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केतन मेहता की Manjhi -The mountainman का मुख्य आकर्षण नवाज का अभिनय ही है। वो पूरी तरह से नवाज़ की फिल्म है । दशरथ मांझी के प्रेम, खिलदंडपन, सनक, तड़प और सबसे जरूरी दशरथी ठसक को नवाज ने भावना की तीव्रता से निभाया है। बाइस साल तक भीतर और बाहर तपती देह से पहाड़ को छैनी और हथौड़े से काटते दशरथ की संघर्ष गाथा को नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी ने जिस तरह जिया है वो उनके निजी संघर्ष की भी विजय की तरह है।

केतन ने फिल्म में पहाड़ को भी एक पात्र की तरह रखा है, मांझी का उससे एकतरफा संवाद चुटीला, मजेदार और भावनात्मक है। मांझी केतन मेहता का चौथी बॉयोपिक है पर सरदार पटेल, मंगल पांडे और राजा रवि वर्मा की तरह इस बॉयोपिक का नायक इतिहास का हीरो नही है। ये अभी इन दिनों खबरों में अचानक आया एक आम आदमी है। ये ऐतिहासिक नही बल्कि एक आम आदमी के ऐतिहासिक बनने की गाथा का बायोपिक है।

मांझी के पिता मगरू के रोल में दिवंगत अभिनेता अशरफुल हक़ ने जीवन का सबसे बेहतरीन काम किया पर अफ़सोस कि अपना सर्वश्रेष्ठ काम देखने के लिये अब वो खुद मौजूद नही है।फगुनिया राधिका आप्टे के सांवले चेहरे पर कुदरती तौर पर भाव उभरते है। मुखिया के किरदार में तिग्मांशु धुलिया ने एक बार फिर बताया कि निर्देशक के साथ साथ अभिनेता के रूप में भी वो दम रखते हैं ।

फिल्म शुरू होते ही आप ख़ून से लथपथ नवाज़ को देखते हैं जो सीधे पहाड़ को ललकारता है। हम ज़मींदार के उत्पीड़न, पत्रकारिता को भी देखते हैं। जाति प्रथा पर चोट करती हुई यह फिल्म मारक लगती है। लेकिन मुसहरों का कोई खास रेफरेंस नहीं देती। कैमरा पहाड़ को उसकी विशालता में क़ैद तो करता है लेकिन निर्देशक बारीकी में पिछड़ जाते हैं। मिसाल के लिए सन 1975 में भारतीय रेल के डब्बे सिर्फ लाल रंग के होते थे !

केतन मेहता ने नवाज़ुद्दीन के मोहब्बत अंदाज़ को एकदम अलहदा अंदाज़ में पेश किया है। राधिका आप्टे और नवाज़ का प्रेम परदे पर अल्हड़ भी है, मज़ेदार भी और कई दफ़ा उन्मुक्त भी। संवाद शानदार हैं । जब तक तोड़ेगा नहीं…या फिर क्या पता भगवान आपके भरोसे बैठा हो..पहले ही हिट हैं।दशरथ मांझी की कहानी पहले ही बहुत प्रेरणादायी है, नवाज़ की अदाकारी और केतन मेहता ने इसे नए आयाम देने की कोशिश की है।

दशरथ मांझी को उनके जीवन काल में गहरोल गांव के बच्चे पहाड़तोड़ुवा कहते थे। दशरथ माझी को धुन लगी थी पहाड़ तोड़ने की। हुआ यों था कि उनकी पत्नी फगुनिया पहाड़ से गिर गई थीं और समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाने की वजह से प्रसव के दौरान मर गई थीं। तभी मांझी ने कसम खाई थी कि वे अट्टहास करते पहाड़ को तोड़ेंगे।

रास्ता बनाएंगे ताकि किसी और को शहर पहुंचने में उन जैसी तकलीफ से नहीं गुजरना पड़े। उन्होंने कसम खाई थी कि ‘जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं’। उन्होंने अपनी जिद पूरी की। इसमें 20 साल लग से अधिक लग गए। उन्होंने वजीरगंज को करीब ला दिया। पहाड़ तोड़ कर बनाए गए रास्ते को आजकल ‘दशरथ मांझी मार्ग’ कहते हैं।

दशरथ मांझी के इस बायोपिक में केतन मेहता ने गहरोल के समाज की पृष्ठभूमि ली है। जमींदार के अन्याय और अत्याचार के बीच चूहे खाकर जिंदगी चला रहे मांझी के परिवार पर तब मुसीबत आती है, जब दशरथ को उसका पिता रेहन पर देने की पेशकश करता है। दशरथ राजी नहीं होता और भाग खड़ा होता है।

वह कोयला खदानों में सात सालों तक काम करने के बाद लौटता है। इस बीच गांव में कुछ नहीं बदला है। हां, सरकार ने छुआछूत खत्म करने की घोषणा कर दी है। दशरथ की खुशी तुरंत ही खत्म हो जाती है, जब जमींदार के लोग उसकी इसी वजह से धुनाई कर देते हैं। दशरथ मांझी किसी तरह गुजर-बसर कर रहा है। इसी बीच दुर्घटना में उसकी पत्नी का निधन हो जाता है। यह फिल्म दशरथ के प्रेम और संकल्प की भी कहानी है। वो तमाम विपरीत स्थितियों में भी अपने संकल्प से नहीं डिगता।

दशरथ मांझी के प्रेम और जिद में एक सामुदायिकता है। वह अपने समुदाय और गांव के लिए रास्ता बनाने का फैसला लेता है। इस फैसले में उसकी बीवी फगुनिया उत्प्रेरक का काम करती है। फगुनिया के शरीर का इस्तेमाल हालांकि कहानी को इस भटकाती है ।क्योंकि प्रेमकथा रूहानी से अधिक जिस्मानी हो जाती है। लेकिन इस अंतराल बाद सामुदायिकता की ओर लौटती है।

फिल्म पूरी तरह नवाज़ की है। फिल्म के ही बहाने दशरथ मांझी अचानक चर्चा में आ गए हैं। गहलौर चर्चा में आ गया है। नवाज़ तो खैर फिल्म कहानी के बाद से अपनी हर फिल्म की वजह से चर्चा में रहते ही हैं। मांझी उनका अब तक का सर्वश्रेष्ठ अभिनय कहा जाना चाहिए। नवाज़ के दीवाने फिल्म को मिस नहीं करेंगे !