domkirkeaksenby — नवीन कुमार

कुछ दिन पहले में गोवा में था . पिछले साल भी गया था , लेकिन इस बार जाकर झटका लगा . कोंकण के इस सुदूर समुद्री किनारे से जो खबरे दिल्ली पहुंच रही थी . वे सही थी बाजार की आंच अब वहा भी पहुचने लगी थी . अब वह भी स्थानीय वास्तु शिल्प पर महानगरीय कायाकल्प का जादू छा रहा हे . बड़े बड़े शॉपिंग सेंटर माल और आसमान में सीना ताने बहुमंजिला इमारते . पणजी में दो मशहूर रेस्त्रां हे शेरे पंजाब और दिल्ली दरबार . नाम भी गोवा से जुड़ा नहीं . ‘ कुछ यहां की ख़ास ‘ के मेरे आग्रह पर बेरा झेप जाता हे . मेनू कार्ड पर प्रोन से आगे कुछ नहीं. दाल मखनी , शाही पनीर राज़मा चावल या कढ़ी ही खानी हे तो काहे का गोवा और काहे की दिल्ली . बड़ी मुश्किल से एक पुरानी बस्ती के भीतर धसें एक ढाबे में नारियल के झोल में पकी समुद्री किंग फिश खाने को मिली तो लगा की बहुराष्ट्रीय ढाबो की विशाल श्रंखलाओ के आगे हमारी लाजवाब पाक कलाय कैसे ध्वस्त हो रही हे . समुद्र के किनारे नारियल के झूमते पेड़ो का संगीत मिट रहा हे . होटल और रिसोर्ट बनाने के लिए एक बड़े हिस्से को उजाड़ दिया गया हे कंडोलिम जैसे बेइंतिहा खूबसूरत समुद्री किनारे के कच्चेपन का आकर्षण खोता जा रहा हे अब समुद्र से बात करने के लिए पैदल चल कर उसके किनारे जाने की जरुरत नहीं हे होटल की खिड़कियों से ही इसका आनद लिया जा सकता हे लेकिन कमरे में समुद्र की लहरे पेरो के नीचे की रेत को बहा ले जाने का रोमांच कहाँ पैदा करती हे . अब तो ऐसा लगता हे की दिल्ली और गोवा में धीरे धीरे बस समुद्र लालकिला या इण्डिया गेट के होने या ना होने का अंतर रह जाएगा

भूमंडलीकरण के इस दौर में बाजार सबसे बड़ा देवता हे और उसकी महिमा पर सवाल खड़े करने वाले अराजक और इस नई भक्ति का विस्तार शहरो की पहचान को मटियामेट कर रहा हे हर जगह उसी तरह के माल और खाद्द श्रंखलाय और उसी हिसाब से बदलता परिवेश . गोवा ही क्यों जयपुर भी पहले वाला जयपुर कहा रहा . नए शहर में गुलाबी शहर की खोज करनी पड़ती हे . जयपुर के लोग अब यह नहीं कहते की जलमहल और नाहरगढ़ का किला या आमेर पैलेस या केसरगढ़ का किला देखा या नहीं . अब कहते हे की गौरव टावर सिटी प्लस या गणपति प्लाजा जरूर देखिये . अधभुत हे अब उन्हें कौन कहे की जो जयपुर हमारी कल्पनाओ में बसा हे . उसमे इन कंक्रीट और कोलतार के सघन जंगलो का उग आना एक सदमा हे . हरिदूार शिमला देहरादून और नैनीताल जैसी पहाड़ी बस्तिया भी अब कितनी पहाड़ी रही हे कोच्चि पांडिचेरी कोवलम इडुक्की त्रिचूर और पालघाट में भी अब बदलाव की यह बयार बह. रही हे इस बयार में वैश्विक सेठो के नए नए उपनिवेश बन रहे हे यह नया चलन हर दस्तूर को मुनाफे की नज़र से देखता हे . सभ्यता को भी संस्कर्ति को भी , भाषा संस्कारो को भी और सरोकारों को भी . इस आंधी में उन बस्तियों की जीवंतता गुम हो रही हे जो कल तक मध्य वर्ग को अपनी तरफ खींचती थी . थोड़ी बहुत जो कशिश बची थी वह भी जल्द ही अतीत हो जायेगी . धीरे धीरे वो लोग भी हाशिये पर चले जाएंगे जिनकी पीढ़ियों ने ही अवचेतन में ही सहअस्तित्व की व्यवहारिक व्याख्या दी ठीक वैसे ही जैसे कोलियो को अब मुंबई एक परया शहर लगता हे .

सवाल हे की हम अपने आस पास की दुनिया को विकास की किसी कूंची में रंगना चाहते हे क्या उनकी मौलिक खूबसूरती से छेड़छाड़ किये बगैर वाकई उनकी तस्वीर नहीं बदली जा सकती ? या फिर एक खास तबके के लोग इस समूची जिंदादिली को अपने नफे के हिसाब से ढलने के लिए विकास का एक तिलिस्म बुन रहे हे . जरा कोई बताय की न्यूयोर्क शंघाई शिकागो और टोकियो में आज क्या फर्क हे ? सिवाय नाम और दुरी के तरक्की फ़्रांस ने भी कम नहीं की हे , लेकिन पेरिस को आप शिकागो नहीं कह सकते हे उस शहर के कुछ ठेठ देशज संस्कार हे , वेनिस में अब भी नावे चलती हे पर्यटकों के लिए सवर्ग हे वेनिस लेकिन सुविधाओ के लिहाज़ से नहीं अपनी चुम्बकीय खासियतों की वजह से . ऐसी ही आंधी हंगरी में भी चल रही हे , लेकिन बुडापेस्ट को लासएंजिल्स या वाशिंगटन बना देने का सपना वह नहीं दिखाया जाता . हमारे यहाँ अगर सेकड़ो किलोमीटर का फासला तय करके भी अब सिर्फ पता बदलता अहसास नहीं तो गलती कहा हे बार बार क्यों बताया जाता हे की मुंबई को शंघाई बनाया जा रहा हे और दिल्ली को सिंगापुर दिल्ली दिल्ली और मुंबई मुंबई बनकर क्यों नहीं रह सकती हे हमारी वे कौन सी ग्रन्थियां हे जो हमें हमारी ही जड़ो से उखाड़ कर अपनी ही जमीं पर परदेसी बन जाने की उत्तेजना पैदा करती हे !

प्रस्तुति सिकंदर हयात