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आनंद सिंह

आखिर वो दिन आ ही गये जिनका उन्‍हें बेसब्री से इन्‍तज़ार था। लेकिन वो कौन लोग थे जो इन दिनों के इन्‍तज़ार में इतने दिनों से आंखे गड़ाये बैठे थे? क्‍या वे भांति-भांति के ओपिनियन पोल और एग्‍िज़ट पोल करने वाले चुनावी विश्‍लेषक और टीवी एंकर थे? वो तो थे ही लेकिन कुछ ऐसे भी लोग थे जो उनसे भी ज्‍़यादा बेसब्री से इन्‍तज़ार कर रहे थे इन दिनों का। तो क्‍या वो टीवी के दर्शक थे? वो भी थे, लेकिन वो तो महज़ कन्‍ज्‍़यूमर थे अच्‍छे दिनों के सपनों के प्रोडक्‍ट के। तो फिर भला सपनों के इस प्रोडक्‍ट का मैन्‍युफैक्‍चरर कौन था? क्‍या वे शेयर मार्केट के दलाल और सट्टेबाज थे? लेकिन वे तो इन सपनों के एजेंट मात्र थे। इन सपनों के असली मैन्‍युफैक्‍चरर तो पूँजीपति थे जिनके मुनाफे़ की सरपट गाड़ी पर मन्‍दी की वजह से ब्रेक लगने शुरू हो चुके थे। दरअसल उनके बुरे दिन चल रहे थे; उन्‍हें अच्‍छे दिनों की सख्‍़त ज़रूरत थी। लेकिन उनके अच्‍छे दिन महँगाई, बेरोज़गारी, छँटनी के बोझ से कराह रही मेहनतकश अवाम को और ज्‍़यादा निचोड़े बगैर या यूं कहें कि उनके दिनों को बद से बदतर किये बगैर नहीं आ सकते थे। वे नग्‍न तानाशाही के ज़रिये भी अपने अच्‍छे दिन ला सकते थे। लेकिन पूँजीवादी लाेकतन्‍त्र के रूप में उनके पास उससे भी बेहतर और कारगर माध्‍यम उपलब्‍ध था। इसके लिए उन्‍हें बस अपने अच्‍छे दिनों की ज़रूरत को बदहाली से त्रस्‍त अवाम के अच्‍छे दिनों की चाहत पर आरोपित कर अाने वाले अच्‍छे दिनों के सपने का प्रोडक्‍ट मैन्‍युफैक्‍चर करना था। फिर क्‍या था, पूँजीपतियों ने अपने वर्ग के इस सामूहिक उपक्रम में बेतहाशा निवेश करना शुरू किया। दलालों, टीवी विश्‍लेषकों और परजीवी बुद्धिजीवियों की जमात ने सपनों के इस ब्रांड के पक्ष में जनमत तैयार किया। भारतीय मध्‍यवर्ग को मुंगेरीलाल की तरह हसीन सपने देखने की पुरानी आदत रही है, साथ ही पिछले दो दशकों में उसे ब्रांड का भी चस्‍का लग गया है। इसलिए उसने पुराने ब्रांडों के पिट जाने के बाद सपनों के इस नये ब्रांड को हाथों-हाथ लिया। मेहनतकश आबादी जिसने आज तक बुरे दिनों के अलावा और कोई दिन नहीं देखे उसके भी अच्‍छे-खासे हिस्‍से को मृग मरीचिका की तरह इन सपनों में अपनी बदहाली दूर करने की उम्‍मीद नज़र आयी। ऐसे में इस ब्रांड को हिट होना ही था और वही हुआ।

लेकिन इतिहास गवाह है कि शासक वर्ग द्वारा प्रायोजित और मैन्‍युफैक्‍चर्ड सपनों की उम्र बहुत लंबी नहीं हुआ करती। जिस दौरान इन सपनों की मैन्‍यूफैक्‍चरिंग हो रही थी उसी दौरान इस देश की मेहनतकश आबादी कल-कारखानों और खेत-खलिहानों में दिन-रात गाय-गोरू की तरह खट रही थी, वह नरक जैसी बस्तियों में रह रही थी, भूख, कुपोषण और बीमारियों से उनके बच्‍चों का दम तोड़ना बदस्‍तूर ज़ारी था, महिलायें हमेशा की तरह नरभक्षी भेड़ि‍यों की शिकार बन रही थीं, अल्‍पसंख्‍यक ठंडी मौत मर रहे थे और जो जिन्‍दा थे वे ख़ौफ़ के साये में जी रहे थे, दलितों और आदिवासियों का कुचला जाना भी बदस्‍तूर ज़ारी था। संक्षेप में कहें तो शोषण और उत्‍पीड़न की पूँजीवादी मशीनरी अपना काम किये जा रही थी। अब जबकि पूँजीपतियों के अच्‍छे दिन आ गये हैं, वे इस पूँजीवादी मशीनरी को और प्रभावी तरीके से संचालित करने की तैयारी में जुट गये हैं। नतीजे के रूप में उनके मुनाफे़ में तो बढोत्‍तरी तो होगी ही, लेकिन यह भी सच है कि यह बढ़ोत्‍तरी अवाम की बदहाली और बर्बादी की शर्त पर ही होगी। यानी उनके मैन्‍युफैक्‍चर्ड सपनों की पोल खुलना तय है। संभव है कि ऐसे में जनमुक्ति के सच्‍चे स्‍वप्‍न को हक़ीकत में तब्‍दील करने की जमीन भी तैयार हो। लेकिन भविष्‍य इस बात पर निर्भर करेगा कि जनता के सपूत इस पूँजीवादी निजाम को उखाड़ फेंकने और शोषण एवं उत्‍पीड़न से मुक्‍त एक नये समाज की नींव रखने के लिए किस क़दर तैयार हैं। इसलिए साथियो, आइये हम शासक वर्ग द्वारा प्रायोजित अच्‍छे दिनों के इन फ़र्जी सपनों का पर्दाफ़ाश करने के साथ ही जनमुक्ति के सच्‍चे स्‍वप्‍न को हक़ीकत में बदलने के लिए आज से ही कमर कस लें।