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by — सरला माहेश्वरी

इसी 13 अगस्त को असम विधान सभा ने डायन हत्या निवारक कानून (Prevention and Protection from Witch-Hunting Bill 2015) पारित किया है। इस कानून में प्राविधान है कि कोई भी यदि किसी स्त्री को डायन बताता है तो उसे तीन से पांच साल की सख्त सजा होगी और पचास हजार से पांच लाख रुपये तक का जुर्माना देना होगा। डायन बता कर जुल्म करने वाले को 5 से 10 साल की सजा और एक से 5 लाख रुपये तक का जुर्माना भरना होगा। अगर इस प्रकार के किसी काम में किसी समूह को दोषी पाया जाता है तो उस समूह के हर व्यक्ति को 5 से 30 हजार रुपये तक का जुर्माना देना होगा। डायन बता कर किसी की हत्या करने पर धारा 302 के तहत मुकदमा चलेगा। डायन बता कर यदि किसी को आत्म-हत्या के लिए मजबूर किया जाता है तो उसे 7 साल से उम्रकैद तक की सजा और एक लाख से 5 लाख तक का जुर्माना देना होगा। इसप्रकार के मामलों की जांच में गफलत करने वाले जांच अधिकारी को भी दंडित किया जायेगा। उसे 10 हजार रुपये का जुर्माना भरना होगा।

असम का यह कानून बिहार, उड़ीसा, झारखंड और महाराष्ट्र के ऐसे ही कानून से ज्यादा सख्त कानून है। असम में पिछले पांच सालों में 70 औरतों को डायन बता कर उनकी हत्या कर दी गई थी। जांच करने पर पता चला है कि इनमें से अधिकांश मामलों के मूल में जमीन और संपत्ति का विवाद था।

हम सभी जानते है कि इसी 8 अगस्त को झारखंड में पाँच औरतों को डायन बताकर मार डाला गया था। पिछले दस वर्षों में वहाँ इस तरह अब तक 1200 औरतों को डायन बताकर मारा जा चुका है ।

देश के अन्य भागों में भी इस तरह की घटनाएँ अक्सर घटती रहती हैं। इसमें और भी निंदनीय बात यह है कि जिनकी इस प्रकार हत्या की जाती हैं उनमें से अधिकांश नहीं, बल्कि सर्वांश ग़रीब, कमज़ोर और विधवा औरतों का होता है । उन्हें कभी चुड़ैल, डायन या कुलटा बताया जाता है तो कभी सती बना कर चिता पर चढ़ा दिया जाता है । और भी गौर करने लायक बात यह है कि औरतों पर होने वाले इन सारे जुल्मों के साथ हमारे समाज की धर्म और तमाम प्रकार की पोंगापंथी ताकतें जुड़ी होती है। बड़ी मुश्किल से राजस्थान में सती पूजा का महोत्सव बंद हुआ है, यद्यपि अभी भी राणी सती का मंदिर यथावत है और एक तबका उसमें पूजा-अर्चना के लिय जाया भी करता है।

हम जानते है उस इतिहास को भी जो हमारी संसद में हिंदू कोड बिल के साथ जुड़ी राजनीति से जुड़ा रहा है। उस इतिहास को हम भूले नहीं हैं। उस समय सारी प्रतिगामी ताकते उस बिल के खिलाफ सड़कों पर उतरी हुई थी। मजे की बात यह है कि जो लोग उस समय हिंदू कोड बिल का पूरी ताकत के साथ विरोध कर रहे थे वे ही आज उसकी वजह से हिंदू समाज में जो बहु-विवाह प्रथा के अंत और संपत्ति में स्त्रियों के अधिकार इत्यादि को लेकर जो सुधार हुए हैं, उसका गौरव-गान करते हुए दूसरे समाजों से अपनी श्रेष्ठता का बखान करने से भी नहीं थकते।

इसीप्रकार, हम कैसे भूल सकते हैं कि 1987 में राजस्थान के दिवराला में 18 वर्ष की रूपकंवर को उसके मृत पति के साथ जिन्दा जला दिया गया था । इन सभी अवसरों पर परम्परा की रक्षा के नाम पर खास तौर पर आज के शासक संघ परिवार वालों ने ही सबसे चरम प्रतिक्रियावादी भूमिका अदा की थी । संसद तक में सती प्रथा कानून में संशोधन का भाजपा ने विरोध किया था। आज उसी संघ परिवार की भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है । तमाम बाबाओं के, कर्मकांडियों के हौसले परवान चढ़े हुए हैं। कभी लव-जेहाद तो कभी खाप पंचायतें मानवाधिकारों का सरे आम मज़ाक़ उड़ा रही हैं । ऐसे में सालों पहले, रूपकंवर को जिंदा जला दिये जाने के समय हमने जो कविता लिखी थी, ‘यकीन नहीं होता’, उसकी कुछ पंक्तियों से हम इस टिप्पणी का अंत करेंगे :

सच बतलाना रूपकंवर/ किसने किसने किसने/ तुम्हारे इस संुदर तन-मन को आग के सुपुर्द कर दिया/ क्या तुम्हें डर था / कि देवी न बनी तो डायन बना दी जाओगी / क्या तुम्हे डर था / अपने उस समाज का / जहां विधवा की जिंदगी / काले पानी की सजा से कम कठोर नहीं होती / लेकिन फिर भी / यकीन नहीं होता रूपकंवर / कि हिरणी की तरह चमकती तुम्हारी आंखों ने / यौवन से हुलसते तुम्हारे बदन ने / आग की लपटों में झुलसने से इंकार नहीं किया होगा।