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भारत के न्यायालय के न्यायधीश या किसी भी जाँच एजेंसी अथवा व्यवस्था के लोग भी इंसान ही होते हैं , और यदि इंसान हैं तो निश्चित ही उनकी अपनी एक व्यक्तिगत सोच होगी , श्रृद्धा होगी , धर्म होगा और उस धर्म के प्रति समर्पण होगा , राजनैतिक पसंद होगी , पसंद के नेता होंगे तथा उन नेताओं के प्रति भी कुछ ना कुछ तो समर्पण होगा ही होगा , और यदि उनकी प्रारंभिक शिक्षा और परवरिश किसी विशेष संस्कार( जैसे संघी ) में हुई है और आगे चल कर वह न्यायधीश अथवा महत्वपूर्ण पदाधिकारी बन गए तो कैसे कोई विश्वास करे कि अमुक फैसला पूर्वाग्रह से प्रेरित नहीं होगा ?

दरअसल चिंता करने का कारण इधर आ रहे कई उदाहरण हैं, तिस्ता सीतलवाड़ को गुजरात हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत नहीं मिलती परन्तु उन्ही आरोपों पर मुम्बई हाईकोर्ट से मिल जाती है तो क्युँ ? समझौता एक्सप्रेस विस्फोट के आरोपी आतंकवादी असीमानंद को ज़मानत दे दी जाती है और एनआइए कहती है कि उसके ज़मानत के विरोध का उसके पास कोई आधार नहीं है तो क्युँ ? उच्चतम न्यायालय बाबरी मस्जिद – श्रीराम जन्मभूमि पर “स्टेटस को” अर्थात यथा स्थिति रखने के अपने निर्णय को ही पलट देती है और मरम्मत का आदेश दे देती है तो क्युँ ? राजनैतिक समझौते और आका के सुरक्षित स्थिति में हो जाने पर गुजरात में तमाम फर्जी मुठभेड़ के आरोपी आईपीएस एक एक करके ज़मानत पा रहे हैं तो क्युँ ? , गुजरात दंगों में 90 लोगों की हत्या करने और एक गर्भवती महिला का पेट चीरकर उस नवजात शिशु को त्रीशूल की नोक पर लहरा कर हत्या करने का आरोप सिद्ध उम्रकैद सजायाफ्ता कैदी बाबू बजरंगी जब चाहे जेल से बाहर आकर घर पर शान से रहता है तो क्युँ ? आज एक चोर यदि चोरी करता पकड़ा जाए और यदि उसने अपने साथ मेरा या आपका नाम पुलिस को बता दिया तो आप जानते हैं कि पुलिस उसी हाल में हमारे घरों में से हमें टांग लेगी जिस हाल में हम होंगे , कपड़े भी पहनने नहीं देगी परन्तु बाबू बजरंगी की कैमरे पर की गई स्विकरोक्ती पर सब कान आंख कान बंद करके बैठ जाते हैं तो क्युँ ? वह स्विकार करता है कि हर हत्या के बाद वह गुजरात के गृहमंत्री को सुचित करता था और अमित शाह उसे शाबासी देते थे , उसकी यह स्विकरोक्ती तो और चिंता बढा देती है कि कैसे मुख्यमन्त्री रहते नरेन्द्र मोदी न्यायालय और न्याधीश को प्रभावित करके उसे फांसी से बचा ले गये अन्यथा उसे पाँच छः बार फांसी की सज़ा होती,फिर भी कोई संज्ञान नहीं लिया जाता तो क्युँ ? कैसे दंगों में हत्याओं के लिए उम्रकैद सजायाफ्ता माया कोडनानी जेल की बजाए अपने घर में रह रही है तो क्युँ ? एक अदालत कैसे इसी अमित शाह को गुजरात में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा कर तड़ीपार घोषित करती है और राजनीति मजबूती मिलते ही धड़ाधड़ यही अदालतें सभी आरोपों से मुक्त कर देती हैं तो क्युँ ?

अदालतों और न्यायधीशों का उदाहरण देखना है तो देखिए कि कैसे नरोदा पाटिया दंगों की सुनवाई के लिए नियुक्त दोनों जज डर और दबाव के कारण अपने को इस मुकदमे से अलग कर लेते हैं तो क्युँ ? मुंबई दंगों में एक वर्ग के लोगों की हत्या करके सबक सिखाने की खुलेआम स्विकरोक्ती करने वाले और बाबरी मस्जिद विध्वंस की जिम्मेदारी लेने वाले आतंकवादी की गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया की बात तो छोड़िए उस बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद उसे तिरंगे में लपेटा जाता है तो क्युँ ? , मालेगांव विस्फोट , अजमेर दरगाह विस्फोट के आरोपियों के साथ एक प्रदेश के मुख्यमंत्री और अब के गृहमंत्री मिलने जाते हों और चिंता में डूबे हुए चित्र खिचाते हैं तो क्युँ ? , सरकार द्वारा ही गठित श्रीकृष्ण आयोग इसलिए कूड़े के ढेर में फेंक दी जाती है क्युँकि वह सच कहती है और कोई कार्रवाई नहीं होती है तो क्युँ ? हाशिमपुरा हत्याकांड में पीएसी लोगों को घरों से ले जाकर नहर के पास गोलियों से भून कर नहर के पानी में फेंक देती हैं और आरोपी वर्षों के बाद शक के आधार पर बाईज्जत बरी कर दिये जाते हैं तो क्युँ ? हत्यारे कौन थे ? 84 दंगों के आरोपियों पर तमाम गवाहों के बाद भी कोई निर्णय आना तो दूर उनको बाईज्जत बरी किया गया तो क्युँ ? हो सकता है कि उपरोक्त दिये उदाहरण सबूतों और साक्ष्यों के आधार पर लिए गए निष्पक्ष निर्णय हों परन्तु जैसे ही तस्वीर के इस तरफ देखता हूँ स्थिति बदल जाती है ।

आजादी के बाद आजतक अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों के पक्ष में एक भी अदालती फैसले मैने तो नहीं देखा बल्कि यदि कोई विषय अदालत के समक्ष पेश हुआ तो विपरीत ही फैसला आया , ज़किया जाफरी के पति को उनके ही घर में जलाकर भून दिया गया और वह बूढ़ी अबला दर दर न्याय के लिए भटक रही है परन्तु अदालतें सुनवाई करने से मना कर दे रही हैं , देश में संसद पर हमले के आरोपी एक व्यक्ति को सबूत नहीं बल्कि परसेप्शन ( जनभावना ) के आधार पर फांसी दे दी जाती है , यह भी भारत के इतिहास का एक मात्र उदाहरण है , ऐसे ही एक व्यक्ति को 30 जुलाई के दिन ही लटकाने की किसी की ज़िद पूरी करने के लिए उच्चतम न्यायालय 18 घंटे में दनादन दो सदस्यीय फिर तीन सदस्यीय पीठ बनाकर आधी रात को सुनवाई और सुबह तक सभी अपील खारिज कर देती है तो विश्वास तो खंडित होता है क्युँकि सामान्यतः यह प्रक्रिया 2-3 महीनो में अपनाई जाती है , अपील खारिज करने वाले तीनो स्वर्ण जजों के विचारों को देख कर तो बिल्कुल ही ऐसी न्यायिक व्यवस्था से विश्वास टूटता है जब जस्टिस दवे को कहते सुनता हूँ कि मैं तानाशाह होता तो देश में भगवत गीता पढ़ना अनिवार्य कर देता , स्पष्ट हो जाएँ कि उनके भगवत गीता पढ़ाने पर आपत्ति नहीं है आपत्ति उनके तानाशाह होने की इच्छा पर है वह भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में तो कैसे कोई विश्वास करे न्यायपालिका पर ।

देश में व्यवस्था के दोगलेपन के इसके अतिरिक्त और भी बहुत से उदाहरण हैं, तो शक होता है ऐसी व्यवस्था और न्याय व्यवस्था पर कि एक तरफ तो मुम्बई हमलों के आरोपी लखवी को आप भारत सौपने की मांग करते हैं वहीं दूसरी तरफ समझौता एक्सप्रेस विस्फोट के आरोपियों को ज़मानत दे रहे हैं तो हमारे और पाकिस्तान की न्यायिक व्यवस्था में अंतर क्या है ? किस मुँह और अधिकार से हम लखवी और हाफिज़ सईद को भारत को सौपने की मांग करते हैं ? दरअसल इसी दोगलेपन के कारण संयुक्त राष्ट्र में हम हारते हैं और हम पाकिस्तान को क्या नंगा करें वह हमें ही नंगा कर देता है ।चीन रूस अमेरिका हमारे इसी दोगलेपन के कारण हमारे विरूद्ध वोट करते हैं और बराक ओबामा भारत आकर ऐश करते हैं और इसी दोगलेपन पर तमाचा मारकर चले जाते हैं , दरअसल संघी दीमक लग गया है हमारे देश की हर व्यवस्था में और देखिए कि यह दीमक क्या क्या चाटता है और मेरा विश्वास है कि इस दीमक का अंतिम लक्ष्य भारत है । हमें इसके उपचार की तुरंत आवश्यकता है अन्यथा देश के एक वर्ग के हृदय में इस दोगलेपन के कारण जो शंका है उसकी फसल कोई काट ले जाए इसकी संभावना घातक है ।