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उत्तर प्रदेश का एक गाँव हैं पिपरिया, पिपरिया प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सिर्फ 80 km दूर है, यह गाँव आज कल चर्चा में है क्योंकि इसके एकमात्र सरकारी स्कूल में कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दौरा किया था। जब मुख्यमंत्री जी ने स्कूल में पढ़ने वाले बच्चो से पुछा की मैं कौन हूँ तो बच्चे एक सुर में बोले “आप राहुल गांधी हैं” । जवाब सुन कर अखिलेश यादव हैरान रह गए और उस सरकारी स्कूल के टीचरो की क्या मिटटी पलीद हुई होगी ये सोचने की बात है।

एक और गॉव सूरत खेड़ा में एक महिला हेड टीचर हैं नाम है जगदेई , इन हेड मास्टर साहिबा को महिला कोटे से नौकरी मिली हैं इनका कमाल ये है की स्कूल में सालो से इनकी जगह इनके पति श्री मंगूलाल बच्चो को पढ़ाते है। जब श्री मंगूलाल से पुछा गया की ऐसा क्यों करते है तो उनका तर्क था की वो अपनी पत्नी श्रीमती जगदेई से ज्यादा पढ़े लिखे है, ऐसे में अगर बच्चो को पढ़ा दिया तो क्या गुनाह हो गया, अब ऐसी मासूमियत के क्या कहने। स्कूल के असली हेडमास्टर मंगूलाल ही है। स्कूल में 162 बच्चे पढ़ते हैं।
इस स्कूल में कुल पाँच टीचर है उसीमे से एक और टीचर है शुश्री उर्मिला, ये राजधानी लखनऊ में रहती है, और क्योंकि रोज आना जाना संभव नहीं हैं, इसलिए महीने में एक ही दिन स्कूल आती है, पूरे महीने की हाजरी करती है और फिर से एक महीने के लिए गायब हो जाती है। इन उर्मिला जी ने आज तक कभी कोई छुट्टी नहीं ली है।

UP के ही बरेली जिले के डेलपुर गावँ के प्रथिमिक स्कूल में एक से पाँच तक की कक्षाये लगती है उसमे पांचो क्लासों के लिए सिर्फ एक ही टीचर है। शुश्री अनीता जी इस स्कूल की हेड-मास्टर से लेकर टीचर, सब कुछ है और जिस दिन ये टीचर स्कूल नहीं आती स्कूल खुलता ही नहीं और छुट्टी हो जाती है। स्कूल में सुविधाओं में नाम पर इतना ही है की कक्षाओं में दरियां बिछी है और स्कूल की ईमारत पक्की है। ऐसा ही एक और स्कूल हेरगड़ गावं में भी है जिसमे पिछले पांच सालो से सिर्फ एक ही टीचर है श्री चुन्नीलाल। चुन्नीलाल 2007 से अकेले ही पढ़ा रहे है। इस स्कूल में 215 बच्चे पड़ते है।ये सारे गावँ और टीचरो के नाम असली है पहचान छुपाने के लिए किसी का भी नाम या गावं का नाम बदला नहीं गया है।

कुछ सालो पहले एक गैर सरकारी NGO “प्रथम” ने ऐसे ही सरकारी स्कूलों का सर्वेक्षण किया था और उसमे पाया था की सरकारी स्कूलों के पाचवी कक्षा के 50 % बच्चे दूसरी कक्षा की किताब भी नहीं पढ़ सकते। 50 % बच्चे गणित में इतने कमजोर है की दो अंको का घटाव भी नहीं कर सकते, भाग (Division) का हिसाब तो 75% बच्चे नहीं कर सकते। सोचिये ऐसे स्कूलों में किस माँ – बाप के बच्चे पड़ते होंगे, उन्हीके जिसे जयप्रकाश नारायण जी ने समाजवाद का सर्वहारा कहा है या जिसे गांधीजी समाज सुविधाओं की पंक्ति में खड़ा हुआ आखरी इन्सान कहते थे। गांधी जी कहते थे की किसी भी देश का भविष्य उस देश के वर्तमान पर अवलंब होता है। जब वर्तमान की ये तस्वीर है तो इन बच्चो का और इस देश का भविष्य क्या होगा। यह बच्चे आगे चल कर येन-केन प्रकारेण कुछ BA , MA जैसा नक़ल मार के पास करेंगे और पूरी जिंदगी आरक्षण की बैसाखियों पर घसटते हुए, किसी सरकारी कार्यालय में क्लर्क या बाबू बन कर बीता देंगे। या उससे भी बुरा यह बच्चे भी ऐसी ही कोई और सरकारी स्कूल के टीचर बन जायेंगे और देश के भविष्य की कब्र और गहरी खोदने में सहयोग देंगे ।

इसी प्रकार के खस्ताहाल और फटीचर स्कूलों की हालत सुधारने के लिए उप्र के ही एक टीचर श्री शिवकुमार पाठक ने इलाहबाद हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (Public Interest Litigation) या PIL दाखिल की थी। इसी जनहित याचिका की सुनवाई में इलाहबाद हाई कोर्ट का फैसला आया है की नेताओ और बड़े सरकारी अधिकारियो के बच्चे भी सरकारी प्राथमिक स्कूलों में पढ़े। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है की “MP, MLA, सरकारी अधिकारी, सरकारी कर्मचारी, और सरकार से सहायता लेने वाले लोगो के बच्चो की प्राथमिक शिक्षा सरकारी स्कूलों में दिलाई जाये। जबतक ऐसे लोगो के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे तबतक सरकारी स्कूलों की हालत नहीं सुधरेगी।”
यही तक नहीं इसके भी आगे जाते हुए हाई-कोर्ट ने अखिलेश यादव को आदेश दिया की 6 महीने में कानून बनाये और अगले साल शुरू होने वाले स्कूल के सत्र में इसे लागू भी किया जाये। और जो अधिकारी इस आदेश का पालन नहीं करते है उनके खिलाफ करवाई की जाये।

कानून बनाना और लागू करना तो एक तरफ रहा, उत्तर-प्रदेश सरकार ने इन श्री शिवकुमार जी को ही बर्खास्त कर दिया उन पर आरोप लगा है की वो बिना छुट्टी लिए हाई-कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल करने गए थे। जबकि शिवकुमार पाठक जी का कहना है की वे बाकायदा लिखित में छुट्टी ले कर ही गए थे। अब लड़ते रहे शिवकुमार अपने पैसो से सालो-साल, करते रहे अपना बचाव कौन पूछता है।

और जहाँ तक इलाहबाद उच्च न्यायलय के फैसले की बात है तो अभी दिल्ली उच्चतम न्यायालय (Delhi Supreme Court) भी तो है ऐसे अन्याय के खिलाफ उप्र सरकार वहां भी अपील करेगी और उसका फैसला आते आते और भी 40 – 50 साल निकल ही जायेंगे। कौन अखिलेश यादव को अपने जेब से पैसे देकर मुक़दमा लड़ना है ?समझ नहीं आता क्या किया जाये ? ऐसे बनेगा बाबासाहब के भविष्य का भारत ?

और अंत में “बीजेपी, लालू से लेकर कांग्रेस समर्थक सब परेशान है की केजरीवाल नितीश से क्यों मिल रहे है ? जो पार्टी भक्त है उनको ही चिंता है जो देश-भक्त है उनको कोई चिंता नहीं है। अगर नितीश बिहार में, केजरीवाल दिल्ली में और मोदी केंद्र में अच्छा काम कर रहे है तो करने दो, फिर समस्या क्या है ? दो अच्छा काम करने वाले के मिलने से लोगो को क्या तकलीफ है पता नहीं ? शायद दो भ्रस्ट (Corrupt) मुख्य-मंत्री आपसे में मिलते तो इतना हाहाकार नहीं मचता ?”