yoga

by — शकील शम्सी

इन दिनों पूरे देश में योग पर जबरदस्त बहस चल रही है क्योंकि 21 जून को योग दिवस मनाया जा रहा है और इस दिन भारत सरकार गीनज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में यह दर्ज कराना चाहती है कि एक दिन में एक साथ इतने लोगों ने योग किया। यह तो एक दिन की बात है, लेकिन स्कूलों और कार्यालयों में योग को अनिवार्य घोषित किए जाने की भी कोशिशें हो रही हैं जिसकी वजह से कई मुस्लिम संगठन सहित ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड योग का विरोध करने में लग गई हैं, यानी विषय बातचीत योग है तो मैं कैसे चुप रह सकते हैं? यहाँ पर मैं अपने पाठकों के सामने कुछ महत्वपूर्ण बातें पेश करना चाहता हूँ। पहली बात तो यह कि मूल शब्द योग नहीं बल्कि योग है। जिस तरह अंग्रेजों ने अशोक को अशोक राम को रामा और कृष्ण को कृष्णा दिया उसी तरह उन्होंने योग को योग दिया। योग का मतलब होता है जोड़ना जैसे एक और एक दो। योग वास्तव में केवल एक व्यायाम प्रक्रिया नहीं है बल्कि हिंदू ाज़म का एक दर्शन है जो आत्मा (आत्मा) परमात्मा (ईश्वर) और शरीर (शरीर) को ध्यान (ध्यान) के द्वारा एक साथ जोड़ने की कोशिश की जाती है .ीोग वैसे तो कई प्रकार का होता है लेकिन इसमें दो तरीके अधिक प्रसिद्ध हैं पहला तो है ” हट योग ” जिसके आविष्कारक हिंदुओं के भगवान शंकर जी थे। दूसरे प्रकार के योग को ‘राज योग’ ‘कहा जाता है, इसका आविष्कारक पता नजली नाम के योग गुरु को बताया जाता है। योग हिंदुओं के अलावा बुधवार धर्म के लोगों में भी सदियों से प्रचलित है, लेकिन यह केवल एक व्यायाम हो ऐसा नहीं है। उसकी धार्मिक स्थिति भी रही है और धार्मिक शब्द का भुगतान भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है .मसलमानों को इसके बारे में ग्यारहवीं सदी में पता चला जब अबुरिहाने अलबेरूनी नाम के एक मुस्लिम पर्यटक भारत में 16 साल तक रहने और यहां के साधोउं को सवेरे सवेरे एक विशेष प्रकार के व्यायाम करते देखा तो उसके बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त करने की कोशिश की। अलबेरूनी ने पतानजली पुस्तक योग सूत्र का अनुवाद भी किया जिससे पता चला कि योग एक व्यायाम का तरीका नहीं है, लेकिन एक धार्मिक दर्शन भी है।

इसके अलावा रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कुछ वर्षों बाद जब भारत में सूफ़ी संतों किराम और प्रचारकों इस्लाम की आवाजाही बढ़ी और उन्होंने यहां अपने प्रवास के दौरान योग करने वाले योगियों लिंक अनुशासन बढ़ाया तो उन्होंने भी योग को विकल्प है, लेकिन केवल योग के व्यायाम हिस्सा कुछ ऐतिहासिक संदर्भों में मिलता है कि मुगल बादशाह अकबर ने योग की शिक्षा के संरक्षण और इसमें काफी गहरी रुचि दिखाई, लेकिन यह भी सच है कि आम मुसलमानों ने योग को अधिकृत नहीं किया, शायद इसकी वजह यह थी कि पांच बार की जो प्रार्थना उन पर कर्तव्य की गई थी और जो नमाज़ें वे अदा करते थे उनके दौरान ही इतनी व्यायाम हो जाता था और किसी भी व्यायाम की जरूरत नहीं थी। स्वयं हिन्दुओं में भी योग आम आदमियों के जीवन से दूर था और यह केवल साधों संतों और उच्च जाति के लोगों के जीवन का हिस्सा माना जाता था। इसलिए योग की परंपरा लगभग खत्म हो गई। बीसवीं सदी में प्रसिद्ध आर्य समाजी नेता स्वामी विवेक नन्द उसके अहयाय की कोशिशें शुरू कीं। आजादी के बाद जब सरकारों में साधु संतों और योगियों का हस्तक्षेप बढ़ा तो योग को आधिकारिक तौर पर बढ़ावा दिए जाने की मुहिम शुरू हुई। योग आश्रम आदि स्थापित होने लगे और फिर देश के बाहर बसे धार्मिक नेताओं और योग गरोउं मानसिक तनाव में घर एस हुए पश्चिमी देशों के लोगों को टीनशन से निजात दिलाने के नाम पर योग को योग कला सज़ के नाम से परिचय और गंभीर मानसिक तनाव का शिकार हो चुके पश्चिमी देशों के लोगों को आराम बख्श कर अरबों रुपये भी कमाए। योग को बढ़ावा देना संघ परिवार की बुनियादी नीतियों का हिस्सा भी है, इसलिए जहां भाजपा की सरकार स्थापित हुई वहाँ योग को स्कूल के बच्चों के लिए अनिवार्य करार देने का सिलसिला भी शुरू कर दिया, उसमें सबसे मतनाज़ह मामला ” सूर्य नमस्कार ‘का था क्योंकि मुसलमानों के पास सूर्य कोई देवता नहीं है बल्कि भगवान की रचनाओं में से एक है, इसके अलावा योग के दौरान मंत्रों और रमज़हबी शब्द का भुगतान भी मुसलमानों में वैध नहीं है।

व्यायाम के दुनिया भर कीं लाखों तरीके मौजूद हैं, उनमें से एक योग भी है। उसे लेने या न करने पर चर्चा की एक वजह यह है कि कुछ लोग समझते हैं कि मंत्रों और रिपोजा पाठ के बिना योग नहीं हो सकता, खुद मेरे साथ ऐसा ही कुछ हुआ। मुझे 1997 में एक दोस्त ने योग करने की सलाह दी और उसकी इतनी मानचित्रण कीं कि मुझे भी लगने लगा कि मेरे सभी समस्याओं का समाधान योग के उसनूं में मुजमर है। उन्होंने श्री फोर्ट के स्पोर्ट्स के परिसर में एक योग गुरु से शुरू भी करवाया और दूसरे ही दिन खुद को फिट रखने हेतु प्रार्थना सुबह पढ़कर योग स्थल पर पहुंच गया। मैं योग गुरु निर्देश सुनी लेकिन जैसे ही उन्होंने सूर्य की ओर आंखें बंद करके सारे लोगों को बिठाया और ओम ओम जपने के लिए कहा मैंने चुपके से चप्पल उठाई और उनकी बंद आँखों का फायदा उठाकर निकल लिया। जब मेरे दोस्त ने भागने की वजह पूछी तो मैंने कहा कि सूर्य नमस्कार या ओम की सदा लगाने की मेरे धर्म में अनुमति नहीं है तो उन्होंने कहा कि भागने की क्या जरूरत थी तुम इन दोनों बातों के बिना भी योग कर सकते थे मगर फिर भी फिर से योग करने नहीं गया। इसके बाद योग करने की मेरी रही सही हिम्मत तब टूट गया जब लखनऊ दूरदर्शन में मेरे एक दोस्त संतोष सेठ के निधन की खबर प्राप्त हुई। संतोष अच्छे खासे स्वस्थ थे लेकिन एक दिन छत पर अकेले में योग करते हुए उन्हें दिल का दौरा पड़ा और मर गया मगर योग के क्षेत्र में मेरे अनुभव के विपरीत मेरी पत्नी को योग में जबरदस्त विश्वास है, वह टीवी पर रामदेव कार्यक्रम देख देखकर योग के कई आसन सीख लिए, लेकिन मेरी पत्नी ने योग के दौरान न तो कभी सूर्य नमस्कार किया और न ओम का जाप किया क्योंकि बाबा रामदेव ने इस मामले को हल करते हुए कहा था कि मुसलमान ओम शब्द कहने के बजाय अल्लाह का नाम लें और सूर्य नमस्कार न करें यानी मुसलमान उसे केवल एक व्यायाम के रूप में अप। अब हाल ये है कि हमारी पत्नी हमारी हर बीमारी का इलाज योग के माध्यम से हमें बताती हैं लेकिन हम कपाल भारती, ानोलोम ोलोम और अन्य आसन आज तक न कर सके।

यह भी सच है कि योग के कारण हमारी पत्नी प्रार्थना रोज़े में कोई फर्क नहीं पड़ा। वैसे भी कई मुस्लिम देशों में अब योग की कलासज़ होने लगी हैं और कई मुसलमान ऐसे भी हैं जो योग गुरु बन गए हैं। फेसबुक पर मेरे एक दूसरे जो देहरादून के किसी योग आश्रम में योग की शिक्षा भी देते हैं। इसलिए यह आरोप लगाना कि सभी मुसलमान योग का विरोध कर रहे हैं सरासर गलत है, क्योंकि कई मुस्लिम घरों में योग आज व्यायाम का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है। दूसरी बात यह है कि मुसलमान योग की नहीं बल्कि योग पर धार्मिक लबादा चढ़ाए जाने का विरोध कर रहे हैं, लेकिन इस पर गंभीरता से चर्चा करने के बजाय योगी आदित्यनाथ जैसे लोग जहरीले बयान देकर योग को विवादास्पद बनाने की चिंता कर रहे हैं। हमारा मानना ​​है कि जिस तरह आयुर्वेदिक इलाज के तरीके वेदों में बताए गए हैं जो हिंदुओं की धार्मिक किताबें हैं फिर कभी किसी मुसलमान ने नहीं कहा कि वे आयुर्वेदिक इलाज नहीं करेगा हमारे विचार में योग पर भी धर्म का लेबल नहीं लगाया जाना चाहिए । योग मनुष्य के कल्याण का एक स्रोत है उसे किसी धर्म से जुड़े कर इसके महत्व घटा ना नहीं चाहिए। खुशी की बात है कि भारत सरकार इस बात पर राजी हो गई है कि सूर्य नमस्कार अब नहीं होगा उसे मंत्रों के जाप के संबंध में भी परिभाषित कर देना चाहिए कि जो लोग चाहते ओम कहीं और जो लोग चाहते अल्लाह अल्लाह करें। कई योग गुरु यह भी कहते हैं कि प्रार्थना के दौरान गठन, झुकने और सजूद भी योग की शिक्षाओं का हिस्सा हैं और एक प्रकार का आसन हैं। भाजपा के वरिष्ठ सदस्य मुरली मनोहर जोशी ने भी यह बात कही थी कि प्रार्थना एक प्रकार का योग है इसलिए भारत सरकार को चाहिए कि योग गरोउं मदद लेकर सारे भारतीयों को झुकने और सजूद व रहने के फायदों से अवगत करवाएं इस तरह योग किसी धर्म का लेबल नहीं लगेगा और उसके दिल की गहराई से अपनाएंगे.