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सैय्यद नवाब अली सरयावी

आज पूरा विश्व विकास की ओर बढ़ रहा है, लेकिन मदरसों के स्तर में दिन-प्रतिदिन गिरावट हो रही है, जबकि इनकी संख्या में वृध्दि हो रही है। आखिर क्या कारण है कि आज के समय में किसी मदरसे से कोई बड़े विद्वान, शोधकर्त्ता और वैज्ञानिक नहीं निकल रहे हैं, जबकि पिछली सदियों में कई विभूतियां सामने आईं जिनका शैक्षिक सम्बंध मदरसे से था, और यहीं से उन्होंने शिक्षा दीक्षा हासिल की और विश्व के ज्ञान व साहित्य के क्षेत्र में सेवा की, जिनको विश्व भुला नहीं सकता और हमेशा उनका कृतज्ञ व ऋणि रहेगा। इनमें से कुछ के नाम इस प्रकार हैं।

इब्न बिलजब्र (फादर आफ अलजेब्रा), इब्ने सिना (फादर आफ मेडिस्न), जाबिर बिन हय्यान (फादर आफ केमिस्ट्री), खलदून (फदर आफ सोशोलोजी एण्ड पोलिटिकल साइंस), अलक़ासिम अलजब्बारबी (फादर आफ सर्जरी), इब्ने नफीसी (फादर आफ ब्लड प्रेशर), और अहमद मेमार जिसने ताजमहल का नक्शा तैयार किया। ये मदरसे के छात्र रहे हैं जिन्होंने केमिस्ट्री, अलजेब्रा, सोशियोलोजी, पोलिटिकल साइंस और मेडिसिन की दुनिया में जान डाली और उसको परवान चढ़ाया लेकिन आज इनकी आत्माएं मदरसों के वर्तमान स्थिति से आहत होंगीं, और इसका कारण आधुनिक शिक्षा न देना है, क्योंकि जो व्यक्ति विश्व परिदृश्य, वैज्ञानिक शोधों और इतिहास के ज्ञान से अनभिज्ञ हो वो एक अच्छा लीडर और पथप्रदर्शक नहीं बन सकता है। हज़रत अली (रज़ियल्लाहू तआला अन्हा) ने कहा है कि अपने बच्चों को वर्तमान के अनुसार शिक्षा दो न कि अपने समय के अनुसार से क्योंकि इनको आने वाले समय के लिए पैदा किया गया है। पैग़म्बर मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) ने कहा है कि शिक्षा ग्रहण करना हर मुसलमान मर्द और औरत का कर्तव्य है और ये भी कहा है कि शिक्षा हासिल करो चाहे इसके लिए चीन भी जाना पड़े। इन दोनों हदीसों में किसी विशेष शिक्षा की ओर इशारा नहीं किया है, न तो आधुनिक और न ही मदरसे की, इसीलिए किसी भी शिक्षा को दूसरे पर श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है। ये अलग बात है कि कुछ ज्ञान को सीखने में जल्दी करनी चाहिए, क्योंकि जब इमाम अबु जाफ़र से पूछा गया कि विभिन्न ज्ञान में से किस ज्ञान को दूसरे पर श्रेष्ठता प्राप्त है, तब आपने कहा कि किसी भी ज्ञान को किसी अन्य पर श्रेष्ठता नहीं प्राप्त है लेकिन ज्ञान से लाभ प्राप्त करने के मामले में अंतर पाया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप मानव के लिए आवश्यक है कि कुछ विषयों का ज्ञान प्राप्त करने में जल्दी करे और ज़्यादा से ज़्यादा फायदा उठाये और वर्तमान समय में दो ज्ञान से ज़्यादा फायदा उठाये, एक है धर्म का ज्ञान और दूसरा है औषधियों का ज्ञान(मेडिसिन)।

आपका ये विश्वास था कि ज्ञान की जितनी वृध्दि होगी वो धर्म के लिए उतनी ही लाभकारी होगी और ये शोध ज्ञान में रुकावट भी नहीं बनेगा। जबकि दूसरे समुदाय विशेषरूप से ईसाई समुदाय में ज्ञान प्राप्त करने लिए शोध को धर्म के लिए खतरा माना जाता है। इसी कारण राबर्ट हुक ने तीन सौ साल पूर्व लंदन में ज्ञान के लिए होने वाले शाही आयोजन के संस्थापकों से कहा कि हमारे धर्म को ज्ञान के लिए होने वाले शोध में रुकावट नहीं बनना चाहिए, जबकि इस्लाम ने प्रारम्भ से ही ज्ञानार्जन और ज्ञान के लिए होने वाले शोध पर जोर दिया, लेकिन अफसोस की बात ये है कि हमारे मदरसे रोमन कल्चर का पालन कर रहे हैं, क्योंकि ईसाईयों के मदरसे में जिसे अंग्रेज़ी में सिमेज़ी कहा जाता है, इसमें कानून का ज्ञान दिया जाता है, यानि केवल धर्म की बातें और ये तरीका हमारे मदरसों में भी आ गया है, जिस कारण से वो आधुनिक शिक्षा को अपने लिए ज़हर मानते हैं।

इसके बारे में विख्यात इतिहासकार और शोधकर्त्ता ज़ियाउद्दीन बर्नी ने लिखा है जिसका उल्लेख नफीस अहमद ने 22 अप्रैल, 2007 को फारूकी तंज़ीम बिहार में किया है। वो लिखते हैं कि ”हर तरह के टीचर को आदेश दिया गया है कि वो निम्न परिवारों में जन्में लोगों और अनपढ़ों को न पढ़ायें और छोटे लोगों को नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात के बारे में ही बतायें। उन्हे सिर्फ़ कुरान पढ़ायें, जिसके बिना ये धर्म पूर्ण नहीं होता है। उन्हें ज़्यादा पढ़ना लिखना न सिखाएं, क्योंकि अगर ये लोग ज़्यादा पढ़ लिख गये तो समाज में कई बुराईयाँ पैदा हो जायेंगीं। नफीस अहमद कहते हैं कि एपीजे अब्दुल कलाम, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और डाक्टर इक़बाल ने भी प्रारम्भिक शिक्षा मदरसे में ही प्राप्त की थी, लेकिन उनको ये दर्जा बाद में हासिल की गयी उनकी आधुनिक शिक्षा ने दिलाया, आगे बताते है कि दुर्भाग्यवश हिंदुस्तानी मदरसों ने भी खुद को कुरान ,हदीस, नमाज़, रोज़ा और हज व ज़कात तक ही सीमित कर लिया है और आधुनिक शिक्षा को ज़हर समझने लगे हैं।

अतः प्रारम्भ में आवश्यकता है कि सात या दस साल तक विभिन्न ज्ञान की शिक्षा दी जाए और फिर भविष्य के लिए कोई विषय दे दिया जाये जो छात्र को सबसे प्रिय हो, और हर मदरसे का पाठ्यक्रम और शिष्टाचार के नियम एक हों, और एक ही शिक्षा केन्द्र से जुड़ा हुआ हो, ताकि उच्च शिक्षा के लिए आगे कोई बाधा न उत्पन्न हो, और पाठ्यक्रम में परिवर्तन और संकलन करने वाले इस क्षेत्र के ज्ञाता हों। उनके उल्लेख का क्षेत्र विस्तृत एवं अर्थपूर्ण हो, और पाठ्यक्रम की पुस्तकें छात्रों की निजी हों, तभी मदरसे अपने गंतव्य तक पहुँच सकते हैं और तभी सफल हो सकते हैं, और मदरसों में आवश्यक है कि शिक्षक योग्य, उच्च नैतिकता वाले हों, क्योंकि जब ये लोग दुनिया की लालच करने वाले होगें, तो अधिकारों का हनन होगा, और मदरसे की कार्यप्रणाली सही नहीं चलेगी और हज़रत अली (रज़ियल्लाहू तआला अन्हा) ने कहा है कि ईश्वर के आदेश को वही लागू कर सकता है जो अधिकार के मामले में नरमी न बरते, विनती न करे और कमजोरी को न दिखाएं, और लोभ के पीछे न पड़े (नहजुल बलाग़ा कलमात क़सार)

इसलिए अच्छे चरित्र वाले शिक्षक होना ज़रूरी है, क्योंकि जो खुद बुरा होगा वो सही रास्ते का मार्ग दर्शन नहीं करा सकता है। इसकी मिसाल दर्ज़ी की तरह है। अगर दर्ज़ी अपने कार्य में निपुण है तो खराब कपड़े को पहनने लायक औऱ अच्छा बना देगा, लेकिन अगर दर्ज़ी खराब है तो अच्छे और कीमती कपड़े को बर्बाद कर देगा। इसी प्रकार से यदि शिक्षक अच्छा है तो अनपढ़ और कामचोर छात्र को भी शिक्षित कर देगा लेकिन अगर वो स्वयं अनपढ़ और बुरे चरित्र का है तो अच्छे और समझदार छात्र को भी बिगाड़ देगा। इसलिए आवश्यक है कि शिक्षक अच्छे आचार व्यवहार वाले हों, और धार्मिक मामलों में लगे हों। शिक्षको को चाहिए कि प्रारम्भ में छात्रों को आस्था की शिक्षा दें, क्योंकि सारे क्रिया कलाप आस्था पर निर्भर है, अगर आस्था गलत होगी तो कोई भी काम लाभकारी नहीं होगा, इसलिए विश्वास का मज़बूत होना ज़रूरी है। यही वजह है कि अमीरुल मोमिनीन ने अपने बेटे को निर्देश देते हुए कहा कि मैंने चाहा था कि पहले तुम्हें ईश्वर की किताब और शरीअत के आदेश व हराम-हलाल की शिक्षा दूँ और इसके अलावा दूसरी चीज़ों के विषय में न सोचूँ, लेकिन ये आशंका पैदा हुई कि कहीं वो चीज़े जिन में लोगों के विश्वास और धार्मिक विचार में मतभेद हैं, तुम्हारे लिए उसी प्रकार संदेहास्पद न हों जायें जिस प्रकार उनके लिए हो गयीं हैं। इसके बावजूद कि मुझे ये नापसंद था कि तुमसे इन गलत विश्वासों के बारे में बात करूँ, मगर इस पक्ष को मज़बूत कर देना तुम्हारे लिए मुझे बेहतर मालूम हुआ, और समाज के मतभेदों से बचने के लिए आवश्यक है कि हम अपने विश्वास के आधार को मजबूत करें, ताकि मतभेद के कारण हमारे विश्वास का आधार खोखला न हो जाए।

इसलिए विश्वास पर ज़ोर देना चाहिए और शिक्षा में हर वो तरीका प्रयोग करना चाहिए जो छात्रों को शिक्षा से जोड़ने में मददगार साबित हो। यही कारण है कि इमाम जाफर सादिक़ ने पद्य साहित्य की शुरुआत की और बेहतरीन पद्य लिखने वाले को ईनाम दिया, इसका परिणाम ये हुआ कि बहुत सारे पद्य लिखने वाले पैदा हुए। आपने शुरु में तीन जज नियुक्त किये, दो शिष्य और स्वयं इसमे थे, बाद में इसे पांच जजों की कमेटी बना दी। जिसे तीन जज ईनाम का हक़दार बना देते उसे ईनाम दिया जाता था। इस तरीके से इमाम ने लोगों को शिक्षा की ओर आकर्षित किया, इसलिए आवश्यक है कि मदरसों को इन पर ध्यान देना चाहिए।

मदरसों में खेल और व्यायाम भी पाठ्यकम का हिस्सा होना चाहिए, क्योंकि इससे मस्तिष्क स्वस्थ रहता है और इससे बहुत सी बीमारियों से रक्षा भी हो जाती है। इस तरह के के तमाम कार्यों का प्रबंधन एक व्यक्ति के ही हाथ में होना चाहिए जो सबका इंचार्ज हो। हज़रत अली (रज़ियल्लाहू तआला अन्हा) ने कहा है कि सफल वो है जो समाज को अशांति से दूर रखे अन्यथा दूसरो के लिए सत्ता छोड़ दे, क्योंकि जब कई शासक होंगें तो प्रशासन चलाना मुश्किल होगा। अध्यापकों को चाहिए कि छात्रों को इस बात के लिए तैयार करें कि वो अपना ध्येय सुनिश्चित करें, और ज्ञानार्जन का उद्देश्य रोज़गार प्राप्त करना न हो बल्कि ईश्वर का सानिध्य प्राप्त करना होना चाहिए। रोज़गार प्राप्त करने के लिए कोई हुनर सीखना चाहिए या कारोबार करना चाहिए, जिससे किसी पर निर्भर न हो, लेकिन धार्मिक ज़िम्मेदारियों को भी पूरा करे। हज़रत अली (रज़ियल्लाहू तआला अन्हा) ने कहा है कि जो लोग अपनी दुनिया संवारने के लिए धर्म से हाथ उठा लेते हैं, ईश्वर ऐसे लोगों के लिए फ़ायदे से ज़्यादा नुक्सान की स्थितियां बना देता है। इसलिए हमें अपनी ज़िम्मेदारियों का ख्याल रखना चाहिए और अंत में ईश्वर से प्रार्थना है कि वो हम सबको ज्ञान दे और उनका पालन करने वाला बनाये (आमीन)

(उर्दू से हिंदी अनुवाद- समीउर रहमान, )

URL: http://www.newageislam.com/NewAgeIslamHindiSection_1.aspx?ArticleID=5226