abdullah

जो बादाकश हैं पुराने वो उठते जाते हैं
कहीं से आब-ए-बक़ा-ए-दवाम ला साक़ी

आज सुबह-सवेरे फ़ेसबुक पर गया कि ग़ालिब वाली अगली टिप्पणी पोस्ट कर दूं तो पहले भाई वीरेन्द्र यादव और फिर इरफ़ान की वौल से अब्दुल्ला हुसैन के गुज़रने की ख़बर पढ़ी. मन एकबारगी उदास हो आया. कैसा अजब हाल है. अब हमको अपने क़रीबी लोगों के गुज़रने की खबर औरों से मिलती है. पर सही है आजकल हमारी जो कैफ़ियत है, उसे ग़ालिब बहुत पहले बयान कर गये हैं — हम वहां हैं जहां से हमको भी / कुछ हमारी ख़बर नहीं आती. सो गिला कैसा.

बहरहाल, ख़बर का पढ़ना था कि हमारा मन तीस बरस पीछे चला गया जब सन १९८०-८४ के बीच मैं बीबीसी में मुलाज़िम था और उस दौरान अब्दुल्ला हुसैन के साथ बहुत वक़्त गुज़रा था.

मैं अभी बीबीसी गया ही था कि पहले ही हफ़्ते मेरा परिचय सुरेन्दर कोछड़ नाम की महिला से हुआ जो बीबीसी में “आवाज़ लगाने” आया करती थी, यानी बाहर से हिस्सा लेने वालों में थी और जैसा कि मुझे दो-तीन दिन में ही पता चल गया कि वह मेरे एक बहनोई के साथ लिव-इन रिश्ते में बंधी थी और उससे उनकी एक बेटी भी थी. ख़ैर, मुझे इससे कोई ऐतराज़ नहीं था. उन दिनों मैं अकेला था, होस्टल में रह रहा था और शनिवार-इतवार की छुट्टी में बाहर निकल जाता था. चूंकि सुरेन्दर ने मुझे मिलते ही घर बुला लिया था, या शायद वह मुझे अपने साथ ले गयी थी, और मेरे बहनोई ने भी आरम्भिक संकोच के बाद मुझे गर्मजोशी से स्वीकार कर लिया था, मैं अक्सर सुरेन्दर के घर चला जाता.

सुरेन्दर दिल्ली रही थी और हमारे साझे दोस्तों में विश्व मोहन बडोला भी थे जो बहुत अच्छे अभिनेता हैं और तब पत्रकार थे. सुरेन्दर के घर का बड़ा बेतकल्लुफ़ाना माहौल था, ढेरों लोग वहां आते और उनका गर्म-जोशी से ख़ैर-मक़दम होता. मैं भी इन स्थायी अतिथियों में शामिल हो गया. मेरे अलावा स्थायी अतिथियों में अब्दुल्ला हुसैन भी था जो जैसा कि उसने मुझे बताया इंजीनियर था, कनाडा रहा था और अब लन्दन में कबाड़ का धन्धा कर रहा था. लम्बा-तड़ंगा, बेहंगम-सा आदमी, पंजाबी लहजे में हिन्दुस्तानी और अंग्रेज़ी बोलने वाला, बेहद ज़हीन, बाज़ौक़ और विनोद वृत्ति से सम्पन्न. आम तौर पर जीन्स और कमीज़ पहने रहता और कपड़ों की तरफ़ से बिलकुल बेपरवाह. कई बार जब हमने रात सुरेन्दर के घर काटी तो वह एक तिकोने से कच्छे में सोया जिसका मैं बड़ा मज़ाक़ बनाता.

मैं अब्दुल्ला का उपन्यास “उदास नस्लें” पढ़ चुका था और वह मुझे बेहद पसन्द आया था. छपा भी वह पहली बार इलाहाबाद से ही था. इसका ज़िक्र करते ही अब्दुल्ला ने कहा – यार, उस पब्लिशर ने पैसे तो कुछ दिये ही नहीं. मैंने ठहाका लगाया और कहा कि वह शुक्र करे कि पब्लिशर ने उससे कुछ पैसे नहीं झटके. उसे पता न रहा होगा कि अब्दुल्ला इंग्लैण्ड में है.

मैं “आग का दरिया” भी पढ़ चुका था, मगर दोनों उपन्यासों में मुझे “उदास नस्लें” भाया था. कुर्रतुल ऐन हैदर ने जिस समाज को लिया था वह ऊंचे तबक़े का इलीट समाज था. शैली उम्दा थी और कहानी के सिलसिले को आगे बढ़ाने की युक्तियां भी पुर-पेच थीं. लेकिन “उदास नस्लें” अम्बाला के पास के पंजाबी किसानों और निचले और मझोले तबक़ों की दास्तान थी, पुराने रूसी उस्तादों की रवायत में जो मुझे वैसे ही रुचती थी.

लेकिन इससे यह न समझा जाये कि मैं और अब्दुल्ला सिर्फ़ साहित्य या उसके उपन्यास पर ही बातें करते थे. दुनिया जहान की गप-शप होती थी, पीना-पिलाना होता था और जब मेरा परिवार हिन्दुस्तान से आ गया और मेरी मसरूफ़ियात बढ़ गयीं तब भी सुरेन्दर के घर अक्सर मिलना होता. तभी रश्दी का “मिडनाइट्स चिल्ड्रेन” आया. उस पर चर्चा हुई तो अब्दुल्ला के लहजे में पहली बार मैंने हल्की-सी अफ़्सुर्दगी महसूस की. उसने बातों-बातों में कहा कि वह अब अंग्रेज़ी में लिखना चाहता है. मैंने उससे कहा कि तुम ऐसा मत करना. रश्दी से रश्क करने की ज़रूरत नहीं, तुम्हारी ताक़त तुम्हारी अपनी ज़ुबान है. मुझे कुछ अजीब भी लगा क्योंकि मैं यह जानता था कि “उदास नस्लें” को पाकिस्तान का सबसे बड़ा इनाम “आदमजी अवार्ड” मिल चुका था. पर तब मैं यह नहीं जानता था कि उसके उपन्यास की काफ़ी आलोचना भी हुई थी जिसका उसे रंज था.

ख़ैर हमारी मुलाक़ातें चलती रहीं. फिर एक दिन अब्दुल्ला ने बताया कि उसने एक औफ़-लाइसेन्स ख़रीद लिया है जिसके साथ एक डेलिकेटेसन भी है. औफ़-लाइसेन्स शराब की उस दुकान को कहते थे जो शराब बेचती तो थी, पर वहां आप पी नहीं सकते थे. डेलिकेटेसन का मतलब था खाने-पीने की तैयार चीज़ें मुहैया कराने वाली दुकान. मुझे यह सुन कर बड़ा मज़ा आया था और हमने अब्दुल्ला की थोड़ी खिंचाई भी की थी.

उन्हीं दिनों मेरा दोस्त अमरजीत चन्दन बरास्ता जरमनी इंग्लैण्ड आ गया. वह पाश के साथियों में था और हमारा साझा राजनैतिक ताल्लुक़ भी था. उसने “पहल” के उस पहले कवितांक में पंजाबी वाले हिस्से के सिलसिले में मदद भी की थी, जो मैंने, मंगलेश और वीरेन डंगवाल ने मिल कर ज्ञानरंजन के कहने पर ग़ालिबन १९७७ में सम्पादित किया था. अमरजीत चन्दन के पास एक बेहतरीन कैमरा था और वह तस्वीरें लेने का बहुत शौक़ीन था. हम अक्सर मिलते. वह मुझे अपने साथ साहित्यिक कार्यक्रमों में ले जाता.

मैं तब तक साउथौल से ग्रीनफ़ोर्ड चला आया था, मगर अमरजीत वहीं डटा हुआ था. जब मैंने उसे अब्दुल्ला के बारे में बताया तो वह उछल पड़ा. वह मुझे “भारतीय जेलों में पांच साल” की लेखिका नक्सली आन्दोलन से जुड़ी मेरी टायलर से मिलाने ले गया था, मैं उसे अब्दुल्ला के यहां ले गया. हम अब्दुल्ला के औफ़-लाइसेन्स पर पहुंचे. बड़ी-सी दुकान थी, जिसकी बग़ल में एक छोटी दुकान डेलिकेटेसन के लिए अलग की हुई थी. अब्दुल्ला ऊपर रहता था — दुकान जितना ही कुशादा कमरा, खिड़कियां, रौशन और हवादार. साज़-सामान बहुत कम, मानो किसी फ़क़ीर का आस्ताना हो. यहीं वह रहने और लिखने की योजना बना रहा था. उसने बताया कि खाने-पीने की दुकान उसका भतीजा संभालेगा और साथ में औफ़-लाइसेन्स भी और अब्दुल्ला उसकी थोड़ी-बहुत मदद करने के साथ-साथ लिखेगा भी.

मैं बहुत हंसा. मैंने कहा इस पर मुझे अपने दादा का एक क़िस्सा याद आ गया है. अब्दुल्ला के आग्रह पर मैंने उसे बताया कि हमारे दादा बहुत पियक्कड़ थे और जुआरी भी. एक बार उन्हें लाटरी में तीन हज़ार रुपये आ गये. जब वे उन्हें ख़र्च करने के बारे में सोचने लगे तो उनके एक क़रीबी दोस्त ने कहा — पण्डत माधोराम, तुम इन रुपयों से शराब की एक दुकान खोल लो और बाहर बोर्ड लगा दो कि “ए वेच्चन वास्ते नईं है, ए असां सारी आप पी जाणी ऐ” यानी यह बेचने के लिए नहीं है, यह हम सारी ख़ुद पी जायेंगे. इस पर हमारे दादा ने उसे बहुत गालियां दीं. तो अब्दुल्ला हमें लगता है कि जिस तरह तुम पीने-पिलाने के शौक़ीन हो, तुमसे चल चुकी यह दुकान. ऊपर से तुम्हारा भतीजा कै दिन टिकेगा, भला?जब वह देखेगा कि चचा जान तो इत्मीनान से नावल लिख रहे हैं तो वह भी किसी पसन्दीदा शग़ल में मुब्तिला हो जायेगा.

ख़ैर, हंसी का यह दौर जब ख़त्म हुआ तो अमरजीत ने टेप रिकौर्डर निकाला और अब्दुल्ला के साथ एक साझी बात-चीत रिकौर्ड की. अंग्रेज़ी में, ताकि वहां छप सके. बाद में चन्दन ने मुझे उसकी कापी भेज दी जो मेरे क़ाग़ज़ों में अंकुर विहार वाले घर में रखी है. यहां होती तो उसे ही पोस्ट करता, क्योंकि उसमें अब्दुल्ला ने समाज और व्यवस्था के बारे में बड़ी खुली खरी बातें की थीं. हमने शीर्षक दिया था — “अगेन्स्ट इस्टैब्लिशमेंट फ़ुल स्टौप.” यह बात ग़ालिबन १९८१-८२ की है. फिर मैं १९८४ में हिन्दुस्तान लौट आया. अब्दुल्ला से मुलाक़ात तो नहीं हुई लेकिन उसका ख़त आने पर मैंने उसकी किताब की रायल्टी के लिए कोशिश ज़रूर की, पर नाकाम रहा. आज जब अब्दुल्ला के गुज़रने की ख़बर पढ़ी तो वे दिन याद आ गये. उसकी और मेरी उमर में काफ़ी अन्तर था, पर उसने उसे कभी हाएल नहीं होने दिया और जो बेतल्लुफ़ाना लहजा पहली मुलाक़ात में क़ायम हुआ वह मेरे इंग्लैण्ड प्रवास की पूरी अवधि में बना रहा.