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ग्लैमर एक ऐसा आकर्षण है जिसके सामने कुछ नहीं दिखता और ग्लैमर यदि महिला के कारण है तो क्या कहने और यदि ग्लैमर चरित्रहीन महिला के हैं तो वाह भाई वाह , कुल मिलाकर चटपटी मसालेदार कहानी हो तो दुनिया गई भाड़ में सारा मीडिया उसी ग्लैमर की चकाचौंध में अंधा हो जाएगा और बाकी मुद्दे जाएँ भाड़ में ।सवाल 90 लोगों के चीथड़े उड़ जाने का है जो ग्लैमरस राधे माँ और इंद्राणी मुखर्जी की भेट चढ़ गया या चढ़ा दिया गया , यदि आप जागरूक हैं तो आप महसूस करेंगे कि झाबुआ ब्लास्ट के बाद ग्लैमरस राधे माँ की वापसी हो गई और एक चैनल पर मारपीट भी ।

मध्यप्रदेश के झबुआ में सिलेंडर के फटने से जो आग लगी उसका कारण जानते हैं क्या था ? उसका कारण था “जिलेटिन” जो उस जगह भारी मात्रा में रखा गया था और इस जिलेटिन में लगी आग इतनी भयावह थी कि होटल में रखे सिलेंडर चपेट में आकर बम की तरह ब्लास्ट हुए और सरकारी आंकड़े के अनुसार 82 लोग मारे गये , मीडिया मस्त है इंद्राणी मुखर्जी के संबंधों में जीतन माझी में , दरअसल इस देश में भाँड मीडिया को दिखाने के लिए अब केवल राजनीतिक और चरित्रहीन लोगों की कहानियाँ ही अहम हैं ।आप जानते हैं कि “जिलेटिन” क्या होता है ?हम ‘जिलेटिन’ के रूप में गाय का मांस खाते हैं और यह गाय की बड़ी आंत और चमड़े को गला कर बनाया जाता है ।

जिलेटिन को गायों की सड़ी हुई खालों, कुचली गई हड्डियों को उबाल कर बनाया जाता है। जिलेटिन बनाने वाले संयंत्र प्राय: वधगृहों के निकट होते हैं और जिलेटिन फैक्टरियों के स्वामियों के अक्सर अपने वध-गृह होते हैं जहां पशुओं की केवल उनकी खाल तथा हड्डियों के लिए हत्या की जाती है। जब भोजन संयंत्रों पर पशु के अंग आते हैं तो गुणवत्ता हेतु उनकी जांच की जानी तथा सड़े हुए हिस्सों को अलग किया जाना होता है। भारत में कोई जांच प्रणाली नहीं है इसलिए इसे तो आप नकार ही सकते हैं। हड्डियों, टिशुओं को काटने की मशीनों में डाला जाता है जो उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काट देती है।

किसी जिलेटिन फैक्टरी में छत पर गाय की खालों का ढेर लगा रहता है। खालों को सडऩे या ‘उपचार’ हेतु लगभग 1 माह तक चूने के ढेरों में रखा जाता है। उस फैक्टरी से निकलने वाली दुर्गंध मीलों दूर तक फैली हुई होती है। खालों के पक जाने के पश्चात उन्हें एसिड की टंकियों में डाला जाता है जो गाय के बाल, चमड़ी, कारटिलेज को अलग कर देता है। कॉस्टिक चूने या सोडियम कार्बोनेट जैसे एसिड या एल्कलाइनों का उपयोग किया जाता है। एसिड (तेजाब) उपचारित कच्चे माल से प्राप्त जिलेटिन को ए-प्रकार का और अलकली (क्षार) उपचारित कच्चे माल से प्राप्त जिलेटिन को बी- प्रकार का जिलेटिन कहा जाता है। (खरीदने वालों को इस भ्रम में डालने के लिए कि वे शाकाहारी विकल्प को खा रहे हैं, कई भोजन उत्पाद अपने अवयवों की सूची में बी-प्रकार का जिलेटिन डालते हैं)।इसे पानी में धोया जाता है और फिर तब तक पकाया जाता है जब तक कि यह एक सफेद घोल या जैल न बन जाए। जिलेटिन घोल से अलग करने के लिए इस जिलेटिन को फिर छान कर तथा सुखा कर विभिन्न कम्पनियों को भेजा जाता है। अब गाय की खाल और हड्डियां एक हल्के पारदर्शी, रंगहीन, आसानी से टूटने वाले, स्वाद रहित ठोस पदार्थ में परिवर्तित हो जाती हैं जिसे जिलेटिन कहा जाता है। वाणिज्यिक रूप से विनिर्मित जिलेटिन को 1/4 औंस के सूखे दानों वाले, कागज जितनी पतली शीटों के लिफाफों में पैक किया जाता है जिन्हें पत्तियां या घुलने वाले ब्लाक कहा जाता है। खाद्य जिलेटिन को तैयार करने के लिए इसमें मीठा, स्वाद तथा रंगों को मिलाया जाता है।

जिलेटिन प्रयुक्त करने वाले आम भोजन जिलेटिन डेसर्ट, जैली, ट्राइफल्स, एस्पिक, मार्शमैलो, योगहर्ट, जैली बेबीज, पारदर्शी मिठाइयां, जैम, क्रीम, पनीर, च्युइंगम, केक, आइसिंग और फ्रॉसिंटग, बवेरियन क्रीम, खट्टी क्रीम, टर्किश डिलाइट, मारगरीन, केकके मिश्रण, आईसक्रीम, कॉफी तथा पाऊडर वाला दूध है।
कहने का अर्थ यह है कि भारी मात्रा में जिलेटिन कैसे इकट्ठा हुआ और इसका अवैध निर्माण कैसे हुआ इस पर पूरा सिस्टम चुप है ।

खबरें इशारे पर कैसे दबाई जाती हैं यह घटना इसका भी गवाह है ।झबुआ में अपराधिक गिरोह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य राजेन्द्र कसवा विस्फोटक सामग्री का एक तस्कर था जो विस्फोटक रखने के जुर्म में 35 वर्ष पहले पहली बार गिरफ्तार हुआ था ।जिलेटिन की छड़ें माईन और पहाड़ों को उड़ा देने के प्रयोग में लाई जाती हैं और यह लगभग थोड़ी कम क्षमता के आरडीएक्स के बराबर विस्फोट करती हैं , सवाल यह है कि फटाके बनाने वाले छोटे मोटे निर्माताओं को फुसफुसहा बारूद प्राप्त करने के लिए सरकार की व्यवस्था में नाको चने चबाने पड़ते हैं वहीं कसवा के इतने बड़े पैमाने पर आरडीएक्स जैसा विस्फोटक जमा कर लेने के बावजूद सरकार अथवा प्रसासन को कोई सूचना नहीँ यह कैसे संभव है ? निश्चित ही संघ के सदस्य का होना एक दबाव रहा होगा ।संघ के उपर जिस तरह आतंकवादी घटनाओं और साजिशें करने के आरोप लगे हैं यदि उस संदर्भ में देखें तो क्या यह जखीरा बिहार चुनाव से पूर्व किसी विस्फोट की तैयारी तो नहीं ? क्या किसी गोधरा जैसी घटना की तैयारी तो नहीं ? जिससे एक धर्म के विरूद्ध ध्रुवीकरण हो और सत्ता प्राप्त की जा सके ? यह सत्ता के लिए कुछ भी कर सकते हैं क्युँकि जब यह 56 लाशों का प्रदर्शन उत्तेजना फैलाकर दंगे कराकर चुनाव जीतने के लिए कर सकते हैं तो लाशों को बिछा देने का इनका इतिहास ही भरा पड़ा है ।

एक और बात कि नगर निगम के चुनाव में भाजपा सभासदों की जीत जैसी छोटी बात पर ट्विट करके बधाईयाँ देने वाले हमारे प्रधानमंत्री के पास मृतकों के प्रति संवेदना के दो शब्द नहीं हैं और इसका कारण केवल घटना को प्रचारित ना करने देना है , ध्यान दीजिए कि यदि यह घटना किसी गैर भाजपा शासित प्रदेशों या किसी मुस्लिम के घर पर होती तो एनआईए सीबीआई और स्वयं डोभाल का दौरा हो चुका होता ।

कुछ गड़बड़ तो है और इसका सामने आना इन अपराधिक सोच की सरकारों के रहते असंभव है ।आखिरकार भाजपा सरकारें इतनी मौतें क्युँ लेती हैं ? हो सके तो कोई जवाब दे दे ।
।घटना में मरने वालों को विनम्र श्रृद्धान्जली ।