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मीडिया रिपोर्टों के अनुसार एक नए अध्ययन से पता चला है कि भारत में 92.1 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं मौखिक तलाक पर तत्काल पूर्ण प्रतिबंध चाहती हैं । रिपोर्ट ,भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन(BMMA)द्वारा जारी की गई, यह संगठन भारतीय मुसलमानों के अधिकारों के लिए लड़ रहीं मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में कार्य कर रहा है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि: “महिलाओं को टेलीफोन, पाठ संदेश, और यहां तक ​​कि सामाजिक मीडिया के माध्यम से भी तलाक की सूचना दी जा रही है जिसका कारण खाना पकाने के कौशल से लेकर कपड़े, जूते, पर्स आदि की पसंद कुछ भी हो सकता है। मुसलमान महिलाओं को धार्मिक कानून के तहत समान अधिकार न होने के कारण वे असहाय और असुरक्षित हैं। BMMA जैसे संगठन, मुस्लिम महिलाओं के व्यापक समर्थन के साथ, भारत में तथाकथित ‘ट्रिपल तलाक नियम’ को प्रतिबंधित करने की मांग पर जोर दे रहे हैं। ”

मुद्दा केवल ट्रिपल या तुरंत तलाक का नहीं, बल्कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में ही सुधार का है।नतीजतन मांग ‘ट्रिपल तलाक’ के व्यापक प्रयोग पर प्रतिबंध लगाने के लिए ही नहीं ।यह अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों के लिए बनाए गए निजी कानूनों की बुराइयों में से एक है। शायद ही भारत में कोई भी मुस्लमान तलाक के संबंध में कुरान में दिए गए तरीकें का पालन करता है, जिसमें तलाक तीन चरणों में तीन मासिक धर्म चक्र के बाद मुक्कमल होता है।

कुरान अध्ययन के प्रति समर्पित शोधकर्ता नसीर अहमद ने न्यू एज इस्लाम में एक कमेंट में मुस्लिम तलाक की प्रक्रिया को निम्नलिखित तरीके से बताया है:

“तलाक की प्रक्रिया मौखिक तलाक के साथ शुरू होती है जिसके बाद यह4 महीने या तीन मासिक धर्म चक्र तक चलती है इस दौरान महिला पति के घर में रहती है । यदि इस अवधि या वास्तविक तलाक से पहले वे सहवास कर लें, तो तलाक खत्म हो जाता है। वास्तविक तलाक का मतलब है चार महीने की अवधि के अंत में तलाक की अंतिम घोषणा के बाद एक तलाकशुदा के रूप में अलग-अलग रहना । कितनी बार “तलाक” कहा गया इसका कोई मतलब नहीं है।यह ऊपर बताए गए तरीके से 4 महीने के अंतराल से कम से कम दो बार दिया जाना चाहिए। अच्छा होगा कि अंतिम घोषणा मध्यस्थों की उपस्थिति में की जाए, यदि वे उन्हें उनका फैसला बदलने के लिए समझाने में असफल हो गए हो। अंतिम रूप से अलग होने और तलाकशुदा जोड़े के रूप में अलग रहना शुरू करने से पहले वे कभी भी तलाक को खत्म कर सकते हैं ।एक बार अंतिम रूप से तलाक हो जाने के बाद, जब वे अलग रहना शुरू कर देते है तब वे दोबारा शादी किए बिना एक नहीं हो सकते हैं इस शादी की भी अपनी शर्तें हैं। अन्य कोई प्रक्रिया कुरान की शरीयत के अनुसार नहीं है

प्रख्यात इस्लामी विद्वान जावेद अहमद गामदी तलाक के संबंध में कुरान की अवधारणा की व्याख्या इन शब्दों में करते हैं:

“यदि किसी पति ने अपनी पत्नी को तलाक देने का फैसला किया है, तो उसे पत्नीके मासिक धर्म चक्र के पूरा होने का इंतजार करना चाहिए और सहवास नहीं करना चाहिए उसे सिर्फ एक बार तलाक बोलना चाहिए। पत्नी को इस तरह से तलाक के बाद, तीन मासिक धर्म चक्र की अवधि के लिए अपने पति के घर में रहना चाहिए इद्दत की इस अवधि के बाद भी यदि आदमी अभी भी अपने फैसले पर अडिग रहता है, तो उसकी पत्नी को स्थाई रूप से अलग माना जाएगा।वह अब एक स्वतंत्र स्त्री है और वह किसी अन्य व्यक्ति से शादी करना चाहती है तो उसे ऐसा करने का अधिकार है और उसे किसी भी तरह से रोका नहीं जाना चाहिए।

संयुक्त पाकिस्तान ने 1961 में अपनी पर्सनल लॉ में सुधार किया और यह सुधार समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं । पाकिस्तान में राष्ट्रपति ज़िया उल हक के तहत निजाम-ए-मुस्तफा के एक युग सहित बहुत उथल-पुथल के दौर से गुजरा है जिसमें चाबुक और कोड़ों जैसी पारंपरिक अरब सजाओं का भी प्रयोग सार्वजनिक रूप से किया गया।वास्तव में भारत में प्रगतिशील मुसलमानों को मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार की मांग करनी चाहिए, जैसाकि वे लंबे समय से कर रहे हैं ।

मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार समय की मांग है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के सुधार के लिए मांग, न्यू एज इस्लाम फाउंडेशन सहित कई प्रगतिशील इस्लामी संगठनों द्वारा आयोजित सम्मेलन, सेमिनार और जुलूस में, दशकों से की जा रही है।बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित करके सरकार से इन कानूनों में सुधार करने की इस मांग को तेज किया जाना चाहिए ।इसका इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा अनिवार्य रूप से विरोध किया जाएगा और साथ ही इससे भारत में इस्लामी कट्टरपंथियों का दोगलापन भी सामने आएगा । यह हमारे उलेमा के पाखंड पर, एक बहुत जरूरी बहस को भी शुरू करेगा।

भारत की सरकार को इस मामले पर ध्यान देना चाहिए। भारतीय मुस्लिम महिलाओं को इस्लाम का वह संरक्षण क्यों न मिले जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और विश्व के अन्य भागों में, मुस्लिम महिलाओं को मिल रहा है। सऊदी अरब को छोड़कर, व्यावहारिक रूप से पूरी इस्लामी दुनिया मिस्र, ईरान, जॉर्डन, मोरक्को, यमन और सूडान में ,भारत की तुलना में अधिक आधुनिक मुस्लिम पर्सनल ला हैं। क्यों भारतीय मुसलमान , हमारे देश में अंग्रेजों द्वारा बनाए गए एंग्लो-मुसलमान कानून के अपमान को सहते रहें? विशेषकर तब जब, देश के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन के परिणाम स्वरूप गठित मुस्लिम बहुल देशों ने पहले ही अंग्रेजों द्वारा बनाए गए निजी कानूनों को समाप्त कर दिया है । पाकिस्तान ने पचास साल पहले ही मुस्लिम पर्सनल ला में सुधार कर लिया है। पाकिस्तान से अपनी स्वतंत्रता के बाद, बांग्लादेश ने और आगे सुधारों की शुरूआत की और इसे और अधिक आधुनिक देश बनाया। इस क्षेत्र में केवल भारत ही पीछे रह गया है।

सरकार को तत्काल 1960 के दशक के प्रारंभ में पाकिस्तान में राष्ट्रपति जनरल अय्यूब ख़ान के सुधारों के आधार पर एक संशोधित मुस्लिम पर्सनल लॉ का एलान करना चाहिए, हांलाकि इसमें मामूली परिवर्तन की आवश्यकता होगी जैसे लड़कों और लड़कियों के लिए शादी की उम्र.

मैं मोरक्को या ट्यूनीशियाई सुधार के सुझाव नहीं दे रहा हूँ ,हालांकि

ये नवीनतम और अधिक आधुनिक हैं,क्योंकि ये हमारे उलेमा को फिक़्ह मतभेद दावा करने के लिए एक बहाना दे सकता है जैसे हनफी-मलकी-शफही अंतर, आदि, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ हमारे ऐसे कोई धार्मिक अंतर नहीं हे।

पर्सनल लॉ सुधारों पर एक बहस शुरू करने से हमें अन्य क्षेत्रों के लिए धार्मिक सुधारों के मुद्दे पर बहस का अवसर मिलेगा जो हमारे समुदाय और क्षेत्र के लिए कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं ।पर्सनल लॉ बहस हमारे उलेमा के प्रगतिविरोध को उजागर करेगी।इससे पता चलेगा कि इन्हें इस्लाम या मुसलमानों की कोई चिंता नहीं है।

हमें शांति, सह-अस्तित्व, समग्रता, बहुलवाद और लैंगिक समानता वाले एक नए इस्लामी धर्मशास्त्र को सृजित करना होगा उसे स्वीकृति दिलवानी होगी और लोकप्रिय बनाना होगा।

मुस्लिम समुदाय में निष्क्रियता और किसी भी धार्मिक बहस न किए जाने की कमी को दूर करना होगा । निष्क्रियता, इस्लामी चरमपंथियों के लिए अच्छी है, जिनका घृणा और असहिष्णुता, लिंग असमानता और भेदभाव का एक बहुत सुसंगत, अच्छी तरह से डिजाइन, अच्छी तरह से सोचा हुआ धर्मशास्त्र है।

यह धर्मशास्त्र हमारे विश्वविद्यालयों और मदरसों में भी पढ़ाया जा रहा है।यहां तक कि सूफी मदरसों में भी अरबी साहित्य पढ़ाने के बहाने सैयद कुतुब को पढ़ाया जा रहा है । फारसी जानने से नौकरियों नहीं मिलती इसलिए गुलिस्तान, शेख सादी की बास्तन को त्याग दिया गया है।

मैं नीचे निजी कानूनों में अय्यूब ख़ान के संशोधनों का एक सारांश दे रहा हूँ ।आप देखेगें कि संशोधित कानून में भी शादी की उम्र महिला और पुरुष के लिए क्रमश 14 और 16 तय की गई है । उस समय के लिए यह प्रगतिशील

रही होगी और पाकिस्तान में शायद आज भी। मुझे उम्मीद है भारत में ऐसा नहीं है।जब सऊदी अरब लड़कियों से एक वर्ष में शादी करने के लिए और 9 वर्ष में सहवास अनुमति देते हैं,तब यह निश्चित रूप से प्रगतिशील था। लेकिन भारत में यह स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए और शादी की उम्र समकालीन मानकों के अनुसार तय की जानी चाहिए।
नीचे एक निबंध से कुछ अंश प्रस्तुत हैं:

Forced Modernization and Public Policy: A Case Study of Ayub Khan Era (1958-69) by Sarfraz Husain Ansari∗ available at:
pu.edu.pk/images/journal/pols/pdf-files/Forced_Modernization%20-%204.pdf

“मुस्लिम परिवार कानून अध्यादेश1961, में यह व्यवस्था की गई है कि विवाह और तलाक पंजीकृत किया जाएगा, दूसरी और बाद की शादी (शादियों) के लिए अदालत से अनुमति लेनी होगी, तलाक अदालत द्वारा अनुमोदित किए जाने के बाद ही प्रभावी होगा; विवाह के लिए न्यूनतम आयु महिला के लिए 14 पुरुष के लिए 16 होगी,

मृत बेटे का बेटा यानि पोता अपने दादा की दाय संपत्ति का वारिस होगा।

अध्यादेश को परिवारिक जीवन के आधुनिकीकरण की दिशा में पहला कदम माना गया (जूनियर, 1975) और इसे उपमहाद्वीप में लागू किए जाने वाले मुसलिम परिवार कानून की सबसे प्रगतिशील व्याख्या “(रोजेन ब्लूम, 1995) माना गया। अध्यादेश के अलावा , बाल विवाह निरोधक अधिनियम और मुस्लिम विवाह अधिनियम के विघटन भी 1961 में अधिनियमित किया गया। उलेमा को शांत करने के बाद ही, अयूब खान नेशनल असेंबली से विधेयक को पारित करवा पाए।इन अधिनियमों और अध्यादेश ने बहुविवाह को हतोत्साहित किया,पत्नी के अधिकारों की रक्षा की और पोते कोअपने दादा की दाय संपत्ति का वारिस होने का अधिकार दिया।

जाहिर है अय्यूब ख़ान द्वारा संशोधित किए गए मुसलमानों के लिए निजी कानूनों में कुछ परिवर्तन करने होंगे।लेकिन भारत के मुसलमानों को इन पुरातन और गैर- इस्लामी निजी कानूनों को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए।
सुल्तान शाहीन एडिटर, न्यू एज इस्लाम