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18 मई 1974 को भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण पोखरण के सैन्य केंद्र में किया। इस परिक्षण के लिए जरूरी प्लूटोनियम कनाडा ने और हेवी वाटर अमेरिका ने भारत को उपलब्ध कराया था। भारत अपना पहला परमाणु परिक्षण शांति और मानव सेवा को समर्पित करना चाहता था, इसलिए इस परिक्षण के लिए जो तारीख तय की गयी , वो दुनिया में शांति संदेश देने वाले भगवान बुद्ध के जन्म दिन की तिथि 18 मई 1974 थी और सफल परिक्षण के लिए जो कोड वर्ड रखा गया वह था “बुद्ध मुस्करा रहे है” ।

इस पहले परमाणु परिक्षण में, DRDO के प्रतिनिधि की हैसियत से डॉ APJ अब्दुल कलाम भी परिक्षण स्थल पर उपस्थित थे। इस पूरे प्रोजेक्ट के चेयरमैन श्री होमी सेथना थे। जो परमाणु परिक्षण पोखरण में किया गया उसका प्रारूप (Design) भारत में ही बना था लेकिन उसका मूलभूत आधार हिरोशिमा में गिराये गए अमेरिकी बम “फैट मैन” (FAT MAN) से प्रेरित था।

यह बम सही तरीके से एक हिंदुस्तानी बम था इसे गोपनीयता के कारण अलग-अलग प्रयोगशालाओ में तयार किया गया। इसके कुछ हिस्से चंडीगढ़ में तो कुछ पुणे की प्रयोगशाला में बने थे और इसके लिए जरूरी 6 किलो प्लूटोनियम भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने उपलब्ध करवाया। पोखरण के परिक्षण स्थल तक पहुचाने से पहले, सारे हिस्सों को मुंबई (तब के बंबई) के ट्रॉम्बे में जोड़ा गया।
पूरी दुनिया में ये बम बैल-गाड़ी (Bullock-Cart) बम के नाम से भी प्रसिध्द हुआ। जब ये बम पोखरण पंहुचाया जा रहा था तो इस का एक हिस्सा जिस ट्रक में आ रहा था वह कही बीच में ही ख़राब हो गया, और कोई दूसरा वाहन तत्काल उपलब्ध भी नहीं था। बम के उस हिस्से को उसी समय एक बैल-गाड़ी में लादा गया और परिक्षण स्थल पर पहुचाया गया।

जब सारा कार्य योजना अनुसार हो गया और परमाणु परिक्षण सफल रहा तो मुख्य वैज्ञानिक सेथीया जी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की फोन किया और सिर्फ इतना कहा की “बुद्ध मुस्करा रहे है”।

दूसरा परमाणु परिक्षण भारत ने 13 मई 1998 में वाजपेयी जी की सरकार के समय किया। उस समय एक साथ 5 परमाणु परिक्षण किये गए और इस परिक्षण का कोड नाम “शक्ति” रखा गया। पहले इस परीक्षणों को 1995 में ही करना तय हुआ था लेकिन सारा प्रोजेक्ट बीच में ही रोकना पड़ा जब अमरीकी खुफिया उपग्रहो ने पोखरण की कुछ तस्वीरें प्रेस में दे दी। अमरीकी राष्ट्पति बिल क्लिंटन के दबाव में प्रधानमंत्री नरसिहं राओ को परिक्षण रोकना पड़ा।

1998 में जब बीजेपी सत्ता में आई उस समय डॉ कालम DRDO के हेड बन गए थे। वाजपई जी ने उन्हें अपना वैज्ञानिक सलाहकार बनाया। वाजपई जी ने डॉ कलाम और श्री आर चिदंबरम जो की उस समय भारत के एटॉमिक रिसर्च के हेड थे बुलाया और ठन्डे पड़े परमाणु परिक्षण प्रोग्राम को फिर से गति देनी की सलाह दी।

डॉ कलाम और श्री चिदंबरम को इस परिक्षण का संयुक्त हेड बनाया गया। और पूरी गोपनीयता से परिक्षण की तयारियां शुरू हुई। इस बार हालात पहली बार से भी ख़राब थे। अमेरिका पाकिस्तान का साथ दे रहा था। अमेरिका की मदद से पाकिस्तान परमाणु बम बनाने में भारत से आगे निकल चुका था। पोखरण में रेगिस्तान होने के कारण किसी भी गतिविधि को अमरीकी सेटेलाइट के छुपा कर रखना असंभव था।

परमाणु परिक्षण की सारी गतिविधियों को, अमरीकी सैटेलाइट से गुप्त रखने की जिम्मेदारी भारतीय सेना की 58 सैन्य इंजिनीरिंग कमांड को सौंपी गयी जिसके के कमांडर गोपाल कौशिक थे। परिक्षण के लिए जरूरी साजो सामान रेत के बड़े बड़े टीलो में छुपाया गया, जरूरी काम जैसेकि खुदाई इत्यादि रात के अंधेरे में बड़े-बड़े टेंट के अंदर निपटाया गया। यहाँ तक की जो भी वैज्ञानिक परिक्षण स्थल पर जाते थे उन्हें फौजी यूनिफार्म पहनी पड़ती थी।

आखरी तक पाकिस्तान और उसके आका अमेरिका को इस पांच-पांच परमाणु परीक्षणों की भनक तक नहीं लगी। अमेरिका इन झटको को भूकंप के झटके समझता रहा, और कई घंटो तक इन भूकंपो का केंद्र दूंदता रहा। फिर जब वाजपई जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया की भारत ने पांच परमाणु परिक्षण किये हैं, तब दुनिया को पता चला। डंके की चोट पर भारत ने अपने परमाणु शक्ति संपन्न होने की घोषणा की।

13 मई 1998 को फिर से एक बार भारत में बुद्ध मुस्कराये और भारत में किये पांच और सफल परमाणु परिक्षण।

आज जहाँ डॉ कलाम की अकस्मात् मृत्यु पर पूरा भारत दुखी है, वही पाकिस्तान के परमाणु बम के जनक माने जाने वाले वैज्ञानिक अब्दुल कादीर खान आज पाकिस्तान में गद्दार माने जाते है और परमाणु बम की तकनीक बेचने का प्रयास करने के जुर्म में पाकिस्तान के अपने घर में नजरबंद है।

किसी भी महान इंसान को याद करने का सबसे से सही तरीका उसके किये हुए महान कामो को याद करना होता है। डॉ कलाम आप चाहे कही भी रहे, आपके किये कामो से हिन्दुस्तान आपको हमेशा याद करता रहेगा।