prabhash-vishnu

प्रस्तुति – सिकंदर हयात

हिंदी पत्रकारिता के दो महान पत्रकार प्रभाष जोशी और विष्णु नागर का लेख खबर की खबर में पाठको के लिए पेश किया जा रहा है जो के जनसत्ता-२००७ में प्रकाशित हुआ था , आज भी बाजार का माहौल देख कर ये लेख की महत्वपर्णता आज भी उतनी ही लगती है , इस लिए दुबारा आप सभी पाठको के लिए पेश किया जा रहा है .

गति की अगति
by- विष्णु नागर

ब्रिटेन के वैज्ञानिक दुनिया की सबसे तेज़ कार बनाने में लगे हे जो एक घंटे में सौलह सो किलोमीटर से भी तेज़ चलेगी ऐसा बताया जा रहा हे की ये चार बन्दुक की गोली से भी तेज़ चलेगी अगर ऐसा हो पाया तो यह निश्चय ही रोमांचक बात होगी बहुत पैसे वाले इस खबर को पढ़ कर शायद बहुत खुश हो रहे होंगे . उनमे से ज़्यादातर को तो अपनी अश्लील समृद्धि दिखाने का कोई भव्य मौका मिलना चाहिए . हमारे इस गरीब देश में भी कोई चार सौ पांच सौ अमीर तो कम से कम ऐसे निकल ही आएंगे . जो इस कार को खरीदने की क्षमता रखते हे और खरीदना भी चाहेंगे . अमीरो के लिए एक सपना सौलह सौ किलोमीटर की गति से दुनिया की बड़ी आबादी को ठेंगा दिखाते हुए चलना . बल्कि ठेंगा दिखाने का सुख ज़्यादा बड़ा हे उस सुख से जो इतनी तेज़ कार में चलने से मिलेगा या शायद नहीं मिलेगा .बहरहाल वे कह रहे हे की ऐसी कार दो साल में बनेगी भी बन गयी तो पांच दस साल में भारत में भी आ भी जायेगी . मनमोहन जैसे कोई प्रधान मंत्री रहे वे नीतिया रही तो इसके लिए सड़क पर अलग से लेन भी बन जायेगी . साइकिल वालो या पैदल वालो के लिए बरसो से सड़क पर जगह उन्हें ना दिख रही हो मगर इनके लिए जरूर मिल जायेगी अमीरी की इस दौड़ में आखिर हम पश्चमी देशो से पीछे तो नहीं रह सकते हे खेर जो भी हे भविष्य जल्दी सामने आ जाएगा हो सकता हे की यह आइडिया पिट जाए और कामयाबी कागज़ी बन कर रह जाए मगर एक बात स्पष्ट हे की इस समय समृद्धों को हर तरह की तेज़ गति की बहुत भूख हे जो जितना ज़्यादा ताकतवर हे वो उतनी ही जल्दी में हे और अधिक गति चाहता हे . आप हम जैसे जो शायद इतने गत्यातमक होने के लिए शायद बने नहीं हे या बनने की कोशिश में अपनी विफलता स्वीकार कर चुके हे , वे कहते हे की जल्दी का काम शैतान का . कितना ही कमा लो जब खानी दो रोटिया ही हे तो फिर इतनी भागदौड़ जल्दी क्यों ? लेकिन यह बात हम अम्बानी भाइयो या रतन टाटा को नहीं समझा सकते , जिनके साम्राज्य को सँभालने के लिए उनकी कोई संतान तक नहीं हे . खेर गति का खौफ उन पर ही नहीं हम पर भी इतना हे की तेज़ चलते चलते कभी ऐसी स्थिति आ जाए की मज़बूरी में धीमा चलना पड़ जाए तो हम लखलड़ा गिर जाते हे कुछ तो मर जाते हे

ऐसे लोगो ने धीमे चलने के आनद और सुख की कभी कल्पना भी नहीं की . जो सोच समझ कर धीमा चलते हे , वे ही शायद समय के सत्य को ज़्यादा अच्छी तरह से जान पाते हे , क्योकि उनके पास इसके लिए जरुरी समय और धैर्य होता हे और वह दर्ष्टि भी होती हे जो तेज़ चलने की विडम्बनाओं को अच्छी तरह समझ पाती हे . तेज़ चलने वालो को तेज़ चलने से फुर्सत कहां ? कई बार तेज़ी तेज़ी में ही वो कब इस दुनिया से चल पड़ते हे इसका उन्हें पता ही नहीं चलता जबकि वे दुनिया से कभी नहीं जाना चाहते थे इनमे से कुछ ऐसे भी होते , जो जब तेज़ क्या धीरे धीरे भी चल नहीं पाते , तब पड़े पड़े अपने विगत गौरव में जीते कम हे मरते ज़्यादा हे इसके विपरीत आप ऐसे लोगो से भी जीवन में कभी कभी मिलते हे जो चाहते तो तेज़ चल सकते थे पर चले नहीं . शायद उन्होंने किसी तरह यह शुरू से ही जान लिया था की इसके बिना ही जीवन सार्थक हे सार्थकता सफलता और नाम हो जाने में ही नहीं हे जिसके पीछे बहुत से लोग भागते रहते हे इसके आलावा भी जिंदगी में बहुत कुछ हे या हो सकता हे कोलकाता के अशोक सेक्सरिया शायद उन्ही में से एक हे वे अपने समय के एक महत्वपूर्ण कथाकार रहे हे समाजवादी आंदोलन से भी गहराई से जुड़े रहे हे उन्होंने पत्रकारिता की हे और एक सम्रद्ध परिवार से आते हे मगर जितना थोड़ा में उनको जानता हु वो अपने जीवन में कभी हड़बड़ी में नहीं रहे यहाँ तक की अपनी कहानियो को इकट्टा करके उन्हें छपवाने का काम भी उनके मित्र प्रयाग शुक्ल ने किया इन दिनों वे कुछ लिखते नहीं या लिखते भी होंगे तो उसे दिखाते नहीं . उसे प्रचारित करने का तो सवाल ही नहीं उठता हे अपने बड़े कमरे में अखबारों किताबो से घिरा वह बेचें इंसान अमूमन कोलकाता में भी कही आता जाता नहीं लेकिन कितनो को ही वाही रहकर उन्होंने आगे बढ़ाया जीवन जीने की ताकत दी और कभी इसका प्रचार नहीं किया . बेबी हालदार को भी आगे बढ़ने का श्रेय बहुत कुछ उन्हें हे और सुशीला राय जैसे गरीब पिछड़े परिवार की , अपनी ससुराल में भी उपेक्षित और निरक्षर स्त्री को लेखिका बनाने का श्रेय उन्हें हे अपने कमरे में पढ़ लिख कर आने जाने वालो से चर्चा करके वे जो सुख आनंद पाते हे बाटते हे उसका कोई हिसाब नहीं . क्या उन जेसो का जीवन कम सार्थक हे उनसे , जो लिखने पढ़ने की दुनिया में भी बलोचित उत्साह से कूदते फांदते , यह जाने बिना की इसकी आख़िरकार कोई सार्थकता नहीं ( कुछ वर्ष पूर्व जनसत्ता में प्रकाशित लेख साभार )

बाजार के दबावों के खिलाफ प्रभाष जी का एक सम्पादकीय”

इमरजेंसी में जब मुझे अंदर से ताकत की तलाश थी तो किताबे टटोलता रहता था एक बार गैलीलियो के जीवन पर एक नाटक पढ़ रहा था उसमे गज़ब की एक लाइन मिली ‘ वह सबसे दूर जाएगा जिसे मालूम नहीं की वह कहा जा रहा हे ‘ सच जिनने लक्ष्य निश्चित कर रखा हे वे तो वाही तक पहुचेंगे लेकिन जो अंनत को खंगाल रहे हे वे ऐसी जगह पहुंच सकते हे जिसका उनने और संसार ने कभी सोचा भी न होगा .अंनत . में इस तरह घूम हो जाना और अनगिनत सम्भावनाओ में जिन मुझे बहुत अपील किया . अपने सवभाव में बिलकुल फिट बैठता हे . लक्ष्य तय करने और दौड़ने वालो के लिए मेने एक वाक्य बना रखा हे .’ वे जो दौड़ रहे हे कभी पहुचेंगे नहीं ‘ . पहुचने के लिए सच मानिये की दौड़ने या तेज़ी से चलने की जरुरत नहीं हे कई लोग कही पहुचने के लिए दौड़ते भी नहीं वे दौड़ते हे ताकि दौड़ने का अहसास रहे और सेहत भी अच्छी रहे . और पहुचने के लिए लगातार चलने या दौड़ने की कोई जरुरत नहीं होती . होड़ में भागने दौड़ने के इस नवउदार ज़माने के बहुत पहले अपने यहाँ पुराणो में एक कथा लिखी गयी ———– . कही पहुचना और और बड़े पारकर्म से बड़ी उपलब्धि करना सिर्फ वस्तुगत मानदंडो से तय नहीं होता . इससे भी तय होता हे की आप खुद को क्या मानते हे और आपका मानना कितना सटीक और शक्तिशाली हे की आप दुसरो को बल्कि दुनिया को भी मनवा दे . आठो पहर अङ्ग रहे आसन कूड़े न उतरे स्याही मन पवना दोनों नहीं पहुंचे ऊनि दसरा माहीं . भाई संतो हमारे एक संत ने कबीर की टेक पर कहा हे . अब यह मत समझिए की में नवउदार ज़माने के होड़ और पराक्रम के दो पवित्र सिद्धांतो को नकुछ करने की कोशिश कर रहा हु . जिसको जो करना हे मज़े में करे अपन तो बचपन से अपनी मढ़ी में आप ही डोलूं में खेलु सहज स्वइच्छा – वाले कबीरी ढंग से चल रहे हे . होड़ में नहीं तो ईर्ष्या भी नहीं दुसरो को देख कर जीने की इच्छा नहीं तो जलने की जरुरत भी नहीं की अपन ने क्या खोया क्या पाया . लोग कहा से कहा पहुंच गए और अपन वही पड़े और सड़ रहे हे . पड़े रहना और सड़ना उतना भौतिक और शारीरिक नहीं हे जितना की मानसिक और अपने मानने का . सबसे बड़ी बात तो यही हे की आप अपने को पाते कहा हे और जहा पाते हे वहा अपने से सुखी और संतुष्ट हे या नहीं . जो दुसरो को देख कर और उन्ही के मानदंडो पर जीते हे उनके न अपने मानदंड होते न मूल्य . उनने अपना जीवन दुनिया की मेहरबानी को दे रखा हे और भगवान करे कोई किसी की मेहरबानी पर न जिए . जमाना दुनिया और भगवान भी किसी पर क्या मेहरबानी कर सकते हे हम वही हुए वही पहुंचे जो हम होना और जहा हम पहुचना चाहते हे इसे हमारे शिव कोई तय नहीं कर सकता .

इसलिए में कहता हु की भाई सफलता के पीछे मत दौड़ो सफलता दुनिया देती हे . सार्थक होने की कोशिश करो क्योकि सार्थक हो या नहीं इसे तुम खुद ही तय कर सकते हो . तुम्हारे लिए कोई नहीं कर सकता . क्योकि सच पूछिये तो बाहर कोई नहीं जानता की तुम वही हो सके की नहीं जो तुम होना चाहते थे सच्ची प्राप्ति या सच्चा सुख या जीने का प्रयोजन तो वही होना हे जो तुम होना चाहते हो वे कहते हे की ज़्यादातर लोग नहीं जानते की होना क्या होता हे जो जान लेते हे वे अपने होने और दुनिया के उन्हें बनाने के संघर्ष में पड़े रहते हे और ऐसे भी लोग हे जो कहते हे की होने और बनने का चक्कर ही बेकार हे अपने होने से होना और अपने बनने से बनना व्यक्तिवादी दार्शनिको का शगल हे हमें दरअसल दुनिया और जमाना बनता हे उनके भरोसे अपने को छोड़ो और तुम्हे जो भी अवसर मिल रहे हे उनका पूरा उपयोग करो ‘खांदा पिंदा रहंदा बाकी अहमद शाहे दा ‘ आजकल वे कह रहे हे की तुम वही होओगे और बनोगे जैसा बाजार तुम्हे बनाएगा . बाजार ने ऐसी ईश्वर जैसी ताकत कैसे पा ली ? कल तक तो धर्म था राज्य था विज्ञान था विचार था आज बाजार हे क्योकि जिनके पास पूंजी हे उन्हें बाजार चाहिए और जिनका बाजार हे वो इसे ईश्वर बना देना चाहते हे क्योकि इंसान आसानी से ईश्वर के सामने ही अपने हथियार डालता हे . बाजार वाले दरअसल खुद ईश्वर को नहीं मानते फिर भी वे ईश्वर का नाम लेते हे क्योकि उन्हें अपने बाजार के लिए ईश्वर का इस्तेमाल करंना हे उनके माने तो बनती तो पूंजी ही हे वही ब्रह्म हे और मुनाफा ही मोक्ष हे . लेकिन मेने तो पूंजी और बाजार का ज़माने आने से बहुत पहले ही कबीर के साथ गाया था माया महाठगनी हम जानी . बाजार तो पूंजी की धुप हे अपन ने पूंजी के महाठगनी रूप को जान लिया तो उसकी माया में यो ही नहीं तो नहीं पड़ जाएंगे . पड़ेंगे भी तो यह जानकर की यह ठगेगी और ठगे भी जाएंगे तो खुद होकर . कबीरा आप ठगाइये और न ठगिए कोय . आप ठगे सुख उपजे और ठगे दुःख होय तो ठगे जा रहे हे और खुश हे आप खुद होकर अपने को ठगे जाने के लिए छोड़ देते हे तो ऐसा कभी नहीं लगता की दुनिया हमें बना रही हे दरअसल हमें अपने आलावा कोई नहीं बना सकता बाजार क्या बना लेगा जो उससे डरे . अगर में बाजार से गुजरा हु खरीदार नहीं हु तो बाजार मेरा क्या बिगाड़ सकता हे भारत के ज़्यादातर लोग उस बाजार से बाहर हे जो लोगो को बनाने का दावा करता हे इन लोगो को बाजार में होने के लायक बनने में अभी सदियां नहीं तो दशक तो लगेंगे ही . तब तक आप देखेंगे की बाजार का जमाना गुजर गया जैसे लोगो तक पहुंचे बिना समाजवाद का जमाना निकल गया वैसे ही लोगो को अपने लायक बनाय बिना बाजार का जमाना भी गुजर जाएगा तब वे क्या करेंगे जिन्हे बाजार ने बनाया ? नीरज ने कहा – और हम लुटे लुटे , वक्त से पिटे पिटे , दाम गाँठ के गवां बाजार देखते रहे