secularism

लेख – हम आज जिस भारत में रहते हैं वहां एक विचित्र प्रकार की प्रजाति पायी जाती है, सेक्युलर!

सेकुलरिज्म शब्द सबसे पहले १८५१ में ब्रिटिश लेखक जॉर्ज जैकब होल्योंके द्वारा इस्तेमाल किया गया था जो कालांतर में एपिक्युरुस और मार्कस औरेलियस जैसे ग्रीक विचारकों के द्वारा परिभाषित होते हुए सारे संसार में सफल लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण शर्त बन गया है! भारत में इसे सबसे पहले महाराजा रणजीत सिंह ने १९वि शताब्दी के पूर्वार्ध में सफलतापूर्वक पंजाब में अपनाया था एक दरबार कि स्थापना कर जिसके प्रमुख होते थे एक सिख, एक मुस्लिम और एक हिन्दू!

अब मैं अपने पहले वाक्य पर आता हूँ! मैंने विचित्र इसलिए कहा है कि आज ये मुक़द्दस शब्द एक गाली बन चूका है! आज सेकुलरिज्म का मतलब रह गया है तुष्टिकरण! हमारे संविधान निर्माताओं ने सपने में भी ये नहीं सोचा होगा कि जिस शब्द को वो एक आधार बना रहे हैं वो विकृत होते होते खुद आधारहीन हो जायेगा! आज सब से ज्यादा सेक्युलर वो माना जाता है जो इफ्तार पार्टीज में सब से ज्यादा गोल टोपी पहन कर सब से सही तरीके से दुआ मांग सके भले ही उस के बाद वो अपने वोट बैंक कि राजनीती के लिए इन्ही गोल टोपी वालों कि लाशें बिछाने का ही प्रबंध क्यों न करने लग जाये! आज सेक्युलर वो है जो इसराइल के विरोध में छाती कूटे और ISIS पर खामोश रहे! आज सेक्युलर वो है जो धर्म आधारित जनगणना करा के सेना में भी धर्म के नाम पर फुट डाले! आज सेक्युलर वो है जो भारत के प्रधानमंत्री को जितनी गन्दी गालियां दे या जितने गिरे हुए शब्दों से सम्बोधित करे! आज सेक्युलर वो है जो भारत के सनातन धर्म में कीड़े निकले और इसे गलत ठहराने का प्रयास करे! आज सेक्युलर वो है जो गोधरा दंगों को कम्युनल बताये और आसाम दंगो को बाहरी बनाम स्थानीय लोगों का संघर्ष! आज सेक्युलर वो है जो मुसलमानो के पक्ष में बोल कर, उनकी सहानुभूति बटोर कर सत्ता का सुख भोगे और फिर उन्हें हिन्दुओं से खतरा बता कर बेवकूफ बनाता रहे!

मुझे आपके ये सब करने से कोई समस्या नहीं है! आप अपना वोट बैंक बढ़ाओ, अपनी राजनीती चमकाओ, अपना फायदा बनाओ! लेकिन उस के आड़ में समाज में वैमनस्यता मत फैलाओ, किसी समुदाय में दूसरे समुदाय के प्रति डर और विद्वेस कि भावना मत भड़काओ, एक समुदाय से दूसरे समुदाय के लोगो के सर न कटवाओ! आप का बोया हुआ ये विष किस हद तक प्रलयंकारी हो सकता है शायद आपको अंदाजा नहीं या है भी तो आप उसे अनदेखा कर रहे हैं अपने क्षणिक स्वार्थ के लिए! आपने मुसलमानो कि इतनी तरफदारी की कि हिन्दुओं में उनके प्रति ईर्ष्या भड़कने लगी और जिसे कुछ संगठनो ने हवा दे कर द्वेष बना दिया! आपने उस द्वेष को भुनाने के लिए पुनः तरफदारी कि और इस तरह ये बढ़ता गया! और बढ़ते बढ़ते इतना बढ़ गया कि आज छोटी छोटी सी बात पर ये समुदाय एक दूसरे के खून के प्यासे हो उठते हैं! ये इतना बढ़ गया है कि आज किसी मंदिर में गाय का मांस या किसी मस्जिद में सुवर का मांस मिलने पर ये बाद में पता लगाया जाता है कि ये किसकी करतूत है जबकि और दो चार लाशें पहले बिछा दी जाती हैं! मुस्लमान कि बस्ती से दुर्गा पूजा का जुलुस या हिन्दू कि बस्ती से मुहर्रम का जुलुस निकलने पर आपस में मर पिट और दंगे हो जाते हैं! किसी मौलाना के एक बयां पर कारसेवकों को ट्रेन में जिन्दा जल दिया जाता है और फिर उस का बदला लेने के लिए निर्दोष बच्चों, औरतों और बूढ़ों तक का कत्लेआम कर दिया जाता है!

आप जब तक किसी समुदाय विशेष कि तरफदारी करेंगे, अलग समुदायों के लिए अलग कानून बनाएंगे, समुदाय विशेष को कोई विशेष सुविधा देंगे तब तक ये चलता ही रहेगा! आप अलगाववादियों के नाम पर रोना रोते हैं जबकि आपके इसी व्यवस्था ने उन अलगाववादियों को उनका बारूद मुहैया कराया है और कराता रहेगा! ये लकीर खींचने का काम आपने किया है! आपने सरकारी प्रतिवेदनों में धर्म के लिए एक कॉलम दिया! क्या भारतीय होना काफी नहीं था.? आपने धर्म के आधार पर देश बांटी और दिल भी बांटे! क्या सारे धर्म के लोग एक साथ नहीं रह सकते थे.? आपने हिन्दू को हिन्दू और मुस्लमान को मुस्लमान बताया! क्या वो इंसान नहीं हो सकते थे.? आप ने धर्म आधारित राजनीती शुरू कि! क्या वो मुद्दे आधारित नहीं हो सकते थे.? आपने मुसलमानो को वोट बैंक बनाया! क्या वो मुख्यधारा का हिस्सा नहीं हो सकते थे.? और इतना सब कुछ कर के भी आपने मुसलमानो का क्या भला किया.? कुछ भी नहीं, बस दो चार मुस्लमान नेता पैदा कर दिए जो आपके ही अजेंडे को हवा दे रहे हैं बजाये कि मुसलमानो के लिए कुछ करते! आप सेक्युलर बनते हैं जबकि आप तो आज तक इसका अर्थ ही नहीं समझ पाये!

आज अगर कोई सेक्युलर है तो हमारे लेखक जो हिंदी और उर्दू को इस तरह से मिला कर लिखते हैं कि आप उन्हें उस वाक्य के भावार्थ और खूबसूरती कि बलि लिए बिना अलग कर ही नहीं सकते! आप इस से सिख सकते हो कि लोगों को आपस में मिलाओ पूरा देश सेक्युलर हो जायेगा नहीं तो इस शब्द का सेकुलरिज्म खुद खतरे में पड़ा हुआ दिख रहा है! कल को कहीं ये शब्द किसी एक समुदाय के लिए पक्षपात का प्रतिक न बन जाये!