gyanvapi-mosque

बनारस हिंदू मुस्लिम एकता की एक अज़ीमह मिसाल रहा है ।पर जैसे जैसे यूपी का चुनाव नज़दीक आता जा रहा है यहाँ के बहाने पूर्वाञ्चल का महोल धधकाने का प्रयास भी हो रहा है । इस बीच साम्प्रदायिकता की आग भड़काने की कोशिशें की जा रही हैं । मामला ज्ञानवापी मस्जिद का है …!!

ज्ञानवापी मस्जिद यानी आलमगीरी मस्जिद के बारे मे आरएसएस अलगाववादियों द्वारा ये अफवाह उड़ाई जा रही है कि इस मस्जिद को मुगल बादशाह औरंगज़ेब ने विश्वनाथ मन्दिर ध्वस्त कर के बनवाया था .। यह विडम्बना नहीं तो क्या ? सच्च कौन नहीं जनता ???,

ये सच है कि औरंगज़ेब ने विश्वनाथ मन्दिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया था पर उसका कारण था !!!!

उस मन्दिर के प्रबंधक द्वारा देवता की मूर्ति के पीछे एक हिंदू रानी का बलात्कार करना,। जिसके कारण मन्दिर को अपवित्र मानते हुए बादशाह ने देवता की मूर्ति को किसी अन्य मन्दिर मे स्थानांतरित करने और मन्दिर को ढहा देने का आदेश दिया …. ये तथ्य दस्तावेजों के आधार पर डाक्टर पट्टाभि सीता रमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “द फेदर्स एण्ड द स्टोन्स” मे सिद्ध किया है …। अब कितनों ने पढ़ा है ? कितने तो नाम भी नहीं जानते होंगे । अब आइये इसकी विवेचना करते हैं …………….

मेरे पास ये बात मानने का कोई कारण नहीं है कि इतिहास के सारे धर्म विद्रोही मुस्लिम ही क्यों बताये जाते हैं, और अन्य धर्म वालों को पाप रहित किस कारण समझ लिया जाता है ?? अब जब किसी को मारना है तो उसको खूब बदनाम कर दो और फिर हत्या !!!! हररे ना फिटकिरी रंग चोखा ॥ जबकि इस्लामी शरीयत मे युद्ध के समय भी शत्रु पक्ष के स्त्रियों, बच्चों व बूढ़े लोगों, सन्यासियों, खेत खलिहान, फलदार पेड़ों, घरों, पानी के स्रोतों, पालतू जानवरों आदि को जलाने या काटने मारने आदि किसी भी प्रकार की हानि पहुंचाने की सख्ती से मनाही की गई है। (इस्लाम के पहले खलीफा हजरत अबू बक्र रज़ि. के मुस्लिम सेनापतियों को दिए निर्देशों के आधार पर )।

वहीं वेद निन्दक को चीर, फाड़, काट डालने व जला कर भस्म कर डालने की शिक्षा वेद मे दी गई है, महिषासुर वध , रावण वध , शंबुक वध , हिरण्य कश्यप वध बौद्धों और दलितों का नरसंहार !!!!! तो फिर ये विश्वास कैसे कर लिया जाता है कि ऐसा धार्मिक निर्देश होने के बावजूद हिन्दुओं ने तो नालंदा को नष्ट नहीं किया जो वेद निन्दक बौद्ध लोगों की वेद निन्दक शिक्षा का केन्द्र था,।

लेकिन इस्लाम मे धार्मिक निषेध के बावजूद मुस्लिमों ने उसे जला डाला ?? ये क्या है ? उसी कचरा मानसिकता का ध्योतक है है । वाराणसी का यह विवाद । सोचने की बात है कि जिस स्थान को बादशाह ने मन्दिर के भी रहने के लिए अपवित्र माना था, भला उसी स्थान को मस्जिद बनाने के लिए वो कैसे पवित्र मान लेते ??

कुछ नासमझ लोग ये तर्क देते हैं कि ये मस्जिद, विश्वनाथ मन्दिर के परिसर मे बनी है और मन्दिर मे बनी नन्दी की प्रतिमा का मुंह मस्जिद की ओर है जबकि नन्दी का मुंह सदैव भगवान की तरफ होता है … दोनों बातों से सिद्ध होता है कि मस्जिद की जगह भी पहले एक मन्दिर था ।. इतिहास की कम जानकारी रखने के कारण ऐसे लोग खुद भी भ्रमित हो रहे हैं, और दूसरे लोगों को भी भ्रमित कर रहे हैं .। क्योंकि नन्दी की प्रतिमा और मस्जिद के बराबर मे विश्वनाथ मन्दिर का निर्माण, मस्जिद के निर्माण के लगभग सौ वर्ष बाद 1780 मे करवाया गया था ।वास्तव मे जिस समय बनारस की आलमगीरी मस्जिद बनाई गई थी, तब वहाँ कोई मन्दिर नहीं था…. मस्जिद के पास एक कुवां था । मुगल अधिपत्य से निकल कर काशी अवध के नवाब के अधिकार मे आई तो मीर रुस्तम अली ने यहाँ कई महत्वपूर्ण घाटों का निर्माण कराया फिर उसके बाद बनारस पर हिन्दू राजाओं राजा मनसा राम, उनके बाद राजा बलवन्त सिंह और उनके बाद राजा चेत सिंह का शासन रहा .. लेकिन किसी ने भी आलमगीरी मस्जिद या उसके समीप के कुवे पर मन्दिर बनाने का नहीं सोचा …… कारण यही था कि उस स्थान पर पहले भी कोई मन्दिर नहीं था ( यदि 1770 से पहले भी हिन्दुओं की ऐसी आस्था होती कि मस्जिद के पास वाले कुवें मे भगवान समा गए हैं, तो उस बीच तीन-तीन हिन्दू शासकों का बनारस पर राज रहा ….मन्दिर का निर्माण न सही कम से कम कुवें पर तो कोई निर्माण कराते )

परंतु जैसा हमेशा होता है 1770 मे काशी पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का अधिकार हो गया …. इसके बाद ही ये अफवाहे उड़ाई गयीं कि औरन्गज़ेब ने विश्वनाथ मन्दिर तुड़वाकर उसपर ही आलमगीरी मस्जिद बनवाई थी और मन्दिर मे जो शिव लिंग स्थित था वो मन्दिर गिराए जाने से पूर्व स्वयं ही अंर्तध्यान होकर समीप के कुवें समा गया था…..। .

हालांकि शिव लिंग के गायब होकर कुवें मे समा जाने की बात न तो तर्क पर खरी उतरती थी, और न ही आलमगीरी मस्जिद के किसी मन्दिर पर बने होने की बात किसी ठोस तथ्य पर आधारित थी…. लेकिन भोली भाली हिन्दू जनता ने इन बातों को सच मान लिया इन्दौर की मराठा महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने कुवें मे भगवान के स्थित होने की आस्था के कारण सन् 1780 में आलमगीरी मस्जिद के पास कुवे से थोड़ा हटकर विश्वनाथ मंदिर बनवाया, जिस पर पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने 9 क्विंटल सोने का छत्र बनवाया। ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मण्डप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहां विशाल नन्दी प्रतिमा स्थापित करवाई जिसका मुंह कुवें की ओर उन्होंने उसमें भगवान का वास समझकर बनवाया और कुवें को ज्ञानवापी यानी ज्ञान का कुवां कहा जाने लगा और इस कुवें के नाम पर ही आलमगीरी मस्जिद को एक और नाम दिया गया “ज्ञानवापी मस्जिद” ।

अब अपने यकीन को और मजबूत कर लीजिये जी दस्तावेज़ कभी झूठ नहीं बोलते । उड़ीसा के राज्यपाल रह चुके श्री बी. एन. पाण्डेय जी ने अपनी किताब मे लिखा कि जब वे इलाहाबाद मे कार्यरत थे तो उनके पास एक प्राचीन मन्दिर के स्वामित्व से जुड़ा एक विवाद लाया गया, इसी केस की छानबीन करते हुए उनके हाथ मुगल बादशाह औरन्गजेब के मन्दिर के नाम जारी किए कुछ फरमान ( राजाज्ञा ) हाथ लगे, जिसमें बादशाह ने मन्दिर को सम्पत्ति और अनुदान देने का हुक्म जारी किया था,।

ये पढ़कर सहसा बी. एन. पाण्डेय जी को विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि ये औरन्गजेब के विषय मे जन साधारण मे फैली धारणाओ के बिल्कुल विपरीत बात थी ।
औरन्गजेब के विषय मे उन्होंने और खोजबीन करने की ठानी तो उन्हें और बहुत कुछ चौंकाने वाली बातें पता चलीं …। वे लिखते हैं “उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर, चित्रकूट के बालाजी मन्दिर, गौहाटी के उमानन्द मन्दिर, शत्रुन्जाई के जैन मन्दिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मन्दिरों एवं गुरूद्वारों से सम्बन्धित जागीरों के लिए औरंगज़ेब के फरमानों की नक़लें मुझे प्राप्त हुई। यह फ़रमान 1065 हि. से 1091 हि., अर्थात 1659 से 1685 ई. के बीच जारी किए गए थे। हालांकि हिन्दुओं और उनके मन्दिरों के प्रति औरंगज़ेब के उदार रवैये की ये कुछ मिसालें हैं, फिर भी इनसे यह प्रमाण्ति हो जाता है कि इतिहासकारों ने उसके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, वह पक्षपात पर आधारित है”।

औरन्गजेब द्वारा मन्दिर तोड़ने की घटना को बड़ा तूल दिया जाता है जबकि सच तो ये है कि औरन्गजेब ने बेशक मन्दिर तुड़वाया लेकिन किसी धर्म से द्वेष के कारण नही बल्कि पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए,। न्याय के लिए ही औरन्गजेब ने एक मस्जिद को भी ढहा दिया था तो भला औरन्गजेब पर धर्मान्धता का आरोप कैसे लगाया जा सकता है ?

मन्दिर तोड़ने की घटना का खुलासा ये है कि उस मन्दिर यानि विश्वनाथ मन्दिर के गर्भग्रह मे एक हिंदू रानी का बलात्कार किया गया था। तो हिंदू राजाओ के अनुरोध पर ही बादशाहने आदेश दिया कि चूंकि पवित्र-स्थल को अपवित्र किया जा चुका है। अतः विश्वनाथ जी की मूर्ति को कहीं और लेजा कर स्थापित कर दिया जाए और मन्दिर को गिरा कर ज़मीन को बराबर कर दिया जाए और महंत को गिरफ्तार कर लिया जाए ।

डाक्टर पट्ठाभि सीता रमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ मे इस घटना को दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणित किया है। पटना म्यूज़ियम के पूर्व क्यूरेटर डा. पी. एल. गुप्ता ने भी इस घटना की पुस्टि की है ।

इसी तरह गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद भी बादशाह के आदेश पे गिरा दी गई थी . गोलकुण्डा का राजा जो तानाशाह के नाम से प्रसिद्ध था, रियासत की मालगुज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली का हिस्सा नहीं भेजता था । कुछ ही वर्षों में यह रक़म करोड़ों की हो गई। तानाशाह ने यह ख़ज़ाना एक जगह ज़मीन में गाड़ कर उस पर मस्जिद बनवा दी। जब औरंगज़ेब को इसका पता चला तो उन्होने आदेश दे दिया कि यह मस्जिद गिरा दी जाए।

साभार पुस्‍तक: ‘‘इतिहास के साथ यह अन्याय‘‘ । लेखक: प्रो. बी. एन पाण्डेय, भूतपूर्व राज्यपाल उडीसा, राज्यसभा के सदस्य, इलाहाबाद नगरपालिका के चेयरमैन एवं इतिहासकार ।

जो लोग मुगल बादशाह बाबर पर राम मन्दिर तोड़कर उसपर बाबरी मस्जिद बनाने का इल्ज़ाम लगाते हैं , उन लोगों के पास अपना आरोप सिद्ध करने का कोई प्रमाण नहीं है,। और बाबर द्वारा लिखी गई इस वसीयत का उन लोगों के पास कोई जवाब नहीं है … ये वसीयत बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को शासन के गुर बताते हुए लिखी थी, और हुमायूं को कुछ आदेश शासन की भलाई के लिए दिए थे …। .बाबर कि वसीयत ” मेरे बेटे, इस देश के लोगों के लिए गाय एक पवित्र और श्रद्धेय जीव है, इसलिए गाय काटने पर रोक लगाओ, और इस बात का भी ध्यान रखना कि किसी भी मज़हब की किसी भी इबादतगाह (धर्म स्थल) को कुछ भी नुकसान नहीं पहुंचे ! हिन्दोस्तान एक ऐसा देश है जहाँ अलग अलग धर्म और रीति रिवाजो को मानने वाले लोग रहते हैं , सर्वशक्तिमान की बहुत बड़ी कृपा है कि उसने तुम्हें ऐसे देश पर शासन करने का मौका अता किया ,और तुम इस बात का सदा ध्यान रखना कि लोगों की मजहबी भावनाओं को कोई ठेस न पहुंचे !”
इस वसीयत को कोई भी State Liabrery of Bhopal मे देख सकता है, जहाँ ये वसीयत सम्हाल कर रखी गई है !

ध्यान देने की बात है कि मन्दिर मस्जिद एक पास बने होने के बावजूद बनारस मे कभी साम्प्रदायिक सौहार्द नहीं बिगड़ा …. लेकिन अब राजनीति के गंदे खेल को देखकर बनारस वासी चिंतित हैं काशी विश्वनाथ मन्दिर के महंत श्री कुलपति तिवारी अपनी चिंता इन शब्दों मे व्यक्त करते हैं ……
“” काशी विश्वनाथ मन्दिर के बगल मे ज्ञानवापी मस्जिद है, पर कभी आरती से अज़ान टकराई नही । नवाब अज़ीज़ुल मुल्क ने मन्दिर के सामने नौबतखाना बनवाया था जिसमें भोग आरती के समय शहनाई बजती थी । इस सौहार्द वाले माहौल को विकृत करने की कोशिशें की जा रही है ।चुनाव बाद विकास के तो नही पर विनाश के संकेत अवश्य देख रहा हूँ । बाबा से काशी को बचाए रखने की प्रार्थना करता हूँ ।