में कहा हे – आईटी इज हारलेट ऑफ़ द फाइन आर्ट्स ( वकृतता ललित कलाओ की हरजाई हे ) इस पर उठे ठहाको और हंसी के बीच फ़िराक ने इतना जोड़ दिया ए गुड आरेटरी इज़ नेवर डिफिटेड ( अच्छी वकृतता कभी पराजित नहीं हो सकती )

इसके बाद फ़िराक ही बोले ” फेज़ में करीब 40 बरस तक एक शेर का मायने गलत समझता रहा बिना किसी के बताय ही , बाद में इसका सही अर्थ समझ पाया . शेर तुलसी का हे सीताहरण हो चूका हे तेज़ बारिश हो रही हे .” घन घमंड नभ गरजत घोरा प्रियाहीन डरपत मन मोरा ” में पहले समझता रहा की राम सोच रहे हे की सीता बेचारी भीग रही होगी किस हालत में होगी पर इसका मतलब यह नहीं हे सीता के जाने से राम की ताकत चली गयी . उनकी हिम्मत खत्म हो गयी शक्ति तो सीता थी वे सोच रहे थे अब में क्या लड़ूंगा . फ़िराक बोलते रहे तुलसी ने क्या सुंदर उपमा दी हे एक जगह . सीता सवयवर में जयमाला लिए जिस राजा के सामने से गुजरती हे वह उनकी आभा के सामने स्याह पड़ जाता हे . वही बैठी एक महिला का स्वर उभरा ”उनका आना तो याद हे मीर फिर उसके बाद चिरागो में रौशनी ना रही ” . फ़ैज़ ने कहा ये मीर का शेर नहीं हे फ़िराक के यारो ने जोड़ दिया होगा इस पर एक सज़्ज़न ने सुचना दी की फ़ला किताब में यह शेर मीर के नाम से दिया हे , फ़िराक फ़ौरन बोले , तो क्या यारो ने डाल दिया होगा फ़ैज़ ने जवाब में सौदा ( अपने प्रिय शायर ) के नाम से कहे जाने वाले कुछ शेरो को गलत बताते हुए कहा मेने सौदा के सारे दिवान छान मारे मुझे वे शेर कही नहीं मिले . कुछ देर की चुप्पी तोड़ कर फ़ैज़ ने फ़िराक से कुछ सुंनाने का अनुरोध किया , फ़िराक की आवाज़ उभरने लगी ” अब तो अक्सर चुप से रहे हे यु ही कभू लब खोले हे पहले तो फ़िराक को देखा होगा अब तो बहुत कम बोले हे ”

फेज़ ने तारीफ करते हुए कुछ और सुंनाने के आग्रह के साथ कहा , इसमें तो कुछ शेर कहे होंगे . बिस्तर पर लेटे फ़िराक कोशिश करके थोड़ा टिक कर बैठ गए . फालिज के कारण उनके ज़्यादातर बेजान हो गए जिस्म की सबसे जिन्दा चीज़ उनके आवाज़ खनकने लगी . झूमते और हाथ झुलाते हुए वे ग़ज़ल के और शेर सुनाने लगे , ” देखो मेरी ग़ज़लें रात का जुड़ा खोले हे . ” जब तक ग़ज़ल पूरी नहीं हुई फ़ैज़ मंत्रमुग्द दिखे . काफी वाह वाह की . अब फ़िराक की बारी थी उन्होंने कहा फ़ैज़ कुछ तुम सुनाओ शालीनता और संकोच से भरी मुलायम आवाज़ में फ़ैज़ ने कहा आपको में क्या सुनाऊ ? फिर सुनाया , मेरे दिल मेरे मुसाफिर ……. ग़ज़ल में तल्लीन हुए फ़िराक कुछ देर वैसे ही खोय रहे , फिर बोले ” फ़ैज़ किसी अंग्रेजी क्रिटिक के ये बात तुम्हारे लिए ही लिखी गयी लगती हे ही रोट लाइक ए पोएट ह्वाट ही फेल्ट लाइक ए मेन ( उसने एक कवि के रूप में वही लिखा जो एक इंसान के रूप में महसूस किया ) .

प्रस्तुति सिकंदर हयात