somnath

श्रीमद्भागवत कथा आप सभी ने सुनी है यह दूसरी बात है कि अमृत कथा का दर्जा होते हुए भी नियमित रूप से सुनने के बावजूद इसका सार तत्व समझने की गंभीरता ज्यादातर श्रद्धालुओं ने नहीं सुनी। इसके लिए निष्ठा की आवश्यकता होती है और निष्ठा की परीक्षा आपके व्यवहार में देखी जाती है। अगर किसी कथा या प्रवचन के संदेश का आप निष्ठा के साथ अनुशीलन करते हैं तो आपको उसी रास्ते पर आचरण मे चलकर दिखाना होगा। अगर आप श्रद्धालु भी हैं और कथा के संदेश में अपने जीवन को ढाल भी नहीं पा रहे तो इस प्रवंचना का क्या कहा जाये आप स्वयं फैसला करें।

श्रीमद्भागवत की भूमिका में इस बात का वर्णन है कि सबसे पहले यह कथा पाण्डु सम्राट युधिष्ठर के पौत्र महाराजा पारीक्षित को सुनाई गई थी। इसकी कथा यह है कि महाराजा पारीक्षित का समय युग संधि का समय था। द्वापर के समाप्त होने और कलयुग का प्रस्थान बिंदु यही कालखंड है। महाराजा पारीक्षित का जीवन अत्यंत धार्मिक और संयमित था। इस कारण उन्हीं के समय जब कलयुग ने संसार में प्रवेश की आज्ञा जब उनसे मांगी तो पारीक्षित इसे सहजता से स्वीकार नहीं कर पाये। उन्होंने कलयुग का प्रतिरोध किया और कहा कि मेंरे समय में पदार्पण की चेष्टा तुम न करो लेकिन कलयुग ने कहा कि विधि का विधान अवश्यभावी है। आप पुण्य आत्मा है इसलिये आप से अनुमति लेने की आवश्यकता मुझे पड़ी अन्यथा मुझे तो इस संसार में आज उतरना ही है। महाराजा पारीक्षित ने जब देखा कि विधि का विधान अटल है तो उन्होंने कलयुग से कहा कि मैं पांच स्थान तुम्हें बताये देता हूं जिनमें तुम आश्रय ले सकते हो। इसके अलावा कहीं अन्य विचरण की अनुमति तुम्हें नहीं दूंगा। कलराज सहमत हो गया। महाराजा पारीक्षित ने कलयुग के आश्रय स्थलों के रूप में दुराचरण के केंद्रों को गिनाना शुरू किया क्योंकि उनके राज्य में कोई दुराचरण होता ही नही था इसलिये उन्होंने सोचा कि कलयुग जब आश्रय स्थान वास्तविक रूप से नही मिलेगा तो छटपटा कर यथाशीघ्र समाप्त हो जायेगा। उन्होंन पहला स्थान बताया द्यूतालय, इसके बाद मदिरालय, वैश्यालय और पशुवध गृह। लेकिन उन्हें पांचवा स्थान नहीं सूझ रहा था इसलिये जल्दी में उन्होंने पांचवे स्थान पर स्वर्ण का नाम ले दिया जबकि वे स्वर्ण का ही मुकुट पहने हुए थे। परिणाम यह हुआ कि कलयुग तपाक से उनके मुकुट में विराजित हो गया और सबसे पहले उसने महाराजा पारीक्षित की ही बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया। (मजेदार बात यह है कि इस कथा में हस्तिनापुर साम्राज्य को निष्पाप घोषित करने के लिए यह जताने की चेष्टा की गई है कि उक्त साम्राज्य में कलयुग के आने के पहले न कोई जुआं खेलता था और न ही शराब पीता था जबकि हकीकत यह है कि महाभारत का पूरा युद्ध महाराजा पारीक्षित के द्यूतक्रीड़ा प्रेम की वजह से ही हुआ था। उस काल में मदिरा पान भी असामाजिक आचरण में शुमार नही था जिसका प्रमाण यह है कि पांडवों के सखा और मार्गदर्शक भगवान श्रीकृष्ण की द्वारिका का विनाश सार्वजनिक समारोहों में मदिरा पान के रिवाज की वजह से ही हुआ था। जब पहले से ही यह सब कुछ हो रहा था तो कलयुग आकर बर्बाद समय का क्या उखाड़ लेता। यह प्रश्न भी कम विचारणीय नहीं है।)

महाराजा पारीक्षित एक दिन स्वर्ण मुकुट पहनकर आखेट पर निकले इस कारण कलयुग उन पर हावी हो गया। महाराज इस दौरान जब श्लथ हो गये तो उन्हें तेज प्यास लगी वे प्यास बुझाने के लिए एक ऋषि की कुटिया में प्रविष्ट हुए। ऋषि उस समय समाधि में लीन थे इस कारण उन्हें महाराज के आग्रह का बोध ही नहीं हुआ। कलयुग के प्रभाव में होने की वजह से महाराज का रक्तचाप बढ़ा हुआ था जिससे ऋषि पर उन्हें भीषण क्रोध आया और गुस्से में पास में पड़ा मरा सांप उन्होंने ऋषि के गले में डालकर ऐंठना शुरू किया जिससे ऋषि चींख पड़े और उनकी आवाज सुनकर उनके पुत्र श्रंृगी वहां पहुंच गये। उन्होंने महाराज को धकेलकर अपने पिता की प्राण रक्षा की और आवेश में महाराज को धिक्कारते हुए कहा कि अगले सप्ताह तक यह सर्प जीवित होकर तुम्हें डसेगा जो तुम्हारी मौत का कारण बनेगा। कलयुग सवार होने की वजह से महाराज को फिर भी कोई प्रायश्चित नहीं हुआ और वे ऋषि और उनके पुत्र की खिल्ली उड़ाते हुए चले गये। बाद में अपने महल में पहुंचकर उन्होंने जब विश्राम के लिए अपना मुकुट उतारा तब उनकी बुद्धि वापस हुई और उन्हें भान हुआ कि वे कितने बड़े अनर्थ के भुक्तभोगी हो चुके हैं। भयभीत और कातर महाराज भागे-भागे फिर ऋषि के आश्रम में पहुंचे और उनके चरणों में गिरकर अपने प्राणों की भीख मांगने लगे। दयालु ऋषि ने कहा कि श्राप को निष्क्रिय करने की कोई विधि नहीं है इसलिए इसमें मैं आपकी कोई सहायता नहीं कर सकता। लेकिन मैं आपको श्रीमद्भागवत की अमृत कथा के परायण की सलाह देता हूं जो कि आपको मृत्यु के भय से अभय प्रदान करेगीं जिससे आप शांति के साथ जीवन के विसर्जन के लिए अपने को तैयार कर सकेगें यानी आप मृत्यु को मोक्ष के रूप में ग्रहण करेगें।

प्रश्न यह है कि महाराजा पारीक्षित का सप्ताह भर बाद मरना सुनिश्चित था। इसलिए उन्हें श्रीमद्भागवत कथा सुनते हुए पुण्यों की गठरी के साथ स्वर्ग जाने का अवसर था लेकिन श्रीमद्भागवत की कथा जब सार्वजनिक होती है तो उसमें असंख्य भक्त उपस्थित रहते हैं। उनमें से कोई दस वर्ष बाद मरता है तो कोई पचास वर्ष बाद। इस दौरान दुव्र्यसनों के फेर में पड़कर वह इतने पाप अपने साथ जोड़ लेने का जोखिम उठा बैठता है कि वर्षों पहले सुनी गई भागवत कथा का पुण्य बैलेंस में माइनस हो जाता है। इसलिये जिन्हें यह आभास नही है कि उनकी मृत्यु समीप है उन्हें भागवत कथा सुनने के लिए क्यों प्रेरित किया जाये क्योंकि आशंका यह है कि उनके लिए भागवत कथा के श्रवण का प्रलोभन आकर्षणीय नहीं होगा। फिर भी श्रीमद्भागवत कथा पारीक्षित के समय से ही सार्वजनिक रूप से होती है। संभवतः प्रयोजन यह है कि इस माध्यम से सभी को अलर्ट के तौर पर यह बताया जा सकेगा कि स्वर्ण में पाप का वास है इसलिये अगर स्वर्ण से दूरी बनाई रखी जाये तो पाप के दलदल में फंसने की नौबत ही नहीं आयेगी। जाहिर है कि भागवत कथा का श्रवण एक निरोधात्मक कार्रवाई है।

लेकिन ईश्वर ने जिस आचरण को पाप कर्म के रूप में चिन्हित कर रखा है यदि आप उसमें संलग्न होते हैं तो वह आपको रोकने नहीं आयेगा। आप की जिंदगी में मर्जी है जैसे चाहे जियें। सनातन धर्म के विश्वास के अनुसार मृत्यु के बाद चित्रगुप्त आपके जीवन का बहीखाता पेश करेगें तब देखा जायेगा कि स्वर्ण निषेध के बावजूद अगर आपने स्वर्ण भंडार के लिए उत्साह दिखाया था तो आपको बताना पड़ेगा कि आपने ऐसा क्यों किया। अगर आपने यह सिद्ध कर दिया कि आपके स्वर्ण भंडार से पात्र व्यक्तियों का परोपकार हुआ है तो आप दंडमुक्त हो जायेगें अन्यथा………….। बहरहाल यह व्यक्ति पर छोड़ा गया है कि वह पातकी आचरण से दूर रहे या नहीं। लेकिन अगर वह ईश्वर का घर कहे जाने वाले मंदिरों को ही पातकी आचरण का केंद्र बनाने की ठान ले तो ईश्वर के कोप की क्या पराकाष्ठा हो सकती है इसका अनुमान किया जा सकता है।

क्या सोमनाथ मंदिर में अथाह स्वर्ण संचय के कारण भगवान शिव इसके कर्ताधर्ताओं से कुपित नहीं हुए होगें। भगवान शिव की प्रतिक्रिया तो इस रूप में अनुमानित है कि उन्होंने कहा होगा कि मंदिर में ही स्वर्ण संचय कर मनुष्य उन्हें चैलेंज कर रहे है। इस दुष्टता की सजा दिया जाना अनिवार्य हो गया है। इतिहास कुछ भी हो लेकिन आस्था यह कहती है कि मुटठी भर विदेशी आक्रांता सोमनाथ मंदिर की विशाल सेना को असहाय करने में समर्थ नहीं थे। मंदिर को पवित्र करने के लिए भगवान शिव ने अपने गणों के साथ स्वयं वहां के स्वर्ण भण्डार को विलग करने का तांडव किया होगा। क्या इतिहास के एक महत्वपूर्ण प्रसंग की व्याख्या का यह कोण अतार्किक लगता है। बेहतर यह होगा कि इस पर भावनायें आहत होने का प्रलाप करने की बजाय तार्किक प्रतिवाद सामने लाये जायें। इतिहास का सच उपर्युक्त वर्णन के अनुरूप क्यों नहीं हो सकता प्रतिवाद में इस मामले में दूसरे पक्ष के लोग अपनी प्रतिभा झोंके। प्रयोजन यह है कि धर्म टाइमपास का शगल नही है बल्कि आचरण की वस्तु है यह बात समाज को समझानी पड़ेगी।