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क्या मायने हैं कलाम होने के ? क्या था ऐसा खास कलाम में कि उनको मुसलमानों से अधिक सभी वर्गों का सम्मान मिला विशेषकर तथाकथित ज़हरीले राष्ट्रवादियों से ।
क्या इसलिए कि वह देश के मुस्लिम राष्ट्रपति थे ? बिल्कुल नहीं क्युँकि मुस्लिम राष्ट्रपति तो डॉक्टर जाकिर हुसैन और फखरूद्दीन अली अहमद भी थे जिनका आज कोई नाम लेने वाला भी नहीं ।तो क्या मायने इसलिए थे कि वह एक वैज्ञानिक थे ? बिल्कुल नहीं क्युँकि वैज्ञानिक तो तमाम लोग हुए हैं जो उनसे भी योग्य हैं और होंगे । इसी देश में परमाणु कार्यक्रमों के जनक भी रहे हैं जिनका कोई नाम भी संभवतः नहीं जानता। तो क्या कारण है कभी सोचा है किसी ने ? सच यह भी है कि सादगी और विवादहीन होने के अतिरिक्त राष्ट्रपति के रूप में उन्हे किसी भी खास निर्णय के लिए जाना नहीं जाता बल्कि उनके कार्यकाल से ही फांसी पर निर्णय करने में विलंब हुआ जो प्रतिभा पाटिल तक 10 वर्षों तक चला और वह एक तरह से निष्क्रिय राष्ट्रपति थे। फिर भी कलाम इस देश में सभी वर्गों के लिए प्रिय थे तो क्युँ थे ?

दरअसल इस देश में अब कुछ लोगों को अपने आधिपत्य और अपने धर्म से जुड़े लोग ही पसंद आने लगे हैं ।कोई व्यक्ति यदि मुसलमान है और वह अपनी नमाज़ अपनी कुरान अपने हज ज़कात की बात करता है तो इन कुछ लोगों की नज़र में वह कट्टर है परन्तु यदि कोई मुसलमान सनातन धर्म की बात करे गीता वेदों की बात करे प्रशंसा करे , गो रक्षा की बात करे तो वह सबसे प्रिय होता है ।कलाम ने भी यही किया ।रामेश्वरम में पैदा होकर पले बढ़े डाक्टर कलाम कुरान से अधिक गीता रामायण की बात करते थे और बार बार रामायण को पढ़ने की बात करते थे ।साधुओं पंडितों और सनातन धर्म के मठाधीशों के समक्ष नतमस्तक हो जाते थे और ऐसा होते देखना बहुत से लोगों को उनके अहंकार को संतुष्ट करता था कि एक मुसलमान सनातन धर्म के मठाधीश के पैरों में बैठा है ।एक तथ्य यह भी है कि जब वह पद पर थे तो भक्तों का जन्म नहीं हुआ था और वह गर्भ में थे अन्यथा इतने सब करने के बाद भी कलाम को गालियाँ हीं मिलती जैसे उनकी मृत्यु पर मिलीं वो भी नतमस्तक होने और मठाधीशों के चरणों में बैठने के बाद भी । उदाहरण देखना है तो उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को देखिए जो लगभग कलाम जैसे ही हैं और दशहरे या अन्य किसी अवसर पर आरती करते या टीका लगाते नजर आये परन्तु भक्तों के जवानी के दिनों में बार बार दुर्गति के शिकार हुए ।इस देश में जैसे अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता कम होती जा रही है और इसे रोकने में संविधान और न्यायालय का नकारापन सामने आने लगा है ।

मुझे देखिए ।मैने जब भी अपने धर्म पर कुछ लिखा या लोगों द्वारा इस्लाम कि की गई आलोचना के कारण सही स्थिति बताते हुए जवाब दिया या देश में मुसलमानों की बदतर स्थिति की चर्चा करनी चाही , मैं कट्टर मैं तालिबानी मैं पाकिस्तानी मैं वहाबी मैं देशद्रोही मै प्रोवोक करने वाला मैं भड़काने वाला घोषित हो जाता हूँ और जैसे ही सनातन धर्म की विशेषता या मंदिरों के संदर्भ में यात्रा वृत्तांत लिखता हूँ वही लोग जो मुझे उपरोक्त प्रमाणपत्र दे रहे थे उन्ही को मैं अच्छा लगने लगता हूँ देश का जिम्मेदार नागरिक हो जाता हूँ जो सभी धर्मों की इज्ज़त करता है ।यही है दोगलापन और इसी दोगलेपन को कुछ लोग अपने अहंकार की संतुष्टि के लिए प्रयोग करते हैं ।आप विश्वास करें कि यही कलाम 5 वक्त के नमाज़ी होते हज करने गये होते यदा कदा कुरान की तारीफ करते टोपी पहन कर रहते तो मैं देखता कि उनकी महान योग्यता और सच्चे राष्ट्र भक्त को कैसे प्रमाणपत्र देते यह कुछ लोग ।जो कुछ लोग उनकी मृत्यु पर गालियाँ दे रहे थे तो उस स्थिति में संघी सोच के सभी लोग गालियाँ दे रहे होते। दरअसल तानाशाही प्रवृत्ति के ये जन्तु ना तो स्वयं अपना धर्म निभाते हैं ना ही किसी अन्य धर्म वालों को निभाते देखना चाहते हैं ।उनको अपने धर्म के प्रति कमज़ोर सलमान खान और डाक्टर अब्दुल कलाम जैसे मुस्लिम अच्छे लगते हैं ना कि ऐसे मुस्लिम जो अपने धर्म के प्रति अधिक सक्रिय हों ।वह भी उनकी अपनी शर्तों पर अन्यथा सलमान खान का भी अंजाम देखा जा चुका है जब उन्होंने याकूब मेमन के समर्थन में ट्विट पर ट्विट किया था ।

डाक्टर अबुल कलाम आजाद ने निश्चित ही देश की बहुत सेवा की है , वह एक वैज्ञानिक थे , बेहतरीन वक्ता और फिलास्फर थे फिर भी मेरा मत है कि एक विशेष नाम को देखते ही चिढ़कर गाली-गलौज करने वाले देश के कुछ दुश्मनों ने भी यदि उनका थोड़ा बहुत सम्मान किया है तो उसका कारण डाक्टर कलाम द्वारा उनके अहंकार को संतुष्ट करना ही था ना कि देश के लिए किया गया उनका काम , यही है वह तालिबानी संस्कृति और इसीलिए यह देश के भगवा तालिबान हैं ।

यदि डॉक्टर कलाम जैसा होने की अपेक्षा देश के सभी मुसलमानों से ऐसे लोग करते हैं तो मेरा मत है कि ऐसा असंभव है क्योंकि 21 मई 2014 के बाद धार्मिक आधार पर खाई बढ़ती जा रही है और देश का मुखिया अपने हित में अंधा बहरा बना बैठा है ।
आज असंभव सा लगता है कलाम सा होना ।