islam

( प्रस्तुति सिकंदर हयात )

इधर दारुल उलूम ने जन्मदिन मनाने के खिलाफ फ़तवा दिया की यह यहूदी ईसाई परम्परा हे और इस्लाम इसकी इज़ाज़त नहीं देता बैंक में काम करने बीमा कराने को भी देवबंद ने नाज़ायज़ करार दिया हे . कुछ ही दिन पहले उसमे संगीत और सिनेमा को भी इस्लाम के विरुद्ध करार दिया था . दरअसल उसका एक विभाग ही हे जो मुसलमानो के दुआरा पूछे जाने पर , या अपने आप फतवे देता रहता हे जब कोई फ़तवा सामान्य बुद्धि से कुछ ज़्यादा ही विचित्र परतीत होता हे तब किसी के दुआरा यह भी कह दिया जाता हे की ये फ़तवा इस्लाम की सही समझ नहीं हे मगर यह नहीं बताया जाता की तब भारत के सबसे बड़े और दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मदरसे से ऐसे फतवे किस आधार पर दिए जाते हे जबकि उसी मदरसो और उसके लोगो को इस्लामी ही नहीं तरह तरह के राजनितिक मामलो में भी तवज़्ज़ो दी जाती हे कुछ लोग यह कहकर ऐसे फतवो को हल्का करने की कोशिश करते हे की ऐसे फतवे मानता कौन हे ? पर वे भूलते हे की मुस्लिम समाज को इसकी इज़ाज़त नही हे की वह स्वय फैसला करे की इस्लाम क्या हे इसलिए अगर कोई फतवा लागू होता हे या नहीं यह साधरण मुस्लिम जनता के हाथ मे नहीं हे भारत इंग्लैंड या ईरान में भी कोई फतवा लागू होना किसी किताबी या बौद्धिक आधार पर तय नहीं होता यह फतवा जारी करने वालो की राजनितिक हस्ती और कटिबद्धता पर निर्भर हे !

दूसरे शब्दों में असल बात ही यही हे की किसी बिंदु पर इस्लामी प्रवाधान क्या हे इसकी कोई स्थायी सम्मति नहीं होती इसलिए जिस मामले में कोई गर्मागर्मी ना हो तभी ऐसी टिप्पणी की जाती हे की फतवे को मानता कौन हे . पर यह चतुराई भरी दलील हे जिससे एक बड़ी कठोर वास्तविकता को छिपाने की कोशिश होती हे यह वास्तविकता की फतवो की पूरी दुनिया एक ठोस अनम्य आधार पर हे जिन्हे कभी भी उतनी ही कठोरता से लागू किया जा सकता हे जब ऐसा होता हे जैसे खुमैनी या तालिबान के शासन में हुआ तब कोई नहीं कहता की उनके फतवे गैर इस्लामी हे उलटे तालिबान को दुनिया का सबसे सच्चा इस्लामी शासन कहने वालो की कोई कमी नहीं हे अतः सिद्धांत और वयवहार दोनों में ही यही देखा गया हे की इस्लामी मामलो में कोई भी बात सही ठहराई जा सकती हे
इसलिए ये बहस सिरे से गलत हे की इस्लाम की नज़र में सही क्या हे ? ऐसे मामले निरंतर आते रहते हे ? आतंकवाद और फिदायीन पर तो यह बहस बरायनाम हो गयी हे की उनके कारनामे इस्लाम के अनुरूप हे या नहीं . भारत में वन्दे मातरम गान के विरुद्ध फतवो पर भी यही इस्तिति हे सौ साल से इस पर कोई पक्की बात तय नहीं हो सकी हे जब जैसी राज़नीतिक इस्तिति हो , देशकाल के अनुपात में संबद्ध मुस्लिम नेता या मौलाना की ताकत के अनुसार यह बात उठी हे , जमी हे या ठन्डे बस्ते में डाली गयी हे उसी तरह परिवार नियोजन पोलियो का टीका स्कर्ट पहनना आदि पर भी ऐसी विविध बाते होती रही हे पर इन बहसों में विवेक और सिद्धांत के बजाय राज़नीतिक परिस्थितियों का तर्क अधिक चलता हे इसे मुसलमान तो जानते ही हे जानकार हिन्दू भी समझते हे अतः इसे झुठला कर फतवो पर हलकी बातें कहना किसी के हित में नहीं हे इतिहास मे कई उदहारण हे , सर सय्यद से लेकर मौलाना शौकत अली अब्दुल बारी , मुलाना आज़ाद जिन्ना आदि . इन महानुभावो ने समय समय पर एक ही विषय जैसे कौमियत हिज़रत हिन्दू मुस्लिम एकता गौ हत्या देशभक्ति आदि पर निताांत विपरीत बयान दिए की इस्लाम के अनुसार क्या होना चाहिए या फिर यह या वह आह्वान किये उनके ऐसे बदलाव कोई इस्लाम की बदली समझ के परिणाम नहीं थे वह मात्र राजनितिक परिस्तिति और शक्ति सतुलन बदलने का फल था इस्लाम तो वही का वही रहा हे पर उससे जुड़े मामलो में निर्णय देश काल राज़नीति सापेक्ष होते रहे हे ये मामले कोई सीमित भी नहीं हे जीवन के हर पक्ष को ये अपने घेरे में लेते हे केवल समय की बात हे कब किसी विषय को उठाया जाता हे , या रहने दिया जाता हे

अतः किसी भी विषय को सही इस्लाम के तर्क से तय करने की कोशिश व्यर्थ हे बल्कि फतवे देने वालो को उस तर्क से समझाना विपरीत परिणाम लाता हे . क्योकि यह तो हर बात के लिए इस्लाम को कसौटी मान लेना हुआ जैसे अगर स्वामी रामदेव कहते हे की वन्दे मातरम में मूर्ति पूजा का कर्मकांड नहीं इसलिए मुसलमानो को विरोध नहीं करना चाहिए तो इसका अर्थ ये हे की वे मूर्ति पूजा को गलत मान रहे हे . फिर तो बस बात इतनी रह जाती हे की इस्लाम में क्या जायज़ हे क्या नहीं . उसका निर्णय कोई मुफ़्ती या कोई आयतुल्ला करेगा या कोई हिन्दू स्वामी ?

दरअसल जन्मदिन मानाने पोलियो के टीके या वन्दे मातरम का विरोध कोई स्वतंत्र मुद्दा नहीं हे . यह इस्लाम और मानवता की सामान्य बुद्धि के अंतर्विरोध का प्रशन हे अलग अलग मुद्दो पर तरह तरह की दलीले आती रहती हे पर ध्यान देने की बात ये हे की मुस्लिम आलिमो में किसी भी ऐसे मुद्दे पर कोई बड़ा विवाद हे ही नहीं . उदहरण के लिए वन्दे मातरम को ले वे सभी मानते और जानते हे की इस्लाम में कौम या वतन का सवाल उम्मा हिज़रत दारुल हरब और दारुल इस्लाम की मूल धारणाओं से अभिन्न हे इसका एक फैसला तो यहाँ 1947 में हो ही चुका . उसकी सीख को याद रखने की जरुरत हे इस्लाम बदला नहीं हे केवल भारत के कर्णधार बदले गए हे जिन्हे इतिहास और सिद्धांत मालूम नहीं .

वहीं बात लड़कियों की शिक्षा बुर्के बैंकिंग पेटिंग फोटोग्राफी आदि बके बारे में भी सही हे . इन पर इस्लामी निर्देशो में विशेष मतभेद नही हे इससे कतरा कर हम अपने देश या मुसलमानो का भला भी नहीं कर सकेंगे इस्लाम में मज़हब समाज राज़नीति कानून सब कुछ अभिन्न हे इसलिए इसे ‘ दीन ‘ और ‘ दौला ‘कहा जाता हे . इसमें इस्लाम ही सर्वस्व का भाव स्थापित हे . उसके सामने परिवार या समाज या देश किसी को भी अहमियत नहीं दी जा सकती हे , उसे कुफ्र माना गया हे इसलिए शाह वलीउल्लाह , सैय्यद बररेल्वी सर सय्यद से लेकर मौलाना हाली मौलाना मौदूदी . सर इकबाल अली बंधू जैसे मुस्लिम रहनुमाओ की पूरी श्रंखला ने भारतीय राष्ट्रवाद या समाज जैसी चीज़ो को ख़ारिज किया था . इसलिए विचित्र फतवे सुनकर इस या उस मौलाना पर हंस कर बात को आई गयी समझना बड़ी भूल हे समस्या यह या वह संकीर्ण फतवेकार नहीं हे . ना समाधान किसी उदार मौलाना को ढूंढ निकालने में हे . मूल समस्या वह मतवाद हे जो मुस्लिम समाज को निर्देशित करता हे . अगर कभी नहीं कर पाता तो राजनीतिक विवशता और शक्ति की कमी से . पर हमारे बुद्धजीवी उस मतवाद से बहस ही नहीं करते उलटे उसके निर्देशो की ही सुन्दर व्याख्या ढूंढने लगते हे यानी जो समस्या का कारण हे उसे ही कसोटी बना लेते हे की इस्लाम यह नहीं वह हे . इस कवायद से उल्टा फल मिलता हे कटटरपंथी उलेमा का अपने अंधविश्वास पर भरोसा और बढ़ जाता हे इस विशवास पर की इस्लामी निर्देश सामान्य बुद्धि मानवता देश सविधान समाज आदि हर चीज़ से ऊपर हे .

अतः जिस विचार से सीधी अलबत्ता शालीन और सदभावना पूर्ण बहस होनी चाहिए उसी को सिरोपा चढ़या जाने लगता हे तब सामान्य मुस्लिम विवेकशील चिंतन करने के लिए कैसे प्रेरित होंगे जब किसी संकीर्ण मतवाद से संघर्ष के बजाय सदा उसी के समक्ष श्रद्धानत रहने की नीति रहे ? भारत के आदर्शवादी सेकुलर वामपंथी और राष्ट्रवादी सभी तरह के बुद्धिजीवियों ने यहाँ मुसलमानो को एक मज़हबी राजनीतिक अतर्राष्ट्रीयवाद के अधीन फंसे रहने के लिए निहथा छोड़ दिया हे . इसलिए को भी देशी विदेशी इमाम या आयतुल्ला जब चाहे अपने चित्र विचित्र फतवो और आह्वानो से सम्बोधित करता रहता हे

जिन विचारो की खुली आलोचना नहीं होगी इसका मतलब होगा की उन्हें हम गलत नहीं मानते हे . शरीअत और सामान्य बुद्धि का , या इस्लामपरस्ती और वतनपरस्ती का सम्बन्ध वैसे ही विचार हे अभी पाकिस्तान में अनेक पाकिस्तानी अपने वतन के बदले इस्लाम के आधार पर तालिबान से सुहानुभूति रखते हे . यह कहना बचकानापन ही होगा की उन्हें इस्लाम की सही समझ नहीं हे . यह दुनिया भर का अनुभव हे की मुसलमानो में उदार मानवतावादी लेखक कवि या देशभक्त नेता इस्लाम की उपेक्षा करके ही वैसा हो पाते हे . सर इकबाल की मश्हूर पुस्तक शिकवा और जवाब ए शिकवा के अलावा डॉ आंबेडकर की पुस्तक थाट्स ओन पाकिस्तान , जीनत कौसर की इस्लाम एंड नेशनलिज़्म , प्रो मुशीरुल हक़ की पुस्तक धर्मनिरपेक्ष भारत में इस्लाम , या शब्बीर अहमद और आबिद करीम की द रूट्स ऑफ़ नेशनलिस्म इन द मुस्लिम वर्ल्ड आदि पुस्तको से भी समझा जा सकता हे दुनिया में कही भी मुसलमानो में उदार लेखको नेताओ की नहीं चलती . खुद जिन्ना जैसे आधुनिक सेकुलर तेज़तर्रार नेता मुसलमानो के बेताज बादहशाह तभी बने जब उन्होंने इस्लामी कोल अपनाया जबकि निजी जीवन में उन्हें इस्लाम से कोई मतलब ना था इसे मुस्लिम जानते भी थे इसके उलट पुरे इस्लामी तरीको से चलने वाले बादशाहखा मुसलमानो के मान्य नेता ना हो सके क्योकि वो इस्लामी मांगे नहीं कर रहे थे यह अंतर ध्यान देने योग्य हे जैसे उस ज़माने में वैसे ही आज हमारे अब्दुल कलाम या सलमान खुर्शीद या एम जे अकबर आदि उदार नेता और लेखक साधारण मुसलमान को प्रभावित नहीं कर पाते आज भी सिमी या बुखारी जिलानी मदनी ही मुसलिम नेता हे इसके पीछे की विराट सच्चाई से कतरा कर टिका टिप्पणी करना आम लोगो को बरगलाने के सामान हे अतःकिसी भी फतवे और इस्लामी निर्देश पर बहस हो तो उसे ईमानदारी से चलना चाहिए दिल को बहलाने को हर ख्याल अच्छा नहीं होत

( लेखक शंकर शरण का फतवो पर लिखा यह लेख कुछ वर्ष पूर्व जनसत्ता में छापा था वही से साभार )