vyapam-scandal

मध्य प्रदेश के व्यवसायिक परीक्षा मंडल से जुड़े लोगों की एक के बाद एक मौत से यह मामला बेहद सनसनीखेज हो गया है और पुराने जमाने की गुमनाम जैसी किसी मिस्ट्री फिल्म की याद जगा रहा है। कहा जाता है कि कई बार वास्तविक घटनाएं किसी भी उपन्यास और फिल्म से ज्यादा रहस्यपूर्ण होती हैं और इस मामले में तो यह बात पूरे दावे के साथ कही जा सकती है।

मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले से जुड़े पच्चीस लोगों की मौत अब तक हो चुकी है। इनमें से किसी की मौत स्वाभाविक या सामान्य नहीं है। शनिवार को झाबुआ जिले में आज तक के पत्रकार अक्षय सिंह की मौत इस मामले में सर्वाधिक सनसनीखेज है। वे मीडिया के बेहद ताकतवर मंच से जुड़े थे। इससे यह मामला अनदेखा नहीं होगा। इसमें अभी मध्य प्रदेश सरकार और भारतीय जनता पार्टी को बहुत कुछ झेलना पड़ेगा। मध्य प्रदेश का व्यवसायिक परीक्षा मंडल प्रीमेडिकल टेस्ट और प्रीइंजीनियरिंग टेस्ट के अलावा तमाम सेवाओं की प्रतियोगी परीक्षाएं संचालित करता है। इसमें कैसी जालसाजी चल रही थी इसका पर्दाफाश शायद आसानी से नहीं होता लेकिन यह घोटाला उस समय सतह पर आ गया जब प्रीमेडिकल टेस्ट की परीक्षा में वास्तविक परीक्षार्थी की जगह पेपर दे रहे दूसरे लोग संयोग से पकड़ लिए गए। इसकी जांच आगे बढ़ी तो न जाने कितनी पर्तें खुलने लगी। बड़े-बड़े कोचिंग संचालक और डाक्टर इसमें जेल जा चुके हैं। मध्य प्रदेश के एक मंत्री को भी जेल की हवा देखनी पड़ी है। हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह इसके तार कहां तक जुड़े हैं यह छोर बावजूद इसके अभी तक हाथ नहीं लग पाया है।

इसे लेकर राजभवन पर तो उंगलियां उठ ही चुकी हैं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी संदेह के घेरे में लाए जा रहे हैं। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने दावा किया था कि जांच में आए तथ्यों में हेराफेरी कराके शिवराज सिंह चौहान ने अपनी जगह उमा भारती का नाम जुड़वा दिया है। शिवराज सिंह इसका पुरजोर खंडन कर चुके हैं। उमा भारती के इस्तीफा देने के बाद अचानक उनकी जगह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान ने निश्चित रूप से प्रशासनिक कुशलता को साबित किया है और इसी वजह से उमा भारती का अस्तित्व मध्य प्रदेश में समाप्त हो गया। कांग्रेस भी जोर लगाने के बावजूद सत्ता में वापसी नहीं कर पा रही है। उन्होंने बिजली सड़क आदि के क्षेत्र में ढांचागत सुधार में जो उपलब्धियां हासिल की उसकी तारीफ अन्य जगह भी होती है। इसी कारण लोकसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट होने के बावजूद शिवराज सिंह ने यह जताने की कोशिश की थी कि मध्य प्रदेश में भाजपा को वोट नरेंद्र मोदी के नाम पर नहीं उन्हीं के नाम पर मिलेंगे। लोकसभा चुनाव के पहले सदन का आगामी स्वरूप जिस तरह होने का अनुमान किया जा रहा था उसे देखते हुए भाजपा में भी कई लोग सत्ता हथियाने की घात अपने-अपने तरीके से लगाए बैठे थे जिनमें शिवराज सिंह भी थे। यह दूसरी बात है कि भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिल गया और नरेंद्र मोदी इसकी वजह से पार्टी के एक छत्र नेता के रूप में स्थापित हो गए। नतीजतन शिवराज सिंह चौहान ने भी अपनी चादर समेट लेने में ही गनीमत समझी।

पर शिवराज सिंह के व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष यह भी है कि कुछ वर्षों से उनका नाम कई कलंक कथाओं से भी जुडऩे लगा है। मुरैना में बालू माफियाओं द्वारा एक आईपीएस अफसर की कुचलकर हत्या के मामले से उजागर हुआ कि शिवराज सिंह के राज में किस तरह से अवैध खनन हो रहा है और इसे कराने वाली लाबी कितनी ताकतवर हो चुकी है। अगर यह मामला उत्तर प्रदेश में होता तो अखिलेश सरकार की खाट खड़ी हो गई होती। इससे छोटे मामलों में राज्य की मीडिया ने अखिलेश सरकार की बखिया उधेडऩे में कसर नहीं छोड़ी। उत्तर प्रदेश में मीडिया ज्यादा जागरूक है और साहसी भी जबकि मध्य प्रदेश में मीडिया का अधिकांश हिस्सा शिवराज सिंह और भाजपा के प्रति भक्तिभाव में डूबा हुआ है इसलिए वहां बड़े-बड़े मामले भी मीडिया में ज्यादा तूल नहीं पकड़ पाते। नियुक्तियों तबादलों में शिवराज सिंह की मैडम का दखल भी मध्य प्रदेश में पर्याप्त चर्चा का विषय हो चुका है। ऐसे में दिग्विजय सिंह के आरोपों को विपक्ष का प्रलाप कहकर शिवराज सिंह को एकदम क्लीन चिट देना संभव नहीं है।

फिर भी इस बात का कोई सबूत नहीं है कि क्या व्यापम घोटाले के तार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री से जुड़े हुए हैं लेकिन इतना जरूर है कि जिस तरह से इस मामले के सबूतों को नष्ट करने और इसका पूरा राजफाश होने से रोकने के लिए कई लोगों को ठिकाने लगाया जा चुका है उससे यह तो साबित हो ही जाता है कि इसमें पर्दे के पीछे कोई बहुत बड़ा मास्टर माइंड है। उसके पास सत्ता भी है और आपराधिक क्षेत्र के धुरंधर भी। जिन लोगों की मौतें हो रही हैं उन्हें हत्या भी साबित नहीं किया जा सकता लेकिन वे मौतें सामान्य भी नहीं हैं इसलिए अगर इसकी सीबीआई जांच की मांग की जा रही है तो कोई अनुचित नहीं है। इस मामले की जांच से जुड़े एसटीएफ के दो अफसर तक शिकायत कर चुके हैं कि उन्हें फोन पर धमकियां मिली हैं। इसका मतलब यह बेहद संगीन मामला है। इस कारण सीबीआई भी नहीं इससे जुड़े लोगों की संदिग्ध मौत के लिए न्यायिक आयोग गठित होना चाहिए। उत्तर प्रदेश में भी एनआरएचएम घोटाले से जुड़े कई सीएमओ रहस्यपूर्ण परिस्थितियों में मारे गए थे। यह हत्याएं किसने कराई थी यहां भी पता नहीं चला। लोग विश्वास करते हैं कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं लेकिन यह मामले इस धारणा को खंडित कर देते हैं और जनता का इस मामले में विश्वास खंडित होना किसी राज्य के स्थायित्व के लिए अच्छी बात नहीं है।

पत्रकार अक्षय सिंह की मौत व्यापम घोटाले में नया ज्वार पैदा करेगी। धर्म का कीर्तन करने से कोई धार्मिक यानी ईमानदार नहीं हो जाता। पिछले कुछ महीनों से भाजपा जैसी घटनाओं का सामना कर रही है उससे यही बात साबित हो रही है। भाजपा संघ और साधु सन्यासियों से निर्देशित होकर चलने वाली पार्टी मानी जाती है इसलिए यह मिथक कायम हो गया कि यह बड़ी धर्मराज पार्टी है लेकिन जिस तरह से महाभारत की पूरा कहानी को पढऩे के बाद इसके लिए मुख्य रूप से पत्नी को जुए में दांव पर लगाने के कारण जिम्मेदार स्वयंभू धर्मराज युधिष्ठिर का मूर्तभंजन हुआ था वैसा ही मूर्तभंजन पिछले कुछ महीनों से भाजपा का हो रहा है। न खाऊंगा न खाने दूंगा की बात कहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जयललिता को तकनीकी आधार पर भ्रष्टाचार के मामले में अदालत से क्लीन चिट मिलने के बाद सबसे पहले बधाई देकर यह साबित किया कि उन जैसे फर्जी तीस मार खां केवल न खाने देने की डींगें हांक सकते हैं।

यथास्थितिवादी वर्गसत्ता के मोहरे होने की वजह से उनकी यह कुव्वत तो है ही नहीं कि वे किसी को खाने से रोक सकेें। लोग न खा सकेें इसके लिए तो व्यवस्था परिवर्तन की जरूरत पड़ती है और मोदी के लिए यह कैसे संभव है। बहरहाल पहले बात केवल भ्रष्टाचार की जीतीजागती देवी जयललिता को बधाई देने तक की थी लेकिन अब तो सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे तक के मामले में उन्होंने अपनी जुबान पर ताला लगाकर प्रभावशाली भ्रष्ट लोगों के साथ समझौता करने के अपने वर्ग चरित्र को स्पष्ट कर दिया है। उन्हीं के नेतृत्व में भाजपा में मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले में उनकी निष्क्रियता का अध्याय जुड़ गया है। उनसे तो भली इंदिरा गांधी थी जिन्होंने महाराष्ट्र में इससे हल्के सीमेंट घोटाला कांड में अपने प्रिय मुख्यमंत्री अब्दुल रहमान अंतुले को प्रारंभ में बचाते रहने के बाद जब देखा कि जनता में उनकी साख ही बिल्कुल खत्म हो जाएगी तो उनका इस्तीफा लेने में गुरेज नहीं किया लेकिन मोदी न तो जयललिता और वसुंधरा का इस्तीफा ले पाएंगे और न ही शिवराज सिंह का इस्तीफा लेकर व्यापम घोटाले से जुड़े लोगों की मौत की बेबाक जांच कराने का साहस दिखा पाएंगे। दुख का विषय यह है कि सत्ता के हमाम में सभी नंगे हैं। लोग करें तो क्या करें। पहले कांग्रेस को भ्रष्ट समझते थे और उसने अपने आचरण से बहुत कुछ इस बात को साबित भी किया था। इसके बाद उसने मोदी और अरविंद केजरीवाल पर भरोसा किया लेकिन इन दोनों ने तो उसे बहुत गहरे मोहभंग की खाई में ले जा पटका है। कांग्रेस की तो कभी बहुत पवित्र छवि नहीं रही। उसके नेता व्यवहारिक माने जाते रहे इसलिए कांग्रेस का भ्रष्टाचार उजागर होता था तो जनता को कोई आघात सा नहीं लगताा था लेकिन मोदी और केजरीवाल तो अभी कुछ महीने पहले तक ही जनमानस के बीच दिव्य आत्माओं के रूप में छाए हुए थे। इन्होंने उसका जो विश्वास तोड़ा है उसकी भरपाई करना जनमानस के लिए आसान नहीं है। नास्तिकता को चरम नकारात्मक भावना माना जाता है लेकिन नास्तिकता का मतलब ईश्वर को नकारना नहीं यह विश्वास हो जाना है कि कहीं कभी कोई नैतिक सत्ता नहीं होती और इस समय ऐसी ही नास्तिकता के प्रसार का दौर है। जो इस कुफ्र के जिम्मेदार हैं इतिहास उन्हें बहुत कड़ी सजा देगा।