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मेरे एक समाजवादी पार्टी के मित्र हैं वह अक्सर कहते हैं कि मुलायम सिंह यादव इंडिया हैंड पम्प मार्का -2 हैं , अर्थात जितना वह बाहर दिखाई पड़ते हैं उससे 200 गुना वह छुपे रहते हैं ।दरअसल मुलायम सिंह यादव एक बेहद अविश्वसनीय राजनीतिज्ञ हैं और मायावती से लेकर बिहार चुनाव में उनके फैसले इसकी पुष्टि करते हैं कि सत्ता और सत्ता के चहेते रहना ही उनकी एक मात्र राजनीति है और इसके लिए वह कब किस करवट बैठ जाएँ बड़ा से बड़ा ज्योतिषी भी नहीं बता सकता ।

कोई व्यक्ति अपने जीवन में केवल एक कार्य करता है और उसी की बदौलत वह जीवन भर खाता है , वैसा ही एक काम मुलायम सिंह यादव ने भी किया जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते उन्होंने अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां चलाईं और प्रदेश के मुसलमानों के नेता बन गए और आजतक उसी का दोहन कर रहे हैं इसके अतिरिक्त यदि उर्दू अनुवाद या टीचर भर्ती के अतिरिक्त आज तक मुसलमानों के लिए मुलायम सिंह यादव ने कोई कार्य किया हो मेरी जानकारी में नहीं ।मुलायम सिंह यादव वह व्यक्ति हैं जिनकी बात पर विश्वास करना आत्मघाती हो सकता है और वह कब पलट जाएँ इसकी संभावना सदैव रहती है । इंदिरा गांधी के परिवारवाद का जीवन भर विरोध करने वाले मुलायम सिंह यादव ने अपने परिवार के लगभग हर व्यक्ति को सांसद और मंत्री बनवा दिया या पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका दे दी इतना तो इंदिरा गांधी ने भी नहीं किया था ।मुलायम सिंह यादव जीवन भर लोहिया लोहिया जेपी जेपी करते रहे और अमर सिंह जैसे कारपोरेट दलाल के मार्गदर्शन में चलते रहे और सैफई में माधुरी दीक्षित को नचाते रहे रंगरेलियां मनाते रहे । यह वही मुलायम सिंह यादव हैं जिनके लोगों ने गेस्ट हाउस में एक दलित महिला पर जानलेवा हमला करके एक समीकरण को ध्वस्त किया जो भविष्य में हो सकता था।गोली चलवा कर आजतक मुसलमानों का एक मुश्त वोट लेते रहे और उसकी कीमत आजमखान जैसे नेताओं को चुकाते रहे जो रामपुर के शाहजहाँ बनना चाहते हैं ।

ऐसा नहीं कि मुलायम सिंह यादव में केवल कमी ही है बल्कि वह दोस्ती निभाने के लिए जाने जाते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि ईश्वर करे कि उनके जैसा नेता हर कौम का नेता हो जिन्होंने यादवों को आज कहाँ से कहाँ लाकर खड़ा कर दिया पर अब संभवतः आयु उनपर असर करने लगी है और बलात्कार से लेकर अन्य विषयों पर उनके अनाप शनाप बयान जनता में क्रोध पैदा कर रहे हैं ।ताजा निर्णय बिहार चुनाव से संबंधित है जिसमें वह खुद के बनाए गठबंधन से ही अलग हो गये और हो सकता है कि कीमत मिल जाए तो फिर आजाएँ परन्तु सच यह है कि पिछले चुनाव में जब वह लोकसभा का चुनाव अकेले लड़े थे तो बिहार में उनकी पार्टी को कुल 63000 वोट मिले थे और बिहार में समाजवादी पार्टी की यही हकीक़त है तो इस आंकड़े पर तो वह किसी भी सीट के हकदार नहीं थे फिर भी पाँच सीट बहुत दे दी गई , संभवतः वह समघी होने का दोहन करना चाहते हैं परन्तु कल लालू प्रसाद यादव ने बिल्कुल सही कहा कि मुलायम सिंह यादव के जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता ।
मुझे लगता है कि मुलायम सिंह यादव का यह निर्णय उनके लिए आत्मघाती होगा और मुसलमानों में यह मैसेज जा चुका है कि जबकि महागठबंधन बिहार में भाजपा से लड़ने का एक सशक्त रूप ले चुका है तो उससे अलग होकर मुलायम सिंह यादव उसे कमज़ोर होने का संदेश दे रहे हैं और इससे भाजपा को वोट में ना सही नैतिक फायदा तो अवश्य होगा ।
मुलायम सिंह यादव ऐसा पहली बार नहीं कर रहे हैं , महाराष्ट्र में ऐसा ही करके भाजपा की मदद करते रहे हैं , ऐसा ही दिल्ली में किया मध्यप्रदेश में किया और गुजरात में , और ऐसा करके भाजपा विरोधी वोट को बिखरते रहे हैं ।राजनीति में मुलायम सिंह यादव से अविश्वसनीय राजनीतिज्ञ कोई नहीँ फिर भी मुसलमान उनको एकमुश्त वोट देते रहे हैं और उस 2014 के चुनावों में भी जबकि उनके अपने यादव वोट ही नरेन्द्र मोदी के मायाजाल में फंसकर भाजपा की ओर चले गये ।

मुझे लगता है कि उत्तर प्रदेश में मुसलमान अब सपा के अतिरिक्त मजबूत विकल्प की तलाश करेगा जो भाजपा के विरूद्ध हो और उस खाँचे में मायावती कुछ हद तक मुलायम सिंह यादव से अधिक विश्वसनीय हैं ।युवा मुसलमानों और गल्फ देशों में रह रहे मुसलमानों को असदुद्दीन ओवैसी निश्चित रूप से आकर्षित कर रहे हैं , मेरा व्यक्तिगत मत है कि दलित- मुस्लिम गठजोड़ जमीनी स्तर पर मुस्लिम-यादव गठजोड़ से अधिक व्यवहारिक है और यदि 2017 के चुनावों में मायावती ओवैसी के साथ गठबंधन कर लेती हैं तो मेरा मानना है कि मुलायम सिंह यादव की अवसरवादी राजनीति का अंत हो जाएगा क्युँकि उनकी जाति का ही वोट अब भाजपा में अपना भविष्य देखने लगा है ।

यदि कोई मुझसे सुझाव मांगे तो मेरा सुझाव होगा कि समाजवादी पार्टी के सभी वृद्ध नेताओं को सन्यास लेकर घर बैठ जाना चाहिए या हरिद्वार में बैठकर भक्ति करना चाहिए क्युँकि मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव की छवि और सरकार इतनी बुरी नहीं जितना इन वृद्ध लोगों के उलजूलूल हरकतों से इमेज बुरी बन रही है ।

मुझे लगता है कि बिहार चुनाव में महागठबंधन से अलग होकर भाजपा के विरूद्ध लड़ने की अपनी इमेज को मुलायम सिंह यादव ने खुद तोड़ दिया है जिसकी कीमत उनको 2017 में चुकानी पड़ सकती है ।