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सबसे पहले तो मैं यह सोच रहा हूँ की मैं इस विषय पर लिख ही क्यूँ रहा हूँ ? क्यूँ की जो हिन्दू मुस्लिम दंगो में शरीक होते हैं उनकी पहुँच यह सब पढ़ने तक होती ही नहीं है ! और जिनकी होती है वे कभी किसी दंगे में नहीं पाए जाते ! और फिर भी बड़े बड़े लेखों में बड़ी बड़ी चर्चाएँ सिर्फ जैसे एयर कंडीशन में बैठकर गरीबी पर शोध प्रबंध लेकर कोई तमगा हासिल करने से ज्यादा हकीकत की धरातल पर किसी काम की नहीं होती ,बस वैसी ही बनकर रह जाती हैं ! फिर भी मैं लिख रहा हूँ | क्यूँ की मैंने भी ऐसे दंगो को न सिर्फ देखा, सुना है बल्कि जिया है | और इन दंगो से पहले और बाद की परिस्थितयों में हिन्दू मुसलमान दोनों को देखा है | लेकिन इससे हुवे नुकसान का बदला लेने के लिए ‘अगली बार’ के इन्तजार में रहने वालों में दंगों के शिकार लोगों से ज्यादा, जो दंगों में प्रत्यक्ष नहीं थे उन्ही को देखा है ! क्यों की जो एक बार किसी दंगे में में शरीक होते हैं वो दुबारा किसी दंगे में शरीक होने लायक नहीं रहते | और न ही उसपर होने वाली चर्चाओं और आरोप प्रत्यारोपों से उनका कोई सरोकार रह जाता है | उनका सरोकार सिर्फ दंगो के बाद के मुआवजों और पीढ़ियों बाद पटरी पर आकर फिर वापस पीढ़ियों पहले की स्थति से उबरने की कशमकश से रह जाता है | इसीलिए तब वह अपना सबकुछ खोकर भी यह नहीं सोचता की मुआवजा देने वाले हाथ किसके हैं ? हिन्दू के या मुस्लिम के ! दंगों में ‘हर हर महादेव’ और ‘अल्लाह हु अकबर’ के नारे लगाने वाला दंगों के बाद हर हाथ से मिलता मुआवजा ले लेता है ! क्यूँ की उसे बाद में पता चल जाता है की केवल ‘अल्लाह हु अकबर’ का नारा लगा कर किसी हिन्दू को मार देने से दुनिया मे इतने मुस्लिम देशों के होने के बावजूद कोई उसे मुआवजा देने नहीं आता | और ‘हर हर महादेव’ के लाख नारे लगाने के बावजूद दंगो के बाद के पुलिसि रवैय से डरकर सगा बाप भी किसी हिन्दू की जमानत कराने बड़ी मुश्किल से आता है ! और ऐसे तो घर में बैठकर मुसलमानों के साथ यूँ करना चाहिए, त्यु कर देना चाहिए कहने वाला बाप ही बेटे को एक थप्पड़ लगा कर कहता है “क्यूँ गया था बाहर ? देखा न ?? तूने कुछ भी नहीं किया फिर भी तेरा नाम आ गया ?”

और हाँ ! ऐसे दंगो में पुलिस के पक्षपाती रवैये पर उंगली उठाना भी हम जैसे एयर कंडिशन में बैठ कर दंगों पर घंटो माथा कूटने वालों का प्रिय विषय रहा है ! मैं यह नहीं कहता की इसमे कोई सच्चाई नहीं है | और कई स्थानों पर ऐसा पक्षपात होना पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता है ! लेकिन यह सब अर्धसत्य है ! खुद पुलिस भी जानती है की दंगो के बाद जो हाल दंगाइयों का होता है, वही वो दंगो में लाख किसी एक पक्ष के प्रति वफादारी निभा लें लेकिन दंगो के बाद उसी पुलिस को ऐसे पक्षपात के लिए उकसाने वालों पर अगर उंगली उठनी शुरू हुई तो फिर वे लोग पुलिस के भी सगे नहीं रहेंगे ! और उनमे से किसी न किसी को बलि का बकरा बना कर पेश कर देंगे !! मेरे सामने की बात है, जो पुलिसवाला मेरे पडोसी को खुली छुट दे रहा था वही बाद में दंगाइयों की लिस्ट में उसका नाम किसी और के द्वारा जोड़े जाने पर उसे घर से धुनाई करते हुवे उठाकर ले जा रहा था ! क्यूँ ? क्यूँ की अब उस पुलिसवाले का बाप ( अफसर ) उसके साथ आया था ! सारा ‘इस्लाम खतरे में है’ और ‘गर्व से कहो हम हिन्दू है’ का नारा धरा का धरा रह जाता है ! क्यूँ की बाद में ऐसी बातें किसी खबर में नहीं आती ! और न ही कोई कितना भी कट्टर संगठन क्यूँ न हो किसी हिन्दू या मुसलमान दंगावीरों का या कुर्बानो का शहीद कह कर सन्मान करने सामने नहीं आता ! और न ही उनमे से किसी की तस्वीर पर इनके कार्यालयों ,सभाओं में कोई माला ही लटकाता है ! (कृपया इसे आतंकवादी वारदातों से न जोड़े क्यूँ की यह लेख केवल दंगो की जमीनी हकीकत के लिए है !)

दंगो की जमीनी हकीकत का एक और पहलू भी है साहबान !! जो की ख़बरों में तो कहीं स्थान नहीं पाता लेकिन फिल्मो में भुनाने के बहोत काम आता है ! वह है ‘खौफ’ ! यह वह खौफ होता है जो जिन्होंने दंगों को झेला है उनके लिए हर दंगे के बाद ‘अगली बार’ तक के लिए आजीवन बरकरार रहता है | फिर आप चाहे जीतनी मोहल्ला कमिटी बना लो , इफ्तार पार्टी करावा लो , गणपति में गुलाल लगवा लो और हाँ ! इस लेख को और ऐसे ही हिन्दू मुस्लिमों पर कलम घिसने वाले लेखकों को पढ़ने वाले पाठकों को तो मैं भूल ही गया ! तो ऐसे लेखक पाठकों से बड़ी बड़ी सेकुलरिज्म की मानव अधिकारों की ‘सकारात्मक’ चर्चाएँ करावा लो ! सामजिक सौहार्द की सामूहिक कसमे खिलवा लो , मोमबत्तियां जलवा लो यहाँ तक की किसी से माफ़ी भी मंगवा लो | तो भी जिसने दंगा भोगा है वह इनमे से किसी पर भी कभी भी भरोसा नहीं करेगा ! क्यूँ की वह जानता है की दंगाइयों के सिर्फ दो चहरे होते हैं | और उनमे से एक चेहरा ही उसे बचा सकता है ,वह भी बचा सकने की हालत में हुवा तो ! और अगर किसी केस में उसके धर्म के चहरे ने उसे बचा भी लिया और दुसरे के दस काट भी दिया होगा तो भी उसे पता है की दंगाइयों को मौत की सजा नहीं होती | और इन चेहरों से वफादारी निभाने के चक्कर में उसने उस दुसरे चहरे से आजीवन की दुश्मनी मोल ले ली है , जो अब न जाने कब किस सूरत में निकले | क्यूँ की दुनिया में केवल बदला ही ऐसा जज्बा है जो कमाल का अभिनय करना सिखा देता है ! और फिर सही वक्त पर अपना असली चेहरा दिखा देता है ! फिर उसे कोई फरक नहीं पड़ता के भारत पाकिस्तान के बीच बातचीत शुरू हुई की नहीं ? नवाज और मोदी गलबहियां डाल मिले की नहीं !! क्यूँ की बदले के जज्बे अपने नुकसान के आगे किसी की कोई अहमियत नहीं रखते | यहाँ तक की जिससे बदला लेना हो उसके मजहब की भी नहीं ! बदला हम मजहबियों को भी नहीं बक्शता तो फिर गैर मजहबी की औकात ही क्या ? इसीलिए, दंगे में कोई बचा हो या फिर कोई किसी को मारा हो दोनों बाद में बेख़ौफ़ नहीं जी सकते , तो जीत के जश्न की तो बात ही छोडिये ! क्यूँ की दंगों के बाद हर मुस्लिम के लिए हिन्दू बहुल इलाका उसके जानी दुश्मन काफिरों का हो जाता है | और एक हिन्दू के लिए मुस्लिम बहुल इलाका पाकिस्तान ! इससे कम कोई किसी को आंकता ही नहीं ! और इसीलिए आप चाहे चाहे जितना उनको बाद में गलबहियां मिले दिखा दो, उनके दिल के खौफ और बदले की आग को मिटा नहीं सकते !

यह तो हुई उन दंगाइयों की बात ! अब मैं आपको दंगे के इससे भी खौफनाक चहरे को दिखाता हूँ ! जो की मैंने देखा है | और जिन्दा हूँ इसीलिए बयान कर रहा हूँ !! लेकिन वास्तव में जो यह देखता है बाद में कुछ देखने के लिए यक़ीनन जिन्दा नहीं रहता ! हम लेखक पाठकों से कम और कलम की सीमा से बाहर प्रत्यक्ष धरातल पर सेकुलरिज्म और मानवता की बात करने वाले और दंगो के बाद मोहल्ला कमिटी ,एकता मंच आदि चोंचलों में बढ़ चढ़ कर तस्वीरें खिंचवाने वाले और उम्मीद की किरणों से दमकते लोगों को कौन नहीं जानता ! लेकिन जानते हैं जनाब इनका यह स्वांग कब तक दम रखता है ? तब तक, जब तक इन्हें भी कोई गैर मजहबी चहरे से दंगों में इनकी जान का खतरा होने का डर न लगे , या फिर वास्तव में ऐसी स्थिति से इनका सामना न हो ! लेकिन जान का डर क्या चीज होती है और उसके आगे सारे अल्लाह, इश्वर और गीता कुरआन कैसे तेल बेचने चले जाते हैं , धर्मनिरपेक्षता , मानवीयता , देशभक्ति वक्ती सब कैसे किस चिड़िया का नाम लगने लगती है यह भी मैंने अनुभव किया है ! औरों की क्या बात करूँ मैं खुद हथियार उठाने पर मजबूर हो गया था ! क्यूँ की स्थिति ही ऐसी बनी थी की उस रात किसी बड़े राजनेता के कार्यक्रम की वजह से शहर की अधिकांश पुलिस शहर से बाहर थी | और जो बची थी उसने खुद ऐसा कह दिया है की अपनी रक्षा आप करो, ऐसी अफवाह फ़ैल गई | फिर क्या था ! हम आधीरात तक हाथ में हथियार थामे जागते रहे | कहीं मंदिर जला दिए जाने की ,तो कहीं बिच बचाव करने गए हम जैसे सेकुलरों को भी काट डाले जाने की ख़बरें , तो कहीं बम जैसी गैस सिलेंडर फटने की आवाजें सुनते रहें | दोनों और मुग़ल कालीन हथियारों का जखीरा बाहर आ जाने की ख़बरों के साथ नदि के दो किनारों में बटे दोनों तटों पर दोनों और के अंधेरों में हथियारों की चमचम ने नारों की आवाज को बिजली की आवाज में तब्दील कर दिया ! और दूसरी तरफ दोनों तटों पर रह रहे अपने अपने अपनों की चिंता खाए जाने लगी ! तब लगा की क्या अपना ही गाँव है ये ? या फिर हिन्दुस्तान पाकिस्तान की बोर्डर ? उधर घरो में खौफजदा औरते लाल मिर्च के डब्बे लिए छतों पर तैयार रहीं तो कई तम्बाकू की मशेरी भुनने की आग जलाये रही ताकि अगर घर के मर्द उन्हें न बचा पाए तो दंगाइयों पर लाल मिर्च डालकर और तम्बाकू का ठसका उडा कर वह किसी तरह अपनी आबरू और बच्चों को वहां से बचा पाए | लेकिन आधीरात बाद ही अर्धसैनिक दलों के आ जाने से ऐसा कुछ करने की नौबत नहीं आई | लेकिन उस रात जो भी सुना दुसरे दिन वह सब सच ही होने का पता चला | सोचिये क्या मंजर होगा वह !!

अब सेकुलरिज्म की मानवता की सिर्फ बातें करने वाले फ़िल्मी सनी देओल तो आजकल हर गली मोहल्ले में मिल जायेंगे ! लेकिन फर्ज कीजिये की अगर ऐसी स्थिति में कोई हिन्दू/मुस्लिम लड़की ऐसे किसी दंगाइयों से अपनी आबरू बचाने के लिए या फिर कोई हिन्दू /मुस्लिम लड़का अपनी जान बचाने के लिए ऐसे किसी मुस्लिम या हिन्दू फ़िल्मी सनी देओल से ये समझ कर की वो बचा ही लेगा पनाह माँगने पहुँच गया, और उसने असलियत में वक्त आने पर अपने हम मजहबियों के गुस्से से अपनी ही जान बचाने के लिए उस आश्रित को उन्ही के हवाले छोड़ दिया तो ? ऐसे लोगों का तो हम नाम भी जान नहीं पायेंगे ! क्यूँ की जैसे की मैंने पहले कहा बाद में कोई अपने हम मजहबियों का साथ देने के बदले उसको इनाम देने या उसका सन्मान करने नहीं बुलाएगा | ये आधे अधूरे और कायर मानवता वादी और सेकुलर तो उन खुलकर हिन्दू मुस्लिम का लेबल लगाकर एकदूसरे की जान लेने वाले दंगाइयों से भी ज्यादा खतरनाक होते है ! इसीलिए किसी के खुद को सेकुलर कहने भर से उसे सेकुलर मान लेंने से पहले एक बात समझ लेनी चाहिए की हिन्दू मुस्लिम तो माँ के पेट से ही हिन्दू या मुस्लिम बनकर पैदा होते है, लेकिन सच्चे सेकुलर माँ के पेट से नहीं ऐसे दंगाइयों से किसी गैर मजहबी को अपनी जान की परवा किये बिना बचाने वालों की मिसालों से बनते हैं ! और ऐसे जीवन रक्षक अभयदान देने वाले गिनेचुने लोगों द्वारा अपनी जान या फिर दूसरों की जान बचा पाया हर इंसान ही उसका अपना धर्म चाहे जो कह ले सच्चा इंसान , सच्चा सेकुलर बनता हैं ! क्यूँ की वह अपने हो या पराये हर धर्म के असली रूप को देख चूका होता है ! और यह भी देख चूका होता है की जिस अल्लाह और महादेव का नाम उसे हिन्दू या मुस्लिमों को काटने के लिए उसमे जोश भर रहा था वही अल्लाह ,महादेव कुछ पल बाद उसके खुद के जान के लाले पड़ जाने पर उसे बचाने नहीं आता , और न ही सामने मारने वाले का बाल भी बांका कर पाता है ! और ऐसे में अगर कोई उसे बचा पाता है तो सिर्फ वह इंसान जो अपने परिजनों को खोकर भी यह भूल चूका होता है की वह हिन्दू है या मुसलमान ! इसीलिए सेकुलर होना सबके बस की बात नहीं ! और पहचानना तो और भी मुश्किल है !! इसमे कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए की अपने स्वार्थ के लिए धर्म तक को न छोड़ने वाले ढोंगियों के दौर में सेकुलरिज्म का भी स्वांग रचाने वाले इस समाज में हैं ! इसीलिए जब तक आपको सेकुलर का सही अर्थ मालुम न हो तब तक केवल खुद को सेकुलर कहनेवाले पर भरोसा करना या फिर सेकुलरिज्म को कोसना दोनों ही बेवकूफी साबित होगी !! क्यूँ की सेकुलर कभी सेकुलरिज्म के लिए भी कट्टर नहीं होगा और धार्मिक कट्टरतावादियों के लाख कोसने से भी वह किसी की जान बचाने से नहीं चुकेगा !

अब अंत में आतें हैं हम लेखक पाठकों की एयर कंडीशन जमात पर ! जो इस हकीकत से परे हिन्दू मुस्लिमों के गड़े मुडदो से लेकर भविष्य तक की चिंता में अपनी कलम से रोज बलात्कार करते रहते हैं ! और उन बातों पर हार जीत का खेल खेलकर पता नहीं कहाँ कहाँ कब कब किस शब्द से ऐसी चिंगारियां जगह जगह पीरों आते हैं ! जिससे कब दंगाइयों का ‘अगली बार’ का इन्तजार ख़त्म होता है इसका हमें एहसास तक नहीं होता ! आपने एक बात पर गौर किया है ? सभी सीरियल क्राइम्स की कड़ी में आपको एक ही स्थान पर सीरियल दंगे होते कभी दिखाई नहीं देंगे ! क्यूँ की एक दंगों के बाद दुसरे के लिए दंगे की हकीकत से अनजान नई फ़ौज तैयार होने में समय लगता है | तब तक चाहे आप कितना भी उल जुलूल बक लो तत्काल कुछ नहीं होता ! लेकिन जैसे ही इनकी नयी फसल तैयार हवी तब एक तरफ आपकी सभ्य सुनहरे मंच की हिन्दू मुस्लिम चिंगारियों की लगातार चलती खेती फिर आग का गोला उगलने में किसी जायज वजह का भी इन्तजार नहीं करती ! क्यूँ की अब तक आपका जहर पढ़ पढ़ के,सुन सुन के वह तबका भी उनके साथ होता है जिसे पढ़ा लिखा या सेकुलर समझ कर बाद में हमें यकीं ही नहीं होता की आप भी ????
इसीलिए कम से कम भारत के लिए भारत के हिन्दू मुस्लिमों पर जो लिखो,कहो सोच समझ कर करो ! क्यूँ की यहाँ हिन्दू मुस्लिमो को एकदूसरे से कोई बचा सकता है तो वो है सच्चा सेकुलर ! और हिन्दू मुस्लिम से सेकुलर होना उतना ही मुश्किल है जितना आसान किसी सेकुलर का फिर से हिन्दू या मुसलमान हो जाना ! इसीलिए ऐसे खौफ में जागने से बचना हो तो धर्मनिरपेक्षता के दीपक की लौ बचाने के लिए जागते रहो ! वरना पगड़ी तो बच जायेगी लेकिन सर नहीं बचेगा !