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मैं एक भारतीय मुसलमान हूँ , इसी भारतीय समाज में हूँ , जागरूक हूँ , व्यवहारिक हूँ , समाज में हो रहे बदलाव को देख रहा हूँ समझ रहा हूँ , मैं भी इस देश में मुसलमानों की बदहाली का गवाह हूँ , मैं देखता हूँ कि मेरे आसपास कैसे हजारों परिवार दो वक्त की रोटी के लिए जद्दोजहद करते हैं , कोई पंचर बनाता है तो कोई कबाड़ खरीद फरोख्त करता है तो कोई रिक्शा चलाता है पर कोई शिक्षा के लिए नहीं जाता दिखता क्युँकि घर का चुल्हा जलना जीवन के लिए कहीं ज़रूरी है , और धर्म के लोग भी यह सब करते हैं पर मै जो देखता हूँ वह महसूस कर रहा हूँ कि आजादी के 68 वर्षों में मुसलमानों के साथ न्याय नहीं हुआ और यह सच है ।देश के आजादी के समय 22% नौकरी में रहने वाला एक समाज बच्चों को दो वक्त की रोटी देने और सिस्टम के भेदभाव में ऐसा उलझा कि 1•5% भी नौकरियों में नहीं रहा ,हम देख रहे हैं कि कैसे सच्चर कमेटी , रंगनाथ मिश्र कमेटी , कुंडू कमेटी , श्रीकृष्ण कमेटी बनाई जाती है और इनकी रिपोर्ट कूड़े के ढेर में फेंक दी जाती है, हम सब देख रहे हैं समझ रहे हैं महसूस कर रहे हैं और हमें भी दुख है कि हम लाचार हैं , हमारा कोई नेता आजतक ना हुआ यह टीस भी है ।

इसलिए मुझे भी असदुद्दीन ओवैसी की बातें अच्छी लगती हैं , मुझे भी आराम मिलता है जब ओवैसी हमारे ज़ख्मों पर अपने दमदार तर्कों से मरहम लगाते हैं , मेरा भी दिल कहता है कि मैं ओवैसी के साथ चलूँ क्योंकि यह एक बंदा है जो मुसलमानों के हक की बात करता है चाहे उसपर कितने ही आरोप क्युँ ना हों , मेरा दिल भी सोचता है कि भारत की राजनीति ऐसे ही तो होती है कि रोज एक समुदाय को गलियाते रहो और चर्चा में आते रहो फिर सत्ता हथिया लो और इस देश के सारे सिस्टम को अपने लिए बदल लो तो यही तो ओवैसी भी करते हैं ।मुझे भी वह आकर्षित करते हैं जब संसद में एक अकेले अपने तथ्यों और तर्कों से सबको चुप करा देते हैं , आखिरकार किसी भी कौम का नेता कैसा होना चाहिए ? बिल्कुल असदुद्दीन ओवैसी जैसा ही होना चाहिए जिसमें एक उम्मीद तो दिखती है वर्ना तो ऐसे भी नेता हैं जिन्होंने मुसलमानों के वोट के कारण मलाई खाई और जब कुछ करने के लायक हुए तो मुसलमानों से अधिक भैंस के लिए परेशान रहे , मुझे भी तकलीफ होती है कि ऐसे मुस्लिम बिकाऊ नेता जो आज यदि उत्तर प्रदेश सरकार से वादा किये 18% आरक्षण को लेकर विद्रोह कर दें तो सरकार की चूलें हिल जाएँ पर भैंस मिल गई तो मुसलमान जाएँ भाड़ में , यह सोचता हूँ तो ओवैसी अच्छा लगता है , पर फिर मुझे मेरे महात्मा गाँधी याद आते हैं तो सोचता हूँ कि कभी गाँधी यदि सपने में ही सही मिल गये तो कैसे नज़र मिलाऊंगा उनसे कि सिद्धांततः जिस कार्य पद्धति का सदैव विरोध किया वही पद्धति को समर्थन दे दिया केवल अपने तुच्छ लाभ के लिए ? तब याद आते हैं मुझे मेरे वह 80% हिन्दू भाई जो हमेशा मेरे साथ थे और हैं जिनको इन्हीं ओवैसियों ने गालियाँ दीं श्रीराम की माँ को गालियाँ दीं तो कैसे भूल जाऊँ कि जो 80% हिन्दू भाई हमारे लिए अपने ही समाज के 20% संघियों से लड़ते रहे लतियाते रहे उनको उनके भगवान को गालियाँ देने वालों का मै समर्थन करूँ ? मेरे तो सभी व्यक्तिगत मित्र ही हिन्दू भाई हैं जो मेरी एक आह पर भागे घर चले आते हैं तो इनको गालियाँ देने वालों का समर्थन मैं कैसे करूँ ? मेरे घर से निकलते ही मेरे व्यवसाय के जो 99% हिन्दू भाईयों ने हमेशा मेरा साथ दिया उनको गालियाँ देने वालों का समर्थन मैं कैसे करूँ ?

इससे अच्छा मैं जैसा हूँ वैसा ही रहना पसंद करूँगा , नहीं चाहिए ऐसा न्याय जो ओवैसी देना चाहता है , नहीं चाहिए ऐसा सुख ऐसा ऐश्वर्य जो ओवैसी दिलाना चाहता है , नहीं चाहिए ऐसी सुरक्षा जो ओवैसी देने का वादा करता है , हम ऐसे जीवित रहने से बेहतर किसी उन्मादी भगवा भीड़ के चंगुल में फंस कर मरना पसंद करेंगे घर का जलना पसंद करेंगे , बहन बेटियों पर अत्याचार भी बर्दाश्त कर लेगें पर हमारे सुख दुख के साथी हमारे 80% भाईयों को गाली देने वालों को आगे करके अपना हक छीनूँ यह मंजूर नहीं क्युँकि हम एहसान फरामोश नहीं।इस देश में हम मुसलमानों की ताकत हमारे ये 80% हिन्दू भाई ही हैं और उनको और उनके भगवान को गालियाँ देने वालो उनको कुत्ते की औलाद कहने वालों के दिलाए हक और समृद्धि से बेहतर है कि हम नंगे भूखे ही रहें ।

ओवैसियों हम जैसों का साथ चाहते हो तो सर्वाजनिक रूप से हिन्दू भाईयों से माफी मांगनी होगी जब वह माफ कर देगें हम उनके साथ ही तुम्हारे समर्थन में खड़े होंगे नहीं तो हम जैसे हैं वैसे ही भले ।