bhasha

साहित्य और पत्रकारिता का तारतम्य कब कैसे टूटा और कैसे संवाद की भाषा शहरी मिजाज के साथ पत्रकारिता ने अपना ली इसके लिये कोई एक वक्त की लकीर तो खिंची नहीं जा सकती । लेकिन यह कहा जा सकता है कि 1991 के बाद जब सत्ता ने ही कल्याणकारी राज्य की जगह उपभोक्ता वादी राज्य की सोच अपना ली वैसे ही सत्ता की नीतियां उन नागरिकों से भी हट गयी जो उपभोक्ता नहीं थे । और शायद इसी दौर में पहले अंग्रेजी अखबारों से हिन्दी अखबारो में अनुवाद का चलन और उसके बाद निजी समाचार चैनलो के जरीये हिंग्लिश को अपनाना । तो सोच उपभोक्ताओं को लेकर ही जागी । पत्रकारिता को भी लगा कि उसके उपभोक्ता जिस भाषा को सरलता से बोलते है तो उसी भाषा को पत्रकारिता भी अपना ले तो ज्यादा जल्दी पाठको से जुड़ा जा सकता है । फिर खुली अर्थव्यवस्था ने जब सबकुछ बाजार के हवाले करते हुये बाजार को ही मानक मान लिया तो बाजार की भाषा ठीक वैसी ही चल पड़ी, जिसमें पत्रकारिता को भी उत्पाद के तौर पर ले लिया गया। ध्यान दें तो यह बहुत बारीक रेखा है कि कैसे राज्य सत्ता की सोच बदलने के साथ हर वह धंधा बदल जाता है जो पूंजी पर टिका हो और जिसका पहला और आखिरी मंत्र मुनाफा बनाना ही हो । मीडिया या पत्रकारिता दोनों ही इससे हटकर नहीं है। तो कह यह भी सकते हैं कि अब वह दौर नहीं कि साहित्यकार संपादक हो जाये या संपादक किसी साहित्यकार की तर्ज पर रचता बसता दिखे। लेकिन सत्ता के नजरिये से अगर भाषा की सत्ता को समझे तो
मनमोहन सिंह/सोनिया गांधी से नरेन्द्र मोदी के हाथों में सत्ता जाने के पीछे भाषा की ताकत को समझना होगा। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी दस बरस की सत्ता के दौर में बेहद कम हिन्दी में बोल पाये । कहें तो जब भी बोले वह हिन्दी को मजाक में लेने से कही ज्यादा रहा।

वहीं 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह हिन्दी भाषा का प्रयोग लच्छेदार तरीके से किया और आम जनता से वह संवाद बनाते चले गये उसमें पहली बार राजनीतिक भाषा की ताकत भी कांग्रेस को भी समझ में आ गई और सोनिया गांधी/राहुल गांधी को भी । पिछले दिनो दो वाकये ऐसे हुये जिसने सत्ता और विपक्ष को लेकर बहुसंख्यक जनता की भाषा हिन्दी की ताकत का एहसास सियासी राजनीतिक दलों को
करा दिया । पहला तो कांग्रेसी नेता गुलाम नबीं आजाद ने बात बात में जानकारी दी कि हिन्दी का प्रभाव जिस तेजी से जनता के बीच जाता है क्योंकि न्यूज चैनलों के दौर में हिन्दी में अपनी बात कहकर कहीं ज्यादा बड़े तबके को प्रभावित किया जा सकता है। तो अब राहुल गांधी और सोनिया गांधी भी हिन्दी बोलते नजर आयेगें । वहीं भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर जब सियासी हंगामा संसद से सड़क तक बढ़ा तो संसद में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अंग्रेजी में जबाब दिया । लेकिन उसका प्रभाव कुछ ज्यादा पड़ा नहीं तो प्रधानमंत्री मोदी तक को लगा कि मामला किसानों का है । और भूमि अधिग्रहण को लेकर समझाना देश की उस बहुसंख्य जनता को है जो वोटर है तो जवाब हिन्दी में ही देना होगा । उसके तुरंत बाद लच्छेदार हिन्दी को मराठी शैली में बोलते हुये केन्द्रीय मंत्री नीतिन गडकरी सामने आ गये । और झटके में नीतिन गडकरी ने जिन मुहावरों के आसरे सोनिया गांधी और राहुल पर निशाना साधा उसने खबरों में नीतिन गडकरी को लाकर खड़ा कर दिया ।

और हिन्दी में बोले जा रहे राजनीतिक वक्तव्य अंग्रेजी न्यूज चैनलों में भी सुर्खियां पाने लगे। दरअसल भाषा की ताकत होती क्या है और राजनीतिक तौर पर ही नहीं बल्कि सामाजिक तौर पर भी सरोकार और संवाद बनाने वाले माध्यमों के लिये अब यह क्यों जरुरी होता चला जा रहा है कि वह जन भाषा का प्रयोग करें, इसके लिये बाजार अर्थव्यवस्था के साथ साथ देश के सामाजिक आर्थिक हालातों को भी परखना होगा जो 1991 के बाद से लगातार हाशिये पर ढकेल दिये गये। और उस सवाल को भी नये सिरे से मथना होगा कि पत्रकारिता की भाषा सत्ता की भाषा होनी चाहिये या आम जन की भाषा । यह दोनो सवाल पत्रकारिता या मीडिया को लेकर
इसलिये मौजूं है क्योंकि दो दशक का वक्त हो चुका है जब देश में सरकारी खबरों से इतर दूरदर्शन पर ही निजी खबरो को जगह मिली। और बीते डेढ़ दशक से निजी न्यूज चैनल उसी तर्ज पर पनपे जैसे नवरत्न को बेचकर डिसन्वेस्टमेंट की थ्योरी देश में शुरु हुई । लेकिन पूंजी पर टिका बाजार भारतीय जनमानस के अनुकूल रहा नहीं। क्योंकि सामाजिक तौर पर महज बीस से पच्चीस करोड उपभोक्ताओ के लिये तो जेब और बाजार दोनो खुला लेकिन बाकियों के लिये हालात और दुविधापूर्ण होते चले गये। समाज में आर्थिक दूरियां बढ़ती चली गई । ध्यान दे तो देश में सत्ता परिवर्तन के लिये नरेन्द्र मोदी ने मनमोहन सिंह की उन्ही आर्थिक नीतियों पर वार किये जो सिर्फ उपभोक्ताओं को रिझा रहे थे । कमोवेश यही से पत्रकारिता और भाषा का सवाल भी खड़ा होता है । हिंग्लिश गायब होने लगी लेकिन पटरी पर लौटते हिन्दी पत्रकारों के सामने संकट भाषा को लेकर उभरा । हिन्दी का प्रयोग कैसे किस रुप में करना है और न्यूज चैनल के स्क्री पर अपनी महत्ता बरकरार रखनी है इसके लिये दो ही तरीके हो सकते थे । पहला कंटेंट और दूसरा भाषा को लेकर सामाजिक आर्थिक समझ। राजनेताओं की बहस में उलझते चैनलो का चेहरा हो या राजनेताओं के चेहरों के जरीये पत्रकारिता का मिजाज दोनो हालातों में पत्रकार या न्यूज एंकर के पास कोई धारदार शैली होनी चाहिये। यह तभी संभव है जब पत्रकार के सरोकार समाज के विभिन्न तबको से हो। क्योंकि दिल्ली और पटना का एक मिज़ाज हो नहीं सकता है
। ठीक उसी तरह जैसी कश्मीर के आतंक को छत्तीसगढ के माओवादियो के साथ जोड़ कर देखा नहीं जा सकता। इसकी और बारीकी को समझे तो पत्रकार अगर भाषा के पैनापन को नही समझेगी तो खबरों में राजनेता उसपर भारी दिखेगा। मसलन प्रधानमंत्री मोदी बिहार के “डीएनए” को लेकर नीतिश कुमार पर हमला करते है और नीतिश कुमार “जुमला बाबू” कहकर प्रधानमंत्री मोदी पर हमला करने से नहीं कतराते। अब सवाल है कि पत्रकारिता अगर डीएनए को खांटी बिहार की राजनीति के परिपेक्ष्य में ना समझ पाये और विज्ञान के नजरिये से टेलीविजन सेकिन पर व्याख्या करने लगे तो किसकी रुची जागेगी। और सियासत तेज होगी तो कई नये मुहावरे गढ़े जायेंगे क्योंकि राजनीति सत्त संघर्ष में भी अब हर राजनेता समझ रहा है कि उसे जन भाषा में ही संवाद बनाना होगा। नहीं तो उसका कहा ना मीडिया में चलेगा ना अखबारों तक पहुंच पायेगा। लंबे वक्त तक लालू प्रसाद यादव इसीलिये न्यूज चैनलों के डार्लिग ब्याय बने रहें, क्योंकि गांव-देहात के लोगों से अपने बोल या कहे भाषा के जरीये वह सीदा संवाद बनाते। जिसे सुनना एक नयापन भी था और शहरी अंग्रेजी मिजाज के उस आवरण को तोड़ना भी जो धीरे धीरे एकरसता ला रहा था । यहां समझना यह भी होगा कि न्यूज चैनलों के 85 फिसदी दर्शकों के लिये यह मायने नहीं रखता कि वह हिन्दी का चैनल देख रहे है या अंग्रेजी का । यानी एक ही खबर अगर ज्यादा रोचक तरीके से या फिर ज्यादा बेहतर तस्वीरो के साथ अंग्रेजी में भी चल रही है तो उसे
भी देखने में हर भाषा के दर्शको को परहेज नहीं होती ।

हालांकि इसके सामांनातर अखबार या हिन्दी पत्रिकाओं के सामने यह ,सवाल है कि न्यूज चैनल को किस्सागोई से चल सकते है । लच्छेदार भाषा से चल सकते है लेकिन अखबारों का क्या करें । जाहिर इस दायरे में फणीश्वरनाथ रेणु की पटना में आई बाढ़ पर छपी दिनमान की रिपोर्टिग को पढना चाहिये । इस लेखन को लेकर राजकमल प्रकाशन ने ऋणजल-धनजल नामक किताब भी छापी है । वैसे साहित्यकारों की पत्रकारिता का मिजाज धर्मयुग, दिनमान, रविवार , साप्ताहिक हिन्दुस्तान सरीखी पत्रिकाओ में 70-80 के दशक में देखी जा सकती है । जहां यह साफ लगता है कि साहित्य पत्रकारिता से कई कदम आगे चलती है । लेकिन उपभोक्ता
संस्कृति को दौर साहित्य की धार में भोथरापन आया और पत्रकारिता राजनीतिक सत्ता के मोहजाल में फंसी तो उसकी भाषा भी कही उपभोक्ता तो कहीं मुनाफा तो कही सत्ता की मलाई खाने वाली हो गई । और चापलूसी या पेट भरी भाषा के जरीये उस समाज में संवाद बनाना बेहद मुश्किल है जो बहुसंख्यक समाज लगातार विकल्प की तालाश में भटक रहा है । और संसदीय राजनीति तले हर बार लोकतंत्र के नाम पर छला भी जा रहा है ।