urdu

आज जब एक भाषा के रूप में उर्दू के सामने पहचान का संकट खड़ा है तो स्वाभाविक है इससे मुहब्बत करने वाले उर्दू की इस बदहाली की वजहें तलाश कर रहे हैं ! मगर अफ़सोस है कि इन सबका चिंतन उर्दू की बदहाली की वास्तविक वजह नहीं तलाश पा रहा हैं ! इसकी बदहाली की माकूल वजहें तलाशने की बजाये आरोप हिन्दू साम्प्रदायिकता और सरकारों के ऊपर डाला जाता रहा है ! अगर उर्दू के बदहाली की माकूल वजह तलाश पाते तो उर्दू पुःन अपने उस गौरव को प्राप्त कर लेती जो प्रतिष्ठा उसकी अतीत में रही थी !

उर्दू की बदहाली के कारण

तारीख गवाह है कि उर्दू तब तक तरक्की करती रही जब तक यह हिन्दू और मुस्लिमों के बीच समान रूप से स्वीकृत जुबान थी और इस पर जान छिड़कने वाले हिन्दू और मुसलमान दोनों थे परन्तु इसकी बदहाली तब से शुरू हो गई जब इसको लेकर मजहब बीच में आ गया और उर्दू को मुसलमान अपनी जुबान बताते हुए सामने आ गये ! और सच तो ये है उर्दू को इस हाल में पहुँचाने के गुनाहगार और कोई नहीं वरन इस भाषा पर सबसे अधिक अधिकार भाव जताने वाले मुसलमान ही हैं ! उर्दू सबकी जुबान थी, इससे मुहब्बत करने वालों और इस भाषा पर महारत रखने वालों की सूची में अग्रणी स्थान हिन्दुओं का भी रहा है ! पंडित दयाशंकर ‘नसीम’,पंडित रतननाथ ‘सरशार’, नरेश कुमार ‘शाद’, मुंशी प्रेमचंद, जगत मोहन लाल ‘खां’, बेनी नारायण ‘जहां’, तिलोक चंद ‘महरूम’, रघुवीर सहाय ‘फ़िराक’, जगन्नाथ ‘आजाद’, आनंद नारायण ‘मुल्ला’, राजेन्द्र सिंह ‘बेदी’, किशन चंदर ये तमाम हिन्दू नाम है पर उर्दू की खिदमत में इनकी बराबरी करने वाले कम ही मुसलमान होंगे ! ये उर्दू से इनकी मुहब्बत की इंतेहा ही थी जिसने इन्हें अपना तखल्लुस (उपनाम) भी उर्दू नाम पर ही रखने को प्रेरित किया ! मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचना ‘सोजे-वतन’ उर्दू में ही लिखी गई थी ! जंगे-आजादी में बलिदान होने वाले सपूत ‘इन्कलाब-जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए थे ! ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ का नारा उर्दू जुबान से निकली थी! इसलिए उर्दू अपने आरंभिक काल से लेकर आज तक में कभी भी मुसलमान नहीं थी पर जब से उर्दू को सिर्फ इस्लाम की भाषा के रूप में रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास शुरू हुआ तब से उर्दू मुसलमान और परायी हो गई !

उर्दू के गुनाहगार

उर्दू को इस्लाम में दीक्षित करने का काम करने वाले गुनाहगारों की सूची बड़ी लम्बी है जिसे अंग्रेजों के काल से लेकर वर्तमान वक़्त तक के कालखंड में आसानी से ढूंढा जा सकता है ! उर्दू न तो हिन्दू है न मुसलमान है ,उर्दू तो हिंदुस्तान की बेटी है जैसे खुबसूरत तराने लिखने वालों ने उर्दू को हिन्दुओं से अलग करने का पहला प्रयास और उर्दू पर अपना पहला दावा तब पेश किया जब भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान तमाम राष्ट्रवादियों ने एक विदेशी और गुलामी की भाषा फारसी को हटाकर उसकी जगह हिंदी को प्रतिष्ठित करने का आग्रह शुरू किया था ! मुसलमाओं को राष्ट्रवादियों की यह मांग उर्दू को पददलित करने वाला और इस्लाम विरोधी लगा और वो ‘ये उर्दू का जनाजा है ज़रा शान से निकले’ के नारे के साथ सड़कों पर उतर पड़े ! (भाषा-विज्ञान कि दृष्टि से तो उर्दू एक स्वतंत्र भाषा भी नहीं है क्यूंकि भाषा-शास्त्र के लिए ये ये अनिवार्य शर्त है कि उसका अपना एक व्याकरण और क्रियापद हो ! उर्दू इन दोनों से ही वंचित है ! उर्दू अधिक से हिंदी हिंदी की फ़ारसी प्रभावित बोली मात्र है! इन कारणों से भी राजकीय भाषा के रूप में इसे स्थापित करना संभव नहीं था ! )

जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं था ! हिन्दी को राष्ट्रीय संपर्क की भाषा बनाने का आग्रह कतई धार्मिक मसला नहीं था क्यूंकि हिंदी को प्रतिष्ठित करने की मांग करने वालों से कोई भी ऐसा नहीं था जिसकी धर्मनिरपेक्षता संदिग्ध हो ! आश्चर्य तो ये है कि तब भारत में केवल कुछ ही हिस्से ऐसे थे जहाँ के मुसलमान उर्दू बोलते थे, देश के हिस्से मसलन बंगाल, तमिलनाडु, केरल, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि राज्यों में रहने वाले मुसलमानों की मादरी जुबान उर्दू नहीं वरन इन राज्यों की स्थानिक जुबान थी पर उर्दू के नाम पर वो सब इकट्ठे हो गए ! इसलिए जब उर्दू को मुसलमानों ने केवल मजहबी आधार पर अपनी एकता और शक्ति प्रदर्शन का जरिया बना लिया तो इसे तो पराया होना ही था !

यहाँ एक बात यह भी ध्यान में रखने योग्य है कि हिंदी को राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करने का अभियान जब भी चलाया गया तो उस आन्दोलन में जो लोग सबसे आगे थे उनमें अधिकांश ऐसे थे जिनकी मादरी जुबान हिंदी नहीं थी ! गुजरात के स्वामी दयानंद सरस्वती ने हिंदी को राष्ट्रीय एकता को पुष्ट करने वाली कड़ी के रूप में देखा था और उनके इस काम को बंगाल से बंकिम चन्द्र चटर्जी, सुभाष चन्द्र बोस और रविंद्रनाथ टैगोर आगे बढ़ा रहे थे तो गुजरात से महात्मा गांधी ! महाराष्ट्र से बाल गंगाधर तिलक भी इसके लिए प्रयासरत थे ! उर्दू को आधार बनाकर मजहबी एकता दर्शाने के इन प्रयासों का बिषफल तब सामने आया जब अलगाववादी मुस्लिम लीग ने उर्दू का दामन पकड़ लिया ! ये वो वक़्त था जब अपनी मादरी जुबान को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने का मोह छोड़ तमाम राष्ट्रवादी नेता हिंदी के समर्थन में खड़े थे सिवाये मुस्लिम लीग के ! मुस्लिम लीग ने खुला ऐलान कर दिया था कि हिंदी को सम्मान देने का अर्थ होगा हिन्दू आधिपत्य को मान लेना और इसी के तहत उसने घोषणा कर दी कि जब तक कांग्रेस हिंदी की जगह उर्दू को प्रतिष्ठित नहीं करेगी हम हिंदी का विरोध करेंगे ! हद तो ये हो गई जब मुहम्मद अली जिन्ना ने एक कदम आगे बढ़कर पकिस्तान के अपने मांग को पुष्ट करने वाली दलीलों में उर्दू को भी घसीट लिया ! 1944 में महात्मा गाँधी को लिखे अपने पत्र में उन्होंने द्विराष्ट्रवाद की अपनी अवधारणा को बल देने हेतु उर्दू को हथियार बनाया और दलील देते हुए कहा –

“हम 10 करोड़ लोगों के एक मुक़म्मिल राष्ट्र हैं, हम अपनी विशिष्ट संस्कृति, सभ्यता, भाषा, साहित्य, कला, भवन निर्माण कला, नाम, उपनाम, मूल्यांकन की समझ, अनुपात, क़ानून, नैतिक आचार संहिता, रिवाज़, कलेंडर, इतिहास, परंपरा, नज़रिया, महत्वाकांक्षाओं के चलते एक राष्ट्र हैं. संक्षेप में हमारा जीवन पर और जीवन के बारे में एक विशिष्ट नज़रिया है लिहाजा किसी भी अंतर्राष्ट्रीय नियम क़ायदे-क़ानूनों के मद्देनज़र हम एक राष्ट्र हैं.”

जिन्ना ने गाँधी जी को लिखे अपने इस पत्र में जिस भाषा का जिक्र किया वो उर्दू थी ! जिन्ना ने उर्दू को अपने मजहब का आधार और भारत विभाजन की अपने मांगों के लिए एक मजबूत तर्क बना लिया जबकि उर्दू की तारीख अगर देखी जाये तो उर्दू मुसलमानों की धर्म भाषा कभी नहीं रही थी और कभी हो भी नहीं सकती थी क्यूंकि मुसलमानों के लिए अगर कोई भाषा धर्मभाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो सकती है है तो वो है अरबी क्यूंकि पवित्र कुरान अरबी में है ! जहाँ तक उर्दू की बात है तो न तो मुस्लिम सल्तनत युग में और न ही मुग़ल काल में भी कभी इसे राजकीय भाषा का दर्जा हासिल था ! बाबर से लेकर औरंगजेब तक सब के सब तुर्की अथवा फ़ारसी बोलते थे और उर्दू से उनका दूर-२ तक नाता नहीं था ! अकबर के समय में तो बाकायदा फ़ारसी को राजभाषा घोषित किया गया था ! जिन्ना द्वारा उर्दू को विभाजन की दलील के रूप से पेश करना दूसरा वक़्त था जब मुस्लिमों ने उर्दू को सिर्फ अपना माना था !

उर्दू को मुसलमान बनाने की एक और कोशिश –

उर्दू मुसलमानों की और इस्लाम की जुबान है इस भाव पर तीसरी मुहर तब लगी जब पाकिस्तान बना ! उस वक़्त के पूर्वी पाकिस्तान के लोग बंगाली बोलते थे, पश्चिमी पकिस्तान में पंजाबी, बलूच, पश्तो का चलन था और उर्दू बोलने वाले प्रायः वही लोग थे जो बिहार, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों से हिजरत कर पकिस्तान गए थे यानि जो भाषाई लिहाज से पाकिस्तान में अल्पसंख्यक थे ! यहाँ भी जिन्ना ने उर्दू को पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा बनाने की जिद पकड़ ली और बहुसंख्यक पाकिस्तानियों की भाषाई भावनाओं की अनदेखी करते हुए महज इस्लाम के नाम पर उर्दू को उनपर थोप दिया !

पहले उर्दू को अपना मानकर हिंदी को हिन्दुओं की जुबान मानते हुए उसका विरोध, फिर द्विराष्ट्रवाद सिद्धांतों की दलीलों में उर्दू को लेकर भारत विभाजन और फिर एक इस्लामी मुल्क के राज्यभाषा के रूप में उर्दू को प्रतिष्ठित करने के कार्यों ने हिन्दुओं और उन मुसलमानों के मन में (जो उर्दू को हिन्दू-मुस्लिम मुहब्बत की सांझी जुबान मानते थे) यह बात डाल दी कि उर्दू तो मुसलमानों की जुबान है जो एक इस्लामी मुल्क के स्थापना का आधार है !

हिन्दुस्तानी मुसलमानों की गलती

पकिस्तान बनने के बाद जो मुसलमान हिंदुस्तान में रह गए थे उनके ऊपर यह जिम्मेदारी थी कि वो मजहबी लबादा ओढ़े उर्दू को पुनः हिन्दू-मुस्लिम मुहब्बत की जुबान रूप में पेश करते पर वो तो इन मामलों में जिन्ना के ही दृष्टिहीन अनुचर साबित हुए ! ऐसा कहना जायज इसलिए है क्यूंकि आजादी के बाद से जितने भी उर्दू अख़बार निकाले गए या आज भी जितने उर्दू टीवी चैनल है उन सबका व्यवहार पूर्णतया इस्लामी है ! आप कोई भी उर्दू अखबार उठा लें उसके अन्दर सम्पादकीय का पन्ना खोलें तो बस हिन्दुवादी संगठनों की आलोचना, भाजपा और संघ के विरोध में लिखे आलेख, मुस्लिम समाज की समस्यायें और मुसलमानों के खिलाफ हो रही नाइंसाफी के ऊपर लिखे आलेख ही नज़र आतें है ! आप कभी भी इन अख़बारों के सम्पादकीय में देश के दूसरे समुदायों की समस्याओं पर आलेख या फिर भाजपा आदि पार्टियों के अच्छे फैसलों और कामों का सटीक विश्लेषण नहीं पाएंगे ! उर्दू अखबारों के पत्रकार और संपादक (कुछ अपवाद को छोड़ कर) भी जबरदस्त सांप्रदायिक मनोवृति के होते हैं, तथ्यों की सही छानबीन कर खबर पेश करने के बजाए उनका नजरिया पूर्वाग्रहग्रस्त और संकीर्ण होता है ! उदहारण के लिए अज़ीज़ बर्नी साहब जो राष्ट्रीय सहारा उर्दू के संपादक रहे हैं ने मुंबई पर हुए आतंकी हमले के पश्चात “26/11 का षड़यंत्र और आर0 एस0 एस” नाम से एक किताब लिखी थी और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हुए ये साबित करने का झूठा प्रयास किया था कि मुंबई पर हुए आतंकी हमले के पीछे पकिस्तान का नहीं वरन संघ का हाथ था ! इस किताब के विमोचन के अवसर पर आये मौलानाओं ने बर्नी साहब की इन कोशिशों के बारे में कहा था कि अज़ीज़ साहब जो काम कर रहे हैं यही तो जिहाद-बिल-कलम है ! बाद में जब मुंबई हमले के षड़यंत्र सामने आयें तो बर्नी साहब ने अपने उस कूड़ा किताब के लिए लिखित माफ़ी मांगी ! (इस बात का जबाब भी बर्नी साहब के पुस्तक विमोचन पर उपस्थित मौलानाओं से अपेक्षित है कि ये कौन सा जिहाद-बिन-कलम है जिसे करने के लिए बाद माफ़ी मांगनी पड़े ? क्या ये सब इस्लाम का मजाक नही बनाता?) अजीज़ साहब एक और उर्दू अख़बार अजीजुलहिन्द भी निकालते हैं, हालिया लोकसभा चुनाव परिणामों में मोदी के जीत पर इन साहब ने अपने अखबार के पहले पन्ने को पूरा काला (जो विरोध का प्रतीक है) रखते हुए इसे भारत के इतिहास का सबसे काला दिन बताया ! एक पूर्ण बहुमत से निर्वाचित व्यक्ति और सरकार का आकलन अपने उर्दू अख़बार में एक पत्रकार और संपादक के नजरिये से न कर मज़हबी लिहाज से करना क्या उर्दू को मुसलमानों का मुखपत्र नहीं बनाता और क्या ये देश के लोगों ने जनादेश का अपमान करना नहीं है ? मोदी के लाखों चाहने वाले जब अज़ीज़ बर्नी साहब के इस कृत्य को देखेंगे तो क्या उर्दू उन्हें मुहब्बत की जुबान लगेगी ? यही तंग नजरिया इन अख़बारों का देश में होने वाले सांप्रदायिक दंगों को लेकर भी है जब उर्दू अखबारों के पत्रकार इन दंगों की एकतरफा रिपोर्टिंग करते हैं !

उर्दू अखबारों में हज, रोज़ा, ज़कात, नमाज़, ईद, बकरीद, आबे-जमजम, मस्जिदे-हरमैन को लेकर तो खूब आलेख छपते हैं पर कभी किसी दूसरे समुदायों की परम्पराओं, तीर्थों, पर्व-त्योहारों और रीति-रिवाजों पर आलेख नहीं छपते ! अहमदियों को लेकर शेष मुस्लिम समाज का जो नजरिया है वही नजरिया अहमदियों के बारे में उर्दू अख़बारों का भी है ! इन अख़बारों में अहमदियों के बारे में सिर्फ बिषवमन ही किया जाता है, यानि अहमदियों के प्रति भी इनकी दृष्टि निष्पक्ष न होकर पूर्वाग्रहग्रस्त ही है ! भारत के अन्य अखबार और पत्र-पत्रिका जहाँ आर्याभट्ट, वराहमिहिर, भास्कराचार्य, चरक और सुश्रुत जैसे महान बिभूतियों पर अपने स्तंभों में जानकारी देते हैं वही उर्दू अखबार कभी इब्ने-सीना और जाबिर इब्ने-हैयान जैसे इस्लामिक नामों से आगे नहीं बढ़ पाते ! इन अख़बारों पर अंकित तारीख हिजरी संवत अथवा ग्रेगरी संवत् के होते हैं, उनमें इस मुल्क के किसी संवत् (विक्रमी, युगाब्द अथवा शक संवत्) पर आधारित तिथि नहीं दी जाती ! ये भेदभाव सिर्फ इन अखबारों के ऑनलाइन संस्करणों में भी स्पष्ट दिखता है ! उर्दू अखबारों के ऑनलाइन संस्करणों में कुरान, हदीस, इस्लामी मालूमात के section तो रहते हैं पर बाकी मजहबों के धर्मग्रंथ तो दूर उनके बारे में कोई जानकारी तक नहीं होती !

यही हाल उर्दू टीवी चैनलों का भी है, इन चैनलों की सुबह नात-पाक या तिलावते-कुरान से होती है, कार्यक्रमों का आगाज़ और समाप्ति ‘अस्स्लामअलैकुम’, आदाब, शब्ब-खैर या खुदा-हाफिज जैसे इस्लामिक संबोधनों के साथ होती है और लगभग सारे कार्यक्रम इस्लाम की छाप लिए होते हैं, समसामयिक बिषयों पर जब चर्चा होती है तो प्रायः इस्लामी समाज के विषय ही केंद्र में रहतें हैं और मुसलमान विद्वानों को ही इन कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाता है ! इन चैनलों पर आने वाले समाचारों में अधिकांश फोकस इस्लामिक विषयों पर और मुस्लिम मुल्कों पर ही रहता है !

अपने अख़बारों और चैनलों पर देश के बाकी तमाम समुदायों की लगातार उपेक्षा करते चले जाना और फिर उनसे ये उम्मीद करना कि वो उर्दू को सर-आँखों पर बिठाएंगे एक मूर्खतापूर्ण सोच ही हो सकती है ! पर इतना जरूर है कि इन सबके बाबजूद हिन्दुओं में मुझ जैसे लाखों लोग हैं जो इनकी तमाम उपेक्षाओं के बाबजूद उर्दू से बेइंतहा मुहब्बत करने वाले हैं और इसकी बेहतरी की चाहत रखते हैं ! इसलिए आज मुसलमानों को अगर सच में उर्दू के बेहतरी चाहिए तो उसे ये समझना होगा कि भाषा को किसी एक मजहब के दायरे में सीमित करना कही से भी जायज नहीं है ! अगर वैश्विक स्तर पर मुसलमानों की बात की जाये तो धार्मिक लिहाज से अरबी जरूर उनकी धर्मभाषा है (क्यूंकि पवित्र कुरान अरबी में है) परन्तु अरबी केवल मुसलमाओं की भाषा है ऐसा कहना भी गलत है क्यूँकि अरबी अरब के आस-पास के मुल्कों में बसने वाले कई ईसाइयों की भी मादरी जुबान है ! अरब के पड़ोस में ईरान, इराक और तुर्की जैसे बड़े मुस्लिम मुल्क है पर उनकी जुबान तो अरबी नहीं है ! यही बात उर्दू के संबंध में भी उतनी ही सत्य है ! उर्दू मुसलमानों की जुबान है ये जुमला ही उर्दू की बदहाली का सबसे बड़ा कारण है ! उर्दू अखबार और टीवी चैनल समाज के तमाम धर्मों और समुदायों की समस्याओं, उनकी तहजीब, परम्पराओं को अपने पत्र और कार्यक्रमों में स्थान दे और उपरोक्त तमाम बिन्दुओं पर आत्मविश्लेषण करें ये उर्दू के हक में सबसे बेहतर कोशिश होगी और इसी से उर्दू इस्लामी लिबास से बाहर आएगी और इसके चाहने वालों की संख्या में भी इजाफा होगा !