pakistan

भारतीय उपमहाद्वीप पर जब अंग्रेजों का शासन था तब उन्होनें यहां फूट डालो और शासन करो की नीति पर काम किया था। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंनें हमेशा और हरसंभव प्रयास किया था कि इस मुल्क के दो बड़े कौमों में एक-दूसरे के प्रति धृणा और नफरत को उभारा जाये। अपने इस कुचक्र को उन्होंनें यहां से जाते वक्त भी नहीं छोड़ा। जब उन्हें ये एहसास होने लगा कि वो इस मुल्क पर ज्यादा समय तक शासन नहीं कर पायेंगें तो जाते-2 उन्होंनें मुसलमानों के मन में यह बात डालनी शुरु कर दी कि हमारे यहां आने से पहले तो यहां तुम्हारा शासन था तो फिर हमारे जाने की स्थिति में भी वापस शासन की बागडोर तुम्हें ही मिलनी चाहिये। कई मुसलमान उनकी बातों की झांसे मे आ गये और फिर से हिंदुस्तान पर राज करने की मंशा उनके अंदर कसमसाने लगी पर उन्हें ये भी पता था कि अब सारे हिंदुस्तान की हुकूमत हासिल करना उनके लिये आसान नहीं होगी इसलिये एक अलग मुल्क का ख्बाब उनके अंदर पलने लगा। शनैः-2 उनकी इस सोच को कट्टरपंथियों और सत्ता के लालचियों ने हकीकत की धरातल पर उतार दिया और 14 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को पाकिस्तान नामक मुल्क अस्तित्व में आया। पाकिस्तान के बनाने के पीछे काम करने वाले हर दिमाग में इसको लेकर एक अलग व्यक्तिगत स्वार्थ था जिसे सबने मिलकर इस्लाम का नाम दे दिया। मानव इतिहास में पहले कभी न धटिट होने वाले इस शर्मनाक काम और इस विभाजन के परिणामस्वरुप लाखों मासूम जानों की हत्याओं और महिलाओं की अस्मत लूटे जाने का पाप ढ़कने के लिये विश्व के मानचित्र पर पैदा हुये देश को इस्लाम के लिये स्थापित देश धोषित कर सारे गुनाहों की इतिश्री कर ली गई। पाकिस्तान सरकार की आधिकारिक बेबसाइट इसे यूं चित्रित्र करती है-

“The Islamic republic of Pakistan and Islam are synonymous since Pakistan was carved out of the Hindu dominated British India so that Muslims could live and practice their religion free of any bondage, subjugation and fear. Pakistan was carved out of the erstwhile British India on the basic plea by Muhammad Ali Jinnah, the founding father of Pakistan that Hindus and Muslims are two separate entities and they cannot coexist under one roof for many reasons, religion and religion related dissimilarities being the major cause. Muslims of India decided to find a place for themselves where they could be free to practice their religion as per the aspirations and tenants of Islam. The popular slogan at that time was “Pakistan Ka Matlab Kia – La Illah ha Illilal La” (What is the meaning of Pakistan – There is no God but Allah”).

इसे पढ़ने से तो यही महसूस होगा कि पाकिस्तान और वहां के मुसलमान इस्लाम के सबसे बड़े अलंबरदार हैं क्यूंकि इस मुल्क को पाने के लिये उन्होंनें अपने धर-परिवार, जमीन, जायदाद सबको छोड़ दिया था। पाकिस्तानी सरकार के बेबसाइट के दावे पाकिस्तान की स्थिति से नावाफिकों को ये भी एहसास दिला सकतें हैं कि इस्लाम और इसके मानने वालों के सम्मान और प्रतिष्ठा का मरकज़ दुनिया में कोई एक मुल्क है तो वो पाकिस्तान ही हैं। मगर ये बेहद अफसोस से कहना पड़ रहा है कि इनके बेबसाइट में वर्णित पाकिस्तान सिर्फ नाम का इस्लामी मुल्क है और इतना ही नहीं ये मुल्क इस्लाम और इसके मानने वालों के सम्मान और प्रतिष्ठा का मरकज नहीं वरन् इस्लाम की बदनामी और मुसलमानों की बदहाली का मरकज है।

इस्लाम को बदनाम करने वालों की फेहरिस्त में पाकिस्तान दुनिया में पहले नंबर पर है। इस्लाम के नाम पर बने इस मुल्क में न तो इस्लाम की मूल शिक्षायें सुरक्षित हैं और न ही मुसलमानों की जान-माल की कोई हिफाजत है। इस्लाम में हराम ठहराये गये तमाम चीजों को हलाल करने, इस्लाम के एहतराम के चीजों का अपमान करने और कुरान-हदीस की शिक्षाओं को लगातार ठुकराने रहने का दूसरा नाम है पाकिस्तान।

इस्लाम का ऐसा अपमान: सिर्फ पाकिस्तान में हो सकता है।

1991 में जब नवाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे, उस दौरान पाकिस्तान ने अपने पड़ोसी मुल्क भारत के कारगिल क्षेत्र में धुसपैठ कर भारत के साथ छद्म युद्ध आरंभ कर दिया था और शांति की चाहत रखने वाले तथा उसके लिये प्रयास कर रहे तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री की पीठ में छुरा धोंपा था। उपरोक्त बातें तो प्रायः सभी को मालूम है पर ये बात बहुत कम लोगों को मालूम है कि पाकिस्तान ने अपनी इस कायरतापूर्ण काम का नाम क्या रखा था? उनके इस मिशन का नाम रखा गया था ‘ऑपरेशन बद्र’। जो लोग इस्लाम की तारीख से वाकिफ नहीं हैं उनके लिये ये शब्द बहुत मायने नहीं रखता पर जो इस्लाम के इतिहास और नबी (सल्ल0) की सीरत से वाकिफ हैं वो जानतें हैं कि ‘बद्र’ शब्द का इस्लाम में क्या मुकाम है। बद्र अरब का एक मैदान हैं जहाँ नबी (सल्ल0) के नेतृत्व में इस्लाम का पहला गजवा हुआ था और मुसलमानों को विजय हासिल हुई थी। ये लड़ाई कई मामलों में बिशिष्ट थी। इस जंग में काफिरों के हजारों की फौज के सामने नबी (सल्ल0) के खेमे में केवल 313 आदमी थे पर फिर भी मुसमलान विजयी रहे थे। ये विजय भी कोई सामान्य विजय नहीं थी, इस जंग ने मक्का वालों की कमर तोड़ दी थी और अबू जहल, उत्बा, आस बिन हिश्शाम, उकबा, उमैया, अबुल बख्तरी जैसे कई बड़े सरदारों समेत कुरैश के 70 लोग मारे गये थे जिसके बाद कुरैश की कमर टूट गई थी। कहा जाता है कि इस जंग में फरिश्तों ने मुसलमानों की तरफ से काफिरों से जंग की थी। इस जंग की एक और बिशेषता थी कि इस जंग में जिन सहाबियों ने भी भाग लिया था उनका मकाम नबी (सल्ल0) ने तमाम सहाबियों से ऊपर रख दिया था और ये बशारत दे दी थी कि बद्र में शरीक होने के फजीलत की वजह से अब वो चाहे कोई भी गुनाह करे, अल्लाह ने उन्हें कयामत तक के लिये माफी दे दी है।

इन्हीं कारणों से जब किसी मुसलमान के कान ‘बद्र’ शब्द सुनतें हैं तो उन्हें अपने दीन की पहली विजय की याद आती है और ये एहसास होता है कि अगर जंग हक के लिये हो रही हो तो अल्लाह भी अपने बंदों की मदद करतें हैं, पर इस्लाम के नाम पर बने मुल्क पाकिस्तान ने इस पवित्र शब्द का इस्तेमाल एक बेहद शर्मनाक और कायरतापूर्ण धुसपैठ कराने के मिशन में की जिसमें उसे बुरी तरह शिकस्त खानी पड़ी।

अब इतिहास में जब कभी ‘बद्र’ शब्द की चर्चा होगी तो उसमें इस शब्द के साथ जुड़े एक शर्मनाक पराजय का जिक्र भी आयेगा जो इस्लाम का दंभ भरने वाला देश के कुकृत्यों के कारण होगी। पाकिस्तान के हुक्मरानों की अपनी महत्वाकांक्षायें हो सकतीं हैं, सियासी मजबूरियां हो सकती है पर उन्हें ये हक किसने दिया कि अपनी करनी से वो इस्लाम से जुड़े एहतराम के शब्दों को बदनाम करें?

पाकिस्तान: जहाँ अब बाबा-ए-आजम काफिर हैं।

मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के संस्थापक और उसके पहले गर्वनर जनरल थे। पाकिस्तान बनाने के उनके इस एहसान के बदले उन्हें वहां बाबा-ए-आजम का दर्जा और कायदे-आजम का खिताब दिया गया, ठीक वही दर्जा जो भारत में महात्मा गाँधी को प्राप्त है। गाँधीजी ही की की तरह जिन्ना साहब के जन्म दिवस पर भी पाकिस्तान में सार्वजनिक अवकाश रहता है। पाकिस्तान सरकार की आधिकारिक बेबसाइट पर जिन्ना साहब की तारीफ में कसीदे गढ़े गये हैं और वहां कि अवाम उनके नाम के साथ रहमतुल्ला0 लगते हैं !

ये तो हुआ जिन्ना को लेकर पाकिस्तानी व्यवहार और मानसिकता के तस्वीर का एक रुख, पर इस तस्वीर का एक दूसरा रुख भी है जो जिन्ना साहब को काफिर बना देता है। भारत को दारुल-हर्ब मानने वालों के अलग मुल्क के सपनों को हकीकत में बदलने वाले मोहम्मद अली जिन्ना आज अपने ही लोगों द्वारा अपने बनाये मुल्क में काफिर धोषित कर दिये हैं। पाकिस्तान की बहुसंख्यक आबादी सुन्नियों की है और मस्लकी अकीदे के एतबार से जिन्ना इस्लाम के शिया फिरके के आगाखानी खोजे वर्गसमूह से आते थे। आज जिन्ना के बनाए मुल्क में उनके अकीदे वाले काफिर धोषित किये जा रहें हैं और रोज कत्ल किये जा रहें हैं। 1984 में वजूद में आये संगठन सिपह-ए-सहाबा शियाओं को काफिर धोषित करवाने के नाम पर बना था। बाद में लश्करे-झांगवी आदि बीसियों संगठन वजूद में आ गया जिनका एकमात्र लक्ष्य था शियाओं को चुन-चुन कर मारना। शियाओं के कत्लेआम का सवाल जायज-नाजायज का न होकर पाप-पुण्य का बना दिया गया है और शियाओं के कत्ल को पुण्य धोषित कर दिया गया है। आए दिन ऐसे फतवे जारी होते रहतें हैं जिनमें शियाओं को कानूनी तौर पर काफिर धोषित करने की मांग की जाती है।

वो लोग जो यह मानतें हैं कि पाकिस्तान मुसलमानों के सपनों का मुल्क था तो फिर इस लिहाज से तो जिन्ना का दर्जा मुजाहिद का हो जाता है, फिर एक मुजाहिद आज काफिर कैसे बना दिया गया? इस्लाम की कौन सी परिभाषा एक इस्लामी मुल्क बनाने वाले को काफिर करार देती है? अगर शिया काफिर हैं तो फिर कायदे-आजम भी काफिर थे। इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान लेकर इतराने वाले क्या इस बात को स्वीकार करने को तैयार हैं कि वो एक काफिर के द्वारा दिलवाये गये मुल्क को इस्लाम का स्वप्न साकार होना मानतें हैं और एक काफिर का दर्जा उनके मुल्क में बाबा-ए-आजम का है? इन कट्टरपंथियों के लिये अगर भारत काफिरों का मुल्क था तो फिर उन्हीं की परिभाषा के आधार पर पाकिस्तान काफिर के द्वारा बनाया गया मुल्क है। कब्र में पड़ी जिन्ना की आत्मा इस बात के लिये खुद को और उस दिन को जरुर कोस रही होगी जब उन्होनें इस्लाम का नाम लेकर पाकिस्तान के मांग की जिद पकड़ी थी, क्योंकि धर्मनिरपेक्ष भारत में मौजूद और पाकिस्तान हिजरत न करने वाले का फैसला लेने वाले मुसलमानों की परिभाषा में जिन्ना कम से कम काफिर तो न ठहराये जाते।

ये इनका कौन सा इस्लाम है जो कभी सज्दे में झुके नबी के नवासे की गर्दन काट लेता है तो कभी मुसलमानों को इस्लाम के स्वप्निल मुल्क का सपना दिखाने वाले को ही काफिर धोषित कर देता है ? इसका जबाब भी इस्लामी बुद्धिजीवियों से अपेक्षित है।

पाकिस्तान: जहां रसूल का नहीं उलेमाओं का इस्लाम है।

मुस्लिम समाज की एक खासियत है कि ये समाज अपने धर्मगुरुओं का काफी एहतराम करता है। उसका बचपन मदरसों में मौलानाओं के बीच गुजरता है, कम से कम हर जुमे को अपने स्थानिक मस्जिद के इमामों का खुत्बा सुनता है, उसकी विलादत से लेकर तमाम दूसरे संस्कारों में इन मौलानाओं की बड़ी भूमिका रहती है। इन कारणों से आम मुस्लिम समाज पर इन मौलानाओं का काफी प्रभाव रहता है पर अपने इस प्रभाव का इस्तेमाल ये उलेमा अपनी उम्मत के बुराईयों को उभारने में करतें है। अपने समाज को बदी की तरफ बुलाने का इनका एक ही मकसद है कि मेरे फिरके को पकड़े रहो, तुम्हारे इस्लाम की हिफाजत करने की जिम्मेदारी मेरी। उम्मत को वहदत को टुकड़े-2 करने वाले इन उलेमाओं ने अपनी उम्मत को ईमान का एक ही तकाजा समझा रखा है कि जिस तरह की बुराई तुम्हारे मन में आये करतो रहो, बस हमें और हमारे फिरके को न छोड़ना। मौलानाओं की ये भूमिका बाकी इस्लामी मुल्कों में तो है ही पर इस्लामी मुल्क पाकिस्तान में सबसे अधिक सर चढ़ कर बोल रही है। इन मौलानाओं के कृत्यों के कारण दुनिया में पनपने वाली ऐसी कौन सी बुराई है जो आज पाकिस्तान में नहीं है? कत्ल, अपहरण, बलात्कार, शराबखोरी, झूठ की सियासत, झूठे मुकदमें , फिरकाबंदी समेत हजारों ऐसी बुराईयां हैं जो आज पाकिस्तान में आम है। उलेमाओं के ऊपर अपने उम्मतियों को दीनी तालीम देने की जिम्मेदारी है तो समाज के सुधार का भी दायित्व भी होता है पर क्या कभी इन उलेमाओं ने क्या कभी समाज में फैले बुराईयों को दूर करने की कोशिश की ? क्या कभी नोटिस लिया की उनके मानने वाले किस किस्म की बुराईयों में लिप्त हैं? क्या आज पाकिस्तान में वही इस्लाम है जिसे हजरत मुहम्मद (सल्ल0) लेकर आये थे? ये किस इस्लाम के अनुयायी हैं और किस नबी के पैरोकार हैं? इस्लामी विश्वास के अनुसार अल्लाह ने दुनिया में 1 लाख 24 हजार पैगंबर भेजे थे, क्या इनमें से किसी नबी ने अपनी उम्मत की इमामत इस बात पर की थी कि आओ आतंक फैलाते हैं, बच्चों का अपहरण और उनका कत्ल करतें हैं, आतमधाती दस्ते बनातें हैं, आतंकी हमले करतें हैं, गैर-मुस्लिम की इज्जत और अस्मत को रौंदतें हैं, अपने हुक्मरानों के कत्ल की योजना बनातें हैं, अपने से अलग मत और अकीदा रखने वालों का कत्लेआम करतें हैं, भूठ की सियासत और झूठे मुकदमें करतें है, कलमा पढ़ने वालों को काफिर धोषित करवाने के लिये आंदोलन करतें हैं ? इतनी बुराईयों वाले पाकिस्तान में हजारों मस्जिदें होंगी और उनकी इमामत करने वाले उतने ही मौलाना, पर वो सब के सब पाकिस्तान के मुसलमानों की ऐसे बदतरीन किरदार को देखते हुये भी चैन से सो रहें हैं। अगर ये हकीकी इस्लाम के पैरोकार हैं तो ऐसे हालात में उन्हें नींद कैसे आ रही है? नबी के सुन्नत पर चलने का दावा करने वाले ये उलेमा उनके लाये दीन को बदनाम करने में आज कोई कसर नहीं छोड़ रहें हैं। जाहिर है कि आज पाकिस्तान में इस्लाम ठीक उसी जगह पर आकर खड़ा हुआ है जिसकी पेशीनगोई नबी (सल्ल0) ने की थी। रसूल (सल्ल0) ने अपनी एक हदीस में फरमाया था जो हजरत अली से रिवायत है, बहुत जल्द लोगों पर एक ऐसा जमाना आएगा जब इस्लाम का सिर्फ नाम बाकी रह जायेगा और कुरान की सिर्फ रस्म बाकी रह जायेगी। इनकी मस्जिदें तो आबाद होंगी पर हिदायत से खाली होंगी। उनके उलेमा आसमान के नीचे की सबसे बदतरीन मख्लूक होंगें। इन उलेमाओं से फित्ने पैदा होंगें तथा फिर उन्हीं में वापस आ जायेंगें। (बैहकी)

ये उलेमा क्या अपनी उम्मत को कभी बतातें हैं कि तुम जो कर रहे हो वो तबाही का रास्ता है और इससे हमारे प्यारे नबी का लाया दीन बदनाम होता है ? ये दुनियादार और फित्नों को जन्म देने वाले उलेमा अपनी उम्मतियों को और दे भी क्या सकतें हैं जबकि इन जैसों के लिये नबी ने पहले ही फरमा दिया था,जिस तरह कताद के पेड़ से कांटों के सिवा कुछ हासिल नहीं किया जा सकता उसी तरह सरमाएदारों के करीब से गुनाहों के सिवा कुछ हासिल नहीं हो सकता।

पाकिस्तान: जहां अमन कहीं खो गया है ।

पाकिस्तान के वजूद में आये तकरीबन 65 साल हो गये पर आज तक यह मुल्क ये तय नहीं कर पाया है कि उसके लिये शासन की कौन सी प्रणाली बेहतर रहेगी। इसलिये कभी वहां लोकतांत्रिक सरकार राज करती है तो कभी फौज। वहां शासन फौज का हो या निर्वाचित सरकार का आम जनता के लिये हालात वही रहते हैं। उसके जान-माल की हिफाजत की गारंटी न फौज लेती है और न निर्वाचित सरकार, और हो भी कैसे जबकि उनकी खुद की जिंदगियां वहां सुरक्षित नहीं है। पाकिस्तान की तारीख अधिक पुरानी नहीं हैं पर इस छोटी सी अवधि में पाकिस्तान का दामन अपने हुक्मारानों के खून से रंगा है। इस मुल्क में शायद ही कोई दिन गुजरता है जब मस्जिदों में खून नहीं बहता। यहां गैर-मुसलमानों की जान और इज्जत, आबरु की कोई कीमत नहीं है तो खुदा और उसके रसूल का कलमा पढ़ने वालों की जिंदगियां भी सुरक्षित नहीं है। बीच के कालखंड में यहां ईशनिंदा के आरोपितों को सजा देने के लिये एक काला कानून लाया गया था जिसकी जद में न केवल अल्पसंख्यक हिंदू, अहमदिया और सिख आतें हैं बल्कि खुद मुसलमान भी इसके शिकार होते रहतें हैं। इस कानून का दुरुपयोग आपसी रंजिशों का बदला लेने के लिये किया जाता है। ऐसी कई धटनायें हर महीने पाकिस्तान में धटिट होती रहती है। इस्लाम धर्म में हाफिजे-कुरआन को बेहद आला दर्जा हासिल है। नबी (सल्ल0) की कई हदीसें कुरआने-पाक को हिब्ज करने वालों को जन्नती होनें की खुशखबरी देता है। हदीसे-पाक में तो ये तक कहा गया है कि एक हाफिजे-कुरआन कयामत के रोज अपनी तीन पीढि़यों को बख्शवाएगा। हदीस के अनुसार जन्नत में तो ये हाफिज बुलंद मर्तबा पाएंगे पर एक हाफिजे-कुरआन को पाकिस्तान में जिल्लत भरी मौत मिलती है वो भी ईशनिंदा के झूटे आरोप पर । पकिस्तान के गुजरांवाला के रुपाली गांव में डॉक्टर सज्जाद फारुख नाम के एक शख्स (जो हाफ़िज़े–कुरान थे) की ईशनिंदा के झूठे आरोप पर पीट-२ कर हत्या कर दी गयी ! नबी के अपमान का नाम लेकर अपना मंसूबा साधने वाले दुनिया भर में इस्लाम की बदनामी करवा रहें हैं और अपने कृत्यों से लोगों को ये मौका दे रहें हैं कि वो इस्लाम के बारे में गलत बोले।

इनकी परिभाषा को अगर मानें तो पाकिस्तान में हिंदू, सिख, अहमदी और शिया ही काफिर नहीं हैं बल्कि हर वो इंसान काफिर है जो इस्लाम के नाम पर पनपने वाले उग्रवाद की निंदा करता है और इनके तथाकथित जेहाद को फसाद कहता है। आतंकी मुल्क के हर गली में फैले हुये हैं जिनका अपना कानून है। वो बेलगाम होकर निर्दोष जनता का खून बहातें हैं और मीडिया, प्रशासन और बुद्धिजीवी मूक-बधिर बन उनके सामने बैठें रहतें है। इस्लाम के वो तमाम प्रचारक भी जुबानों पर ताले लगा लेतें हैं जो गैरमुस्लिमों को इस्लाम की दावत देते वक्त शांति और भाईचारा पर लंबी-2 तकरीरें करतें हैं। अपने समाज में और अपने मुल्क में हो रहे जुल्म पर खामोशी की चादर ओढ़ने वाले ये सब के सब नबी (सल्ल0) की इस हदीस के ऐतबार से मुसलमान नहीं हैं। नबी (सल्ल0) ने अपनी एक हदीस में फरमाया था, वह हममें से नहीं जो तास्सुब की दावत दे, तास्सुब के लिये लड़ाई करे और तास्सुब पर ही मर जाये। एक सहाबी ने पूछा,तास्सुब क्या है? इर्शाद फरमाया, जुल्म पर अपनी कौम की मदद करना।

ये सब इसलिये है क्योंकि इस्लाम का दंभ भरने वाले इस मुल्क में हकीकी इस्लाम मौजूद ही नहीं है। अगर हकीकी इस्लाम इस्लाम मौजूद हो तो उसके रहमत की सायों में इंसान तो क्या परिंदे और जानवरों तक सुकून हासिल करतें हैं। हकीकी इस्लाम हो तो किसी को सरेआम किसी आत्मधाती हमलावर का शिकार होने का डर नहीं रहता, औरतों को अपनी अस्मत लूटने का खतरा नहीं होता, गैर-मुस्लिम अमान में रहतें हैं, किसी निर्दोष पर जुल्म नहीं होता, किसी का माल और जायदाद नहीं हड़पा जाता। इसलिये पाकिस्तान में इस्लाम का सिर्फ नाम बाकी हैं जो उनके संविधान में हैं। वहां के दुनियादारों ने पाकिस्तान को ऐसा रख छोड़ा है जहां आज अमन नदारद है !

पाकिस्तान: एक इस्लामी मुल्क जहां मुसलमान कोई नहीं है।

दुनिया में पाकिस्तान अकेला ऐसा देश है जहां मुस्लिमों की पहचान उसके मुस्लिम होने के आधार पर नहीं बल्कि उसके मस्लक/फिरके के आधार पर होती हैं। इस मुल्क के वाशिंदे बड़े गर्व से अपनी पहचान अपने फिरके के आधार पर बतातें हैं। हर फिरकों के हितों के साधने वाले अलग राजनीतिक दल हैं। सबसे दिलचस्प बात ये है कि हर फिरका खुद को सच्चा और बाकियों को गुमराह, काफिर और जहन्नमी मानता है। पाकिस्तान में जब अहमदियों को गैर-मुस्लिम धोषित किये जाने के लिये एक आंदोलन चलाया जा रहा था तब सरकार ने मुनीर कमीशन के नाम से एक कमिटि गठित की थी। कमटि ने अपने रिपोर्ट में कहा था कि इस्लाम को लेकर अगर हर फिरके के मौलवियों की परिभाषा को मानी जाये तो फिर पाकिस्तान में कोई मुसलमान ही नहीं बचेगा क्योंकि हर फिरका का मौलवी अपने अलावा दूसरे तमाम फिरकों को काफिर मानता है। इसकी जद में सबसे पहले अहमदी मत के मानने वाले मुसलमान आये। \एक संविधान संशोधन के द्वारा अहमदियों को गैर-मुस्लिम धोषित कर दिया गया। अहमदियों को गैर-मुस्लिम धोषित करवाने की मुहिम में पाकिस्तान के सभी फिरकों के मानने वाले लगे थे, जिनमें शिया भी थे। कहतें हैं कि कट्टरपंथी मानसिकता को अगर उसकी ख्वाहिशें पूरी करने दी जाये तो उनमें अपनी मांगे मनवाने का जूनून छा जाता है। इसलिये अब वहां अहमदियों के बाद शियाओं को भी संवैधानिक रुप से काफिर धोषित की जाने की मांग उठ रही है और चूंकि सरकार उन्हें गैर-मुस्लिम धोषित नहीं कर रही है इसलिये हर रोज उनका खून बहाया जा रहा है।

इस्लाम के जितने भी फिरके आज पाकिस्तान में मौजूद हैं, सबने अपने अलावा दूसरों पर कुफ्र का फतवा जारी कर रखा है। वहां की मस्जिदों में बातें गरीबी, भूख, अशिक्षा पर नहीं वरन् दूसरे फिरकों वालों पर किस-किस तरीके से लानत भेजी जाये इसकी होती है। कुल मिलाकर तकरीबन 16 करोड़ मुसलमानों के इस मुल्क में उन्हीं के मुख्तलिफ मौलवियों के फतवों के अनुसार मुसलमान कोई भी नहीं है।

पाकिस्तान: जहां स्त्रियों के साथ ये सब कुछ होता है।

कुरान अवतरण से पूर्व अरब में महिलाओं की स्थिति काफी बदतर थी और पुरुषों के मुकाबले उन्हों दोयम दर्जे कर समझा जाता था। उस दौर मे जब महिला-पुरुष समानता और महिला अधिकार जैसे शब्द किसी के कल्पना में भी नहीं थे तब हजरत (सल्ल0) पर उतरे ग्रंथ कुरआन ने महिला अधिकार और समानता पर जो सिद्धांत पेश किये थे उसने सारे संसार को स्तब्ध कर दिया था। वो कुरान था जिसने सबसे पहले ये धोषणा की थी कि स्त्री और पुरुष दोनों का दर्जा समान है। हजरत मोहम्मद (सल्ल0) ने स्त्री के हर किरदारों यथा माँ, बेटी, बहन, पत्नी के अधिकारों की बात की। लड़कियों को ये हक दिया कि वो अपनी मर्जी से शादी कर सकतीं हैं। पत्नी पति की दासी नहीं है, ये धोषणा करते हुये पवित्र कुरान ने कहा, आप दोनों एक-दूसरे के लिबास हो। नबी (सल्ल0) ने स्त्री और पुरुष दोनों पर ये फर्ज कर दिया कि वो इल्म हासिल करें। मर्दों को बीबियों से मोहब्बत करने और उनका सम्मान करने की तालीम दी। मगर इस्लाम के नाम पर बने मुल्क पाकिस्तान में आज सबसे बदतर स्थिति में कोई है तो वहां की महिलायें हैं। वहां के पुरुष, सरकार और कट्टरपंथी मौलानाओं ने उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक और पुरुषों के पांव की जूतियां बना कर रखा हुआ है। Voice of America की एक खबर के अनुसार पाकिस्तान के कई इलाकों में स्त्रियों पर अंडा और दूसरी गर्म चीज खाने पर रोक लगाई गई है क्योंकि वहां के मर्दों को लगता है कि गर्म चीज उनके मन को गलत बातों की तरफ मोड़ेगा और उनमें चारित्रिक स्खलन आएगा। पाकिस्तान में महिलाओं के साथ बलात्कार और छेड़छाड़की के घटनाएँ आम हैं ! पकिस्तान की असेंबली में एक बहस के दौरान हुये खुलासे ने बताया कि इस मुल्क में औरतों को क्या समझा जाता है और उनके साथ क्या किया जाता है। इस बहस में जो आंकड़े पेश किये गये उससे ये खुलासा हुआ कि बर्ष 2011 में पाकिस्तान में महिलाओं के साथ अत्याचार के 5557 मामले दर्ज हुये, जिनमें 1163 हत्या, 368 ऑनर कीलिंग, 80 हत्या की कोशिश, 1203 अपहरण, 667 धायल, 82 आत्महत्या की कोशिश, 572 बलात्कार, 256 धरेलू हिंसा, 408 मर्दों के उकसाने के कारण आत्महत्या, 199 सामूहिक बलात्कार, 122 छेड़छाड़, 74 यौन उत्पीड़न, 43 जिंदा जलाया जाना, 210 तेजाब फेंकने की धटनाये थी। ये आंकड़ें तो उन धटनाओं की है जो दर्ज हुये है, दर्ज न होने वाली ऐसी धटनायें तो इससे भी ज्यादा होगी। (न्यू एज इस्लाम पर अपने आलेख में असद मुफ्ती ने भी ये आंकड़े पेश कियें हैं) दूसरे मुल्कों में अमूनन राजनीतिक पार्टियां महिलाओं के हक के लिये आवाज उठातीं हैं पर पाकिस्तान में उनके लिये बोलने वाला कोई नहीं है और तो और पाकिस्तान की एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी मुत्ताहिदा मज्लिसे-अमल को जब एक बार ये अंदेशा हुआ कि उनके पार्टी के कुछ सदस्य खेमा बदलकर दूसरी पार्टी में जा सकतें हैं तो उन्होंनें एक बैठक कर अपने सभी सदस्यों से इस बात की शपथ दिलवाई कि अगर वो पार्टी में साथ गद्दारी करेंगें तो उन्हें अपनी बीबी को तलाक देना पड़ेगा। पाकिस्तान में बलात्कार की धटनायें आम है तो इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि उन बलात्कारियों को कोई सजा नहीं मिलती। कोई गुंडा अगर किसी मासूम की अस्मत लूट लेता है तो पाकिस्तान की शरई अदालत/पंचायत ये हुक्म देती कि बलात्कारी की बहन का निकाह बलत्कृत लड़की के बाप से भाई से कर दी जाये।

वो हजरत मोहम्मद (सल्ल0) थे जिन्होंनें महिलाओं को ये हक दिया था कि अगर उसके वालिद उसका निकाह उसकी मर्जी के खिलाफ करतें हैं तो उसे पूरा अख्तियार है कि वो उस शादी से इंकार कर दे। पवित्र कुरान ने तो जिना करने वालों के लिये सजा का प्रावधान रखा था पर पाकिस्तान में बलात्कारियों के लिये कोई सजा नहीं है। ये कैसा इंसाफ है कि एक मासूम के बलात्कारी के कृत्यों की सजा दूसरी मासूम को दी जाये ? राजनीतिक वफादारी न बदले इसके लिये बीबियों को तलाक देने की शर्त जैसे वो इंसान नहीं कोई सामान हो। मजे की बात ये है कि ये सब वहां इस्लाम के नाम पर हो रहा है । पाकिस्तान में बलात्कार , महिलाओं के साथ बर्ताब और महिलाओं पर अत्याचारों के उपरोक्त आंकड़ें को देखकर क्या ये लगता है कि ये उस रसूल के उम्मती हैं जिन्होंने मुसलमानों को अपने चरित्र को ऊँचा उठाने की तालीम थी दी और ऐसे चरित्रवानों को खुशखबरी देते हुये कहा था कि जिस मुसलमान की किसी स्त्री पर नजर पड़ी और उसने सिर्फ खुदा के लिये अपनी निगाहें झुका ली तो ऐसे लोगों के लिये जन्नत की खुश्बू है। ये कैसे मुसलमान हैं जो महिलाओं को लेकर कुरान की तालीम को भूल गये? पाकिस्तान के ये कैसे हुक्मरान और सियासी लीडर हैं जो पवित्र कुरान की शपथ लेकर सत्तासीन होतें हैं और कुरान की तालीमों पर अमल नहीं करते? पाकिस्तान में आज इस्लाम अजनबी हो चुका है, अगर अजनबी न हुआ होता तो महिलाओं की अस्मत लूटा जाना तो दूर उसकी तरफ नजर उठाने का कोई तसव्वुर भी न करता।

पाकिस्तान: जहां हराम खैरात को हलाल माना जाता है।

पाकिस्तान का जन्म भारत से नफरत के आधार पर हुई था। इसलिये वहां के नेताओं के चुनाव जीतने और सत्ता में बने रहने का आधार भारत विरोध है। भारत का डर दिखाकर पाकिस्तानी नेता वोट तो बटोरते ही है साथ ही पाकिस्तान जनता की आंकांक्षाओं को हथियार खरीदने और फौज की तादाद बढ़ाने में धूल-धूसरित कर देतें हैं। भारत विरोध के लिये उससे जो भी बन पड़ता है वो करतें हैं। पाकिस्तान की इस मानसिकता ने उन्हें बदहाली की दहलीज पर पहुँचा दिया है। पाकिस्तानी हुक्मरानों की कोशिश बजाए अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने, उधोगों का विकास करने, रोजगार सृजन करने और उपज बढ़ाने के हथियार खरीदने में ज्यादा होती है। कर्ज लेकर हथियार जमा करने की मानसिकता ने पाकिस्तान को दुनिया के उन देशों का गुलाम बना दिया है जिन मुल्कों से मुसलमान सबसे ज्यादा नफरत करतें हैं। पाकिस्तान जबसे बना है, अमेरिका खैरात में उसे 50 अरब डॉलर दे चुका है पर ये खैरात वहां के अवाम के माली हालत और तालीम के स्तर को बेहतर बनाने में नहीं वरन् हथियार जमा करने में जाया कर दिये गये। भारत से नफरत की अंधी दौर में अमेरिका आदि देशों से खैरात बटोरते वक्त पाकिस्तान के हुक्मरानों को ये एहसास भी नहीं रहा कि ये इस्लाम की परिभाषा में हराम दौलत की श्रेणी में आता है।

हजारों लाखों मुसलमानों के खून से सने अमेरिकी खैरात को बटोरते समय वो ये भी सोचने को तैयार नहीं कि इस हराम दौलत को हासिल करने के एवज में उन्हें क्या-2 खोना पड़ा है। ये मुल्क आज अमेरिका के हाथों में कथपुतली बन कर खेल रहा है। आज के दौर में पाकिस्तान संभवतः अकेला स्वाधीन मुल्क है जहां कोई देश आता है, ड्रोन हमले करता है और उसके देशवासियों का कत्ल कर चला जाता है। हराम के पैसों पर पल रहे इस मुल्क में ये स्थिति आनी ही थी क्योंकि दूसरे खलीफा हजरत उमर फारुख ने फरमाया था, ऐ मुसलमानों ! मुझे तुम्हारे भूख से खतरा नहीं तुम्हारे दौलतमंद होने से खतरा है। आगे उन्होंनें यह भी फरमाया था कि जब तक इस्लाम गरीब रहेगा गैरत जिंदा रहेगी। आज दौलतमंद होने की चाह ने पाकिस्तानी आकाओं को बेगैरत कर दिया है और उसकी स्वाधीनता छीन ली है। नबी (सल्ल0) का दसियों हदीसें है जो मुसलमानों को हराम कमाई से परहेज करने का हुक्म देती है। उदा0,

-नबी (सल्ल0) ने कयामत से पहले जाहिर होने वाले हालातों की इत्तला देते हुये फरमाया था कि लोगों पर एक ऐसा जमाना आएगा कि इंसान यह परवाह न करेगा कि उसने हलाल हासिल किया या हराम। (बुखारी शरीफ)

– रसूल (सल्ल0) ने इर्शाद फरमाया था कि जन्नत में वह गोश्त दाखिल न होगी जो हराम कमाई से बढ़ी होगी और जो गोश्त हराम से बढ़ा हो, दोजख उसकी अधिक हकदार होगी।

– रसूल (सल्ल0) ने फरमाया था कि जिसने 10 दिरहम का कपड़ा खरीदा और उसमें 1 दिरहम भी हराम का था तो जब तक वो कपड़ा उसके जिस्म पर रहेगा खुदा उसकी नमाज कबूल न फरमायेगा।

और बदकिस्मती से आज पाकिस्तान हलाल-हराम के तमाम फर्क को भूलकर इन तमामों हदीसों की बातों को को पूरा करने में पूरी ईमानदारी से लगा हुआ है।

पाकिस्तान: जहाँ अहमदियों के बाद अब शिया काफिर हैं।

पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर बना तो जरुर है पर वहां इस्लाम नहीं है। अगर इस्लाम होता तो तौहीद और मुहम्मद (सल्ल0) के नाम का कलमा पढ़ने वालों को काफिर न ठहराया जाता, न ही उनके खून बहाये जाते और न ही कलिमा पढ़ने वालों पर कुफ्र और बाजिबुल-कत्ल के फतवे लगाये जाते। मुल्लावाद के शिकंजे में जकड़े पाकिस्तान में आज हर फिरके के मानने वालों ने सिवाए अपने फिरके के तमाम दूसरे फिरकों को काफिर धोषित कर रखा है और काफिर धोषित करने की इस प्रतिस्पर्धा में सबसे ज्यादा शिकार अहमदी और शिया हुयें हैं। अहमदियों को तो काफी पहले कानूनी रुप से काफिर धोषित कर दिया और हर रोज वो कत्ल किये जा रहें हैं। अहमदियों के बाद काफिर करार दिलवाये जाने की कट्टरपंथियों की मुहिम में अब शियाओं का नाम हैं। परिणामस्वरुप शियाओं का सरेआम कत्लेआम किया जा रहा है। राह चलते लोगों की कमीज उतार कर देखा जाता कि उनकी पीठ पर मातम का निशान है कि नहीं, और अगर यह निशान मिल गया तो उन्हें मौत दे दी जाती है। सन् 2009 में अंग्रेजी अखबार द न्यूज में तहरीके तालिबान की तरफ से एक धमकी भरा विज्ञापन प्रकाशित करवाया गया जिसमें शियाओं को धमकी दी गई कि वो लोग अपने कुफ्री अकाएद को छोड़ दें और हक राह पर लौट आयें अन्यथा उनके मर्दों को कत्ल कर दिया जायेगा, औरतों को लौंडियां बना लिया जायेगा और बाकियों को गुलाम। इस 20वीं में ऐसी मध्ययुगीन मानसिकता रखने वाले, अपने ही हममजहबों के खून और उनकी औरतों का अपमान करने की मानसिकता रखने वाले एवम् देश के सबसे बड़े अखबार में इस तरह के विज्ञापन देने वाले किस इस्लाम के प्रचारक है? जिस मजहब की किताब और उसके नबी (सल्ल) की शिक्षायें औरतों को आला मुकाम देती है, जिस मजहब के नबी ये फरमातें हैं कि जिस मुसलमान मर्द की किसी औरत पर नजर पड़ी और सिर्फ अल्लाह के लिये उसने अपनी नजरें नीची कर ली उसके लिये जन्नत की खुश्बू है, जिस मजहब के नबी ने गुलामी प्रथा की धृणित परंपरा को बंद कराया उस मजहब के ये स्वयंभू रहनुमा अपने ही धर्मभाईयों की औरतों को लौंडिया बनाने और उनके बच्चों को गुलाम बनाने की मानसिकता रखतें हैं। हद तो तब होती है जब इस विज्ञापन पर पाकिस्तान से कोई आवाज नहीं उठती। गैरमुसलमानों को इस्लाम की तरह बुलाते वक्त इस्लामी समानता, अमन और भाईचारे का उपदेश देने वालों को तब सांप सूंध जाता है और उनकी जुबान नहीं खुलती। यकीनन पाकिस्तान के हलाकत का वक्त करीब है, नबी की एक हदीस इसकी पुष्टि कर देती है जिसमें उन्होंनें फरमाया था, जब तुम जुल्म पर अपनी कौम की मदद करने लगना तो समझ लेना तुम्हारी हलाकत करीब है। अब्दुल्ला बिन अम्र से रिवायत एक हदीस है जिसमें नबी (सल्ल0) ने फरमाया था कि जब जालिम को जालिम कहने में लोग हिचकने लगे तो तुम उनसे रुखसत हो जाना। शियाओं से नफरत का ये आलम है कि उन्हें मारने के बाद जब उनकी मय्यत कब्रिस्तान ले जाई जा रही होती है तो ये बहादुर (?) वहां जाकर भी बम फोड़ देतें हैं। शिया मस्जिदों में नमाज पढ़ रहें होतें हैं, ये वहां जाकर भी बम फोड़ आतें हैं। क्या ये ईमान का तकाजा है कि उस जगह पर बम फोड़ा जाये जहां खुदा का नाम लिया जाता है ?

एक इंसान के साथ इस तरह के सलूक से तो इंसानियत शर्मिंदा हो जाये। इस तरह के कुकर्म करने वाले और खुद को मुसलमान कहने वालों को क्या नबी की ये हदीस भी याद है जिसमें उन्होंनें काबा की तरफ तवज्जो करते हुये फरमाया था तू किस कद्र पाकीजा है, तेरी खूश्बु किस तरह उम्दा है, तू किस कदर काबिले एहतराम है, मगर मोमिन की इज्जत और एहतराम तुझसे ज्यादा है और इसी कारण मोमिन का माल, खून, इज्जत एहतराम के काबिल है। ये बात हराम है कि हम किसी मोमिन के बारे में जरा भी बदगुमानी रखें। (तबरानी)

सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि कलिमा पढ़ने वाले को काफिर कहने और उनके ईमान को तय करने का हक कट्टरपंथियों को किसने दे दिया ? इनके पास आखिर ऐसा कौन सा लिटमस पत्र है जिसके आधार पर ये ईमान की परीक्षा करतें हैं? अगर इन कट्टरपंथयों की परिभाषा में शिया मुसलमान नहीं हैं तो कम से कम इंसान तो हैं और इस लिहाज से पवित्र कुरान और नबी (सल्ल0) के हुक्म के मुताबिक उसे तो बख्शा जाना चाहिये।

पाकिस्तान: एक इस्लामी मुल्क जहाँ शराब की नदियां बहती है।

पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर बना था, इसका संविधान इसे इस्लामी मुल्क का दर्जा देता है, इसके हुक्मरान रसूल (सल्ल0) के सुन्नत पर चलने का दंभ भरतें हैं पर इसी पाकिस्तान में इस्लाम की सबसे हराम चीज हलाल कर दी गई है। इस्लाम धर्म में शराब पीने, इसका कारोबार करने अथवा किसी भी रुप में इससे जुड़ने की सख्ती से मनाही की गई है। पवित्र कुरान में आता है, ऐ ईमान लाने वालों ! यह शराब और जुआ और पाँसे तो शैतानी काम है अतः तुम इनसे अलग रहो ताकि तुम सफल हो सको। (कुरान, 5:90) नबी (सल्ल0) की शिक्षाओं में न सिर्फ शराब पीने से मना किया गया है बल्कि ये तक कहा गया है कि शराब के साथ जुड़े हुये दस लोग पर अल्लाह की ओर से लानत और धिक्कार की जाती है। जो उसको निचोड़ता या तैयार करता है, जिसके लिये यह तैयार की गई है, इसको पीने वाला, उसको पहुँचाने या भेजने वाला, जिसके पास भेजा या पहुँचाया जाए, जिसे ये पेश की जाए, उसे बेचने वाला, उसके आमदनी से फायदा उठाने वाला, उसे अपने लिये खरीदने वाला और दूसरों के लिये उसे खरीदने वाला। (इब्ने-माझा)

ये हैरतनाक बात जरुर है पर ये तल्ख सच्चाई है कि पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र इस्लामी मुल्क है जहाँ शराब तैयार किया जाता है। शराब बनाये जाने वाले छोटी-बड़ी कई भटिठ्यां तो हैं ही साथ ही साथ इस मुल्क में विश्व के तीन बड़े ख्यातिनामा शराब की फैक्ट्रियां हैं जो हर साल लाखों गैलन शराब पाकिस्तानी अवाम के पेट में पहुँचाती है। ये मशहूर कंपनियां हैं, ब्रूरी, कोवैटा डिस्टलरी और इंडस डिस्टलरी। बात-2 में इस्लाम का दंभ भरने वाले पाकिस्तानी हुक्मरान और नौकरशाह भी इस हराम चीज की बिक्री को जायज मानतें हैं क्योंकि एक तो इससे प्राप्त आमदनी उनके पेट में जाती है और दूसरी वो अपने ब्रिटिश और अमेरिकी मेहमानों का इससे स्वागत करतें हैं। आश्चर्य है कि जो मुल्क इस्लाम के नाम पर बना है, जहाँ की राजनीति इस्लाम का नाम लेकर चलती है उस मुल्क में हराम चीज की गंगा बहती है और फिर भी उसे इस्लामी मुल्क समझा जाता है। बीबी आएशा ने अपनी एक हदीस में फरमाया था कि नबी (सल्ल0) ने कहा था कि इस्लाम को बिगाड़ने की पहली कोशिश इस तरह की जायेगी कि मुसलमान शराब को हलाल कर लेंगें। (मिश्कात) और पाकिस्तान ने काफी पहले से ही यह कोशिश शुरु कर दी है।

पाकिस्तान: एक इस्लामी मुल्क जहाँ मुसलमानों का कत्ल और मोमिना से बलात्कार जायज है।

हदीसों में नबी (सल्ल0) की तालीमें भरी पड़ी हैं जिनमें मुसलमानों से बार-2 कहा गया है कि तुम्हारे लिये किसी मोमिन का खून बहाना जायज नहीं हैं। उदा0 –

– हजरत अब्दुल्ला रिवायत करतें हैं कि रसूल (सल्ल0) ने इर्शाद फरमाया, मुसलमान को गाली देना बेदीनी तथा कत्ल करना कुफ्र है। (बुखारी) मजाहिरे हक में इस हदीस की व्याख्या करते हुये कहा गया है, जो मुसलमान किसी मुसलमान को कत्ल करता है वह अपने इस्लाम के कामिल होने की नफी करता है और मुम्किन है कि कत्ल करना कुफ्र पर मरने का भी सबब बन जाये।

– हजरत अबू मूसा रिवायत करतें कि सहाबा ने अर्ज किया: या रसूल (सल्ल0)! कौन से मुसलमान का इस्लाम अफ्जल है? इर्शाद फरमाया, जिस मुसलमान की जबान तथा हाथ से दूसरे मुसलमान महफूज रहे। (बुखारी)

– हजरत अबू हुरैरा से रिवायत है कि अबुल कासिम मुहम्मद ने इर्शाद फरमाया, जो शख्स अपने मुसलमान भाई की तरफ लोहे यानि हथियार वगैरह से इशारा करता है, उसपर फरिश्ते उस वक्त तक लानत करतें हैं जब तक कि वह इशारा करना छोड़ नहीं देता। (मुस्लिम) इसका मतलब किसी मुसलमान को इशारातन भी दूसरे मुसलमान पर हथियार उठाने से सख्ती से मना करना है।

– हजरत बुरैदा रिवायत करतें हैं कि मोमिन का कत्ल किया जाना अल्लाह के नजदीक सारी दुनिया के खत्म हो जाने से भी ज्यादा बड़ी बात है। (नसाई शरीफ)

इन तमाम हदीसों को सामने रखें और पाकिस्तान के कट्टरपंथियों के जेहन और कृत्यों को सामने रखें तो ये स्पष्ट हो जायेगा कि वहां इन लोगों ने इस्लाम की इस्लाम की परिभाषा ही बदल दी है। नबी (सल्ल0) ने अपनी हदीसों में किसी मुसलमान पर हथियार से इशारा करने वालों के बारे में कहा था कि वो जबतक ऐसा करे उस पर फरिश्तों की लानत रहती है और 1971 में तो पाकिस्तान के मुसलमानों ने पूर्वी पाकिस्तान में मुसलमानों के खून की नदियां बहा दी थी। अपने ही हममजहबों के अत्याचार से पूर्वी पाकिस्तान के मुसलमान इतने आजिज आ गये थे कि उन्होंनें पाकिस्तान से छुटकारा पाने की कोशिश का नाम ही मुक्ति युद्ध रख दिया था। पाकिस्तान के फौजियों ने 1971 के संधर्ष के दौरान तकरीबन 2 लाख औरतों की अस्मत लूटी। इस्लाम की कौन सी तालीम मुसलमान औरतों की अस्मत लूटने की सीख देती है? नबी (सल्ल0) अपने जमाने में जब वो गैर-मुस्लिमों की तरफ फौज भेजते थे तो अपने कमांडरों को ये ताकीद करते थे कि वो औरतों का कत्ल न करें, उनकी अस्मत को न लूटें पर 71 में उन्हीं के उम्मतियों ने मुस्लिम महिलाओं के साथ वो सब कुछ किया जिसे दरिंदे और हैवान भी करने से शर्मातें हैं। बजाए इन कामों से पाकिस्तानी फौजियों को रोकने के पाकिस्तान के मौलवियों ने इसे जिहाद करार दिया। ये किस इस्लाम की तालीम है जिसमें बच्चों को भूखा रखा रखने, सत्ता के नाम पर खून बहाने और महिलाओं को बेइज्जत करने को जायज समझा जाता है ?

पाकिस्तान: जहाँ फौज आराम करती है और बच्चे जंग

पाकिस्तान में फौज की सं0 6 लाख से भी ऊपर है। अपने रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान फौज के ऊपर खर्च करता है। फौज किसी मुल्क की सुरक्षा के लिये जरुरी है, इस बात से किसी को भी इंकार नहीं हो सकता पर ये कहाँ का तकाजा है कि किसी मुल्क में फौज अपने दुश्मनों के खिलाफ जंग में मासूम बच्चों का इस्तेमाल किया जाये। उन्हें मानव बम बनने की ट्रेनिंग दी जाये? आज पाकिस्तान में फौज आराम करती है और जेहाद के नाम पर मौलवी बच्चों को ट्रेनिंग देकर जान गंवाने भेजतें हैं। अहमदिया विरोध के नाम पर शुरु हुये संगठन तहफ्फुज खत्मे नबुबत के प्रधान उलेमा ‘हबीबुर्रहमान सानी लुधियानवी ने एक बार कहा था कि पाकिस्तान माँ-बाप सूफीवाद को अलविदा कहें और अपने बच्चे को जेहाद के लिये तैयार करे। क्या इन उलेमाओं को इन बच्चों के भबिष्य की कोई चिंता है? क्या कभी पाकिस्तान के किसी उलेमा ने इस बात की मुखालफत की है कि मासूम बच्चों का इस्तेमाल आंतकवाद फैलाने में न किया जाये। बच्चे मुल्क के बेहतर कल के वर्तमान होंतें हैं जिन्हें ठीक से संवारा जाये तो मुल्क के खुशहाल भबिष्य होने की गारंटी हो जाती है, पर अपने राजनीतिक इस्लाम को फैलाने में जुटे इन उलेमाओं के लिये अपने मुल्क के बच्चों के खुशहाल भबिष्य की कोई चिंता नहीं है।

पाकिस्तान: जहाँ की मस्जिदों में ये कुछ होता है।

मस्जिदें इबादत के लिये होती है जहां बंदा सबकुछ भूलकर खुदा के याद में बैठता है, अपने पालनहार को याद करता है। ये वो जगह भी होती है जहां बैठकर मुसलमान दीन सीखते हैं, हलाल-हराम का कर्फ समझतें हैं। इन मस्जिदों से मुसलमानों को नेक राह पर चलने की ताकीद की जाती है। पर पाकिस्तान में कई मस्जिदों का इस्तेमाल इन कामों के लिये नहीं वरन् आतंक फैलाने के लिये हो रहा है ! नबी (सल्ल0) ने फरमाया था, एक जमाने में ऐसे लोग होंगें जिनकी दुनिया की मुतल्लिक बातें उनके मस्जिदों में की जायेंगी। तुम उनके पास न बैठना क्योंकि खुदा को उनकी जरुरत नहीं है। पाकिस्तान में धटिट लाल मस्जिद प्रकरण इसी का तो उदाहरण है। पाकिस्तान की इस मस्जिद में जनरल परवेज के समय हुये ऑपरेशन ने सारी दुनिया में मस्जिदों और मदरसों पर शक करने वालों को एक पुष्ट आधार तो दे दिया। क्या मस्जिद इसी के लिये बनाई जाती है कि वहां बैठकर धरों को लूटने, आत्मधाती हमलें करने, हत्याओं की साजिश रचने का काम किया जाये? हदीसों में मस्जिद तामीर करवाने वालों के लिये आखिरत में बहुत सबाब बताया गया है, पर क्या पाक मस्जिदों में ऐसे काम करने वालों को कोई सबाब मिल सकता है?

नबी (सल्ल0) ने अपनी हदीसों में कयामत के पहले पेश आने वाले तमाम हालातों की भबिष्यवाणी कर दी थी। आने वाले कई फितनों और बुराईयों से अपनी उम्मत को आगाह करते हुये उन्होंनें बताया था कि इन-2 बुराईयों के पनपना और बढ़ना कियामत करीब आने की निशानियों में से होंगी। नबी (सल्ल0) के तमाम दूसरी बहुमूल्य उपदेशों को छोड़कर पाकिस्तान ने कियामत से पहले पनपने वाली बुराईयों को पूरा करने का ठेका ले लिया है।

पाकिस्तान की आधिकारिक बेबसाईट ये लिखती है कि हिंदू भारत से अलग होने का मकसद था कि मुसलमान निर्भय होकर अपने मजहब का पालन कर सके और उनके जान-माल की हिफाजत हो सके। आज पाकिस्तान के हालात साबित कर देते हैं कि मुसलमानों को जिस पाकिस्तान का ख्बाब दिखाया गया था वो बस ख्बाब ही था। इस्लाम के नाम पर वजूद में आये इस मुल्क में न तो इस्लाम सुरक्षित हैं और न ही मुसलमान। इस मुल्क का बनाने वाले और चलाने वाले केवल इस्लाम का राजनीतिक इस्तेमाल करने वाले हैं, अगर वास्तव में वो इस्लाम के और मुसलमानों के खिदमतगार होते तो कभी भी अपने कृत्यों से इस्लाम को बदनाम न करते। आज बुराईयां पाकिस्तान में धर बनाकर बैठ गई है और इन बुराईयों के चलते पाकिस्तान के चेहरे पर इतनी कालिख लग चुकी है कि ये कालिख अगर सारी दुनिया में तक्सीम कर दी जाये तो भी पाकिस्तान की कालिख खत्म नहीं होगी । किसी उम्मत, मुल्क या समाज में बिगाड़ होना उतनी चिंता की बात नहीं है , चिंता तब है जब इन बातों पर आत्मचिंतन करने की कोई गुंजाईश दिखाई न दे। इस्लाम के नाम पर बना यह मुल्क आज इस्लाम की बदनामी और मुस्लिमों की तबाही का सबसे बड़ा मरकज है।